h n

पंजाब के आद धर्म आंदोलन ने अछूतों को दिया मूलनिवासी का दर्जा

बाबू मंगूराम मुगोवालिया द्वारा स्थापित आद धर्म की 95वीं वर्षगांठ पर रौनकी राम बता रहे हैं कि यह आंदोलन पंजाब में अछूतों के जीवन में कांतिकारी बदलावों का कारक बना

अनुसूचित जातियां पंजाब की कुल आबादी का एक-तिहाई हैं। देश के किसी अन्य राज्य में अनुसूचित जातियां जनसंख्या का इतना बड़ा हिस्सा नहीं हैं। इसके बावजूद, इस कृषि-प्रधान राज्य में खेती की ज़मीन में उनकी हिस्सेदारी सबसे कम है। उनमें से केवल 5 प्रतिशत छोटे किसान हैं। यद्यपि जनगणना में उनकी गिनती अन्य समुदायों और जातियों के साथ ही की जाती है, परंतु असल में वे सबके साथ नहीं रहते। दलितों की बस्तियों गांवों की सीमाओं पर होती हैं। पंजाब के तीनों भौगोलिक-सांस्कृतिक क्षेत्रों में इन बस्तियों के अलग-अलग नाम हैं और वे सभी अपमानजनक हैं। दोआब में उन्हें चमारली, मालवा में थाथी और माझा में वेहरा कहा जाता है। पंजाबी कौम के अन्य तबको की तरह, पंजाबी अनुसूचित जातियां भी अन्यायपूर्ण शासकों और सामाजिक दमन के खिलाफ गुरु गोविन्द सिंह के नेतृत्व में खालसा सेना द्वारा किये गए युद्धों में अपनी वीरता के लिए जानी जातीं हैं। सन् 1920 के दशक के उत्तरार्द्ध में गरिमापूर्ण जीवन की चाह में वे आद धर्म के झंडे तले गोलबंद हुईं। यह अविभाजित पंजाब में अछूतों का पहला आंदेालन था, जो 11-12 जून 1926 को शुरू हुआ। पंजाब का आद धर्म आंदोलन, शेष भारत के विभिन्न हिस्सों में उसी कालखंड में उदित आदि आंदोलनों के समानांतर चलता रहा, परंतु उसने अपना स्वतंत्र अस्तित्व बनाये रखा।

पूरा आर्टिकल यहां पढें : पंजाब के आद धर्म आंदोलन ने अछूतों को दिया मूलनिवासी का दर्जा

लेखक के बारे में

रौनकी राम

रौनकी राम पंजाब विश्वविद्यालय,चंडीगढ़ में राजनीति विज्ञान के प्रोफेसर हैं। उनके द्वारा रचित और संपादित पुस्तकों में ‘दलित पहचान, मुक्ति, अतेय शक्तिकरण’, (दलित आइडेंटिटी, इमॅनिशिपेशन एंड ऍमपॉवरमेंट, पटियाला, पंजाब विश्वविद्यालय पब्लिकेशन ब्यूरो, 2012), ‘दलित चेतना : सरोत ते साररूप’ (दलित कॉन्सशनेस : सोर्सेए एंड फॉर्म; चंडीगढ़, लोकगीत प्रकाशन, 2010) और ‘ग्लोबलाइजेशन एंड द पॉलिटिक्स ऑफ आइडेंटिटी इन इंडिया’, दिल्ली, पियर्सन लॉंगमैन, 2008, (भूपिंदर बरार और आशुतोष कुमार के साथ सह संपादन) शामिल हैं।

संबंधित आलेख

सरल शब्दों में समझें आधुनिक भारत के निर्माण में डॉ. आंबेडकर का योगदान
डॉ. आंबेडकर ने भारत का संविधान लिखकर देश के विकास, अखंडता और एकता को बनाए रखने में विशेष योगदान दिया और सभी नागरिकों को...
संविधान-निर्माण में डॉ. आंबेडकर की भूमिका
भारतीय संविधान के आलोचक, ख़ास तौर से आरएसएस के बुद्धिजीवी डॉ. आंबेडकर को संविधान का लेखक नहीं मानते। इसके दो कारण हो सकते हैं।...
पढ़ें, शहादत के पहले जगदेव प्रसाद ने अपने पत्रों में जो लिखा
जगदेव प्रसाद की नजर में दलित पैंथर की वैचारिक समझ में आंबेडकर और मार्क्स दोनों थे। यह भी नया प्रयोग था। दलित पैंथर ने...
राष्ट्रीय स्तर पर शोषितों का संघ ऐसे बनाना चाहते थे जगदेव प्रसाद
‘ऊंची जाति के साम्राज्यवादियों से मुक्ति दिलाने के लिए मद्रास में डीएमके, बिहार में शोषित दल और उत्तर प्रदेश में राष्ट्रीय शोषित संघ बना...
‘बाबा साहब की किताबों पर प्रतिबंध के खिलाफ लड़ने और जीतनेवाले महान योद्धा थे ललई सिंह यादव’
बाबा साहब की किताब ‘सम्मान के लिए धर्म परिवर्तन करें’ और ‘जाति का विनाश’ को जब तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने जब्त कर लिया तब...