कोरोना : आदिवासी, सरकारें और उनका तंत्र

मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, गुजरात और महाराष्ट्र के आदिवासी बहुल इलाकों में कोरोना के मद्देनजर सरकारी तंत्र की उदासीनता साफ तौर पर दिखती है। वहीं आदिवासियों के मन में दहशत भी है। बता रहे हैं मनीष भट्ट मनु

कोविड-19 की दूसरी लहर ने भारत में तबाही ला दी है। अस्पताल तो छोड़िए, श्मशान और कब्रिस्तानों में भी जगह की कमी पड़ रही है। सरकार द्वारा जारी किए जा रहे मृतकों के आंकड़ों की पोल दैनिक समचार पत्र खोल ही रहे थे। मगर अब यूनिवर्सिटी ऑफ वॉशिंगटन इंस्टीट्यूट फॉर हेल्थ मेट्रिक्स एंड इवैल्यूशन (आईएचएमई) द्वारा किए गए एक विश्लेषण के अनुसार भी भारत में सरकार द्वारा जारी किए गए आंकड़ों की तुलना में दोगुने से अधिक मौतें हुई हैं। 

आईएचएमई द्वारा 3 मई, 2021 तक भारत में इस महामारी के चलते 6 लाख 54 हजार 395 मौतों का होने का अनुमान लगाया गया है। जबकि सरकारी आंकड़े 2 लाख 21 हजार 181 मौतों पर ठहरे हुए हैं। स्वास्थ्य संबंधी मुद्दों पर कार्य करने वाले संगठनों और आदिवासियों के मध्य कार्य कर रहे व्यक्तियों को डर है कि जिस प्रकार यह महामारी अब ग्रामीण क्षेत्रों में फैल रही है, आने वाले दिनों और भी भयावह हो सकते हैं। 

टाइफाइड मौजूद, सरकार नदारद 

कोरोना महामारी के इस दूसरे चरण में मध्य प्रदेश के महाकौशल और विंध्य अंचल के साथ ही छत्तीसगढ़ के बिलासपुर संभाग के आदिवासी क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर टायफाइड और बुखार से लोगों के प्रभावित होने के समाचार मिल रहे हैं। आदिवासी बहुल बस्तर संभाग भी इससे अछूता नहीं है। महाराष्ट्र के गढ़चिरौली में भी इसकी मौजूदगी है। विशेषज्ञों का कहना है कि टाइफाइड और कोविड-19 के लक्षणों में बहुत ज्यादा फर्क नहीं है। इस वायरस द्धारा जिस प्रकार से अपनी संरचना में लगातार परिवर्तन किया जा रहा है, उसमें यह और भी जरुरी हो जाता है कि बिना रिपोर्ट का इंतजार किए चिकित्सकों की सलाह से कोविड-19 का उपचार प्रारंभ कर दिया जाय। ऐसे में देरी से इलाज का मतलब है मर्ज को और बढ़ने देना। 

मगर, सरकारी लापरवाही का आलम यह है कि मध्य प्रदेश के डिंडौरी, मंडला, बालाघाट, छिंदवाड़ा, सिवनी जिलों, और छत्तीसगढ़ के बिलासपुर एवं बस्तर संभाग के सुदूर आदिवासी अंचलों में पूरा दारोमदार आशा, आंगनबाड़ी कार्यकर्ता और मितान पर है, जिनके पास यह जानने का कोई भी साधन नहीं है कि किसे वास्तव में टाइफाइड है और कौन कोविड-19 से ग्रसित है। इससे समाज में इस महामारी के फैलने की आशंका भी बढ़ जाती है। कुछ ऐसा ही हाल महाराष्ट्र के गोंदिया और अमरावती जिलों, राजस्थान के सवांई माधोपुर और बारां तथा गुजरात के दाहोद और नर्मदा जिलों की मध्य प्रदेश से लगती सीमाओं में भी है। 

मध्य प्रदेश के मंडला जिला की नारायणगंज तहसील के निवासी मुन्ना बर्मन ने बताया कि विगत पैंतालीस से अधिक दिनों से उनके क्षेत्र में टाइफाइड के लक्षण, सर्दी, खांसी और जुकाम के मरीजों की संख्या में वृद्धि देखने को मिल रही है। मगर, इसके बाद भी स्वास्थ्य विभाग की ओर से कोई भी आवश्यक कदम नहीं उठाए गए। सिवनी जिला की घंसौर तहसील के गुलाब झारिया भी उनके यहां एकाएक बुखार, सर्दी, खांसी और जुकाम के मरीजों की संख्या में वृद्धि को स्वीकारते हैं। उनका भी कहना है कि स्वास्थ्य विभाग की सक्रियता महज टीकाकरण तक ही सीमित है। छिंदवाड़ा जिला के एक पत्रकार तो यह भी बताते हैं कि उनके यहां कई ऐसे प्रकरण सामने आए हैं, जिनमें लोगों का प्रारंभिक इलाज टाइफाइड के लक्ष्णों के आधार पर किया गया, मगर सीटी स्कैन अथवा आरटी-पीसीआर टेस्ट के बाद उनमें कोविड-19 की पुष्टि हो गई। वे कहते हैं कि ऐसे मरीजों ने कितने अन्य लोगों को संक्रमित किया होगा, इसका अंदाजा लगा पाना मुश्किल है। बालाघाट जिला की लांजी तहसील के आनंद मरावी और बैहर तहसील के हनीफ भी बुखार, सर्दी, खांसी और जुकाम के मरीजों की संख्या में हुई वृद्धि की बात कहते हैं। मगर, टेस्ट के अभाव में वे यह नहीं कह सकते कि इनमें से कितने कोविड से संक्रमित हैं। 

कुछ ऐसी ही बात गोंदिया निवासी वंचित बहुजन अघाड़ी के नीलेश भी कहते हैं। उनके अनुसार गोंदिया समेत अमरावती और गढ़चिरौली के आदिवासी बहुल अंचलों में मरीजों की संख्या में वृद्धि के समचार तो हैं, मगर यकीनी तौर पर नहीं कहा जा सकता कि इनमें से कितने कोविड से संक्रमित हैं।

आदिवासी बहुल इलाकों में जागरूकता फैलाने की जरूरत

छत्तीसगढ़ के मरवाही जिला निवासी सर्व आदिवासी समाज के मनीष धुर्वे, बिलासपुर के यशवंत सिंह कुर्राम और दंतेवाड़ा के मनोज कुंजाम भी आदिवासी क्षेत्रों में बुखार, सर्दी, खांसी और जुकाम के मरीजों की वृद्धि की बात स्वीकारते हैं। इन तीनों का ही यह मानना है कि आदिवासी क्षेत्रों में टेस्ट की कमी ने ही कोविड की वास्तविक स्थिति को समाज की नजरों में आने से बचाए रखा है। यहां वही मामले सामने आ रहे हैं, जिसमें लोगों ने स्वयं आगे आकर अपना टेस्ट करवाया हो या फिर गंभीर बीमारी में उसे अस्पताल ले जाए जाने के बाद टेस्ट हुआ हो। ऐसे में यह बता पाना मुश्किल है कि वास्तविक रूप से कितने संक्रमित हुए, उनमें से कितनों की इस बीमारी के चलते मौत हुई। शिवपुरी, मध्य प्रदेश निवासी आल इंडिया सफाई मजदूर कांगेस के सुधीर कोड़े कहते हैं कि शिवपुरी और आसपास के जिलों के आदिवासी अंचलों में कोरोना फैलने के समाचार तो मिल रहे हैं, मगर पर्याप्त संख्या में जांच नहीं होने से उसकी पुष्टि नहीं की जा सकती। 

मध्य प्रदेश के अलीराजपुर जिला में भी एक ऐसा प्रकरण सामने आ चुका है, जिसमें टाइफाइड के मरीज की जांच होने पर उसे कोविड-19 संक्रमित पाया गया। उस मरीज का नाम है सोंडवा तहसील निवासी बोलसिंह खरत। इसके अतिरिक्त भी निमाड़ अंचल के आदिवासी क्षेत्रों में टाइफाइड के अन्य मरीजों का मिलना जारी है मगर यहां कार्यरत संगठनों के अनुसार जांच समुचित तरीके से नहीं की जा रही है। ऐसे में बेहद मुमकिन है कि सही जांच संक्रमण प्रभावितों की संख्या में वृद्धि कर दे। 

कुछ ऐसा ही हाल गुजरात के दाहोद और नर्मदा जिलों की मध्य प्रदेश की सीमावर्ती जिलों का भी है। निमाड़ अंचल में लंबे समय तक आदिवासियों के मध्य कार्य कर चुके और फिलवक्त गुजरात में सक्रिय अमरनाथ बतलाते हैं कि न जाने क्यों सरकार आदिवासी क्षेत्रों में जांच व पहचान का काम उतनी तेजी से नहीं कर पा रही, जिसकी इस समय आवश्यकता है।

पिछले साल का दहशत कायम

आदिवासी अंचलों में कार्य करने वाले सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि पिछले साल कोरोना की रोकथाम के लिए सरकार ने जिस तरह के कदम उठाए थे, उससे भी आदिवासी समाज के लोगों में अभी तक दहशत व्याप्त है। आदिम जनजातियों में शुमार बैगा के मध्य डिंडौरी जिले में एक लंबे समय से कार्यरत सामाजिक कार्यकर्ता बताते हैं कि पिछली बार जिस तरह से पुलिस और वन विभाग के कर्मचारियों द्वारा कोविड-19 के प्रभावितों को आइसोलेशन सेंटर में ले जाया गया, जहां असुविधाएं थीं। इस कारण इनमें डर समा गया है। मनीष बतलाते हैं कि आदिवासी क्षेत्रों में “वर्दी” की पहचान शोषक की है और ऐसे में स्वभाविक है कि आदिवासी अपने आप को इनके हाथों में नहीं पड़ने देना चाहते। अमरनाथ कहते हैं कि कथित विकास का सबसे ज्यादा खामियाजा आदिवासी समाज ने ही सहा है और विरोध करने पर पुलिस या अन्य सरकारी महकमों द्वारा उनके साथ किया गया दुर्व्यवहार अब इन्हें सिस्टम पर भरोसा नहीं करने दे रहा। एक अन्य सामाजिक कार्यकर्ता का कहना है कि सरकार द्वारा की जा रही सोशल डिस्टेंसिंग की नीति भी इस आदिवासियों की सामाजिक संरचना के विपरीत है। जिस समाज में किसी को मामूली सर्दी-खांसी होने पर भी दो-चार साथियों का उसके साथ चिकित्सक के पास जाना स्वाभाविक संव्यवहार हो, वहां किसी को एकांतवास में रखना न केवल समाज में डर उत्पन्न करेगा वरन् लोग भी बीमारी छिपाने लगेंगे। मंडला जिले की घुघरी तहसील के रवीन्द्र मरावी कहते हैं कि परंपरागत तौर से ही आदिवासी समाज प्राकृतिक संसाधनों और वनस्पतियों के द्धारा अपना इलाज करते चले आया है और इस बार भी वह वही कर रहा है। स्वास्थ्य संबंधी मुद्दे पर छत्तीसगढ़ में कार्य कर रहे चंद्रकांत बतलाते हैं कि सरकारी स्तर पर आदिवासी अंचलों में न तो इस महामारी की भयावहता को लेकर लोगों को सतर्क करने का कोई गंभीर प्रयास किया जा रहा है और ना ही स्थानीय भाषाओं में इस बाबत कोई जानकारी उपलब्ध करवाई जा रही है। बिलासपुर के अंकित बतलाते हैं कि सरकार ने आदिवासियों के परंपरागत मुखियाओं को भी इस बाबत भरोसे में लेना न जाने क्यों उचित नहीं समझा। ऐसे में बुखार, सर्दी, खांसी और जुकाम होने पर भी लोग सरकारी अस्पताल जाने से महज इसलिए कतरा रहे हैं क्योंकि उन्हें आइसोलेशन केंद्र में डाल दिया जाएगा। जहां टेस्ट हो भी रहे हैं, वहां न जाने का एक प्रमुख कारण यह डर भी है।

जांच परिणामों पर संदेह

आदिवासी अंचलों में कार्य कर रहे संगठनों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि बेहद कम संख्या में हो रही जांच भी आरटीपीसीआर न होकर रैपिड एंटीजन पद्धति के माध्यम से की जा रही है। पूर्व में अनेक बार इस पद्धति के परिणामों को संदेहास्पद करार दिया जा चुका है। मगर, इसके बाद भी सरकारें गंभीर नहीं हैं। उनके मुताबिक यह टेस्टिंग भी अधिकांश उनकी ही की जा रही है जो तहसील अथवा जिला स्तरीय अस्पतालों में स्वयं से किसी बीमारी का इलाज करवाने पहुंच रहे हैं। नेताओं और प्रशासन द्वारा बढ़ावा दिए गए तालाबंदी ने स्थिति को और बिगाड़ा हैं। आदिवासियों में सिस्टम को लेकर उपजे संदेह व भय तथा उनके इलाकों में बाहरियों के प्रवेश पर लगी रोक वास्तविक स्थिति को सामने आने ही नहीं दे रही। देवास, मध्य प्रदेश के निवासी और पूर्व पार्षद सुजीत सांगते बतलाते हैं कि हरदा जिला की सीमा से सटे हुए आदिवासी गांवों में शायद ही कोई ऐसा घर बचा होगा, जिसमें कोई न कोई बीमार हो। अधिकांश में कोविड-19 से संक्रमितों के लक्ष्ण ही पाए जा रहे हैं, मगर न कोई जांच करवा रहा है और ना ही प्रशासनिक स्तर पर कोई बड़ी पहल की जा रही है। 

उज्जैन निवासी और आजाद समाज पार्टी के सुनील आस्तेय के अनुसार प्रशासन द्वारा आदिवासी समाज के मुखियाओं और बुजुर्गों को विश्वास में न लिए जाने के चलते ही आज ऐसे हालात बन चुके हैं कि कई गांवों में जांच करने वालों को घुसने भी नहीं दिया जा रहा है। उनकी इस बात की पुष्टि मनोज कुंजाम और आनंद मरावी भी करते हैं। स्वास्थ्य अधिकार पर लंबे समय से काम कर रहे जन स्वास्थ्य अभियान, मध्य प्रदेश के अमूल्य निधि बतलाते हैं कि मार्च के दूसरे पखवाड़े और अप्रैल में मध्य प्रदेश के विभिन्न आदिवासी अंचलों में बुखार, सर्दी, खांसी और जुकाम के मरीजों की संख्या में वृद्धि के समाचार आए तो थे मगर पर्याप्त संख्या में जांच नहीं होने से कुछ कह पाना मुश्किल हैं। वे बतलाते हैं कि मध्य प्रदेश के आदिवासी अंचलों में कोविड-19 संक्रमण जांच कराने वालों की संख्या बेहद कम बनी हुई है। उनके अनुसार कुल जांचों का साठ से सत्तर प्रतिशत शहरी व अर्ध शहरी क्षेत्रों में तथा शेष ग्रामीण क्षेत्रों में हो रहा है। आदिवासी अंचलों की दुर्गमतम स्थिति और दूर-दूर बसे टोलों/मजरों/फलियों के चलते वहां जांच टीम का पहुंचना और भी मुश्किल हो जाता है।

सरकार के पास आरटीपीसीआर की पर्याप्त सुविधा ही नहीं

अमूल्य निधि का कहना है कि एक साल गुजर जाने के बाद भी राज्य सरकार आरटीपीसीआर की पर्याप्त सुविधा विकसित नहीं कर पाई है। इंडियन काउंसिल आफ मेडिकल रिसर्च के हवाले से वे बताते हैं कि मध्य प्रदेश के महज 19 शासकीय संस्थाओं में यह सुविधा है, जबकि निजी संस्थानों की संख्या 22 है। छत्तीसगढ़, गुजरात, महाराष्ट्र और राजस्थान में इनकी संख्या क्रमश: 11 व 6, 35 व 47, 74 व 112 तथा 40 एवं 28 है। 

सिलिकोसिस और टीबी के मरीजों पर शोध किया जाना बाकी

अमूल्य निधि के अनुसार अभी तक इस बाबत कोई शोध नहीं किया गया है कि सिलिकोसिस और टीबी के मरीजों पर कोविड-19 का वायरस किस प्रकार असर डालता है। झाबुआ जिला मध्य प्रदेश की मेघनगर तहसील में सिलिकोसिसि पीड़ित संघ के दिनेश राय बतलाते हैं कि अप्रैल माह में उनके पास बड़ी संख्या में नागरिकों के टाइफाइड पीड़ित होने के समाचार आए थे। मगर, पर्याप्त जांच के अभाव में यह कह पाना मुश्किल है कि उनमें से कितने कोविड-19 से संक्रमित हुए थे। सिंगरौली में कार्यरत एक समाजिक कार्यकर्ता कहते हैं कि इस अंचल में एक बड़ी आबादी उत्खनन से चलते हो रहे प्रदूषण से प्रभावित हैं। सांस लेने में तकलीफ यहां एक आम शिकायत है। ऐसे में पर्याप्त जांच नहीं होने के चलते यह बता पाना मुश्किल है कि किसे कोविड-19 का संक्रमण हुआ था और किसे नहीं।

सरकार का सारा जोर टीकाकरण पर

स्वास्थ्य संबंधी मुद्दों पर कार्य कर रहे संगठनों और सामाजिक कार्यकर्ताओं से बात करने में इतना स्पष्ट होता है कि राज्य सरकार का सारा जोर टीकाकरण पर है। महामारी से बचाव और जांच पर नहीं। छत्तीसगढ़ के बालोद जिला अंतर्गत गुंडरदेही जनपद पंचायत ने तो बाकायदा एक आदेश निकाल 18 से 44 वर्ष आयु समूह के व्यक्तियों द्वारा टीकाकरण नही करवाए जाने की स्थिति में अंत्योदय योजना के लाभांवितों को राशन कूपन जारी नहीं करने के आदेश निकाल दिए थे। भारी विरोध के बाद यह आदेश वापिस तो ले लिया गया। मगर लोगों का आरोप है कि सरपंच और पंचायत सचिव के माध्यम से उन पर आज भी यही दबाव बनाया जा रहा है। मनोज कुंजाम भी बताते हैं कि उन तक भी ऐसी शिकायतें पहुंची जरूर हैं, मगर लोगों द्वारा लिखित में न दिए जाने के चलते वह कुछ भी कर पाने में असमर्थ हैं। हालांकि सहरिया महापंचायत के श्योपुर जिला निवासी महेश ऐसे किसी दबाव की सूचना से इंकार करते है।

अनहोनी की आशंका से सहमे आदिवासी नहीं करवा रहे टीकाकरण

सरकार का सारा जोर टीकाकरण पर होने के बाद भी आदिवासी अंचलों में इसे सफल नहीं कहा जा सकता। सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि आदिवासियों में जहां एक ओर यह अफवाह है कि टीका लगाने से वे बीमार पड़ जाएंगे। वहीं टीकाकरण होने के बाद हुई मौतों की खबरों ने भी उन्हें डरा दिया है। मुन्ना बर्मन, गुलाब झारिया, हनीफ, नीलेश और मनीष भी यह स्वीकारते है कि उनके यहां टीकाकरण के बाद हुई मौतों को लेकर लोग आपस में बात कर रहे हैं, उनके अनुसार अनेक का तो यह भी दावा है कि उसके पास टीकाकरण के बाद हुई मौतों का वीडियो तक है। ऐसे में यह सरकार की पहली जिम्मेदारी बन जाती है कि वह ऐसी अफवाहों को दूर करने के लिए हर संभव प्रयत्न करे।

(संपादन : नवल/अनिल)


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