रामस्वरूप वर्मा, जिनके लिए बहुजन महत्वपूर्ण थे, मुख्यमंत्री की कुर्सी नहीं

अर्जक संघ के संस्थापक रामस्वरूप वर्मा ने कहा था कि सामाजिक जागरूकता सामाजिक परिवर्तन को ला सकती है और सामाजिक परिवर्तन राजनीतिक परिवर्तन को संचालित करता है। इसलिए सामाजिक परिवर्तन के बिना राजनीतिक परिवर्तन होता है तो वह दीर्घकालिक नहीं होगा। स्मरण कर रहे हैं बाल गंगाधर बागी

भारतीय समाज में पुनर्जन्म, भाग्यवाद, जातिगत भेदभाव, कर्मकांड, धर्मांधता, कुरीतियां, सामंतवाद समेत कई प्रकार का शोषण व्याप्त है। इसके ख़िलाफ़ बहुजन/अर्जक समाज में विभिन्न कालखंडों में अलग-अलग नायकों के आह्वान पर आवाजें उठती रही हैं। इन्हीं नायकों में जाने माने समाज सुधारक, राजनीतिज्ञ,विद्वान लेखक, कुशल पत्रकार, वैज्ञानिक चेतना के वाहक, क्रांतिकारी, आंदोलनकारी महामना रामस्वरुप वर्मा (22 अगस्त, 1923 – 19 अगस्त, 1998) का नाम उल्लेखनीय है। कहा जाता है कि मान्यवर कांशीराम से एक बार किसी नेता ने कहा कि आप कोई किताब लिखें। तब कांशीराम जी ने जवाब देते हुए कहा था कि अर्जक संघ के रामस्वरूप वर्मा जी ने इतनी किताबें लिखी हैं कि अब मुझे कोई किताब लिखने की आवश्यकता ही महसूस नहीं होती। मैं तो बस उनकी लिखी बातों को ज़मीन पर उतारना चाहता हूं।

महामना रामस्वरूप वर्मा का जन्म कानपुर (उत्तर प्रदेश) जिला के गौरिकरण गांव के एक किसान परिवार में हुआ था। इनके पिता वंशगोपाल के चार पुत्रों में रामस्वरूप वर्मा सबसे छोटे थे। उनकी माता का नाम सखिया था। उन्होंने वर्ष 1949 में हिंदी साहित्य में इलाहाबाद विश्वविद्यालय से एमए किया और आगरा विश्वविद्यालय से विधि स्नातक (एलएलबी) की डिग्री हासिल की। इसके अलावा वे होमियोपैथ के भी अच्छे जानकार थे।

रामस्वरुप वर्मा अमानवीयता और शोषण पर आधारित व्यवस्था का मुखर विरोध करते हुए और मानवतावादी मूल्यों को स्थापित करने के लिए 1 जून 1968 को लखनऊ में अर्जक संघ नामक सामाजिक सांस्कृतिक संगठन की स्थापना की। वे गौतम बुद्ध, रविदास, कबीर, जोतीराव फुले छत्रपति शाहूजी महाराज, बाबा साहब डॉ. आंबेडकर से प्रभावित रहे। अर्जक संघ के विस्तार में बिहार लेनिन जगदेव प्रसाद, चौधरी महाराज सिंह भारती, ललई सिंह यादव की भूमिका भी अहम रही। जगदेव प्रसाद से मिलकर 1972 में रामस्वरूप वर्मा ने शोषित समाज दल की स्थापना की। । 

वे सामाजिक,सांस्कृतिक, आर्थिक और राजनीतिक जीवन के चारों क्षेत्रों में बदलाव (क्रांति) करने के पक्षधर थे। उन्होंने अर्जक संघ और शोषित समाज दल दोनों का लिखित सिद्धांत वक्तव्य, नीति, विधान और कार्यक्रम पेश करके देश और समाज को नई दिशा दी।

वे ब्राह्मणवाद और पूंजीवाद को समाज और देश के लिए अहितकारी मानते थे। उसकी जगह मानववाद और समाजवाद स्थापित करना चाहते थे।

महामना रामस्वरूप वर्मा (22 अगस्त, 1923 – 19 अगस्त, 1998)

अगर उनके राजनीतिक जीवन को देखें तो यह स्पष्ट बोध होता है कि एक निहायत ही ईमानदार व्यक्तित्व के धनी वर्मा जी 1967 में उत्तर प्रदेश में चौधरी चरण सिंह मंत्रिमंडल में वित्त मंत्री रहे। उन्होंने मंत्री रहते हुए बगैर कोई नया टैक्स लगाये मुनाफे का बजट पेश करके देश के अर्थशास्त्रियों को हैरत में डाल दिया। उन्होंने राजकोषीय घाटे को कम करने से लेकर सरकारी राशि के अपव्यय पर नियंत्रण का जनपक्षीय तरीका इजाद किया था। मंत्रालय से सभी अंग्रेजी टाइपराइटर को नीलाम करके हिंदी टाइपराइटर खरीदवाया ताकि सारा कामकाज हिंदी में हो। हिंदी को राजकाज की भाषा बनाने के लिए मंत्री रहते दिल्ली में गिरफ्तारी दी। उन्हें मुख्यमंत्री पद का लालच भी दिया गया, पर वे दल बदलकर कांग्रेस में नही गए। हालांकि राजनीति में आने से पहले उन्होंने भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) की लिखित परीक्षा उत्तीर्ण की। लेकिन तब तक सामाजिक राजनीतिक आंदोलन में दिलचस्पी इतनी बढ़ गई थी कि वह इंटरव्यू देने ही नहीं गए। 

रामस्वरूप वर्मा डॉ. आंबेडकर के विचारों से इतने प्रभावित थे। उन्होंने उनकी तरह ही दिन-रात सामाजिक परिवर्तन की वकालत करने वाले दर्जनों किताबों की रचना की। इनमें “ब्राह्मण महिमा क्यों और कैसे?”, “मानववादी प्रश्नोत्तरी”, “क्रांति क्यों और कैसे?”, “मनुस्मृति राष्ट्र का कलंक”, “निरादर कैसे मिटे?”, और “अछूतों की समस्या और समाधान” आदि शामिल हैं।

डॉ. आंबेडकर ने वर्ष 1944 में मद्रास के पार्क टाऊन मैदान में शेड्यूल्ड कास्ट फेडरेशन को संबोधित करते हुए कहा था कि– “जाएं और अपने दीवारों पर लिख दें कि आप इस देश का शासक बनना चाहते हैं ताकि जब कभी आप उस रास्ते से गुजरें तो आपको यह बात याद रहे।”  

डॉ. आंबेडकर की इस वैचारिकी का रामस्वरूप वर्मा के जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ा। रामस्वरूप वर्मा लिखते हैं कि- “सामाजिक जागरूकता सामाजिक परिवर्तन को ला सकती है और सामाजिक परिवर्तन राजनीतिक परिवर्तन को संचालित करता है। इसलिए सामाजिक परिवर्तन के बिना राजनीतिक परिवर्तन होता है तो वह दीर्घकालिक नहीं होगा।”

आगे जातिवाद पर लिखते हुए वे इस तरह मुखर होते हैं– “अगर पोटेशियम सायनाइड का टुकड़ा दूध के एक कैन में गिरा दिया जाय और फिर बाहर निकाल लिया जाय तब भी दूध जहर ही होगा। इसलिए ब्राह्मणवादी मूल्य सुधार के लिए उपयुक्त नहीं है। ब्राह्मणवाद में सुधार नहीं किया जा सका। इसे निर्वासित किया जाना चाहिए।”

रामस्वरूप वर्मा के राजनीतिक जीवन की शुरुआत के कानपुर के रामपुर विधानसभा से 1957 में हुई। वह 1967 से 1969, 1980, 1989 तक 1991 चुने जाते रहे। यह उनकी लोकप्रियता का ही परिणाम था कि उन्हें जनसमर्थन लगातार मिलता रहा।

रामस्वरुप वर्मा जी जनता की जमीन को मंदिर व मजार के लिए आवंटित करने के खिलाफ थे। उनका मानना था कि जनकल्याण के लिए स्कूल व कॉलेज ज़्यादा ज़रूरी हैं ना कि यह सब। इस संबंध में वह विधानसभा में एक गैर सरकारी विधेयक भी लेकर आए थे। 

भारतीय समाज में पुरोहितवाद हावी होने की वजह से जनता का धर्म के नाम पर लगातार शोषण होता रहा है, जिसमें तमाम कर्मकांड व कुरीतियां शामिल हैं। रामस्वरूप वर्मा ने उन कुरीतियों व्यावहारिक धरातल पर खत्म करने का आंदोलन चलाया। इसका असर आज भी देखा जा सकता है। अर्जक संघ पद्धति से शादी और शोकसभा समाज में काफी प्रचलित हुआ है। देखा-देखी दूसरे संगठन भी शुरुआत करने लगे हैं। मसलन, अंतिम यात्रा व अंत्येष्टि के संबंध में फारवर्ड प्रेस द्वारा प्रकाशित एक खबर में बताया गया है कि– “अर्जक संघी सुरेंद्र प्रसाद सिंह की अंतिम यात्रा जब शुरू हुई तब पूरा माहौल बदल गया। सभी लोगों ने द्विज परंपराओं का विरोध करते हुए ‘राम नाम सत्य है’ के बदले ‘सुरेन्द्र प्रसाद सिंह अमर रहें’, ‘मरना जीना सत्य है’ और ‘पाखंडवाद मुर्दाबाद’ के नारे लगाए।” इसी लेख में अर्जक संघ के सांस्कृतिक प्रकोष्ठ के पूर्व अध्यक्ष उपेंद्र पथिक बताते हैं कि अर्जक परंपराएं अर्जक समाज के लोगों में इसलिए लोकप्रिय हो रही हैं क्योंकि इसमें पाखंड नहीं है। कोई ब्राह्मण इसमें शामिल नहीं होता। साथ ही यह खर्चीला भी नहीं होता। जबकि द्विज परंपरा में पाखंड ही पाखंड है।

निश्चित तौर पर रामस्वरुप वर्मा जी का आंदोलन भारतीय इतिहास की एक ऐसी इबारत है, जिसे नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।

महामना रामस्वरूप वर्मा सामाजिक सांस्कृतिक क्षेत्र में अर्जक संघ के माध्यम से मानववाद और आर्थिक तथा राजनीतिक क्षेत्र में शोषित समाज दल के माध्यम से समाजवाद स्थापित करने के किए आजीवन संघर्षशील रहे। निरादर और दरिद्रता को वे प्रमुख समस्या मानते थे। 

भारतीय समाज के लिए वर्मा जी ने जो सन्देश दिया है उससे देश और समाज सुखी और समृद्धि वको प्राप्त कर सकेगा।

(संपादन : नवल/अनिल)


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