पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव : भाजपा नहीं, आरएसएस की प्रत्यक्ष हार

वर्ष 2014 में केंद्र में अपने स्वयंसेवक को गद्दीनशीं करके आरएसएस चुप नहीं बैठा। उसके निशाने पर सनातनियों का बौद्धिक गढ़ रहा पश्चिम बंगाल था। सत्ता के लिए उसने प्रणब मुखर्जी का उपयोग किया। परंतु, मोहन भागवत की प्रत्यक्ष भागीदारी और तिकड़मों को पश्चिम बंगाल की जनता ने बुरी तरह नकार दिया। बता रहे हैं भंवर मेघवंशी

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) और बंगाल का रिश्ता बहुत पुराना है। वैसे तो आधिकारिक तौर पर आरएसएस ने 1939 से बंगाल में काम शुरू किया लेकिन उसका अनौपचारिक जुड़ाव लंबा है। संघ के संस्थापक केशव बलिराम हेडगेवार की डाक्टरी की पढ़ाई बीसवीं शताब्दी के दूसरे दशक में वहीं हुई। उनके संघी जीवनीकार यह भी दावा करते हैं कि हेडगेवार क्रांतिकारी संगठन अनुशीलन समिति से भी जुड़े रहे और उन्होंने छद्म नाम से विप्लव में भागीदारी निभाई। आज़ादी के आंदोलन के ऐतिहासिक दस्तावेज़ इस संघी दावे की पुष्टि नहीं करते हैं। फिर भी यह तो माना ही जा सकता है कि संघ के संस्थापक हेडगेवार का रिश्ता बंगाल से रहा ही है। इसके बाद जब आरएसएस ने परोक्ष राजनीति में भाग लेने के लिए भारतीय जनसंघ बनाया, जिसके पहले अध्यक्ष श्यामा प्रसाद मुखर्जी को बनाया गया। उन्होंने वर्ष 1952 के पहले आम चुनाव में जीत भी पश्चिमी बंगाल से हासिल की थी। हिंदुत्व राजनीति में प्रमुख भूमिका निभाने वाली सांप्रदायिक पार्टी हिंदू महासभा को भी बंगाल में राजनीतिक ज़मीन मिलती रही है। लेकिन आरएसएस को वाममोर्चे के लंबे शासन के दौरान अपने पांव जमाने का अवसर नहीं मिल पाया। हालांकि उसकी नफ़रत की राजनीति के लिए सर्वथा उपयुक्त और उर्वरा ज़मीन बंगाल की रही।

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