पश्चिम बंगाल : दलित-आदिवासियों में दिखा बिखराव

विधानसभा चुनाव के दौरान भाजपा ने दलित-आदिवासियों को साधने के लिए हिंदुत्व का कार्ड जमकर खेला। कई इलाकों में इसका असर देखने को मिला। वहीं अनेक इलाकों में उन्होंने टीएमसी को भी अपना समर्थन दिया। बता रहे हैं ललित कुमार

कोरोना महामारी के बीच देश के पांच राज्यों के चुनावी परिणाम की गिनती जैसे ही 2 मई, 2021 की सुबह 8 बजे शुरू हुई, हर किसी की नजर पश्चिम बंगाल पर ही टिकी हुई थी कि आखिर ‘एबार असोल पोरिबोर्तन होबे की होबे न’ (इस बार असल में परिवर्तन होगा या नहीं)। जैसे-जैसे वोटों की गिनती आगे बढ़ रही थी, बीजेपी और टीएमसी के खेमे में बैचैनी भी बढ़ती जा रही थी। दोपहर 12 बजते ही बंगाल चुनाव के परिणाम की तस्वीर सामने आने लगी कि पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की लगातार तीसरी बार सत्ता में वापसी होने जा रही है। बीजेपी बंगाल में जिस तरीके से हिंदू-मुस्लिम ध्रुवीकरण की कोशिश में लगी थी। उससे यही माना जा रहा था कि इस बार ममता बनर्जी को शिकस्त का सामना करना पड़ सकता है। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। टीएमसी को 213 और बीजेपी को 77 सीटें प्राप्त हुईं। इसमें दलित-आदिवासियों की खास भूमिका रही। 

दरअसल, बीजेपी जहां बार-बार 200 का आंकड़ा पार करने का वादा करती रही, वहीं वह बमुश्किल मात्र 77 सीटें ही जीत पाई। भले ही 2016 के मुकाबले उसे 74 सीटों का फायदा हुआ साथ ही, कांग्रेस-वामपंथ गठबंधन अपना खाता भी नहीं खोल पाया।

टीएमसी ने जिस तरह से 200 का आंकड़ा पार करके अपने विरोधियों को पस्त किया, उससे तो साफ संकेत मिलता है कि पश्चिम बंगाल के जंगलमहल, झाड़ग्राम, पुरुलिया और बांकुड़ा जिले के आदिवासी समाज को आरएसएस ने जितना भी बहला-फुसलाकर हिंदू धर्म का पाठ पढ़ाया हो, लेकिन उन्होंने उसे नकारते हुए टीएमसी का साथ देना ही बेहतर समझा। और इतना ही नहीं, ममता बनर्जी की इस जीत में दलित-आदिवासी और मुस्लिम समुदाय का मिला समर्थन खास मायने रखता है, क्योंकि इन समुदायों को पश्चिम बंगाल की राजनीति में सबसे निर्णायक माना जाता है। 

बंकुरा में आदिवासी महिलाओं के साथ ममता बनर्जी

कोलकाता स्थित एकेडेमिशियन और सामाजिक चिंतक डॉ. सुनील कुमार ‘सुमन’ का मानना है कि “यह बड़ा सकारात्मक संकेत है कि मोदी-शाह के झांसे में आने से बंगाल के दलित-आदिवासियों ने परहेज किया। इनके एकतरफा भाजपा में जाने की चर्चा सही साबित नहीं हुई। खासकर मतुआ समुदाय के संदर्भ में यह बात उत्साहित करने वाली है। यद्यपि इस चुनाव परिणाम से न तो पश्चिम बंगाल के दलित राजनीतिक रूप से परिपक्व हो जाएंगे और न ही यहां कोई दलित नेतृत्व उभरकर सामने आएगा। ऐसा कम्युनिस्टों ने भी नहीं होने दिया था। इसका एक बड़ा कारण यह है कि बंगाल के दलित फिलहाल वैचारिक क्रांति से बहुत दूर हैं और यही तभी हो पाएगा, जब पश्चिम बंगाल में आंबेडकरवाद की जड़ें मजबूत होंगी”। 

पश्चिम बंगाल में दलित व आदिवासी समुदाय की आबादी 2011 की जनगणना के आधार पर 23.52 फ़ीसदी है। दलित वर्ग में मतुआ समुदाय की आबादी लगभग 50 फ़ीसदी है। करीब 70 विधानसभा सीटें ऐसी हैं, जहां दलित समुदाय का सबसे ज्यादा प्रतिनिधित्व है। उनमें से अकेले मतुआ समाज ही लगभग 40 सीटों पर अपना सबसे ज्यादा प्रभाव रखता है, जिनमें नदिया, उत्तर और दक्षिण 24 परगना जिलें शामिल है। इन 70 सीटों में से बीजेपी ने 30 सीटें और टीएमसी ने 40 विधानसभा सीटों पर जीत हासिल की हैं। नदिया, उत्तर और दक्षिण 24 परगना जिले में भी मतुआ समुदाय की पहली पसंद तृणमूल कांग्रेस ही रही। जहां से 14 सीटों पर टीएमसी और बीजेपी मात्र 9 सीटें ही जीतने में सफल हो पाई। 

चुनाव प्रचार के दौरान ‘सीएए’ और ‘एनआरसी’ के मुद्दे पर जिस तरीके से बीजेपी मतुआ समुदाय के लेागों को अपने पक्ष में करने के लिए अपना सर्वस्व झोंक रही थी, उससे तो यही लगता था कि इस बार मतुआ समुदाय बीजेपी की तरफ जा सकता हैं। इसके लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मतुआ समुदाय को अपनी बांग्लादेश यात्रा के माध्यम से इस समुदाय को साधने की कोशिशें की। लेकिन बीजेपी की सारी रणनीति और कोशिशें ममता के सामने धरी की धरी रह गई। 

इसके विपरीत टीएमसी बहुजनों को आरक्षण, उनके अधिकार को केंद्र सरकार द्वारा खत्म करने और दलित उत्पीड़न जैसे मुद्दों पर बीजेपी को घेरती रही। इसी तरह से संथाल आदिवासी समुदाय के लोगों का तृणमूल कांग्रेस पर विश्वास बना रहा। आदिवासी समुदाय की 16 सीटों में से टीएमसी ने 10 और बीजेपी ने 6 सीटें जीती। वहीं अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित सीटों में 40 सीटें टीएमसी और 30 सीटें बीजेपी को मिलीं।

बंगाल के दलित-आदिवासी समुदाय की उन 86 विधानसभा सीटों को जिलेवार समझने की कोशिश करते हैं, जहां इनकी भूमिका अहम मानी जाती है। इनमें उत्तर बंगाल के कूचबिहार, अलीपुरद्वार, जलपाईगुड़ी और दार्जिलिंग चार ऐसे जिले हैं, जहां पर एससी और एसटी के लिए कुल 18 सीटें आरक्षित हैं, जिनमें बीजेपी ने 13 सीटें और टीएमसी ने मात्र 5 विधानसभा सीटें जीती हैं। यानी उत्तर बंगाल के पहाड़ी इलाकों में बीजेपी को ज्यादातर दलित-आदिवासी समुदाय का साथ मिला हैं। वहीं उत्तर और दक्षिण दिनाजपुर, मालदा, मुर्शिदाबाद, वर्धमान और बीरभूम ऐसे जिले हैं, जहां अल्पसंख्यक आबादी अच्छी खासी मानी जाती हैँ। इन 6 जिलों में दलित-आदिवासी समुदाय के लिए आरक्षित कुल 20 सीटें हैं, जहां बीजेपी को अनुसूचित जाति की 3 और अनुसूचित जनजाति की 2 सीटें हासिल हुईं, लेकिन वही टीएमसी को एससी की 15 सीटें मिलीं।  

उसी प्रकार पूर्व-पश्चिम मिदनापुर, झाड़ग्राम, पुरुलिया और बांकुड़ा जिले में एससी-एसटी की कुल 16 सीटें आती है, जिनमें से बीजेपी को अनुसूचित जाति की 8 सीटें, तो वहीं टीएमसी को अनुसूचित जाति की एक और अनुसूचित जनजाति की 7 विधानसभा सीटों पर जीत हासिल हुई। जबकि हावड़ा और हुगली जिले में इन दोनों समुदाय की 6 सीटें हैं, जिनमें से टीएमसी को चार और बीजेपी को दो सीटों कर जीत हासिल हुई। जंगलमहल के वे इलाके जहां आरएसएस और बीजेपी लगातार पिछले 10 वर्षों से हिंदू धर्म का पाठ पढ़ाकर आदिवासी इलाकों में जगह-जगह शाखाएं चलाकर यह बतालाने की लगातार कोशिश करती रही कि बंगाल का हिंदू खतरे में है, लेकिन आदिवासी समाज ने आरएसएस को नकार दिया। 

(संपादन : नवल/अनिल)


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