दिलीप कुमार : पसमांदा आंदोलन के एक बागबान

अपनी सभी सभाओं में दिलीप कुमार जोर देकर कहा करते थे कि पसमांदाओं के मामले में आरक्षण को धर्म से न जोड़ते हुए उसे सामाजिक और शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़े एक समुदाय की बेहतरी के लिए सामाजिक उपाय के रूप में देखा जाना चाहिए। बता रहे हैं अभिजीत आनंद

युसुफ खान उर्फ़ दिलीप कुमार (11 दिसंबर, 1922 -7 जुलाई, 2021) पर विशेष

सोते-जागते, खाते-पीते बॉलीवुड हम लोगों के दिलो-दिमाग पर छाया रहता है। बॉलीवुड की हस्तियों के दीवाने देश की सीमाओं के पार भी हैं। हम पर बॉलीवुड के सितारों का प्रभाव सिनेमा हॉल तक सीमित नहीं रहता। हम अपने निजी जीवन में उनके जैसा बनना और दिखना चाहते हैं। परन्तु व्यापक समाज के घटनाक्रम पर बॉलीवुड के सितारे अक्सर चुप्पी साधे रहते है। समय-समय पर इस प्रवृत्ति की आलोचना भी होती रही है। अन्य कई देशों में कला और संस्कृति के क्षेत्रों की हस्तियां ऐसा नहीं करतीं, विशेषकर हॉलीवुड में। वहां के सितारों के सामाजिक सरोकार होते हैं और वे खुलकर उनकी हिमायत करते हैं। यह वहां के समाज की परिपक्वता को भी प्रतिबिंबित करता है।    

मसलन, जॉर्ज क्लूनी ने ‘इनफ प्रोजेक्ट’ शुरू किया; एकोन ने ‘लाइटिंग अफ्रीका’ और मेरिल स्ट्रीप ने ‘ह्यूमन राइट्स कैंपेन (एचआरसी)’। एचआरसी, राष्ट्रीय स्तर का एलजीबीटी संगठन है। गोल्डन ग्लोब्स अवार्ड समारोह में एचआरसी के लिए धन जुटाने हेतु आयोजित एक कार्यक्रम में मेरिल स्ट्रीप के भावपूर्ण भाषण को भुलाना मुश्किल है। उस दिन डोनाल्ड ट्रम्प की बखिया उधेड़ कर उन्होंने न सिर्फ गोल्डन ग्लोब्स अवार्ड जीता बल्कि लाखों लोगों का दिल भी जीत लिया।     

मशहूर लोगों द्वारा सामाजिक मुद्दों और व्यापक राजनीति में दिलचस्पी न लेना सही है या गलत, यह बहस का विषय हो सकता है। परन्तु हम इतना तो कह ही सकते हैं कि भारत में फ़िल्मी दुनिया की हस्तियों का एक अलिखित नियम है कि वे समाज से लेते तो बहुत कुछ हैं, परन्तु उसे देते कुछ नहीं है।     

क्या हमेशा से यही होता आ रहा है? इस बारे में पक्के तौर पर कुछ कहने में कम से कम मैं तो सक्षम नहीं हूँ। परन्तु हाँ, इस नियम के कम से कम एक अपवाद के बारे में तो मैं बात कर ही सकता हूँ। और वह अपवाद हैं असाधारण प्रतिभा के धनी और सबके पसंदीदा ट्रेजेडी किंग, खानों में पहले खान, युसुफ खान उर्फ़ दिलीप कुमार (11 दिसंबर, 1922 -7 जुलाई, 2021)। बहुत कम लोग जानते हैं कि दिलीप साहब ने मुस्लिम समुदाय के हाशियाकृत तबकों के संघर्षों में बड़े पैमाने पर हिस्सेदारी की। यह इस तथ्य के बावजूद कि वे स्वयं ऊंची जाति से थे और उनकी शोहरत और दौलत ने उन्हें देश के श्रेष्ठि वर्ग के शीर्ष पर बिठा दिया था। उन्होंने जो किया, वैसा और उतना बहुत कम लोग कर पाते हैं। इस महानायक ने कैमरे से परे काफी काम किया, विशेषकर अपनी कामकाजी ज़िन्दगी के दूसरे हिस्से में। उन्होंने ऑल इंडिया मुस्लिम ओबीसी आर्गेनाइजेशन (एआईएमओबीसीओ) के झंडे तले महाराष्ट्र के पसमांदाओं के संघर्ष में जमकर भागीदारी की।   

दिलीप कुमार की ज़िन्दगी के इस अपेक्षाकृत अनजाने पहलू के बारे में जानने के लिए मैंने सामाजिक कार्यकर्ता और (एआईएमओबीसीओ) के संस्थापक विलास सोनवाने, बॉलीवुड के लोकप्रिय गीतकार हसन कमाल और एआईएमओबीसीओ के अध्यक्ष शब्बीर अंसारी से बात की। ये तीनों उनके साथ काम करते थे। उन्होंने उन दिनों की अपनी यादें मेरे साथ साझा कीं। 

पसमांदा समाज के समर्थन में : बाएं से रामविलास पासवान, शब्बीर अंसारी और दिलीप कुमार (तस्वीर साभार राउंड टेबुल इंडिया)

विलास भाई की दिलीप कुमार के साथ पहली मुलाकात मुंबई के इस्लाम जिमखाना में हुई थी। मुलाकात के दौरान विलास भाई ने उन्हें अपने संगठन के बारे में बताया और यह भी कि यह संगठन पसमांदा मुसलमानों के अधिकारों लिए संघर्षरत है। दिलीप कुमार को सामाजिक मुद्दों में गहरी रूचि थी और वे उदार मिजाज के आदमी थे। उन्होंने विलास भाई की बात ध्यान से सुनी। हसन कमाल ने मुझे बताया, “उन दिनों दिलीप साहब सामाजिक मुद्दों को लेकर बहुत सक्रिय थे। अगर उन्हें भारतीय सेना से संबंधित कोई बात पता चलती या उन्हें बाढ़ आदि प्राकृतिक विपदा के कारण कहीं हुई तबाही के बारे में बताया जाता तो वे अपने घर से निकल पड़ते और जो कुछ वे कर सकते थे, करते। दिलीप कुमार का मानना था कि कोई भी फ़िल्मी हस्ती अगर सामाजिक मुद्दों में समाज के साथ शामिल नहीं होती तो स्क्रीन से उतरते ही लोग उसे भुला देंगें। ये सिर्फ सोशल एक्टिविज्म ही है, जो उसे जिंदा रखेगा।”

विलास भाई और शब्बीर अंसारी ने दिलीप कुमार को मंडल आयोग की रपट और पसमांदा मुसलमानों पर उसके लागू होने के बारे में बताया। और यह भी बताया कि देश के करीब 85 फ़ीसदी मुसलमान पसमांदा हैं, जिन्हें एआईएमओबीसीओ के आंदोलन से फायदा मिल सकता है। दिलीप कुमार ने इस पर सहमति व्यक्त करते हुए कहा कि शेष 15 फ़ीसदी मुसलमानों को आरक्षण की ज़रुरत भी नहीं हैं क्योंकि वे पहले से ही आर्थिक दृष्टि से समृद्ध हैं। उन्होंने विलास भाई से यह वायदा भी किया कि आंदोलन के लिए जो कुछ भी वे कर सकते हैं, ज़रूर करेंगे। परन्तु जो उन्होंने किया, वह अपेक्षा से कहीं अधिक था। 

दिलीप कुमार ने 1990 में औपचारिक रूप से एआईएमओबीसीओ की सदस्यता ली और संगठन के रोज़मर्रा के कामों में भी दिलचस्पी लेने लगे। उन्होंने देश भर में सौ से ज्यादा आमसभाओं में हिस्सा लिया। उन्होंने विलास भाई, शब्बीर अंसारी और हसन कमाल के साथ इन सभाओं को संबोधित भी किया। औरंगाबाद और लखनऊ में उनकी विशाल रैलियों ने सियासत के गलियारे में हलचल पैदा कर दी। उनके फ़िल्मी सितारा होने के कारण इन सभाओं में भारी भीड़ उमड़ी और इसने राजनैतिक वर्ग को हिला कर रख दिया। राजनीतिज्ञों को समझ में आ गया कि उन्हें लोगों की मांगों पर ध्यान देना ही पड़ेगा।   

अपनी सभी सभाओं में दिलीप कुमार जोर देकर कहा करते थे कि पसमांदाओं के मामले में आरक्षण को धर्म से न जोड़ते हुए उसे सामाजिक और शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़े एक समुदाय की बेहतरी के लिए सामाजिक उपाय के रूप में देखा जाना चाहिए। यह मात्र संयोग है कि इस समुदाय का धर्म इस्लाम है। वे कहते थे कि पसमांदाओं को उनकी जाति के कारण हाशियाकरण का सामना करना पड़ता है। उन्हें पेशे के आधार पर अलग-अलग बिरादरियों में बाँट दिया गया है, जिसके चलते उनका सामाजिक विकास प्रभावित हुआ है और वे जीविकोपार्जन के लिए अपनी पसंद की आर्थिक गतिविधि चुनने के अधिकार से वंचित हैं। आरक्षण एक संवैधानिक प्रावधान है और हाशियाकृत समुदायों को आरक्षण के कारण उन्हें उपलब्ध अवसरों का उपयोग अपनी सामाजिक-आर्थिक उन्नति के लिए करना चाहिए। दिलीप कुमार ने संगठित होने और आरक्षण की परिकल्पना को समझने में लोगों की मदद की। उन्होंने यह प्रयास किया कि लोग एक मंच पर आएं और अपने अधिकारों के लिए आंदोलन करें। वे एक नई आवाज़ को लोगों तक पहुँचाने का माध्यम बने। 

यद्यपि एआईएमओबीसीओ पसमांदाओं के लिए 1978 से ही काम कर रहा था, परन्तु दिलीप कुमार के उससे जुड़ने से संगठन को गति मिली। सरकार इस संगठन के साथ खड़े लाखों लोगों की आवाज़ पर ध्यान देने के लिए मजबूर हो गई। नतीजे में महाराष्ट्र सरकार को 7/12/1994 को एक शासकीय आदेश जारी कर सामाजिक और शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़े मुसलमानों को ओबीसी की सूची में शामिल करना पड़ा। इस सिलसिले में सरकार ने लगभग 57 अधिसूचनाएं और आदेश जारी किये। यह तत्समय पसमांदा आंदोलन की एक बड़ी सफलता थी।  

बहरहाल, जिस प्रश्न पर विचार नहीं हुआ वह यह है कि जमींदार परिवार का यह पठान, पसमांदाओं के आंदोलन से कैसे जुड़ गया। यह अभूतपूर्व था। मुझे बताया गया कि दिलीप कुमार ने अपने परोपकारी स्वभाव के कारण इस आंदोलन में शिरकत की। परन्तु इस व्याख्या से मैं संतुष्ट नहीं था।   

मैं अपने प्रश्नों के साथ एक बार फिर शब्बीर अंसारी के पास पहुंचा। उन्होंने मुझे दिलीप कुमार के जीवन की कुछ घटनाओं के बारे में बतलाया जिनके कारण वे पसमांदा मुसलमानों के आंदोलन से जुड़ने के लिए प्रेरित हुए। शब्बीर साहब ने मुझे बताया कि दिलीप साहब सामाजिक मसलों के बारे में बहुत-कुछ जानते-समझते थे परन्तु फिर भी शुरुआत में मुस्लिम समुदाय के सन्दर्भ में जाति के प्रश्न पर विचार करने में उनमें कुछ हिचकिचाहट थी। परन्तु धीरे-धीरे वे महाराष्ट्र में सामाजिक न्याय आंदोलन के अग्रणी पंक्ति के नेताओं में शामिल हो गए।

शब्बीर भाई एक घटना का ज़िक्र करते हैं जिसने शायद जाति व्यवस्था और उसके अनिष्टकारी प्रभाव से दिलीप कुमार का परिचय करवाया। बचपन में दिलीप कुमार फुटबॉल खेला करते थे। उनके दोस्तों में एक दलित लड़का भी था, जो उनकी फुटबॉल टीम का कप्तान चुना गया। कप्तान बनने की ख़ुशी में उसने टीम के सभी खिलाड़ियों को अपने घर खाने पर आमंत्रित किया। परन्तु पहुंचे केवल दिलीप कुमार। जब उन्होंने टीम के अन्य सदस्यों की अनुपस्थिति के बारे में पूछा तो उसने कहा, “मैं नीच जात का हूँ, वे लोग मेरे घर नहीं आते और हमारे घर का खाना नहीं खाते।” बालक दिलीप कुमार को यह सुन कर बहुत धक्का लगा। 

एक और घटना ने दिलीप कुमार पर गहरा प्रभाव डाला। महाराष्ट्र के कुछ पसमांदा विद्यार्थियों ने उनके संगठन से कुछ आर्थिक सहायता माँगी। वे छह विद्यार्थी थे जो पढने में बहुत अव्व्ल थे, परन्तु आर्थिक दृष्टि से बहुत कमज़ोर थे। शब्बीर भाई ने दिलीप कुमार को बताया कि अन्य पिछड़े समुदाय आरक्षण का लाभ ले रहे हैं और अगर पसमांदा भी ऐसे कर सकें तो उनमें से भी कुछ डाक्टर और इंजिनियर बन सकते हैं। दिलीप कुमार को यह बात जम गई और उन्होंने छहों विद्यार्थियों के लिए ज़रूरी मदद की व्यवस्था अपनी जेब से की। इसी घटना के बाद ही दिलीप कुमार आधिकारिक रूप से संगठन में शामिल हुए। पसमांदाओं के लिए आरक्षण की मांग के आंदोलन में दिलीप साहब की सक्रिय भागीदारी के कारण उनकी बहुत आलोचना भी हुई। उलेमा ने उनके खिलाफ फतवे जारी किये और वे कुलीन वर्ग के मुसलमानों के कोपभाजन का शिकार बने। यह इस तथ्य के बावजूद कि दिलीप कुमार के पेशकशों के कारण, गरीब विद्यार्थियों को शिक्षा प्राप्त करने का मौका मिल रहा था। दिलीप कुमार अक्सर बाबासाहेब आंबेडकर के साथ उनकी मुलाकातों की चर्चा किया करते थे और बताते कि इन मुलाकातों के चलते ही उन्होंने जाति और जातिगत भेदभाव के बारे में सोचना शुरू किया। 

आला खानदान के ऊंची जाति के व्यक्ति से पसमांदा के अधिकारों के लिए लड़ने वाला कार्यकर्ता बनना निसंदेह एक लम्बी और कठिन यात्रा थी। यह समझना मुश्किल है कि वे इस दिशा में प्रवृत्त कब हुए। बाबासाहेब से मुलाकातों के बाद, दलितों और पसमांदाओं के हालात देखने के बाद या फिर बचपन में विस्थापन झेलने के नतीजे में? परन्तु हम यह तो जानते ही हैं कि वे अपने जातिगत विशेषाधिकारों से ऊपर उठकर विचार करते थे। दिलीप कुमार ने सामाजिक कार्यकर्ता बतौर अपने काम को शोहरत पाने का माध्यम नहीं बनाया। बॉलीवुड के अन्य कई कलाकारों के विपरीत, यह काम उनके लिए ‘पीआर’ नहीं था। वर्तमान पीढ़ी के बहुत कम लोग पसमांदा आंदोलन में उनके महत्वपूर्ण योगदान के बारे में जानते हैं। यही इस बात का सबूत है कि उन्होंने कभी इस आंदोलन पर कब्ज़ा करने का प्रयास नहीं किया। वे कभी स्वयं आगे नहीं आते थे। वे आंदोलन के नेताओं को ही आगे रखते थे। शब्बीर अंसारी का कहना है कि दिलीप साहब स्वयं को बागबान (माली) मानते थे। वे कहते थे कि उनके पिता फलों के व्यापारी थे और इसलिए उनका बागबान होना स्वाभाविक है। 

दिलीप कुमार सचमुच पसमांदा आंदोलन के बागबान थे – ऐसा बागबान जो बागान के पेड़ों की देखभाल इसलिए करता है ताकि अन्य लोग फलों का लाभ ले सकें। 

(यह आलोख मूल रूप से अंग्रेजी में राउंड टेबुल इंडिया के वेब पोर्टल पर दिनांक 1 सितंबर, 2017 को प्रकाशित हुआ। दिलीप कुमार के निधनोपरांत यह आलेख लेखक की अनुमति से आंशिक संशोधनों के साथ यहां प्रकाशित)

(अनुवाद: अमरीश हरदेनिया, संपादन : नवल/अनिल)


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