शोषित किसानों के सखा जोतीराव फुले और वर्तमान का किसान आंदोलन

आज जिन आशंकाओं को लेकर भारत के किसान सरकार के तीन कृषि कानूनों को लेकर आंदोलनरत हैं, उनके बारे में जोतीराव फुले ने 140 साल पहले आवाज उठाई थी। यह महज संयोग नहीं है। बता रहे हैं अनिल वर्गीज

यदि महात्मा जोतीराव फुले आज जीवित होते तो वे दिलो-जान से किसानों के आंदोलन का समर्थन करते और मराठाओं के लिए आरक्षण की वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं की सुनवाई कर रहे उच्चतम न्यायालय से दो टूक कहते कि “महारों से लेकर ब्राह्मणों तक हम सभी मराठी भाषी, मराठा के नाम से जाने जाते हैं। केवल मराठा शब्द से किसी व्यक्ति की जाति का पता नहीं लगाया जा सकता।” फुले ने एक मराठा कुनबी से ठीक यही कहा था जब उसने अपना परिचय मराठा के रूप में दिया। 

फुले की पुस्तक ‘किसान का कोड़ा’ मराठा-कुनबी (या कुनबी) शूद्र किसानों के हालात का वर्णन करती है। इन किसानों का ब्राह्मण नौकरशाही जम कर शोषण करती थी और अपने हवादार बंगलों में आनंद कर रहे अंग्रेज़ कलेक्टर, मजिस्ट्रेट और जज उनके भ्रष्ट आचरण से अपना मुंह फेरे रहते थे। ‘किसान का कोड़ा’ पुणे के आसपास के ग्रामीण इलाकों में किसानों की सभाओं में फुले द्वारा सन् 1882-83 में दिए गए भाषणों का संकलन है। इस पुस्तक में पांच अध्याय हैं। दीनबन्धु अख़बार ने पूरी किताब को श्रृंखला के रूप में प्रकाशित करना मंजूर किया, लेकिन केवल दो अध्याय ही छापे। इन दो अध्यायों में यह बताया गया था कि प्राचीन धार्मिक ग्रंथों में उन्हें दिए गए विशेषाधिकारों और औपनिवेशिक नौकरशाही में उनके दबदबे – दोनों का ब्राह्मण किस प्रकार शूद्र कृषकों का शोषण करने के लिए उपयोग करते हैं। अख़बार के संपादक नारायण मेघाजी लोखंडे ने शेष तीन अध्यायों को छापने से इसलिए इंकार कर दिया क्योंकि उनमें किसानों के बारे मे ब्रिटिश सरकार की नीतियों की कड़ी आलोचना की गई थी। लोखंडे सरकार के कोपभाजन का शिकार नहीं होना चाहते थे। क्या यही स्थिति आज भी नहीं है? क्या आज भी प्रेस की आज़ादी पर इसी तरह के खतरे नहीं मंडरा रहे हैं? फुले के जीवनकाल में ये तीन अध्याय अप्रकाशित ही रहे।  

पिछले कई महीनों से दिल्ली की सीमाओं पर चल रहे किसानों के आंदोलन को दिल्ली और अन्य स्थानों से मिल रहे भारी जनसमर्थन से हम अंदाज़ा लगा सकते हैं कि फुले ने दमित किसानों की ओर से मोर्चा क्यों सम्हाला होगा। ‘किसान का कोड़ा’ लिखने के एक दशक पहले उन्होंने गुलामगिरी नामक पुस्तक प्रकाशित की थी, जो ब्राह्मणों और उनके धर्मग्रंथों पर तीखा हमला थी। उन्होंने धार्मिक सुधार और शूद्रों व अतिशूद्रों की शिक्षा और प्रगति को बढ़ावा देने के लिए सत्यशोधक समाज की स्थापना भी की थी।  

इस बीच, वे एक कुशल और सफल ठेकेदार भी बन गए थे। वे ब्रिटिश सरकार की निर्माण परियोजनाओं जैसे खडकवासला बाँध, यरवदा पुल और पुणे-सतारा मार्ग पर कटराज घाट सुरंग के लिए निर्माण सामग्री सप्लाई करते थे। सैकड़ों मजदूर फुले के अधीन काम करते थे। उन्हें पुणे नगर निगम का सदस्य भी नियुक्त किया गया था। सभी सदस्यों की नियुक्ति ब्रिटिश सरकार द्वारा की जाती थी। तत्कालीन वायसराय लार्ड लिटन की पुणे यात्रा के लिए शहर को सजाने-संवारने पर एक बड़ी रकम खर्च करने का प्रस्ताव जब नगर निगम की बैठक में प्रस्तुत हुआ, तो 36 सदस्यों में से केवल फुले ने इसका विरोध किया। तब तक फुले और उनकी पत्नी सावित्रीबाई शूद्रों, अतिशूद्रों और लड़कियों के लिए कई स्कूल स्थापित कर चुके थे। उनका तर्क था कि प्रस्तावित धनराशि को गरीब नागरिकों की शिक्षा पर व्यय करना बेहतर होगा। 

फुले अपनी व्यावसायिक गतिविधियों के बीच भी सामाजिक कार्यों को प्राथमिकता देते थे। उन्होंने सत्यशोधक समाज के उद्देश्यों की पूर्ति और उसकी पहुंच को अधिक व्यापक बनाने के लिए सतत कार्य किया। उन्होंने निर्माण परियोजनाओं में काम कर रहे मजदूरों के लिए रात्रि स्कूल खोले। फुले माली जाति के थे और स्वयं भी खेती करते थे। उनकी खेती पुणे के पास थी। उन्होंने खडकवासला बांध से उस इलाके तक पानी सिंचाई हेतु पहुंचाने के लिए एक चैनल बनवाया था। इलाके के अन्य किसान सिंचाई से होने वाले लाभ के प्रति आश्वस्त नहीं थे। उनमें से कुछ को तो यह लगता था कि सिंचाई के बहाने सरकार उनकी ज़मीन हड़पने का उपक्रम कर रही है। फुले ने उनके भ्रम को दूर किया। सिंचाई का लाभ उठाते हुए फुले पूरे साल फल, सब्जियां और गन्ना उगाकर ख़ासा मुनाफा कमाने लगे। उन्होंने एक कम्पनी भी स्थापित की जो फलों और सब्जियों को बिक्री के लिए बंबई ले जाती थी। इस प्रकार, फुले को अपने व्यक्तिगत अनुभव से यह पता था कि कृषि से किसान समृद्ध हो सकते हैं। परन्तु ब्राह्मणों के नेतृत्व वाली शोषणकारी व्यवस्था, जिसके विरुद्ध अंग्रेज़ सरकार कोई कदम नहीं उठा रही थे, के चलते किसान कंगाल हो रहे थे। 

किसानों की बदहाली 

सन 1882 में फुले और सत्यशोधक समाज के अन्य कार्यकर्ताओं ने पुणे के आसपास के ग्रामीण इलाकों का भ्रमण शुरू किया। इन यात्राओं में उन्हें कुनबी किसानों के हालातों को समझा, कई बड़ी सभाओं को संबोधित किया और ब्राह्मणों व साहूकारों के बहिष्कार के लिए लोगों को गोलबंद किया। फुले ने अपनी किताब ‘किसान का कोड़ा’ में लिखा कि किस प्रकार ब्राह्मण हर कर्मकांड का उपयोग किसानों की कड़ी मेहनत की कमाई को लूटने के लिए करते हैं। “आर्य भट्ट और ब्राह्मण अपने संस्कृत स्कूलों में शूद्र किसानों की संतानों को भर्ती नहीं करते। हाँ, वे अपने प्राकृत मराठी स्कूलों में उन्हें भर्ती करते हैं। उनके मासिक वेतन के अलावा, इन बच्चों के अभिभावकों को हर अमावस्या और पूर्णिमा को उनके भोजन की व्यवस्था करनी होती है तथा कई त्योहारों पर उन्हें अन्न भी भेंट करना पड़ता है। यहां तक कि बच्चे स्कूल में खाने के लिए जो लाते हैं, उसका चौथाई हिस्सा भी ब्राह्मण शिक्षकों का होता है। वे उन्हें अक्षर ज्ञान देते हैं और थोडा-बहुत गणित पढ़ाते हैं … वे उन्हें इस योग्य भी नहीं बनाते कि वे अपने घर खर्च का हिसाब-किताब रख सकें। ऐसे में वे मामलतदार के दफ्तर में घुस भी कैसे पाएंगे? क्लर्क भी कैसे बन पाएंगे?”  

जोतीराव फुले; दिल्ली और उत्तर प्रदेश की सीमा स्थित ग़ाज़ीपुर में आन्दोलनरत किसान

ब्रिटिश सरकार द्वारा लागू की गयी लगान व्यवस्था ने कुनबी पाटिलों, जो परंपरा से गांव के वंशानुगत मुखिया हुआ करते थे, का दबदबा कम कर दिया था और गांव के ब्राह्मण लेखाकार, जो कुलकर्णी कहे जाते थे, को भू-राजस्व से जुड़े मामलों का प्रभारी बना दिया था। फुले ने बताया है कि किस प्रकार ब्राह्मण कुलकर्णी और महाजन, ब्राह्मण अधिकारियों और कर्मचारियों, जिनका औपनिवेशिक नौकरशाही में वर्चस्व था, से सांठगांठ कर किसानों के बीच विवाद और झगड़े करवाते थे तथा फिर इन विवादों को निपटने के नाम पर किसानों की बचत का ख़ासा हिस्सा चट कर जाते थे। किसी भी विवाद के प्रकरण के ब्रिटिश अधिकारियों, मजिस्ट्रेटों या जजों तक पहुंचने से पहले ब्राह्मण दस्तावेजों में हेराफेरी कर उस पक्ष का प्रकरण मज़बूत कर देते थे जो उन्हें अधिक रिश्वत देता था। ब्रिटिश अधिकारी किसानों की बदहाली के कारणों को समझने का कोई प्रयास नहीं करते थे। इससे किसान कर्ज के दुष्चक्र में फंस कर कंगाल हो जाते थे। तुर्रा यह कि “कुछ अति-उत्साही भारतीय सरकारी कर्मचारी … ये अफ़वाहें फैलाते हैं कि किसान कर्ज के जाल में इसलिए फंसते हैं क्योंकि वे शादियों में अनापशनाप खर्च करते हैं।”   

‘किसान का कोड़ा’ पुस्तक किसानों के साथ होने वाले अन्यायों का मर्मस्पर्शी वर्णन करती है। फुले लिखते हैं, “एक दिन एक किसान कलेक्टर के डेरे से अपने गांव की तरफ जा रहा था। वह नदी किनारे उगे पेड़ों के झुरमुट के पास से गुज़र रहा था। मौसम अच्छा था और मंद-मंद हवा बह रही थी। परंतु किसान गुस्से में अपने दांत किटकिटा रहा था। उसकी उम्र चालीस के आसपास रही होगी। वह हताश नज़र आ रहा था … करीब दो बजे दोपहर वह अपने घर पहुंचा। वह सीधे रसोईघर में गया। उसने खूंटे पर टंगी एक चादर ज़मीन पर बिछाई और लपेटे हुए कंबल को तकिया बनाकर, सोने के लिए लेट गया। वह कलेक्टर के साथ अपनी मुलाकात के बारे में सोच रहा था। ‘वो अपने चाय-नाश्ते में व्यस्त था, उसके पास मेरा सच सुनने का समय ही नहीं था। उसने मुझे मेरी किश्त कुछ देर से चुकाने की इज़ाज़त भी नहीं दी।’ उसे नींद नहीं आई और वह सीने पर हाथ रखकर खुद से ऐसे बातें करने लगा मानो वह कुछ सनक गया हो। वह बडबडा रहा था, ‘दूसरे गांववालों की तरह मैंने भट्ट मुलाजिमों की जेब गर्म नहीं की, इसलिए उन्होंने गोरे अफसर से कह कर मेरा टैक्स दोगुना करवा दिया। उसी साल बारिश भी कम हुई और मेरे खेत और बगीचे धूप ने जला डाले। फिर मेरे पिता अचानक चल बसे। कर्मकांडों में काफी पैसा खर्च हो गया …”

अगर भारत सरकार द्वारा बनाए गए तीन नए कृषि कानूनों को लागू किया गया तो ऐसे दृश्य गांव-गांव में दिखेंगे। किसान अपनी फसल के खरीदारों से अनुबंध करेंगे और जाहिर है कि दोनों में विवाद होंगे। जब किसान एसडीएम और कलेक्टर से इन विवादों की शिकायत करने जाएंगे तो उन्हें खाली हाथ लौटना होगा क्योंकि नए कानून उन्हें विवादों को अदालतों में ले जाने का अधिकार ही नहीं देते।    

फुले बताते हैं कि ब्रिटिश सरकार की नीतियां किस प्रकार किसानों का खून चूस रहीं हैं। वे लिखते हैं कि “जब किसान अपनी फसल बेचने निकलता है तो उसे हर छह मील पर टैक्स चुकाना होता है।” किसान लकड़ी और खाद्य सामग्री के लिए जंगलों पर निर्भर हैं, परंतु जंगलों को घेर दिया गया है और उन चरागाहों को भी, जहां वे अपने मवेशी चराते हैं।

आनुपातिक प्रतिनिधित्व

फुले केवल समस्याओं का वर्णन ही नहीं करते,बल्कि हल भी सुझाते हैं। वे लिखते हैं, “चूंकि गोरे कर्मचारियों को कुछ ख़ास पता नहीं रहता, इसलिए बड़ी संख्या में भट्ट ब्राह्मणों को सरकारी पदों पर नियुक्त किया जाता है। इससे उन्हें खेतों में कमरतोड़ मेहनत नहीं करनी पड़ती और ना ही उनकी महिलाओं को अपना पेट भरने के लिए फसल बेचने बाज़ारों के चक्कर काटने पड़ते हैं। किसान भोलेभाले होते हैं और भट्ट ब्राह्मण जातिगत विभेदों और उंच-नीच का भरपूर फायदा उठाते हैं। अतः ब्राह्मण – चाहे वे सरकारी कर्मचारी हों, कथा वाचक हों या स्कूल अध्यापक – वे सभी दिन रात अपनी सारी कुटिलता का इस्तेमाल यह सुनिश्चित करने के लिए करते हैं कि ये विभेद और उंच-नीच समाप्त न हों। इसलिए जब तक किसानों के बच्चे सरकारी नौकरी पाने के लायक योग्यता हासिल नहीं कर लेते तब तक सरकारी नौकरियों में ब्राह्मणों को उनकी जनसंख्या के अनुपात में ही नियुक्त किया जाना चाहिए।” क्या यहां फुले दूसरे शब्दों में आरक्षण और सरकारी नौकरियों में आनुपातिक प्रतिनिधित्व की बात नहीं कर रहे हैं? वे आगे लिखते हैं, “और जब सारे गांवों में शिक्षित और योग्य पाटिल हो जाएंगे तब कुटिल भट्ट कुलकर्णी किसानों को एक-दूसरे से लड़वा नहीं पाएंगे और ना ही किसान एक दूसरे के खिलाफ मुक़दमे करेंगे। इससे हमारी सरकार को फायदा होगा क्योंकि तब किसान अभी से ज्यादा टैक्स दे पाएंगे और पुलिस व न्याय विभाग पर अनौचित्यपूर्ण बोझ कम होगा।”  

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आज हमारे देश की 60 प्रतिशत जनसंख्या अपनी आजीविका के लिए कृषि पर निर्भर है। हमारे सकल घरेलू उत्पाद में कृषि का योगदान 20 प्रतिशत है। आंदोलनरत किसानों की मुख्य शिकायत यह है कि तीनों कानूनों का मुख्य लक्ष्य पूंजीपतियों को लाभ पहुंचाना है। दूसरी ओर, सरकार का तर्क है कि इन कानूनों से कृषि का यंत्रीकरण होगा और उत्पादकता और लाभप्रदता में वृद्धि होगी। परंतु जैसे कि गेल ऑम्वेट ‘कल्चरल रिवोल्ट इन ए कोलोनियल सोसाइटी’ में लिखती हैं, “फुले औद्योगिकीकरण को भारत के पिछड़ेपन का इलाज नहीं मानते थे। उनकी मान्यता थी कि भारत जैसे कृषि प्रधान देश में, निर्धनता को दूर करने का एकमात्र तरीका है कृषि को उन्नत बनाना। इसलिए वे चाहते थे कि कृषि में सुधार के लिए सरकार व्यापक कदम उठाए, जिनमें मृदा संरक्षण, तालाबों और बांधों का निर्माण, वैज्ञानिक तरीकों से पशुओं की नस्ल में सुधार और किसानों के लिए विशिष्ट शैक्षणिक कार्यक्रमों का संचालन, जिससे प्रत्येक गांव में ऐसे प्रशिक्षक उपलब्ध हो सकें, जो किसानों को कृषि की आधुनिक तकनीकें सिखा सकें, आदि शामिल हैं। वे प्रगति के ‘ट्रिकल डाउन’ सिद्धांत के विरोधी थे। इस सिद्धांत के अनुसार, समाज के शीर्ष तबके की आर्थिक या शैक्षणिक प्रगति से अंततः पूरे समाज की प्रगति होगी।”

नए कानूनों के बारे में आंदोलनरत किसानों की आशंकाओं को पूरी तरह से दरकिनार नहीं किया जा सकता है। खेती को बाज़ार के हवाले करने के अपने खतरे हैं। आज से 140 साल पहले फुले ने लिखा था, “अगर वर्षा समय पर होती है और फसल का उत्पादन ठीक-ठाक होती है तो किसान अपनी फसल को जंगली और देसी सुअरों से बचा नहीं पाता क्योंकि हमारी शूरवीर सरकार के बुजदिल कर्मचारी किसानों को बंदूकों का इस्तेमाल करने की इज़ाज़त नहीं देते। जो फसल बचती है, उस पर ब्राह्मणों, मारवाड़ी सूदखोरों और गुजराती व्यापारियों और दलालों की नज़र रहती है और वे उसमें से जितना हड़प सकते हैं, हड़प लेते हैं। यहां तक कि व्यापारियों के घरों में काम करने वाले गुजराती ब्राह्मण रसोइयों ने भी गुड़ के कुछ हिस्से पर अपना दावा करना शुरू कर दिया है।”

संदर्भ : 

फुले, जोतीराव. (2002). ‘सिलेक्टेड राइटिंग्स ऑफ़ जोतिराव फुले’, जी.पी. देशपांडे (संपादक). नई दिल्ली : लेफ्टवर्ड बुक्स.   

ओ’ हेन्लोन, रोसालिंड. (2002). ‘कास्ट, कनफ्लिक्ट एंड आइडियोलॉजी: महात्मा जोतीराव फुले एंड लो कास्ट प्रोटेस्ट इन नाइनटीन्थ-सेंचुरी वेस्टर्न इंडिया’. रानीखेत : परमानेंट ब्लैक 

ऑम्वेट. गेल. (2011). क’ल्चरल रिवोल्ट इन ए कोलोनियल सोसाइटी: द नॉन-ब्राह्मण मूवमेंट इन वेस्टर्न इंडिया’. दिल्ली : मनोहर.

(अनुवाद: अमरीश हरदेनिया, संपादन : नवल)


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