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सवर्ण स्त्रियों के कंठ में दलितों के खिलाफ जहर और आचरण में हिकारत क्यों है?

राजेंद्र यादव ने ‘हंस’ (मार्च, 1993) के संपादकीय में लिखा कि शूद्रों और औरतों को एक ही कैटेगरी में रखने का फैसला किसी शूद्र या दलित का नहीं बल्कि मनु और हिंदू धर्मग्रंथों का है। जब उन्होंने कहा कि स्त्रियां भी दलित हैं, तो मृदुला गर्ग जैसी लेखिकाओं ने उनके विरुद्ध मोर्चा खोल दिया था। मृदुला गर्ग का कहना था कि प्रत्येक स्त्री दलित नहीं होती है। बता रहे हैं सुरेश कुमार

अभी पिछले दिनों भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी), खड़गपुर की एक उच्च कुलीन महिला प्रोफेसर ने जाति और वर्ण के दंभ में दलित छात्रों को किस कदर अपमानित किया था उससे देश वाकिफ है। इसके कुछ ही दिन बाद ही एक टीवी कलाकार सवर्ण स्त्री ने कहा कि वह भंगियों की तरह दिखना नहीं चाहती है। इन घटनाओं से याद आया कि सन् 1993 में ‘हंस’ पत्रिका में एक बड़ी दिलचस्प और आकर्षक बहस चली थी कि क्या स्त्रियां भी दलित और शूद्र हैं!

इस बहस की पृष्ठभूमि में प्रेमचंद की जयंती के उपलक्ष में ‘हंस’ पत्रिका द्वारा ‘दलित चेतना और साहित्य’ विषय पर आयोजित संगोष्ठी थी। इस संगोष्ठी में वरिष्ठ लेखिका मृदुला गर्ग ने अपने वक्तव्य में स्त्रियों को शूद्र और दलित की कैटेगरी में रखे जाने का मुखर विरोध किया था। राजेंद्र यादव ने ‘हंस’ (मार्च, 1993) के संपादकीय में मृदुला गर्ग को बताया कि शूद्रों और औरतों को एक ही कैटेगरी में रखने का फैसला किसी शूद्र या दलित का नहीं, बल्कि मनु और हिंदू धर्मग्रंथों का है। जब उन्होंने कहा कि स्त्रियां भी दलित हैं, तो मृदुला गर्ग जैसी लेखिकाओं ने उनके विरुद्ध मोर्चा खोल दिया था। मृदुला गर्ग का कहना था कि प्रत्येक स्त्री दलित नहीं होती है। 

श्रमजीवी व निष्ठावान दलित महिलाएं घृणा की पात्र नहीं

मृदुला गर्ग के कहने का अर्थ था कि सवर्ण स्त्रियां दलित और शूद्र की कैटेगरी में नहीं आती हैं। उन्होंने दावा किया कि जब तक स्त्रियां अपने आपको कम तर मानकर दलित होने की आत्मदया में डूबी रहेंगीं, तब तक वे विद्रोह नहीं कर सकती। मानो दलित होने का मतलब ही गुलाम रहना है। 

दरअसल, हमारे यहां स्त्री विमर्श की नुमाइंदगी अंग्रेजीदां चंद कुलीन स्त्रियां करती आ रहीं हैं, जो जातिवादी परिसरों के प्रति गैर आलोचनात्मक रुख तो रखती ही हैं, साथ ही जातिवादी संरचना को अपनी प्रतिष्ठा का अड्डा भी मानती हैं। बात केवल मृदुला गर्ग की नहीं है, बल्कि नीलम कुलश्रेष्ठ जैसी लेखिकाएं भी स्त्री को दलित और शूद्र से जोड़े जाने का सख्त विरोध करती दिखायी देती है। नीलम कुलश्रेठ ने राजेंद्र यादव पर निशाना साधते हुये कहा कि ‘मैं भी स्त्री को दलितों से जोड़े जाने का विरोध करती हूं। जिस तरह दलितों का पीढ़ी दर पीढ़ी शोषण एक बड़ी साजिश है, उसी तरह स्त्री की शक्ति को नकार कर उसे दलितों से जोड़ना या अपने से कमतर चीज़ बना देना पुरुष अहम की बड़ी साज़िश है।’ 

यह नई व्याख्या नहीं है कि सवर्ण स्त्रियां जातिवादी छाप व्यवस्था के जोखिमग्रस्त इलाकों में उतनी शिद्दत से क़दम नहीं रखती, जितनी उन्होंने पितृसत्ता के उसूलों को उखाड़ फेंकने में दिखाई है। शायद वह भी वर्णधारी हिंदुओं की तरह ही अपनी प्रतिष्ठा और सम्मान जाति-व्यवस्था की परिधि के दायरे में ही देखती हैं। इसमे कोई दो राय नहीं है कि सवर्ण स्त्रियां भारतीय समाज में जाति-व्यवस्था के जोख़िमग्रस्त इलाकों की शिनाख़्त करने के बजाए उससे तालमेल बैठने की कवायद करती नजर आती हैं। जातिअंधता में मशगुल उच्च श्रेणी की स्त्रियां न सिर्फ दलितों और शूद्रों को जाति के चश्मे से हिक़ारत भरी दृष्टि देखती हैं, बल्कि उन्हें सार्वजनिक तौर पर अपमानित करने में किसी तरह की हिचक महसूस नहीं करती हैं।

सवर्ण स्त्रियां यह बात स्वीकार ही नहीं करती हैं कि ब्राह्मणवादी-शास्त्रवादी व्यवस्था में जो स्थान दलितों और शूद्रों का है, कमोवेश वही दर्जा उनका भी है। शास्त्रवादी नियंताओं ने स्त्रियों को उनके पिता, पति और पुत्र नामक इन टापुओं के अधीन कर दिया था। यही टापू आज भी उनके जीवन को नियंत्रित करते आ रहे हैं। कुछ गिने-चुने धार्मिक अनुष्ठानों को छोड़कर उन्हें पुरुषों जैसे अधिकार प्राप्त नहीं रहे हैं। 

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दरअसल, वर्णवादी व्यवस्था में स्त्री और दलित को अपनी मर्जी से किसी भी क्षेत्र में निर्णय लेने का अधिकार नहीं था। यहां तक कि उच्च कुल की स्त्रियां अपने जीवनसाथी का चुनाव भी अपनी मर्जी से नहीं कर सकती थीं। उनके लिए यह चुनाव भी पुरुषों द्वारा ही किया जाता था। अब भी उच्चकुलीन घरों की स्त्रियों को संचालित करने वाले सवर्ण पुरुष ही होते हैं। यदि कोई जरा सा भी लीक से हटकर चलती हैं तो उनकी औकात सवर्ण पुरुषों द्वारा बता दी जाती है। इसके बावजूद ये स्त्रियां सवर्ण पुरुषों की तरह जातिवादी व्यवस्था में अपनी प्रतिष्ठा समझती हैं। इसलिए उनके विचार और विमर्श में दलित स्त्री को लेकर कोई चिंता और सरोकार नहीं दिखायी देता है। बल्कि होता यह है कि वे काफी हद तक ‘दलित स्त्री विमर्श’ से दूरी बनाकर चलती हैं।

दरअसल, पक्षधरता के अपने खतरे भी होते हैं। दलितों की पक्षधरता के साथ और भी खतरे हैं। सवर्ण स्त्रियां अपने उपर दलित का ठप्पा चस्पा नहीं होने देना चाहती हैं। इससे उनकी प्रतिष्ठा और अहम को धक्का लगता है। इसलिए ऐसी स्त्रियां सवर्ण पुरुषों की तरह ही दलितों और शूद्रों के प्रतिनिधित्व का भी विरोध करती दिखाई देतीं हैं। जब नब्बे के दशक में मंडल कमीशन की सिफ़ारिशे देशभर में लागू हुईं तो सवर्ण स्त्रियों ने जमकर विरोध प्रदर्शन किया था। तब इन स्त्रियों का कहना था कि मंडल कमीशन की सिफ़ारिशे लागू होने से उन्हें बेरोजगार लड़कों से शादी करनी पड़ेगी। बड़ी दिलचस्प बात है कि इन स्त्रियों ने यह नहीं कहा कि हम दलित-पिछड़ों से शादी कर जातिवाद की दीवारों को तोड़ सकेंगीं।

सवाल है कि क्या सवर्ण स्त्रियां यह बात नहीं जानती हैं कि उनकी सामाजिक भागीदारी सुनिश्चित करने में बहुजन नायक व नायिकाओं का बड़ा योगदान रहा है? या वे जानकर भी अंजान बनती हैं? सावित्रीबाई और जोतीराव फुले ने जब सबसे पहले स्त्री शिक्षा को बल देने के लिए बालिकाओं के लिए स्कूल खोला था, तो पाखंडी हिंदुओं ने कैसे उनका अपमान किया था। इसके सौ साल बाद डॉ. आंबेडकर ने सवर्ण स्त्रियों सहित सभी हिंदू स्त्रियों को सबल बनाने के लिए हिंदू कोड बिल प्रस्तुत किया था तो खुद को आर्य कुल का बतानेवाली सवर्ण महिलाओं ने भी उनके विरुद्ध मोर्चा खोल दिया था। आज भी क्या ये स्त्रियां अपने उत्थान में डॉ. आंबेडकर का योगदान मानती हैं? इसका जवाब बहुत जटिल नहीं है। वास्तविकता तो यही है कि उन्हें बौद्धिक जगत और संस्थाओं में नुमाइंदगी करने का जो अवसर मिला है, उसके पीछे डॉ. आंबेडकर का बड़ा योगदान रहा है। इसके बावजूद ये स्त्रियां जाति की ठसक में कभी आरक्षण को, कभी दलितों को सार्वजनिक तौर से भला-बुरा बोलने में किसी भी तरह की कोई हिचक महसूस नहीं करती हैं। इनकी वर्णधारियों से लगातार एक साठगांठ चलती रही है, जिसके नतीजें में जाति व्यवस्था काफी मजबूती से उभर कर सामने आती है। 

ऐसे में दलित स्त्री विमर्शकारों की ज़िम्मेदारी बनती है कि वे इस साठगांठ की कड़ियों को अपने विमर्श के जरिए उघाड़ दें। तभी इस सवाल का जवाब खोजा जा सकता है कि आख़िर, ऐसी कौन सी मनोग्रंथियाँ और दबाव हैं, जिनके चलते उच्च श्रेणी की स्त्रियां वर्णवादियों की तरह दलितों के लिए सार्वजनिक तौर गाली-गलौज की भाषा का प्रयोग करती हैं? और यह भी कि उनके कंठ में दलितों के लिए जो विष भरा है, आचरण में जो हिकारत है, इसके पीछे सवर्ण स्त्रियों की उच्च श्रेणी की मानसिकता के साथ वर्णवादी प्रशिक्षण भी किस हद तक जिम्मेदार है? 

(संपादन : नवल/अनिल/अमरीश)


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लेखक के बारे में

सुरेश कुमार

युवा आलोचक सुरेश कुमार बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से एम.ए. और लखनऊ विश्वविद्यालय से पीएचडी करने के बाद इन दिनों नवजागरण कालीन साहित्य पर स्वतंत्र शोध कार्य कर रहे हैं। इनके अनेक आलेख प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में लेख प्रकाशित हैं।

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