विधानसभा चुनाव – 2021 : जमीनी मुद्दे रहे हावी

पांच राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों के परिणाम सामने चुके हैं। तीन राज्यों में भाजपा की उम्मीदों को झटका लगा है। वहीं आसाम और पुडुचेरी में उसे कामयाबी मिली है

पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और केरल सहित देश के पांच राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों के परिणाम सामने आए। भारतीय जनता पार्टी गठबंधन भले ही असम और पुडूचेरी में सरकार बनाने में कामयाब हुई। परंतु उसे पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और केरल में करारा झटका लगा है। कश्मीर से कन्याकुमारी तक अपना साम्राज्य फैलाने के उसके विजय अभियान को फिलहाल रोक दिया गया है। 

सियासती गलियारे में पहले से ही इसी तरह के परिणाम प्रत्याशित थे। हालांकि पश्चिम बंगाल में जिस तरह की हवाबाजी नरेंद्र मोदी और अमित शाह ने मिलकर की थी, उससे यह तो साफ था कि भाजपा फायदे में रहेगी। यही हुआ भी भाजपा को 2016 में हुए चुनाव की तुलना में 4 सीटों का लाभ हुआ। उसे 77 सीटें हासिल हुईं। जबकि विजेता रही तृणमूल कांग्रेस। उसे 292 सीटों में से 213 सीटें प्राप्त हुईं। हालांकि ममता बनर्जी स्वयं नंदीग्राम विधानसभा क्षेत्र से अपने ही सिपहसलार रहे शुभेंदू अधिकारी से 1956 वोटों से हार गईं। खास बात यह कि मतों में हिस्सेदारी के मामले ममता बनर्जी अपना दबदबा बनाए रखने में कामयाब रहीं। उनकी पार्टी को 47.93 प्रतिशत मत मिले। जबकि सबसे अधिक फायदे में भाजपा रही। उसे 38.14 फीसदी मत मिले।

डीएके के नेता एम के स्टलिन, पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी, केरल के मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी

पश्चिम बंगाल में वामपंथियों का हुआ सफाया

सबसे खास यह कि पश्चिम बंगाल से कांग्रेस और वामपंथी दलों का सफाया हो गया। उन्हें एक सीट भी नहीं मिली। वोटों में भी उनकी हिस्सेदारी न्यून रही। मसलन सीपीएम को 4.72 प्रतिशत, सीपीआई को 0 20 प्रतिशत और सीपीआई एमएल (एल) को 0.03 प्रतिशत मत मिले। हालत यह रही कि बहुजन समाज पार्टी को 0.39 प्रतिशत मत मिले जो सीपीआई को मिले मतों से अधिक ही रहे।

पश्चिम बंगाल में उलटा पड़ा आठ चरणाें में मतदान का पैंतरा

पश्चिम बंगाल में आठ चरणों में चुनाव करवाने का भाजपा का पैंतरा भी उलटा पड़ा। यह इसके बावजूद कि शुरूआत के तीन चरणों में उसे लाभ मिला। इस लाभ का मूल्यांकन इसीसे किया जा सकता है कि दूसरे चरण में नंदीग्राम में जब मतदान हुआ तो स्वयं ममता बनर्जी भी अपना खूंटा बचाने में नाकाम रह गईं। 

तीसरे चरण की समाप्ति के बाद बदल गई बाजी

यह संयोग ही रहा कि तीसरे चरण की समाप्ति के बाद नरेंद्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी ने पश्चिम बंगाल में अपना अभियान तेज कर दिया और कोरोना के मामले पूरे देश में सामने आने लगे। इस क्रम में केंद्र सरकार की विफलता भी सामने आई। पश्चिम बंगाल की जनता को नरेंद्र मोदी के भाषणों पर विश्वास नहीं हुआ। जैसे-जैसे कोरोना का कहर बढ़ा, नरेंद्र मोदी की साख कम होती गई।

“दीदी ओ दीदी” का संबोधन पड़ा महंगा

इस चुनाव में नरेंद्र मोदी कोई नैरॅटिव सेट करने में कामयाब रहे। उनकी बड़ी परेशानी थी ममता बनर्जी के मुकाबले में किसी को खड़ा करने की, जिसमें वह नाकाम रहे। शुभेंदू अधिकारी और मुकुल रॉय के रूप में उनके पास चेहरे जरूर थे, लेकिन वे इतने सक्षम नहीं थे कि वे अपने दम पर कुछ कर पाते। हालांकि फिल्म अभिनेता मिथुन चक्रवर्ती को अपने पाले में लाकर नरेंद्र मोदी ने लिटमस टेस्ट जरूर किया लेकिन वे विफल रहे। सबसे खास रहा ममता बनर्जी पर केंद्रित प्रहार की रणनीति। नरेंद्र मोदी और अमित शाह के निशाने पर ममता बनर्जी रहीं। इससे ममता बनर्जी का कोई नुकसान नहीं हुआ। ‘दीदी ओ दीदी’ के संबोधन के खिलाफ ममता बनर्जी का ‘खेला होबे’ का आह्वान कारगर रहा।

मुस्लिम बहुल इलाकों में ममता बनर्जी को मिला समर्थन, निष्प्रभावी रहे ओवेसी 

भाजपा को उम्मीद रही कि एआईएमआईएम के मैदान में उतरने के बाद मुसलमान मतदाताओं के बीच फर्क पड़ेगा। लेकिन जब चुनाव परिणाम सामने आए तब ओवेसी की पार्टी असरहीन साबित हुई। खासकर मालदा, मुर्शिदाबाद, उत्तर व दक्षिण दिनाजपुर में कुल 49 सीटें हैं। इन जिलों में तृणमूल कांग्रेस 36 सीटें जीतने में कामयाब रही। पार्टी के रूप् में ओवेसी की पार्टी को केवल 0.02 प्रतिशत मत हासिल हुए। 

मतुआ समुदाय का मिला अधूरा साथ

भाजपा यह उम्मीद कर रही थी कि मतुआ समुदाय के बल पर वह नमोशूद्र समुदाय के लोगों का समर्थन हासिल कर लेगी। परंतु, ऐसा नहीं हुआ। इसकी वजह यह रही कि मतुआ समुदाय के संस्थापक हरिचंद ठाकुर के मौजूदा परिजन पहले से ही भाजपा और तृणमूल के खेमे में बंट चुके थे। इसके अलावा अपने दूसरे कार्यकाल के दौरान ममता बनर्जी द्वारा नमोशूद्र समुदाय के लिए चलाए गए योजनाओं का असर भी इस चुनाव में दिखा। लिहाजा नमो शूद्र समुदाय के मतदाताओं के बीच जिस तरह की सेंधमारी की उम्मीद भाजपा कर रही थी, वह उसमें विफल रही।

तमिलनाडु में भाजपा की रणनीति रही नाकाम

तमिलनाडु में एआईडीएमके व भाजपा के गठबंधन को जीत नहीं मिली। लेकिन यह भी पहले से तय था। इसकी वजह यह जयललिता के बाद एआईडीएमके की पकड़ कमजोर होती गई है। उपर से भाजपा के साथ जाने पर उसे एंटी इनकंबेंसी की दोहरी कीमत चुकानी पड़ी। विजेता रही डीएमके गठबंधन को 159 सीटें तथा एआईडीएमके गठबंधन को 75 सीटें मिलीं। वहां एम. करुणानिधि के पुत्र एम के स्टलिन का सीएम बनना तय है। एमपी थोल थिरूमवलवन के नेतृत्व में गठित दलित पैंथर ऑफ इंडिया और वर्तमान में विदुथलई चिरूथईगल काटची (वीसीके) पार्टी ने चार सीटें जीती हैं। इनमें दो सीटें अनारक्षित सीटें हैं। यह पार्टी डीएमके गठबंधन का एक घटक दल है।

केरल और आसाम में पहले से तय थे परिणाम, जेल से जीते अखिल गोगोई 

केरल में वाम मोर्चा को लगातार दूसरी बार जीत मिली है। वहां उसे 99 सीटें और विपक्षी यूडीएफ को 41 सीटें। भाजपा को 11.3 प्रतिशत वोट मिले, लेकिन वह अपना खाता केरल में फिर से खोलने में नाकाम रही। असम में कांग्रेस लड़ती नजर आई। उसने असम गण परिषद और भाजपा गठबंधन को मजबूत चुनौती दी। लेकिन जीत का सेहरा भाजपा गठबंधन को मिली। उसे 75 सीटें तथा कांग्रेस गठबंधन को 50 सीटें हासिल हुईं। वहीं सिबसागर विधानसभा क्षेत्र से निर्दलीय उम्मीदवार अखिल गोगोई ने उल्लेखनीय जीत हासिल की। उन्होंने भाजपा की उम्मीदवार सुरभि राजकुंवारी को हरा दिया। दोनों को क्रमश: 45 हजार 344 व 57 हजार 219 मत मिले। गाेगाई सीएए के खिलाफ आंदोलन करने के दौरान यूएपीए कानून के तहत गिरफ्तार जेल में रखा गया है। 

(संपादन : अनिल)


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