मराठा आरक्षण : दावे और सियासी अफसाने

सुप्रीम कोर्ट द्वारा मराठों के आरक्षण को खारिज किए जाने के बाद एक बार फिर महाराष्ट्र में आंदोलन की सुगबुगहाट तेज होने लगी है। पहले भी मराठों ने दबाव की रणनीति अपनायी थी। एक बार वे फिर उसी रणनीति को अपनाना चाहते हैं। ऐसे में प्रदेश की राजनीति पर प्रभाव निश्चित है। बता रहे हैं बापू राऊत

“एक मराठा, लाख मराठा” के बैनर तले महाराष्ट्र के कोने-कोने से मराठा जाति को आरक्षण दिलाने के लिए मोर्चे निकाले गए थे। मराठों के मोर्चे इतने बड़े थे कि आरक्षण विरोधी एवं इस क्षेत्र के सामाजिक वैज्ञानिक भी अपनी प्रतिक्रिया देने में घबराहट महसूस कर रहे थे। उन्हें लग रहा था कि हमें मराठा विरोधी कहा जाएगा। इस स्थिति में महाराष्ट्र सरकार द्वारा गठित गायकवाड़ कमीशन के निष्कर्ष एंव सिफारिश पर मराठा आरक्षण अधिनियम, 2018 पारित किया गया। 

इस अधिनियम के खिलाफ कुछ संस्थाओं एवं वकीलों द्वारा उच्च एंव सर्वोच्च नायालय में याचिकाएं दायर की गईं। सर्वोच्च न्यायालय के चार जजों द्वारा सुनवाई के बाद मराठा आरक्षण अंधिनियम, 2018 को निरस्त किया गया। तबसे महाराष्ट्र की राजनीति एंव सामाजिक स्थिति में बदलाव के हालात दिखने लगे हैं।  

मराठा आरक्षण का इतिहास

भारत सरकार ने पहला राष्ट्रीय आयोग काका कालेलकर (1955) के अध्यक्षता में गठितत किया था। कालेलकर आयोग ने महाराष्ट्र में ब्राह्मण जाति के साथ मराठा जाति को भी शासक जाति कहकर पिछड़ा वर्ग का दर्जा देने से इंकार कर दिया था। फिर 31 दिसंबर 1979 को मंडल कमीशन का गठन किया गया। मंडल कमीशन ने मराठा जाति को प्रगतिशील और प्रभुत्वशाली जाति की श्रेणी में डालकर उनकी आबादी भारत की जनसंख्या के मुक़ाबले 2.2 प्रतिशत चिन्हित किया। मंडल कमीशन ने ओबीसी की जनसंख्या को कुल आबादी के 52 प्रतिशत (हिंदू ओबीसी 43.70+ मुस्लिम ओबीसी 8.40 प्रतिशत) घोषित किया। केंद्र सरकार के निर्देशों के बाद पिछड़ी जातियों की अनुसूची बनाने के लिए महाराष्ट्र सरकार द्वारा बी.डी. देशमुख कमेटी (1964), खत्री कमीशन (1995), आर. एम. बापट कमीशन (2008) बनाया गया। इन सभी आयोगों को कभी भी मराठा जातियों में आर्थिक, सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ेपन की झलक या तथ्य नहीं दिखाई दी। इसीलिए उन्होंने मराठों कों ओबीसी जाति का दर्जा नहीं दिया। फिर 13 अगस्त, 1967 को केंद्र ने राज्यवार ओबीसी जातियों की सूची जारी की। इसके बाद मराठा नेताओं ने मराठा जातियों कों ओबीसी में सम्मिलित करने, या उन्हें कुनबी जाति का दर्जा देने की मांग शुरु की।

मराठों को पिछड़ा दिखाने की होड में आयोगों का गठन

बापट कमीशन पर तत्कालीन राज्य सरकार द्वारा मराठों को पिछड़ा दिखाने के लिए दबाव डाला गया था। लेकिन उनका मन परिवर्तन नहीं हुआ। इसीलिए कमीशन के अस्तित्व रहने के बाद भी मराठों कों पिछड़ा दिखाने के लिए नारायण राणे कमेटी का गठन 2014 में किया गया। राणे कमिटी ने मराठों कों आर्थिक, सामाजिक एवं शैक्षणिक रूप से पिछड़ा करार देकर 16 प्रतिशत आरक्षण देने का परामर्श महाराष्ट्र सरकार को दिया। लेकिन बंबई उच्च न्यायालय ने सरकार के इस आरक्षण को स्थगित कर दिया। फिर, 2017 में महाराष्ट्र सरकार द्वारा न्यायाधीश एम.जी. गायकवाड़ को राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग का अध्यक्ष बना दिया गया। इस आयोग द्वारा 2018 को मराठा जातियों को सामाजिक एवं शैक्षणिक पिछड़ेपन का दर्जा देकर उन्हें नोकरियों एंव उच्च शैक्षणिक संस्थाओं मे आरक्षण देने की सिफ़ारिश की, जिसे महाराष्ट्र सरकार द्वारा 30 सितंबर, 2018 को मराठा आरक्षण, 2018 कानून के रूप में स्वीकार किया गया। 

महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे, भाजपाई राज्यसभा सांसद संभाजी राजे और पूर्व मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़णवीस

मराठों की सामाजिक एंव शैक्षणिक स्थिति

मराठा आरक्षण, 2018 के कानून को उच्च एवं उच्चतम न्यायालय में चुनौती दी गई। लंबे वाद-विवादों के बाद सर्वोच्च न्यायालय के चार जजों द्वारा महाराष्ट्र सरकार के इस कानून को निरस्त किया गया। निर्णय के उपरांत उच्चतम न्यायालय ने कुछ तथ्य सामने रखे हैं। सुप्रीम कोर्ट की खंडपीठ ने स्पष्ट तौरपर कहा कि मराठों द्वारा लाखों की संख्या में मोर्चे, रास्ता रोको जैसे आंदोलन और मराठा नेताओं के दबाव के कारण सरकार ने आरक्षण का कानून बनाया। अगर मराठा जातियों को पिछड़ी जातियों मे सम्मिलित किया गया, तब ऐसे स्थिति में वे अपनी शिक्षा, आर्थिक संपदा और राजनीति के प्रभाव से ओबीसी का आरक्षण भी हजम कर जाएंगे।

दरअसल, गायकवाड कमीशन ने 1 अगस्त, .2018 तक के खुले प्रतियोगिता के आधार पर होने वाले नियोजनों में मराठों की संख्या से संबंधित आंकड़े पेश किए हैं। इसके मुताबिक, राज्य सेवा परीक्षा द्वारा खुले वर्ग से मराठों का मंत्रालयीन श्रेणी का प्रतिशत श्रेणी ए, बी, सी और डी के लिए क्रमश: 37.5 प्रतिशत, 52.33 प्रतिशत, 52.1 प्रतिशत और 55.55 प्रतिशत था। वही केंदीय लोकसेवा आयोग द्वारा प्रतियोगिता परीक्षा के उपरांत मराठा जाति के अभ्यर्थियों की कीआइएएस में हिस्सेदारी 15.52 प्रतिशत, आईएफएस में 17.97 प्रतिशत और आइपीएस के लिए 27.85 प्रतिशत रहा है। इसके साथ ही, सार्वजनिक क्षेत्र और लोक उपक्रमों में तहत मराठों की ए श्रेणी में हिस्सेदारी 33.23 प्रतिशत, बी श्रेणी में 29.03 प्रतिशत, सी श्रेणी में 37.06 प्रतिशत तथा डी श्रेणी में हिस्सेदारी 36.53 प्रतिशत थी। उच्चतम न्यायालय के अनुसार, यह प्रमाण किसी भी जाति अथवा जाति समूह के सामाजिक और आर्थिक पिछड़ेपन का संकेत नहीं हो सकता। महाराष्ट्र में मराठा समाज राजनीति एंव आर्थिक संपन्नता प्राप्त समाज है। सहकार से लेकर कारखानदारी एवं शिक्षा के क्षेत्र में भी शहर से लेकर गांव तक मराठों का वर्चस्व बरकरार है। वतफिर भी वे खुद के उपर पिछड़ों का लेबल लगाने के लिए बेताब हैं। गायकवाड कमीशन ने उन्हें शूद्र का टैग भी लगा दिया है। 

आरक्षण की 50 प्रतिशत की सीमा लांघने की सलाह 

गायकवाड कमीशन द्वारा मराठों को पिछड़े जातियों मे सम्मिलित कर आरक्षण की 50 प्रतिशत की सीमा लांघने की सलाह दी गई। इसके लिए मराठों को पिछड़ा घोषित कर उनके साथ अनुसूचित जाति, जनजाति और ओबीसी के जनसंख्या को मिलाकर पिछड़ो की जनसंख्या 85 प्रतिशत दिखाया गया। अनुसूचित जाति एंव जनजाति यानी 22 प्रतिशत जनसंख्या को घटाने से पिछड़ों की कुल जनसंख्या 63 प्रतिशत रह जाती है। 50 प्रतिशत आरक्षण में से अनुसूचित जाति एवं जनजाति का 21 प्रतिशत आरक्षण घटाने से केवल 29 प्रतिशत आरक्षण बच जाता है। अब 63 प्रतिशत पिछड़ों की जनसंख्या को केवल 29 प्रतिशत के आरक्षण में सम्मिलित करना विसंगत होगा। इसीलिए, इस विशेष असाधारण परिस्थिति को देखते हुए आरक्षण की 50 प्रतिशत की सीमा को तोड़कर मराठों को आरक्षण दे देना चाहिए। गायकवाड कमीशन की इस दलील को उच्चतम न्यायालय ने इंद्रा साहनी और नागराज केस का संदर्भ देकर मानने से इंकार कर खारिज कर दिया। 

आर्थिक आरक्षण का मराठा कोटा 

मराठा आरक्षण अब केंद्र सरकार और न्यायालय का विषय बन गया है, लेकिन महाराष्ट्र में मराठा समुदाय और विरोधी पार्टियों ने इसे रास्ते की लड़ाई बना ली है। इस रास्ते की लड़ाई का मतलब दो पड़ोसी आपस में आने-जाने के लिए राह के वास्ते झगड़ते हैं। “एक मराठा, लाख मराठा” नामसे आंदोलनो की तैयारिया चल रही हैं। इससे रास्ता निकालने के लिए महाराष्ट्र सरकार ने मराठो के लिए आर्थिक पिछड़ेपन के आधार पर दस प्रतिशत आरक्षण की घोषणा की है। लेकिन यह एक अस्थाई प्रावधान है, जिसे न्यायालय में चुनौती दी ही जाएगी। 

ओबीसी के कोटे मे हिस्सेदारी चाहिए 

देश की अदालतें 50 प्रतिशत से अधिक आरक्षण के लिए तैयार नहीं हैं। और केंद्र सरकार आरक्षण की मर्यादा 50 प्रतिशत से अधिक करने के लिए तैयार नहीं होगा, इस सुगबुगाहट से मराठा समाज से सबंधित मराठा सेवा संघ और संभाजी ब्रिगेड ने मराठा जातियों के लिए ओबीसी आरक्षण के कोटे से आरक्षण की मांग की है। कोल्हापुर के भाजपाई राज्यसभा सांसद संभाजी राजे मराठा आरक्षण की आड़ में खुद को मराठा नेता साबित करने में जुटे हैं। 

अब महाराष्ट्र में क्या होगा? 

भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) परोक्ष और अपरोक्ष मराठा आंदोलन मे भाग ले रही है। इससे मराठा आंदोलन को ऊर्जा मिलेगी और साथ ही भाजपा को नया मराठा वोटर मिल जाएगा। हो सकता है कि संभाजी राजे एक नया दल गठित करें। वहीं ओबीसी भी चाहेगा कि अपने आरक्षण में किसी की हिस्सेदारी न हो। दूसरी ओर जातिगत जनगणना की ओबीसी की मांग एक नए आंदोलन का स्वरूप धारण कर सकती है। 

बहरहाल, ये सारी मांगें  केंद्र सरकार से जुड़ी हैं। फिर भी महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे को नाकों चने चबाने ही होंगे। 

(संपादन : नवल/अनिल)


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