दलितों की वेदना और चेतना को रेखांकित करतीं कंवल भारती की कविताएं

प्रसिद्ध दलित समालोचक कंवल भारती ने काव्य लेखन भी किया है। उनकी एकमात्र कविता संग्रह ‘तब तुम्हारी निष्ठा क्या होती!’ वर्ष 1996 में प्रकाशित हुई। उनकी कविताओं का पुनर्पाठ कर रही हैं ज्योति पासवान

दलित साहित्यकारों में कंवल भारती का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है। हालांकि इनकी मूल पहचान एक आलोचक के रुप में ही है । इनकी 40 से भी अधिक आलोचनात्मक कृतियां हैं। उनकी एकमात्र कविता संग्रह ‘तब तुम्हारी निष्ठा क्या होती!’ है, जिसका प्रकाशन 1996 में बोधिसत्व प्रकाशन से हुआ है। इस कविता संग्रह की भूमिका दलित साहित्यकार ओमप्रकाश वाल्मीकि ने लिखी है। तत्पश्चात निवेदन में कंवल भारती ने अपने विचारों को लिखा है। इस संग्रह के संबंध में कंवल भारती ने लिखा है कि प्रगतिवादी/जनवादी लेखक और दलित लेखक एक-दूसरे के मित्र ही है, अंतर सिर्फ इतना है कि जहां प्रगतिवादी/जनवादी लेखक का एकमात्र शत्रु पूंजीवाद है, वहीं दलित लेखकों ने ब्राह्मणवाद एवं पूंजीवाद दोनों पर प्रहार किया है। 

अपनी कविता संग्रह में डॉ. आंबेडकर के महत्वपूर्ण संघर्षों को स्मरण करते हुए तथा वर्णव्यवस्था, जाति, धर्म एवं सामाजिक विसंगतियों के विरोध में कविताएं संकलित हैं। राजतंत्र एवं लोकतंत्र के व्यवस्था में मानवाधिकार कितनी सीमा तक सुरक्षित हैं, इसकी भी तुलनात्मक अभिव्यक्ति कंवल भारती की कविताओं में हमें मिलती है। साथ ही, सामाजिक नियमों ने दलितों के जीवन को कितना भयावह और यातनापूर्ण बनाया है, इसकी अभिव्यक्ति भी उनकी कविताओं में स्पष्ट रूप से होती है।     

मसलन, कविता संग्रह की पहली कविता ‘चौदह अप्रैल’ है। इस कविता में कंवल भारती डॉ. आंबेडकर के जन्मदिवस 14 अप्रैल को ‘क्रांति दिवस’ कहा है। उनके मुताबिक, यह दिन ऐसे महापुरुष का जन्मदिवस है, जिन्होंने विश्व की सबसे बड़ी क्रांति का सूत्रपात किया था। उन्होंने पत्थरों में भी प्राण फूँक दिये थे। मूकों को भी वाणी प्रदान की, जिसके कारण वे अन्याय, अत्याचार, शोषण और दमन के खिलाफ विरोध किया। अछूतों को लेकर एक सामाजिक मान्यता यह थी कि इनकी छाया पड़ने से पाषाण प्रतिमाएँ भी अपवित्र हो जाते थे और अगर ये अछूत तालाब और कुँए के पानी पी लें तो वह तालाब दूषित हो जाता है। अत: इन्हें पानी पीने जैसे मूल अधिकारों से भी सदियों तक वंचित रखा गया था। डॉ. आंबेडकर ने अछूतों को यह मानवाधिकार दिलाया, तभी दलित एक सामाजिक मनुष्य के तुल्य जीवन जीने के योग्य बन पाये हैं। उनके योगदानों को याद करते हुए ही कवि ने बाबा साहब के जन्मदिवस को ‘ज्योति पर्व’ कहा है। वहीं ‘बलिहारी मन’ कविता में डॉ. आंबेडकर को ‘आधुनिक समाज का शिल्पकार’ कहा है। क्योंकि बाबा साहब ने दलितों के हृदय में स्वाभीमान और मानवीय गौरव की परिभाषा से अवगत कराया। यथा – 

“हे मेरे आधुनिक समाज के शिल्पकार
उसकी अनुभूतियों के चित्रकार
वेदना के संगीतकार
तुझ पर बलिहारी है मन
शत-शतबार।”

कंवल भारती, दलित साहित्यकार व समालोचक

बाबा साहब के द्वारा आरंभ किये गये संघर्ष को कंवल भारती तबतक जारी रखना चाहते हैं जबतक कि मुरझाये पौधे को भी सूरज की रोशनी प्राप्त ना हो जाये। मुरझाये पौधे से इनका तात्पर्य दलितों से है। यथा –  

“जो मुक्ति संग्राम लड़ा था तुमने
वह जारी रहेगा उस समय तक
जब तक कि हमारे मुरझाये पौधे के
हिस्से का सूरज
उग नहीं जाता है।”

अपनी ‘मातृभूमि’ शीर्षक कविता के माध्यम से कवि अपनी बात कहते हैं कि वे दलितों के विकास के विकास के लिए सर्वस्व त्याग कर देना चाहते हैं। यथा – 

“विकसित हो अब नई चेतना
दलित उत्थान लक्ष्य हमारा
अब सारे बलिदान हमारे
अर्पित हो निज के विकास पर ।” 

‘तब तुम्हारी निष्ठा क्या होती?’ कविता में कंवल भारती ने दलितों की अंतर्वेदना को प्रकट करते हुए तथाकथित सवर्ण जाति से ही प्रश्न किया है कि अगर उन्हें भी यातनापूर्ण जीवन जीने के लिये वाध्य किया गया होता, फिर भगवान के प्रति उनकी निष्ठा क्या होती? दलितों के लिये विद्या, वेद- पाठ, यज्ञ निषिद्ध है। अगर उन्होंने वेद, विद्या पढ़ने की धृष्टता की तो उनके जिह्वा को काट दिया जाय। यदि वे यज्ञ करने का दुस्साहस करें तो उनकी सम्पत्ति को जब्त करके यज्ञ स्थल पर ही उनका कत्ल कर दिया जाय। विडम्बना तो यह जानकर दुगुनी हो जाती है कि धर्मशास्त्रों में ही द्विज वर्ग को यह अमानवीय कृत्य करने का अधिकार दिया गया है। स्मृतियों में दलितों को गांवों के बाहर रहने एवं उन्हें सवर्णों के खेतों और घरों में दास-कर्म करने का विधान बनाया गया। इतना ही नहीं उनकी आने वाली पीढ़ियां भी सेवक बने रहने के लिये वाध्य हैं। कंवल भारती लिखते हैं – 

“तुम ब्राह्मण, ठाकुरों और वैश्यों के लिये
विद्या, वेद-पाठ और यज्ञ निषिद्ध है।
यदि तुम सुन लो वेद का एक भी शब्द
तो कानों में डाल दिया जाय पिघला शीशा।
यदि वेद-विद्या पढ़ने की करो धृष्टता,
तो काट दी जाय तुम्हारी जिह्वा
यदि यज्ञ करने का करो दुस्साहस,
तो छीन ली जाय तुम्हारी धन-समपत्ति,
या, कत्ल कर दिया जाय तुम्हें उसी स्थान पर ।
तब, तुम्हारी निष्ठा क्या होती?” 

अतीत में इन्हीं धार्मिक-विधान एवं विनियम के कारण दलितों ने यातनापूर्ण एवं अमनावीय जीवन जीया। इसलिए कवि को अतीत के रुढ़ीवादी नियमों से घृणा है और उन कवियों के आधुनिकता बोध पर आश्चर्यजनित होकर अपनी कविता ‘आधुनिकता बोध’ में लिखा है – 

“कितना अनूठा है इन कवियों का आधुनिकता बोध
जो तलाशता है
अतीत की पुरातन रुढ़ियों में मानवतावाद
राजतंत्रों में न्याय और शासन” 

अतीत के उस युग को कवि ने ‘अंधा-युग’ कहा है। आगे शूद्रों की यथास्थिति को उद्घाटित करते हुए लिखा है – 

“जिसमें बंद थे शूद्रों की उन्नति के मार्ग
यदि करता कोई शूद्र आत्मबल से अपना विकास
उसको कुचलने के लिये तैयार रहते थे
कपटी ब्राह्मण दास सम्राट।” 

‘शंबूक’ कविता मे भी कंवल भारती ने ब्रह्मवाक्य के आदेशानुसार वर्णव्यवस्था का पालन करने वाले शासन-प्रशासन की कटु आलोचना की है। शंबूक की मृत्यु के पीछे छिपे वास्तविक रहस्य का उद्घाटन किया है। शम्बूक को इन्होंने राजतंत्र में जन्मती असंख्य दलित चेतना का प्रतिक माना है। उन्होंने ‘शम्बूक’ के नाम पर भी आपत्ति की है। उनका मानना है – 

“शम्बूक जो तुम्हारा नाम नहीं है
क्योंकि तुम घोंघा नहीं थे ,
घृणा का शब्द है, जो दलित चेतना को
व्यवस्था के रक्षकों ने दिया था ।”

आगे वे लिखते है – 

“क्योंकि तुम्हारी हत्या थी ,
स्वतंत्रता, समानता और न्यायबोध की हत्या थी।”   

कंवल भारती ने ने कविता संग्रह में कई कविताओं में हिंदू धर्म की परंपराओं, त्योहारों आदि की कटु आलोचना की है। “होली” शीर्षक कविता में वे लिखते हैं – 

“जो भी धर्म, शास्त्र, देवता, महापुरुष
सिखाते हैं असमानता
अलगाव, नफरत और अस्पृश्यता
न्यायोचित ठहराते हैं जो वर्णव्यवस्था को
मैं उन सब का विरोधी हूँ।” 

दलितों ने सदियों से समाजिक अपमान को झेला है । यही कारण है कि कंवल भारती ने राजनीतिक स्वतंत्रता की तुलना में सामाजिक स्वतंत्रता को अधिक वरीयता प्रदान किया है । ‘पन्द्रह अगस्त’ कविता में उन्होंने लिखा है – 

“हम आज भी जरुरी समझते हैं
सामाजिक स्वतत्रता को
हमारे लिये अर्थहीन है उस देश की आजादी
जहाँ करोड़ों मनुष्य जीते हैं गुलामी की जिन्दगी।”

यद्यपि यह कहा जाता है कि यह देश सबका है। फिर भी देश में अगर करोड़ों लोग गुलामी की जिन्दगी जी रहे हैं, अनेकों मानवाधिकारों से वंचित होकर असमानतापूर्ण जीवन जीने के लिये वाध्य हैं। फिर क्या यह सम्भव है कि सभी के अधिकार समान होंगें? इसी विरोधाभाष स्थिति को अपनी कविता ‘अपने स्वराज के लिये’ में उठाया है और आलोचनात्मक प्रश्न करते हुए लिखा है – 

“तुम कहते हो, यह देश सबका है ।
पर, शिक्षा पर तुम्हारा कब्जा।
भूमि पर तुम्हारा एकाधिपत्य।
उद्योगों पर तुम्हारा एकच्छत्र राज,
हमारा क्या?” 

किन्तु एक महत्वपूर्ण तथ्य है कि सामाजिक पिछड़ापन का दंश झेल रहे दलित किन आधारों पर अस्पृश्य, दास एवं वंचित के अधिकारी बना दिये गये? क्या इस पिछड़ेपन के लिये वे स्वंय दोषी हैं। इनसे जुड़े वास्तविक रहस्यों का उद्घाटन इन्होंने अपनी कविता ‘तुम क्या कहोगे?’ में उद्घाटित किया तथा दलितों की इस स्थिति के लिये धर्म, धर्मशास्त्र एवं देवताओं को उत्तरदायी ठहराया है। उदाहरणस्वरुप – 

“जिसमें जन्म लेते ही,
अभिशप्त हो जाते हैं अस्पृशयता से
लागू हो जाती हैं निर्योग्यताएँ
दासता बन जाती है नियति
अपमान जिन्दगी,
 उस धर्म को तुम क्या कहोगे?”

सदियों पहले धर्म और धर्मशास्त्रों के सहारे जिस वर्णव्यवस्था को स्थापित किया। उन पौराणिक कथाओं में मानवातावाद ढूँढने वाले कवियों की इन्होंने आलोचना की है। क्योंके उन पौराणिक कथाओं ने वर्णव्यवस्था की जड़ों को और भी मजबूती प्रदान किया है। उनकी वेदना और अनुभूति पर कटाक्ष करते हुए उन्होंने ‘जब तक व्यवस्था जीवित है’ कविता में लिखा है –

“क्योंकि तुम्हारे बाप ने नहीं काढ़ी
मरे जानवरों की खाल
तुम्हारी माँ ने नहीं ढोया मैला
तुम्हारे बच्चों ने
घर-घर जूठन की जुहार नहीं लगायी
तुम्हें कीड़ों से बजबजाते गंदे नालों के किनारे
अंधेरे घरों में रहना नहीं पड़ा।
इसलिए सत्य को देखने की
अनुभूति और वेदना कहाँ है तुम्हारे पास?” 

बहरहाल, ‘तुम्हारी निष्ठा क्या होती?’ कविता संग्रह में कंवल भारती ने पुरातन समाज, धर्म एवं व्यवस्था से लेकर आधुनिक समाज की यथास्थिति को उद्घाटित किया है। इस कविता-संग्रह में धर्म, व्यवस्था और समाज के प्रति विरोध एवं आक्रोश के स्वर हैं।

(संपादन : नवल)


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