प्रेमकुमार मणि को मिलेगा पहला ‘सत्राची सम्मान’

प्रसिद्ध बहुजन चिंतक, साहित्यकार व राजनीतिज्ञ प्रेमकुमार मणि को पहले “सत्राची सम्मान” के लिए चयनित किया गया है। इस खबर के साथ ही, इस बार पढ़ें फादर स्टेन स्वामी के संबंध में झारखंड के सीएम हेमंत सोरेन के विचार

बहुजन साप्ताहिकी

बिहार के वरिष्ठ साहित्यकार, विचारक और राजनीतिज्ञ प्रेमकुमार मणि सम्मान को पहला सत्राची सम्मान दिया जाएगा। इस आशय की जानकारी सत्राची फाउंडेशन, पटना के निदेशक डॉ. आनंद बिहारी के द्वारा दी गयी है। उन्होंने बताया कि इस सम्मान का उद्देश्य न्यायपूर्ण सामाजिक सरोकारों से जुड़े लेखन को रेखांकित करना है। फाउंडेशन द्वारा दी गयी जानकारी के अनुसार सम्मान के आलोक में एक चयन समिति का गठन किया गया था, जिसके अध्यक्ष प्रो. वीर भारत तलवार थे। वहीं अन्य सदस्यों में पटना विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के अध्यक्ष प्रो. तरुण कुमार और ‘सत्राची’ के प्रधान संपादक डॉ. कमलेश वर्मा रहे। 

आनंद बिहार ने बताया कि आगामी 20 सितम्बर, 2021 को प्रो. वीर भारत तलवार की अध्यक्षता में श्री प्रेमकुमार मणि को सम्मान-स्वरूप इक्यावन हजार रुपए, मानपत्र और स्मृति-चिह्न प्रदान किया जाएगा। उन्होंने चयन समिति की सर्वसम्मति से प्राप्त निर्णय की घोषणा करते हुए बताया कि सामाजिक सरोकारों से जुड़े लेखन के द्वारा हिंदी बुद्धिजीविता को प्रभावित करना मणि जी की विशेषता रही है। भले ही उनका संबंध राजनीति से रहा है, मगर उनके लेखन की प्रतिबद्धता का आधार उत्पीड़ित समाज रहा है। समाज के व्यापक रूप के भीतर मौजूद तल्खियों के बारे में वे बारीकी से लिखते रहे हैं। उनका लेखन एक न्यायपूर्ण समाज की खोज में लगा रहा है।  

प्रेमकुमार मणि

बताते चलें कि 25 जुलाई, 1953 को बिहार की राजधानी पटना के नौबतपुर इलाके के एक स्वतंत्रता सेनानी और किसान परिवार में जन्मे प्रेमकुमार मणि ने विज्ञान से स्नातक की पढ़ाई की। नालंदा में भिक्षु जगदीश काश्यप के सान्निध्य में रहकर बौद्ध धर्म दर्शन का अध्ययन किया और निरंतर नवोन्मेष को उन्मुख रहे। उन्होंने 1971 में ‘मनुस्मृति : एक प्रतिक्रिया’ नामक आलोचनात्मक पुस्तिका से लेखन की शुरुआत की। यह पुस्तिका बहुत चर्चित हुई। वर्ष 1977 से कहानी लेखन की शुरुआत करनेवाले मणि जी के चार कहानी-संग्रह अब तक प्रकाशित और चर्चित हो चुके हैं। इनमें ‘अँधेरे में अकेले’, ‘घास के गहने’, ‘खोज और अन्य कहानियां’ और ‘उपसंहार’ शामिल है। उनका एकमात्र उपन्यास ‘ढलान’ अपनी सामाजिक समझ के लिए रेखांकित किया जाता रहा है।

प्रेमकुमार मणि के लेखकीय जीवन का एक बड़ा पक्ष समकालीन विषयों से जुड़ा है। वे विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं और अख़बारों में नियमित रूप से लेखन करते रहे हैं। उनके वैचारिक लेखन के कुछ संग्रह प्रकाशित हैं – ‘चरखे और चर्चे’, ‘चिंतन के जनसरोकार (अंग्रेजी में “दी कॉमन मैन स्पीक्स आउट” शीर्षक से अनूदित)’, ‘सच यही नहीं है’, ‘खूनी खेल के इर्द-गिर्द’। इसके अलावा उन्होंने कई पत्रिकाओं का संपादन भी किया है। इनमें ‘जन विकल्प’, ‘साक्ष्य’, ‘संवाद’, ‘कथा कहानी’ और ‘इस बार’ शामिल हैं। 

किसान आंदोलन स्थल से हटा दी गयी सावित्रीबाई फुले पाठशाला, संचालकों ने लगाया किसान नेताओं पर भेदभाव का आरोप 

दिल्ली और उत्तर प्रदेश की सीमा गाजीपुर बार्डर पर किसान तीन कृषि कानूनों के खिलाफ आंदोलनरत हैं। इसी आंदोलन स्थल पर नवंबर, 2020 से माता सावित्री बाई फुले राष्टीय महासभा के द्वारा अस्थायी तौर पर सावित्रीबाई फुले पाठशाला का संचालन किया जा रहा था। इस पाठशाला को पिछले महीने हटा दिया गया है और अब इस पाठशाला का संचालन किसानों के आंदोलन स्थल से थोड़ी ही दूरी पर रेडिशन होटल के पीछे बने बुद्ध विहार में किया जा रहा है। इस पूरे घटनाक्रम के बारे में महासभा की राष्ट्रीय अध्यक्ष निर्देश सिंह ने दूरभाष पर बातचीत में किसान नेताओं के उपर जातिगत भेदभाव का आरोप लगया है। उन्होंने बताया कि किसान नेताओं ने यह कहते हुए पाठशाला को हटवा दिया कि अब यहां आंदोलन स्थल पर किसानों के बच्चे नहीं हैं। इसलिए पाठशाला की आवश्यकता नहीं है। 

गाजीपुर के बुद्ध विहार में संचालित की जा रही है सावित्रीबाई फुले पाठशाला

निर्देश सिंह ने बताया कि पहले भी पाठशाला में किसानों के बच्चों से अधिक आसपास की स्लम बस्तियों के बच्चे पढ़ने आते थे, जो पहले कूड़ा बीनने का काम करते थे। महासभा ने ऐसे बच्चों को कूड़े के काम से हटाकर उनके हाथों में कलम और किताबें दीं। 

हेमंत सोरेन ने दी फादर स्टेन स्वामी को श्रद्धांजलि, बताया बिरसा के समान प्रेरक

झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने 15 जुलाई, 2021 को फादर स्टेन स्वामी के संस्थान बगइचा जाकर उन्हें श्रद्धांजलि दी। इस मौके पर सोरेन ने कहा कि झारखंड की धरती शहीदों की धरती रही है। इस धरती पर बिरसा मुंडा ने शहादत दी और अब हमलोगों ने फादर स्टेन स्वामी के जीवन को देखा है जो कि उन्होंने आदिवासियों के हक-हुकूक के लिए समर्पित कर रखा था। उन्होंने कहा कि फादर ने वंचितों के लिए आवाज बुलंद की। हम उनके योगदानों को नहीं भूला सकते। फादर के साथ व्यतीत लमहों को याद करते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि वे एक अच्छे मार्गदर्शक थे। इस मौके पर उन्होंने बगइचा में लगाए गए पत्थलगड़ी पत्थर पर पुष्प अर्पित कर फादर को श्रद्धांजलि दी।

फादर स्टेन स्वामी को श्रद्धांजलि देते हेमंत सोरेन

बताते चलें कि बीते 5 जुलाई, 2021 को फादर स्टेन स्वामी का निधन मुंबई के एक अस्पताल में न्यायिक हिरासत के दौरान हो गया था। उन्हें बीते वर्ष अक्टूबर में बगइचा से राष्ट्रीय जांच एजेंसी ने भीमा-काोरेगांव मामले में गिरफ्तार किया था। 

बनारस में नेत्रहीनों के विद्यालय पर गिरी गाज

उत्तर प्रदेश के वाराणसी में नेत्रहीनों के एक विद्यालय को बंद कर दिया गया है। यह विद्यालय 1972 से संचालित था। मिली जानकारी के अनुसार शहर के दुर्गाकुंड स्थित हनुमान प्रसाद पोद्दार नेत्रहीन विद्यालय की तकरीबन सौ करोड़ की संपत्ति का व्यावसायिक उपयोग कर मुनाफे की लालसा के चलते पूर्वांचल में नेत्रहीनों के इस पहले विद्यालय को हमेशा के लिए बंद कर दिया गया है। सूचना है कि 18 उद्योगपति, जो विद्यालय के ट्रस्टी बताएं जाते है ने, प्रस्ताव पारित कर पिछले 20 जून 2020 को कोरोनाकाल में ही विद्यालय को हमेशा के लिए बंद कर दिया। ट्रस्टियों का कहना था कि उन्हें किसी भी तरह की सरकारी सहायता नहीं मिल रही है। हालांकि पहले विद्यालय बंद करने की खबर को दबाने की भरसक कोशिश की गई लेकिन सच जब सामने आया तो लोगो ने प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री, शिक्षा सचिव और सामाजिक न्याय मंत्रालय तक छात्रों की व्यथा-कथा को लिखकर भेजा। लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई। 

बताते चलें कि 26 मार्च 1972 को इस विद्यालय की स्थापना समाजसेवी हनुमान प्रसाद पोद्दार ने ‌दृष्टिहीनों की जिदंगी में ज्ञान की रोशनी लाने के लिए किया था ताकि वे खुद को स्वावलंबी बना सकें और समाज के विकास में योगदान दे सके। सामाजिक न्याय मंत्रालय, भारत सरकार के दीन दयाल दिव्यांग पुनर्वास योजना के तहत इस विद्यालय को संचालित करने के लिए आर्थिक सहायता दी जाती थी, जिसमें पहले कटौती की गई और फिर बाद में सहायता बंद कर दी गई। 

(संपादन : नवल)


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