तमिलनाडु-केरल चुनाव : महिलाओं को छोड़ सभी के साथ न्याय

गत 2 मई को पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव के परिणाम सामने आए तो पश्चिम बंगाल और आसाम के विपरीत दक्षिण के राज्यों तमिलनाडु व केरल में एक स्पष्ट अंतर साफ दिखा। अंतर यह कि इन दो राज्यों में लगभग सभी जातियों/समुदायों को भागीदारी मिली। हालांकि महिलाओं की भागीदारी असंतोषजनक रही। बता रहे हैं दीपक के. मंडल

उत्तर भारत की राजनीति में सवर्णों के वर्चस्व के उलट दक्षिण भारत राज्यों की राजनीति में दलितों और पिछड़ों की भागीदारी लगातार मजबूत हो रही है। इसकी एक वजह यह कि दक्षिण में द्विज जातियों के वर्चस्व व भेदभाव के खिलाफ सामाजिक सुधार आंदोलनोंं का जबरदस्त असर रहा है। मसलन, तमिलनाडु में पेरियार और केरल में नारायण गुरु और अय्यंकाली जैसे बहुजन नायकों, ब्रिटिश काल में ईसाई मिशनरी संस्थाओं द्वारा बहुजनों के सशक्तिकरण व वामपंथी विचारों असर राजनीति के साथ ही सांस्कृतिक, सामाजिक और आर्थिक ढांचे पर साफ-साफ दिखता है। दक्षिण के सबसे बड़े और छोटे राज्य यानी तमिलनाडु और केरल, दोनों समावेशी राजनीति की मिसाल बनते जा रहे हैं। हाल ही संपन्न हुए विधानसभा चुनाव में दोनों राज्यों में जगह लगभग हर जाति और समुदाय का प्रतिनिधित्व बराबर दिख रहा है। दोनों राज्यों में बहुजन-दलित चेतना उभार का ही असर है कि राजनीतिक पार्टियों को समावेशी राजनीति की राह पकड़नी पड़ती है।

पिछड़ी जातियों का राजनीतिक दबदबा 

तमिलनाडु में जब से द्रविड़ पार्टियों ने चुनाव जीतना शुरू किया है तभी से विधानसभा में ओबीसी जातियों का वर्चस्व बना हुआ है। पिछले पांच दशकों में विधानसभा में ओबीसी की हिस्सेदारी कम नहीं हुई है और यह लगभग 72 फीसदी बनी हुई है। उनकी हिस्सेदारी 2000 के बाद से थोड़ी कम होनी शुरू हुई जब नायडुओं (एक मझोली जाति) को चेन्नई, वेल्लोर, तिरुवल्लुर और विरुदनगर जैसी शहरी सीटों पर जीत मिलने लगी। हालांकि विधानसभा में अभी भी उनका वर्चस्व है। राज्य की आबादी में ओबीसी की हिस्सेदारी 76.1 फीसदी है।

तमिलनाडु की राजनीति में मुख्य रूप से थेवर, गौंडर, मुदलियार और वन्नियार जैसी ओबीसी जातियों का दबदबा है। 1971 से 2006 तक तमिलनाडु विधानसभा में सबसे ज्यादा विधायक वन्नियार जाति के थे। लेकिन 2011 में थेवरों ने उन्हें पछाड़ दिया। तमिलनाडु में सभी पिछड़ी जातियों ने किसी एक पार्टी के पीछे चलने के बजाय सभी प्रमुख पार्टियों में अपनी भागीदारी सुनिश्चित की है। यही वजह है कि राजनीतिक रूप से सभी ओबीसी जातियां मजबूत हैं। हाल में एक और मजबूत ओबीसी जाति गौंडर ने अपनी खोई हिस्सेदारी फिर से हासिल करने में सफलता हासिल कर ली है। लेकिन 1996 से अपना प्रतिनिधित्व बढ़ाती जा रही एक और मझोली जाति वेल्लालार की हिस्सेदारी मौजूदा विधानसभा में बुरी तरह गिर गई है। 

2021 में तमिलनाडु विधानसभा में विभिन्न समुदायों की हिस्सेदारी

जाति/समुदायहिस्सेदारी (प्रतिशत में)
वन्नियार 16
गौंडर14
थेवर13
मुदलियार5
नाडर5
वेल्लालार 3
चेट्टियार2
यादव1
अन्य ओबीसी9
गैर चिन्हित ओबीसी 4
ईसाई2
मुस्लिम3
एससी 17
एसटी 1

स्रोत : त्रिवेदी सेंटर फॉर पॉलिटिकल डाटा – स्पिनर (यथा स्क्रॉल डॉट इन पर प्रकाशित)

डीएमके में वन्नियार और थेवर जातियों का वर्चस्व 

डीएमके में वन्नियार और थेवर जातियों का वर्चस्व रहा है। 2001 से अब तक डीएमके के टिकट पर 372 एमएलए चुने गए हैं, जिनमें से 50 वन्नियार, 41 थेवर, 33 वेल्लालार और 28 गौंडर जातियों के हैं। नायडू जाति के 31 एमएलए रहे हैं।

तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम के स्टालिन व केरल के मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन

करीब 59 दलित डीएमके के टिकट पर जीत चुके हैं। सात ऊंची जातियों के उम्मीदवारों को भी इनके टिकटों पर चुनाव जीतने में सफलता मिली है। पार्टी के बाकी विधायक निम्न पिछड़ी जातियों के रहे हैं। 

2001 से लेकर अब तक अन्नाद्रमुक (एआईडीएमके) के 543 विधायक चुने गए हैं। इनमें से ज्यादा 108 दलित समुदाय के हैं। इनके अलावा 88 थेवर, 83 गौंडर, 77 वन्नियार, 18 नाडर 18 नायडू जातियों के हैं। आठ मुस्लिम, 15 वेल्लालार, 11 चेट्टियार और नौ ऊंची जातियों के शामिल हैं।

डीएमके और एआईएडीएमके गठबंधन की सहयोगी पार्टियों के जरिये दलितों को अपने दायरे में लाती हैं 

अन्नाद्रमुक डीएमके की तुलना में वर्चस्व वाली ओबीसी जातियों को ज्यादा अच्छा प्रतिनिधित्व देती दिखती है। अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित सीटों पर भी एआईएडीएमके का प्रदर्शन डीएमके से अच्छा है। हालांकि दोनों प्रमुख पार्टियों ने ओबीसी समुदायों का ज्यादा अहमियत दी। वहीं दलित भागीदारी सुनिश्चित करने का काम गठबंधन की छोटी सहयोगी पार्टियों को आउटसोर्स कर दिया गया। 

विविधता भरी असेंबली 

अगर 2021 के विधानसभा को देखें तो पाएंगे कि तमिलनाडु में किसी भी जाति समूह का वर्चस्व नहीं है। लगभग सभी जातियों और समुदायों को हिस्सेदारी मिली है। मसलन, वन्नियार, थेवर और गौंडर जातियों की हिस्सेदारी 43 फीसदी है। लेकिन इसके अलावा लगभग सभी जातियों की हिस्सेदारों के बीच कोई बड़ा अंतर नहीं है। मतलब यह है कि लगभग सभी जातियों और समुदायों की हिस्सेदारी ने तमिलनाडु की चुनावी राजनीति को समावेशी बना दिया है।

यह भी पढ़ें – पश्चिम बंगाल व आसाम : आदिवासी, दलितों और पिछड़ों का वोट, सवर्णों का राज

महिलाओं को नहीं मिला है समावेशी राजनीति का फायदा

जातियों के प्रतिनिधित्व के मामले में भले ही तमिलनाडु की राजनीति समावेशी दिख रही हो, लेकिन यहां भी महिलाओं की हिस्सेदारी घटती जा रही है। इस वर्ष की विधानसभा में महिलाओं की हिस्सेदारी 20 साल के न्यूनतम स्तर पर पहुंच गई है। इस बार की विधानसभा में सिर्फ 5 फीसदी विधायक महिला हैं। यहां महिला विधायकों की संख्या घटती-बढ़ती रही है। सबसे अधिक महिला विधायक 1991 में तब चुनी गई थीं, जब अन्नाद्रुमक प्रमुख जयललिता पहली बार मुख्यमंत्री बनी थीं। उस समय विधानसभा में 14 फीसदी महिला विधायक थीं। इस बार सिर्फ 12 महिला विधायक चुनी गईं। इनमें छह डीएमके के टिकट पर, तीन अन्नाद्रमुक के टिकट पर और दो बीजेपी के टिकट पर। वर्ष 1996 के बाद तमिलनाडु विधानसभा में यह महिलाओं का सबसे कम प्रतिनिधित्व है। 

केरल : सबको बराबर हिस्सेदारी देने की कोशिश 

केरल विधानसभा की 140 सीटों पर विजयी उम्मीदवारों का जायला लें तो पाएंगे कि किसी भी जातीय या धार्मिक समूह की हिस्सेदारी 25 फीसदी से ज्यादा नहीं है।

सबसे बड़ी हिस्सेदारी मुस्लिमों की 24 फीसदी है। ओबीसी में 19 फीसदी सीटें इजावा और छह फीसदी थिया और दो फीसदी अन्य पिछड़ी जातियों के पास है।

ऊंची जातियों और दबंग शूद्र जातियों के पास विधानसभा की 20 फीसदी सीटें हैं। इनमें 19 फीसदी सीटें नायरों (दबंग शूद्र जाति) के पास हैं। वहीं विधानसभा की 21 फीसदी सीटें ईसाइयों के पास हैं। यह हिस्सेदारी सीरियन, रोमन कैथोलिक, जैकबाइट सभी ईसाइयों में बंटी हैं। 

इसी तरह मुस्लिमों की सीटें भी इसके अलग-अलग समूहों और जातियों में बंटी हैं। राज्य विधानसभा की दस फीसदी सीटें अनुसूचित जातियों के विधायकों और एक फीसदी अनुसूचित जाति के विधायकों के पास है। 

ओबीसी में इजावा सबसे असरदार, एलडीएफ और यूडीएफ दोनों में मजबूत

सबसे अहम बदलाव ओबीसी की प्रमुख जाति इजावा के प्रतिनिधित्व में दिखा है। 1980 के आखिर से विधानसभा में इजावा जाति की नुमांइदगी बढ़ी है। लेकिन दूसरी पिछड़ी जातियां नाडर, धीवर, कुलाला आदि का प्रतिनिधित्व घटता गया है। दरअसल, 1996 में ईएन नयनार की अगुआई में लेफ्ट की जीत ने गैर इजावा ओबीसी जातियों का प्रतिनिधित्व लगभग खत्म कर दिया। इस मार से सिर्फ थिया जाति बची रही। वर्ष 2016 और वर्ष 2021 में कुछ थिया उम्मीदवार कन्नुर और कोझिकोड से जीतने में सफल रहे। 

2021- केरल विधानसभा में प्रतिनिधित्व

जाति/समुदायहिस्सेदारी (प्रतिशत में)
मुस्लिम 24 
इजावा16
ईसाई21 
थिया6
एसटी 
एससी 10
नायर 19
अन्य ऊंची जातियां 
अन्य ओबीसी2

स्रोत : त्रिवेदी सेंटर फॉर पॉलिटिकल डाटा – स्पिनर (यथा स्क्रॉल डॉट इन पर प्रकाशित)

उम्मीदवार खड़े करने की रणनीति के मामले में भी एलडीएफ और यूडीएफ के बीच खास फर्क नहीं रहा है। 2021 के चुनाव में एलडीएफ ने 22 फीसदी इजावा जाति के उम्मीदवार खड़े किए जबकि यूडीएफ ने 14.2 फीसदी। एलडीएफ ने यूडीएफ से ज्यादा मुस्लिम उम्मीदवार खड़े किए। एलडीएफ ने 24.2 फीसदी उम्मीदवारों को टिकट दिए तो यूडीएफ ने 15 फीसदी। दोनों ने लगभग बराबर नायर उम्मीदवार खड़े किए। 

नतीजों को देखने पर पता चलता है कि केरल के विधानसभा में हर तरह की विविधता है। मौजूदा विधानसभा में सीपीएम के 62 उम्मीदवारों में अलग-अलग 18 अलग-अलग जातियों और समुदायों का प्रतिनिधित्व है। कांग्रेस के 21 विधायकों 11 जातियों और समुदायों का प्रतिनिधित्व है। बाकी दस ईसाई हैं।

महिला विधायकों के मामले में केरल का रिकार्ड भी खराब 

लेकिन महिला विधायकों के मामले में केरल की समावेशी राजनीति खरी नहीं उतरती। राज्य में 1996 को छोड़ कर हर विधानसभा में महिलाओं का प्रतिनिधित्व कम होता गया है। केरल भी अब उन राज्यों में शामिल हो गया है, जहां महिला विधायक सबसे कम हैं। 

2021 में विधानसभा के लिए खड़े होने वाले उम्मीदवारों में सिर्फ 11 फीसदी महिलाएं थीं। जबकि जीत दर्ज कर विधानसभा पहुंचनेवाली महिलाएं सिर्फ आठ फीसदी हैं। पिछले चार चुनावों में यह सबसे बड़ा आंकड़ा है। लेकिन महिलाओं के लिए बेहतर कल्याणकारी योजनाओं के रिकार्ड को देखते हुए यह बेहद निराशाजनक आंकड़ा है। महिलाओं की कम हिस्सेदारी के लिए यूडीएफ और इसकी सहयोगी पार्टी, इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग और कम्युनिस्ट तीनों समान रूप से जिम्मेदार हैं। 

(स्क्रॉल डॉट इन द्वारा प्रकाशित एक आलेख के आधार पर विश्लेषित)

(संपादन : नवल/अनिल)


फारवर्ड प्रेस वेब पोर्टल के अतिरिक्‍त बहुजन मुद्दों की पुस्‍तकों का प्रकाशक भी है। एफपी बुक्‍स के नाम से जारी होने वाली ये किताबें बहुजन (दलित, ओबीसी, आदिवासी, घुमंतु, पसमांदा समुदाय) तबकों के साहित्‍य, सस्‍क‍ृति व सामाजिक-राजनीति की व्‍यापक समस्‍याओं के साथ-साथ इसके सूक्ष्म पहलुओं को भी गहराई से उजागर करती हैं। एफपी बुक्‍स की सूची जानने अथवा किताबें मंगवाने के लिए संपर्क करें। मोबाइल : +917827427311, ईमेल : info@forwardmagazine.in

फारवर्ड प्रेस की किताबें किंडल पर प्रिंट की तुलना में सस्ते दामों पर उपलब्ध हैं। कृपया इन लिंकों पर देखें 

मिस कैथरीन मेयो की बहुचर्चित कृति : मदर इंडिया

बहुजन साहित्य की प्रस्तावना 

दलित पैंथर्स : एन ऑथरेटिव हिस्ट्री : लेखक : जेवी पवार 

महिषासुर एक जननायक’

महिषासुर : मिथक व परंपराए

जाति के प्रश्न पर कबी

चिंतन के जन सरोकार

About The Author

One Response

  1. Shrawan Deore Reply

Reply