‘शूद्र’ की अपेक्षा ‘बहुजन’ शब्द ज्यादा गरिमापूर्ण है : कंवल भारती

विचार करने का प्रश्न यह है कि क्या पिछड़ी जातियों को अपनी शूद्र पहचान से जुड़ना चाहिए? क्या ऐसा करने से उनके बीच सांस्कृतिक एकता कायम होगी? मेरा ख़याल है कि ऐसा करना आत्मघाती होगा। कंवल भारती का विश्लेषण

क्या पहचान के लिए पिछड़े वर्गो के लोगों को एक नये शब्द की दरकार है? 

‘पिछड़ा वर्ग’ पिछड़ा क्यों है? भारत की आधी से अधिक आबादी का प्रतिनिधित्व करने वाले इन समुदायों के लिए प्रयुक्त ‘पिछड़ा वर्ग’ और ‘ओबीसी (अन्य पिछड़ा वर्ग)’ शब्द इनकी वर्तमान स्थिति के बारे में तो हमें बताते हैं, परंतु यह नहीं बताते कि वे इस स्थिति में कैसे पहुंचे। लेकिन ‘शूद्र’ शब्द शायद इसकी अभिव्यक्त करता है। इस शब्द को ब्राह्मणवादी ग्रंथों के रचयिताओं ने इसलिए गढ़ा ताकि इन उद्यमी लोगों को उनकी औकात बताई जा सके। शूद्र शब्द में इन वर्गों, उनकी जीवनशैली, उनके उद्यम और उनकी शिल्पकला के प्रति इस शब्द को गढ़ने वालों का तिरस्कार भाव समाहित है और यह शब्द इन वर्गों के दमन और शोषण को वैधता प्रदान करता है। यह तब जबकि उद्यम और शिल्प ही किसी समाज या देश को आगे ले जा सकते हैं। लेकिन क्या वे उसी शब्द को अपनी पहचान बनाना चाहेंगे जो उनके शोषकों ने दिया है ताकि वे पीढ़ी-दर-पीढ़ी गुलाम बने रहें? क्या वे नहीं चाहेंगे कि जैसे पूर्व अछूतों ने अपने लिए दलित शब्द का चयन किया, उनके लिए भी वैसा ही एक शब्द हो? हम इस विमर्श में भागीदारी के लिए आपको आमंत्रित करते हैं। कृपया अपने लेख editor@forwardpress.in पर प्रेषित करें। इस विमर्श की शुरुआत कांचा इलैया शेपर्ड ने ‘खुद को शूद्र मानें ओबीसी और गैर-ओबीसी पिछड़े’ शीर्षक लेख से की। आज पढ़ें, वरिष्ठ दलित समालोचक व साहित्यकार कंवल भारती का यह आलेख      


कांचा इलैया शेपर्ड ने अपने एक लेख में पिछड़ी जातियों को सुझाव दिया है कि वे अपनी शूद्र पहचान को आगे बढ़ाएं, और एक मजबूत सांस्कृतिक एकता का गठन करें। सामान्यतया यह ख़याल अच्छा लगता है, पर सैद्धांतिक और व्यावहारिक दोनों दृष्टियों से शूद्र अस्मिता को लेकर कुछ ऐसे सवाल खड़े होते हैं, जो समाधान चाहते हैं। हालांकि शूद्र कौन हैं, यह पेचीदा सवाल नहीं है। वे सभी शूद्र हैं, जो ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य वर्ण से बाहर हैं। क्योंकि इस पर कोई विवाद नहीं है कि वर्ण चार हैं, और पांचवां कोई वर्ण नहीं है, इस दृष्टि से कायस्थ भी शूद्र हैं।  

इस सवाल की गहराई में जाने का यहां समय नहीं है कि वर्णव्यवस्था के निर्माताओं ने भारत की श्रमजीवी जातियों को शूद्र वर्ण में क्यों रक्खा, और उनको पिछड़ा बनाए रखने के लिए उनका विकास क्यों रोका? यहां विचार करने का प्रश्न यह है कि क्या पिछड़ी जातियों को अपनी शूद्र पहचान से जुड़ना चाहिए? क्या ऐसा करने से उनके बीच सांस्कृतिक एकता कायम होगी? मेरा ख़याल है कि ऐसा करना आत्मघाती होगा। शूद्र अस्मिता को आगे बढ़ाने से सांस्कृतिक एकता तो दूर, सामाजिक समानता भी कायम नहीं हो सकेगी। वस्तुतः शूद्र पहचान को स्वीकार करने का मतलब है अवैज्ञानिक और गरिमा-विरोधी वाहियात वर्णव्यवस्था को स्वीकार कर लेना। इस व्यवस्था को स्वीकार करने से उन्हें समाज में अपनी निचली श्रेणी को भी स्वीकारना होगा। तब निचली श्रेणी के वे सारे अनुशासन भी उन्हें मानने होंगे, जो ब्राह्मणी सभ्यता ने उनके लिए निर्धारित किए हैं। 

मुझे नहीं लगता कि पिछड़ी जातियों के लिए यह पहचान उनकी मानवीय गरिमा के लिए उचित होगी। कांचा इलैया शेपर्ड शूद्र पहचान के पक्ष में क्यों हैं? उनकी चिंता राजनीतिक है। उनका कहना है कि आरएसएस और भाजपा के सत्ता-विमर्श से शूद्र वर्ग गायब हो गया है। उनके विमर्श में केवल ब्राह्मण और क्षत्रिय हैं। वह शूद्रों को हाशिए पर रखने के लिए ब्राह्मण को सत्ता सौंपता है, या फिर क्षत्रिय को। वे कहते हैं कि आरएसएस ने ठाकुर आदित्यनाथ को उत्तर प्रदेश की सत्ता सौंपी, जिन्होंने मुख्यमंत्री बनते ही उस आवास को गंगा जल से धुलवाया, जिसमें अखिलेश यादव बतौर मुख्यमंत्री रहे थे। आरएसएस ने इस शुद्धिकरण की निंदा नहीं की। राजस्थान में उसने क्षत्रिय महिला वसुंधरा राजे को बार-बार मुख्यमंत्री बनाया। हरियाणा में जाटों को सत्ता से बाहर रखने के लिए खत्री जाति के मनोहरलाल खट्टर को कमान सौंपी। महाराष्ट्र में ब्राह्मण-पुत्र देवेन्द्र फडणवीस को मुख्यमंत्री बनाया, ताकि शूद्रों के उभार को रोका जा सके। कांचा कहते हैं, ‘इन द्विज नेताओं का सत्ता में आना शूद्र-दलित बहुसंख्यकों की कीमत पर आरएसएस/भाजपा द्वारा वर्ण-धर्म परंपरा को बढ़ावा देने का परिणाम है’। वे कहते हैं कि शूद्र उत्पादक वर्ग है, इसलिए उसे राष्ट्र-निर्माण के सभी विमर्शों में स्थान मिलना चाहिए।

आरएसएस यह जानता है कि जबतक संविधान है तबतक भारत हिंदू राष्ट्र नहीं बन सकता

निस्संदेह राष्ट्र निर्माण के सारे विमर्श सत्ता के विमर्श हैं, और इन सभी विमर्शों में शूद्रों को बाहर रखा जा रहा है। कांचा का एक और तर्क है। वह कहते हैं, ‘सन् 2014 में केंद्र में भाजपा की सरकार सत्ता में आई। यह पार्टी सिद्धांत के स्तर पर प्राचीन संस्कृत ग्रंथों पर आधारित परंपराओं और वर्ण-धर्म की विचारधारा को शिक्षा व्यवस्था का भाग बनाने की पैरोकार रही है। इससे एक नई स्थिति पैदा हुई। भाजपा और उसके पितृ संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के संस्कृत विमर्श में शूद्रों के लिए कोई जगह नहीं है। प्राचीन संस्कृत साहित्य में केवल क्षत्रिय राजाओं और ब्राह्मण ऋषियों की चर्चा है। जाहिर है कि हड़प्पा की नागरी सभ्यता के दिनों से भारतीय अर्थव्यवस्था का निर्माण करने वाले उत्पादक शूद्रों को राष्ट्रीय विमर्श में स्थान नहीं मिलेगा। दलितों पर थोड़ी-बहुत चर्चा की इजाजत मिल सकती है। परंतु शूद्र अन्न उत्पादकों और शिल्पकारों का तो कोई नामलेवा ही नहीं होगा। वो तो भारत के शब्दकोश से शूद्र शब्द को गायब ही कर देना चाहते हैं।’

देखें कांचा आइलैया का यह लेख : खुद को शूद्र मानें ओबीसी और गैर-ओबीसी पिछड़े

मुझे नहीं लगता है कि भारत के शब्दकोश से शूद्र शब्द गायब हो जाएगा। शूद्र शब्द, जब तक हिंदू धर्म और सभ्यता का इतिहास रहेगा, हमेशा रहेगा, लेकिन जिसे कांचा आइलैया राष्ट्रीय विमर्श कहते हैं, वह वास्तव में ब्राह्मण-सत्ता का विमर्श है, जिसमें शूद्र के साथ वैश्य वर्ण भी हाशिए पर है। यद्यपि हिंदू राष्ट्र की परिकल्पना में सत्ता के ब्राह्मण-विमर्श में द्विज वर्ग ही रहेगा, लेकिन लोकतंत्र में हिंदूराष्ट्रवादी भी सत्ता की भागीदारी में शूद्र की उपेक्षा नहीं कर सकेंगे। अलबत्ता उनका शूद्र वही होगा, जो कल्याण सिंह, विनय कटियार, उमा भारती और नरेंद्र मोदी की तरह ब्राह्मण-प्रतिष्ठापक होगा। ध्यान रहे कि आरएसएस के पास अपने ओबीसी, अपने दलित और अपने मुसलमान भी हैं, जो ब्राह्मण-सत्ता के विमर्श में भले ही नहीं हैं, परंतु जब तक लोकतंत्र है, सत्ता की भागीदारी में उनकी आवश्यकता बनी रहेगी। आरएसएस और भाजपा अच्छी तरह जानते हैं कि पूर्ण हिंदू राष्ट्र के लिए संविधान में संशोधन या उसका खात्मा जरूरी है, जिस दिशा में वे सक्रिय भी हैं, पर लोकतंत्र को समाप्त कर देना अभी उनके वश की बात नहीं है।

कांचा की शंका गलत नहीं है, पर चिंतनीय भी नहीं है। एक तो इसलिए कि शूद्र शब्द संविधान-सम्मत नहीं है। संविधान में शूद्र जातियां (इनमें कुछ दबंग अद्विज जातियां शामिल नहीं हैं और कुछ द्विज जातियों को भी शामिल किया गया है) सामाजिक व शैक्षणिक रूप से पिछड़ा वर्ग (ओबीसी के रूप में लोकप्रिय) के रूप में मान्य हैं और यही अब राजनीतिक विमर्श का भी शब्द बन गया है। केन्द्र और राज्यों के आयोग भी पिछड़े वर्ग के नाम से ही बने हैं। लेकिन यह जरूर चिंतनीय है कि आरएसएस और भाजपा के चिंतन-विमर्श में पिछड़ी जातियों का विकास प्राथमिकता में नहीं है, उनके लिए द्विजों का विकास ही मुख्य प्राथमिकता है। उनके शासन, प्रशासन और आर्थिक तंत्र में सर्वत्र मुख्य भागीदारी द्विजों की है, और पिछड़ी जातियां हाशिए पर हैं। आरएसएस और भाजपा पिछड़ी जातियों को हिंदुत्व के वर्ण-धर्म के अनुसार निचले स्तर पर ही रखने की योजनाएं बनाते दीखते हैं। वे उन्हें सिर्फ हिंदुत्व से जोड़कर मंदिर के उन्माद और हिंदू-मुस्लिम के एजेंडे पर ही सक्रिय रखना चाहते हैं। पिछड़े वर्ग में कुछ को छोड़कर शेष जातियों में राजनीतिक चेतना का अभाव है। हिंदुत्व की चेतना उनमें कूट-कूटकर भर दी गई है। पिछड़े वर्गों के लिए आरएसएस की इस हिंदूकरण-नीति ने उन्हें भाजपा का समर्थक बना दिया है। परिणामस्वरूप उनमें अपने सामाजिक और आर्थिक उत्थान की राजनीतिक चेतना का विकास अवरुद्ध हो गया है, जिससे वे शिक्षा और अन्य क्षेत्रों में निरंतर पिछड़ रहे हैं। लेकिन ओबीसी का यह पिछड़ापन भाजपा को राजनीतिक ताकत देता है। 

लोकतंत्र में हरेक वर्ग की आवाज होती है और हरेक को विकास का समान अवसर मिलता है। लेकिन इस आधार पर शूद्र जातियां कहां हैं? मेरे विचार से चिंतन का विषय यह होना चाहिए। जहां तक, अस्मिता या नाम की पहचान का सवाल है, तो ‘शूद्र’ की अपेक्षा ‘बहुजन’ शब्द ज्यादा गरिमापूर्ण है, जो न सिर्फ सामाजिक, सांस्कृतिक एकता, बल्कि राजनीतिक चेतना के लिहाज से भी अर्थपूर्ण है।

(संपादन : नवल/अनिल)


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  1. Vinod Yadav Reply

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