वे गुण, जिनके कारण अलहदा थे फादर स्टेन स्वामी

झारखंड के चर्चित मानवाधिकार कार्यकर्ता और आदिवासियों को उनके हक-हुकूक के लिए आवाज उठाने वाले फादर स्टेन स्वामी का निधन दुखद परिस्थितियों में बीते 5 जुलाई, 2021 को न्यायिक हिरासत में हो गया। उनके सहकर्मियों व करीबियों के हवाले से प्रियंका बता रही हैं उनके व्यक्तिगत गुणों व व्यवहारों के बारे में, जिनके कारण अलहदा थे स्टेन स्वमी

फादर स्टेन स्वामी (26 अप्रैल, 1937 – 5 जुलाई, 2021) पर विशेष

एक दुबला-पतला मध्यम कद-काठी का आदमी। सांवला रंग, आंखों पर चश्मा, शोषितों के हक की लड़ाई के प्रति प्रतिबद्ध। परिधान के नाम पर बस हाफ शर्ट, पैंट और पैरों में पुराने चप्पल में दिखाई देने वाली हाड़-मांस की जर्जर सी काया। आखिर ऐसा क्य़ा था इस आदमी में? जिसे पार्किंसन जैसी बीमारी से ग्रस्ति होने, हाथ कांपने पर जेल में एक स्ट्रॉ के लिए हाईकोर्ट से इजाजत मांगनी पड़ी, जिन्हें जेल में रहते मानवीय आधार पर जरूरी सुविधा तक मयस्सर नहीं हुई। और जिसे लेकर आज देश की सर्वोच्च संस्था की शुचिता पर सवाल खड़े हो गये हैं? सवाल यह भी है कि कैसी थी फादर स्टेन स्वामी की निजी जिंदगी, उनकी दिनचर्या? 

सरल हृदय वाले लेकिन सजग इंसान स्टेन स्वमी, बेहतरीन सामाजिक विश्लेषक, दबे-कुचले, शोषित आदिवासियों-दलितों के प्रतिरोध का स्वर बन चुके थे, जिनसे सभी परिचित हैं। उनके निधन ने देश के एक बड़े वर्ग को आहत किया है। रोष की प्रखर ध्वनि भी उठ रही है। कुछ संस्थाओं और बुद्धिजीवियों ने हिरासत में हुई उनकी मौत को ‘संस्थागत हत्या’ करार दिया है। देश में इसे लेकर कई प्रदर्शन हुए और अब भी जारी है।

झारखंड के आदिवासियों, उनकी संस्कृति, उनके सामाजिक मूल्यों, उनके समानता के भाव से कुछ इस कदर प्रभावित हुए थे, तामिलनाडु में जन्मे फादर स्टेन स्वामी की फिर वो झारखंड के ही होकर रह गये। करीब 84 साल के इस बुजुर्ग ने अपना पूरा जीवन आदिवासियों, दलितों, हशिये पर जी रहे लोगों की आवाज उठाने और उनके हक की लड़ाई लड़ने में बीता दिया। 

एक परिचय

तमिलनाडु के तिरुचिरापल्ली में 26 अप्रैल 1937 को स्टैनिस्लॉस लोर्दूस्वामी उर्फ फादर स्टेन स्वामी का जन्म हुआ था। मई 1957 में यीशु समाज (सोसायटीज ऑफ जीजस) से जुड़े स्टेन स्वामी एक कैथोलिक पादरी थे। उन्होंने थियोलॉजी (धार्मिक शिक्षा) और मनीला यूनिवर्सिटी से 1970 के दशक में सोशियोलॉजी (समाजशस्त्र) में स्नातकोत्तर की पढ़ाई की। वर्ष 1975 से लेकर 1986 तक बेंगलुरू स्थित इंडियन सोशल इंस्टीट्यूट के निदेशक के तौर पर उन्होंने काम किया। वह 1965 में पहली बार झारखंड आये और फिर यहीं के होकर रह गए। हालांकि उन्होंने विधिवतरूप से 1991 में आदिवासियों के बीच काम करना शुरू किया। वहीं 1990 के दशक से ही आदिवासियों की आवाज बन जाने वाले स्टेन स्वामी की समाज पर जबरदस्त पकड़ थी। आदिवासियों के जल-जंगल-जमीन की लड़ाई लड़ने वाले स्टेन की आवाज दबाने के लिए हर कोशिश की गयी। पहले पत्थलगड़ी आंदोलन से जुड़े दस हजार आदिवासियों को प्रताड़ित करने के मुद्दें पर लिखने के लिए उनके उपर देशद्रोह का मुकदमा कर उन्हें गिरफ्तार करने की कोशिश हुई। बाद में भीमा-कोरेगांव हिंसा मामले में फंसाकर राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) ने उन्हें 8 अक्टूबर, 2020 को रांची स्थित उनके बगइचा नामक संस्था में उनके आवास से गिरफ्तार कर लिया। फिर मुंबई के तलोजा जेल में रहते हुए उन्होंने कई बार जमानत के लिए अपील की। लेकिन उनकी अपीलें खारिज होती गयी। कई बीमारियों से पीड़ित होने के बावजूद उन्हें जमानत नहीं दी गई। और अंतत: 5 जुलाई, 2021, का दिन भारतीय इतिहास में एक काले अध्याय के रूप में जुड़ गया। इसी दिन एक समर्पित सामाजिक कार्यकर्ता ने आखिरी सांसें लीं। 

फादर स्टेन स्वामी को आखिर झारखंड के आदिवासियों में ऐसा क्या खास दिखा कि उन्होंने फिर कभी मुड़कर नहीं देखा, इस सवाल का जवाब उनके कुछ साक्षात्कार से मिलता है, जिसे आदिवासी जनाधिकार महासभा की ओर से उनकी गिरफ्तारी के बाद ट्वीट किया गया था।

दरअसल, आदिवासियों के समाज में जो समानता का भाव है, उससे फादर स्टेन काफी प्रभावित थे। उन्होंने कहा था, समानता, सहयोग, सहभागिता, सर्वसहमति से निर्णय लेना आदिवासी समाज के अहम गुण हैं। ये लोग प्रकृति से जुड़े हैं। प्रकृति से जुड़ा इनका सरना धर्म-संस्कृति है। यहां एक समानता वाली संस्कृति है। यानी कोई बड़ा-छोटा नहीं, और लोकतंत्र में यही समानता जरूरी है।

सहयोगियों व जानकारों की नजर में फादर स्टेन स्वामी

पहले झारखंड के चाईबासा और फिर रांची में रहकर आदिवासियों, दलितों के मानवाकारों की रक्षा, उनकी जमीन, प्राकृतिक संसाधनों को बचाने और पांचवीं अनुसूची तथा आदिवासी हित में बनाये गये कानूनों को लागू करवाने के लिए वह निरंतर संघषरत रहे। रांची के नामकुम में उन्होंने बगइचा संस्थान का निर्माण करवाया था, जहां झारखंड से जुड़े विभिन्न मुद्दों पर सेमिनार, प्रशिक्षण के कार्यक्रम होते रहते हैं। इस संस्थान में बतौर प्रशासक और वित्तीय प्रबंधक काम कर चुके महेंद्र पीटर तिग्गा ने बगइचा में, फादर स्टेन के साथ दो साल बिताये। स्टेन स्वामी की दिनचर्या का जिक्र करते हुए वे बताते हैं कि फादर सुबह जल्दी ही उठ जाते थे। नित्य क्रिया के बाद वह करीब एक किलोमीटर तक मॉर्निंग वॉक पर जाते, जिसमें जूली नाम की कुतिया भी उनके साथ होती। लौटकर अखबार पढ़ते और फिर नहा-धो लेने के बाद नाश्ता करते। बगइचा में टहलते हुए भी वह किसी-ना-किसी मुद्दे के बारे में ही सोच रहे होते थे। सुबह के समय अकेलेपन को पसंद करने वाले स्टेन स्वामी बगइचा में काम करने वाले कर्मियों से आत्मीय व्यवहार करते थे। 

महेंद्र तिग्गा आगे बताते हैं कि मैंने किसी बड़े संस्थान के निदेशक को खाना बनाने वालों की चिंता करते नहीं देखा, लेकिन फादर स्टेन स्वामी की यही बात उन्हें औरों से अलग करती है। जनसाधारण के छोटे-से-छोटे काम को भी वह तरजीह देते थे। बगइचा में जो भी लोग कार्यक्रम के लिए आते थे, उनका पूरा ख्याल रखा जाता था, और स्टेन स्वामी खुद भी ध्यान रखते थे कि लोगों को किसी तरह की परेशानी ना हो।

रांची के नामकुम इलाके में अपने संस्थान बगइचा के परिसर में अपने कमरे के आगे फादर स्टेन स्वामी

महेंद्र तिग्गा के मुताबिक फादर ने अत्यंत सादा जीवन जीया। दो सालों में उन्होंने कभी उनके पास नये कपड़े नहीं देखे। बगैर इस्तरी के टी-शर्ट-पैंट पहनते थे। महेंद्र तिग्गा कहते है कि फादर जैसी शख्सियतों से हम-आप सीखते हैं कि जीवन कैसी होनी चाहिए. जहां आपको समाज के लिए कुछ करना है। 

स्टेन स्वामी की हिंदी का जिक्र करते हुए वे कहते हैं कि बगइचा में काम करनेवाली लड़की को वह ‘एक लड़की’ कह कर बुलाते थे, जिसपर मैं मुस्कुराता था, और मेरे द्वारा लड़की को ‘मैंया’ कहे जाने पर फादर स्टेन। अपने व्यक्तिगत जीवन में भी फादर ने हार नहीं मानी। पार्किंसन बीमारी के कारण उनके हाथ कांपते थे, लेकिन फिर भी स्टेन स्वामी अपने सारे काम खुद करते थे। तिग्गा कहते हैं कि उनकी बीमारी के बाद भी आप उनकी गिलास में पानी नहीं डाल सकते थे। यह बात उन्हें पसंद नहीं थी। वो अपनी तकलीफ से ऊपर उठे हुए इंसान थे। वह किसी पर निर्भर नहीं थे। कहीं भी आने-जाने के लिए ऑटो का इस्तेमाल करने की बात करते हुए महेंद्र तिग्गा बताते हैं कि नामकुम बाजार चौक से बगइचा पैदल आने में एक बुजुर्ग को 15-20 मिनट लगता है, लेकिन फादर स्टेन ने कभी भी उन्हें बाजार से बाइक से बगइचा ले जाने को नहीं कहा। वे पैदल ही आते-जाते थे। 

तिग्गा के मुताबिक, लोगों के लिए फादर किस कदर समर्पित थे, इसका अहसास इसी से किया जा सकता है कि बगइचा में जब कोई कार्यक्रम नहीं होता था, तब ही हमदोनों के लिए अलग से खाना बनता था। नहीं तो कार्यक्रम में जो खाना सबके लिए बनता, वही हमलोग भी कॉमन हॉल में सबके साथ बैठकर खाते। तिग्गा बताते हैं कि एकबार उन्होंने फादर से कहा कि हमारी प्लेट में थोड़ा आचार औऱ एक-एक ऑमलेट तो आ ही सकता है। तब फादर ने सहज भाव में जवाब दिया– “हम लोगों के लिए हैं” (वी आर फॉर द पिपल)। यह बात उन्होंने हंसते हुए कही जो थी तो केवल एक पंक्ति लेकिन यह समझाने के लिए काफी थी कि हमलोगों को क्या करना है, कैसे रहना है। बगइचा में लगे पत्थलगड़ी से उनके विशेष लगाव का जिक्र करते हुए महेंद्र ने बताया कि वॉक पर जाने से पहले फादर पत्थर के सामने सिर झुकाते थे, फिर आने के बाद काफी देर तक उसे निहारा करते थे। वह संस्थान में आनेवालों से भी उसका जिक्र किया करते थे। एक नेता, एक आइएएस अधिकारी, और सरकार की नजर में झारखंड क्या है, लेकिन बगइचा का पत्थलगड़ी झारखंड को अलग तरीके से बताता है। 

स्टेन स्वामी के धर्मगुरू होने की बात पर तिग्गा ने कहा कि मैंने कभी भी उनको पादरी वाले कपड़े पहनकर प्रार्थना करते नहीं देखा। लेकिन एक पादरी होते हुए उन्होंने ईश्वर से जो प्रेम किया, उस प्रेम को न्याय के साथ जोड़कर काम किया। 

प्रोस्टेट कैंसर के इलाज के लिए फादर स्टेन के दक्षिण भारत जाने की बात करते हुए उन्होंने बताया कि बीमारी के कारण वे अपना सामान भी नहीं उठा पाते थे। एकबार मैंने कहा भी कि आपको छोड़ आता हूं, लेकिन उन्होंने कहा– “महेंद्र नो, आप यहां का काम संभालिये।” 

तिग्गा के अनुसार बगइचा ही उनका परिवार था, और वो चाहते थे कि वहां किसी को तकलीफ नहीं हो।

फादर स्टेन स्वामी के शिष्य रह चुके झारखंड के जानेमाने फिल्मकार मेघनाद उन्हें याद करते हुए कहते हैं कि “बैंगलुरू में सोशल इन्स्टीट्यूट में उन्होंने मुझे पढ़ाया था। आज मै समाज के बारे में जो कुछ भी जानता हूं, उसमें उनका भी योगदान रहा है। करीब 40 सालों तक हमारा साथ रहा। मेरी फिल्में भी आदिवासी संघर्ष की कहानी कहती हैं, जो उन्हें पसंद आती थीं।”

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मेघनाद बताते हैं कि फादर ने कभी भी बड़े संस्थान के साथ काम नहीं करना चाहा। वह हमेशा गरीबों-आदिवासियों के लिए कुछ करना चाहते थे। ‘लर्निंग एंड डी-लर्निंग’ की बात करते हुए फादर कहते थे कि मैंने जो स्कूल-कॉलेज में पढ़ा, उसे भूलकर आदिवासी जीवन के मूल्यों से सीख रहा हूं। आदिवासी मूल्यों के बारे में बताते हुए स्टेन स्वामी ने मेघनाद को एकबार बताया कि– गांव में पेड़ से आम तोड़ा जा रहा था, मैं भी वहां था। मैंने देखा कि पेड़ पर बहुत सारे आम (लगभग 25 प्रतिशत) बचे हुए हैं। मैंने बूढ़े बाबा को कहा कि इन आमों को क्यों नहीं तोड़ा। देखो तो कितने सारे अभी भी पेड़ पर हैं। मेरी बात सुनकर उस बुजुर्ग आदिवासी ने कहा कि ये फल पंछियों के लिए हैं, उन्हें भी तो खाना चाहिए। उनका जवाब सुनकर मैं हैरान रह गया। मैंने सोचा कि कितना उदार है ये आदिवासी समाज, जहां पंछियों-जानवरों के खाने की चिंता भी इन्हें हैं, हमलोग तो बस अपने स्वार्थ सिद्धि में लगे हैं। 

आदिवासियों के जीवन और संघर्ष से जुड़ी फिल्मों में फादर को रुचि थी। आदिवासी संस्कृति को समृद्ध बनाने वाले पद्मश्री रामदयाल मुंडा जी के जीवन पर आधारित फिल्म ‘नाची से बाची’ की स्क्रीनिंग के समय, फादर स्टेन तय समय से पहले रांची यूनिवर्सिटी के हॉल में आकर पहली पंक्ति में बैठे थे, और उन्होंने इस फिल्म को सराहा भी था। इस तरह की फिल्मों को देखकर वे अपनी प्रतिक्रिया भी देते थे। संस्कृति का आनंद उठाना उनकी आदत थी। 

मेघनाद कहते हैं कि कर्मकांड लोगों को सुलाने का काम करता है, लेकिन स्टेन स्वामी ने लोगों को जागरूक किया। अपने ज्ञान का उन्होंने आदिवासियों की समस्याओं के निराकरण के लिए इस्तेमाल किया। जल-जंगल-जमीन की लड़ाई में शोषित वर्ग के साथ वे आखिरी सांस तक खड़े रहे। ईसा मसीह ने जैसे लोगों के हक की लड़ाई में उनका साथ दिया और अपनी जिंदगी कुर्बान कर दी, झारखंड में फादर स्टेन स्वामी भी जीजस के कुछ वैसे ही अनुयायी थे, जिन्होंने ना सिर्फ दूसरों के अधिकार के लिए ताउम्र संघर्ष किया, बल्कि अपनी जिंदगी कुर्बान कर दी। उनके लिए लोगों के हक के लिए खड़ा होना ही धर्म था।  

फादर स्टेन को याद कर भावुक होते हुए फिल्मकार मेघनाद ने बताया कि नामकुम में उनके संस्थान बगइचा में पत्थलगड़ी किया हुआ है, जिसमें झारखंड के लिए शहीद हुए लोगों के नाम है। फादर रोजाना उस पत्थर को देख शहीदों को याद करते थे, और आज उनका नाम भी उस पत्थर पर अंकित हो गया। 

बगइचा में कार्यक्रम समन्वयक के तौर पर काम कर रही सुगिया होरो फादर को वैसे ही याद करती है, जैसे वह अपने परिवार के एकबुजुर्ग को याद कर रही हो। सुगिया बताती हैं कि फादर को सबकी चिंता रहती थी। हमेशा हमलोगों से कहते थे कि बगइचा, और यहां आनेवाले, रहनेवाले मेरा परिवार है। बीमार होने के बावजूद हमें कभी खाना परोसने नहीं दिया। खुद से लेते औऱ खाते। सुगिया बताती हैं कि खाने में उन्हें दोसा, सांभर, इडली के साथ-साथ मैगी भी पसंद था। सरल भाव का जिक्र करते हुए उन्होंने बताया कि कभी-कभी तो फादर काम में हमारी मदद भी कर दिया करते थे। बगइचा में सुबह 11 बजे और शाम को 5 बजे कर्मियों के चाय पीने का समय होता है। इस दौरान स्टेन स्वामी भी उनके साथ होते थे। काम की जानकारी लेते, जरूरी सुझाव देते थे। 

झारखंड आंदोलनों से जुड़ीं जानी-मानी सामाजिक कार्यकर्ता दयामनी बारला कहती हैं कि फादर के साथ हमारी एक-दो नहीं, अनेक यादें हैं। आदिवासियों के मुद्दे हमें एक मंच पर लाते थे, और हम संघर्ष में साथ होते थे। लेकिन फादर का सरल औऱ सादा जीवनशैली उन्हें अन्य से अलग करता था। उन्हें कभी कार से आते नहीं देखा। ऑटो से आने पर भी वह लोगों से पूछ लेते थे कि अगर किसी को साथ चलना हो तो चले। बारला कहती हैं कि सबकी चिंता करना, साथ लेकर चलना उनके स्वभाव में था। वर्ष 1996 से उनसे जुड़ी रहीं बारला कहती हैं कि वह आदिवासियों के उत्थान के नाम पर अपना चेहरा चमकाने वालों में से नहीं थे। वह पीछे बैठकर लोगों को सुनते थे। हमेशा जाति-धर्म, राजनीति से ऊपर उठकर चीजों को सोचते थे। आदिवासियों से जुड़े मुद्दों के लिए वो छोटे-बड़े संस्थानों को एक मंच पर लाना चाहते थे।

फादर स्टेन स्वामी को याद करते हुए रांची के वरिष्ठ पत्रकार मधुकर कहते हैं कि “कार्यक्रम के दौरान बगइचा में जाना होता था। जहां मैंने देखा कि वह बगइचा को एक बच्चे की तरह प्यार करते थे। कहीं गंदगी दिखी तो किसी को बोलने की बजाये खुद ही सफाई में लग जाते, जो बगैर बोले लोगों को बड़ी सीख दे जाता था। झारखंड के आदिवासियों के लिए काम करने वालों के साथ वे ऐसे थे मानो उनका बचपन वापस आ गया हो। भले ही इनकी उम्र में दादा-पोते वाला फासला हो, लेकिन वह एक दोस्त की तरह व्यवहार करते थे। समाज के लिए काम करनेवालों को हमेशा प्रोत्साहित करते थे।”

बगइचा के मौजूदा निदेशक पीटर मार्टिन टोनी कहते है कि फादर की सोच थी कि समाज के आखिरी जरुरतमंद तक मदद पहुंचनी चाहिए। एक छोटा-सा किस्सा याद करते हुए उन्होंने कहा कि- रांची में घरेलू काम करनेवाली महिलाओं को ‘दाई’ कहकर बुलाया जाता था। यह बात फादर स्टेन को पसंद नहीं थी। वह घरेलू काम करनेवाली महिलाओं से कहते थे कि तुम आजीविका के लिए मजदूरी करती हो, किसी को हक नहीं कि तुमको ‘नौकर’ या ‘दाई’ कहे। इन छोटी-छोटी बातों से समझा जा सकता है कि वह किस कदर आदिवासी समाज में जागरूकता लाना चाहते थे। ताकि कोई शोषण नहीं कर सके। वह हमेशा आदिवासियों से कहते कि तुम्हें संगठित होना होगा ताकि कोई तुम्हारा हक कोई नहीं मारे।

दिनचर्या पर बात करते हुए टोनी ने बताया कि प्रायः हर दिन फादर किसी ना किसी मीटिंग के लिए जाते ही थे। मॉब लिंचिंग, भूख से मौत, विस्थापन के मुद्दों, जमीन अधिग्रहण को लेकर कहां शोषण हो रहा है, इसके बारे में फैक्ट फाइंडिंग करना, पीयूसीएल के साथ मिलकर काम करना, उनके कार्य थे। वापस आकर लंच कर थोड़ा आराम करते, फिर इंटरनेट पर पढ़ना या अपने आलेख पर काम करना। प्रिस्ट की ट्रेनिंग के दौरान स्टेन स्वामी ने हिंदी सीखी, औऱ चाईबासा में काम करते हुए वहां की आदिवासी भाषा ‘हो’ को। वे इन भाषाओं में आसानी से बात करते थे। शाम को 7 से 8 का समय उनका न्यूज चैनल देखने का होता था और रात करीब साढ़े नौ बजे तक सो जाते थे। टोनी कहते हैं कि वह मीडिया में प्रकाशित करने के लिए आलेख नहीं लिखते थे, बल्कि जागरूकता फैलाने के लिए हर 10-15 दिनों में एक आलेख जरूर लिखते थे।

झारखंड जनाधिकार महासभा से जुड़े चर्चित सामाजिक कार्यकर्ता सिराज दत्ता की नजर से देखें तो फादर स्टेन स्वामी एक ऐसे शख्स थे, जो वामपंथी विचारधारा – मार्क्सवाद से प्रभावित थे, जिनके जीवन का ध्येय ही अन्याय के विरुद्ध लड़ना रहा। सिराज कहते हैं कि वे पढ़ते बहुत थे। किसी भी मुद्दे पर शोध बहुत करते थे। साथ ही लोगों में जागरूकता लाने के लिए लिखते थे। यह उनके जीवन का हिस्सा था। फादर के कमरे में एक लोहे का बेड, एक अलमारी और जर्जर हालत वाली हाथकुर्सी थी। कमरे में म्यूजिक के चंद सीडी होने का जिक्र करते हुए सिराज कहते हैं कि मुझे नहीं पता स्टेन स्वामी उन्हें सुनते थे या नहीं। लेकिन इतना मालूम है कि वो शोषितों की आवाज थे। 

जमशेदपुर के रहनेवाले और जनमुक्ति संघर्ष वाहिनी के राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य मंथन फादर स्टेन स्वामी को याद करते हुए कहते हैं कि बगइचा संस्थान का प्रमुख होने के बाद भी कभी किसी तरह की अति विशिष्ट सेवा उनके लिए नहीं देखने को मिली। एक आम आदमी की तरह वह काम करते थे। विशेष व्यवस्था की अपेक्षा उन्होंने कभी नहीं की। किसी कार्यक्रम में कुर्सी मिली तो भी ठीक, नहीं भी मिली तो कभी कोई शिकायत नहीं। सहजता उनके स्वभाव का हिस्सा था। यह नाटकीय नहीं था, बल्कि सरलता और सहजता उनके जीवन में मूल रूप से शामिल थी।

(संपादन : नवल/अनिल)


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