आदिवासियों, दलितों और शूद्रों के संत स्टेन स्वामी, जिन्हें पीढ़ियां रखेंगी याद

स्टेन स्वामी ने अपनी जान गंवा कर भारत को बचा लिया है। पूरी दुनिया के सामने भारत की शासन व्यवस्था की कलई खुल गई है। सबको यह पता चल गया है भारत में दमित वर्गों के लिए काम करने वालों को सूली पर चढ़ा दिया जाता है। यह साफ़ है कि हमारे देश के संवैधानिक लोकतंत्र बनने के बाद भी, उन लोगों के मन में जहर खत्म नहीं हो सका है, जो आदिवासियों और दलितों को मनुष्य ही नहीं मानते। कांचा इलैया शेपर्ड की टिप्पणी

भारत की सरकारी एजेंसियों ने बीते 5 जुलाई, 2021 को फादर स्टेन स्वामी (स्टेनिसलॉस लौर्दूसामी) को मुंबई के एक निजी अस्पताल से सुनियोजित ढंग से स्वर्ग भेज दिया। वे तो शायद यही चाहते रहे होंगें कि फादर नर्क में जाएं। मेरी समझ से फादर स्टेन, भारत में कैथोलिक ईसाईयों के सबसे बड़े संत रहे। सामान्यतः किसी कैथोलिक को ‘संत’ की पद पदवी से नवाज़ने का अधिकार केवल वैटिकन को है और इसकी एक लंबी प्रक्रिया होती है। परंतु स्टेन स्वामी को ‘हम भारत के लोगों’ – आदिवासियों, दलितों और शूद्रों – ने संत घोषित कर दिया है। रांची, झारखंड, में अपना काम शुरू करने से लेकर जेल जाने तक वे गरीब, शोषित और दमित जनों के लिए अनवरत काम करते रहे। उन्हें आदिवासियों के मानवाधिकारों के लिए खड़े होने की कीमत अदा करनी पड़ी। अदालतों द्वारा सीमित हस्तक्षेप के बाद भी, उन्हें मरने दिया गया। यह आपराधिक लापरवाही थी।

एक वृद्ध और कमज़ोर पादरी के साथ इस तरह की क्रूरता की मिसाल मिलनी मुश्किल है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की केंद्र सरकार ने यह दिखा दिया है कि आदिवासियों की निस्वार्थ सेवा करने वालों के प्रति वह तिरस्कार का भाव रखती है। निश्चित रूप से भारत की सभ्यता और संस्कृति इस तरह के व्यवहार की हामी नहीं रही है। भारत की उत्पादक सभ्यता, स्टेन स्वामी को सलाम करती है क्योंकि उन्होंने उसके लिए अपनी क़ुर्बानी दी। 

ईस्वी संवत की पहली सदी में ईसा मसीह के 12 मूल शिष्यों में से एक संत थॉमस, आज के तमिलनाडु में शहीद हुए थे। संत थॉमस सुदूर फिलिस्तीन (इजराइल) से ईसा मसीह की शिक्षाओं को भारत की धरती पर रोपने के लिए यहां आये थे। वे अपने अभियान में सफल भी रहे। वह राष्ट्रवाद का युग नहीं था। वह दुनिया को पाप, दासता, अज्ञानता और अंधविश्वास से मुक्ति दिलवाने के लिए ईसा मसीह के बलिदान और उनके पुनस्र्ज्जीवन का युग था। उस समय भारत को ईसा मसीह के संदेशवाहक की ज़रुरत थी क्योंकि हड़प्पा की सभ्यता से लेकर तब तक भारत का निर्माण करने वाले उत्पादक वर्ग पर आज के हिन्दुत्ववादियों के ब्राह्मणवादी पूर्वजों ने क्रूर वर्ण व्यवस्था लाद दी थी। 

जाति और छुआछूत की व्यवस्था का निर्माण कर उन्होंने हड़प्पा की महान सभ्यता की जननी इस भूमि की मानवीय आत्मा को नष्ट कर दिया था। ब्राह्मणवादी शिक्षाओं और आचरण ने अपने हाथ से काम करने वाले खाद्यान्न उत्पादकों और शिल्पकारों को आत्मा-विहीन बना दिया था। उन्हें उनकी आत्मा समुद्रपार के एक व्यक्ति ने लौटाई। संत थॉमस ने वह ज्योति प्रज्वलित की और उन्हें हमारी धरती पर अपनी शहादत देनी पड़ी।  

संत थॉमस के सदियों बाद, अल्बानिया से मदर टेरेसा यहां आईं और उन्होंने अपना जीवन निर्धनों में भी निर्धन दलितों, आदिवासियों व शूद्रों और कुष्ठ रोग व अन्य गंभीर बीमारियों के पीड़ितों की सेवा-शुश्रुषा को अपना जीवन समर्पित कर दिया। उनकी इस सेवा भावना के लिए वैटिकन ने उनकी मृत्यु के कुछ समय पश्चात् उन्हें संत की उपाधि से विभूषित किया। परंतु उनके सेवाभाव का हिंदुत्व के झंडाबरदारों ने हमेशा अपमान किया। जिन कुष्ठ रोगियों की वह सेवा करती थीं, उनकी तीमारदारी करना तो दूर रहा, उन्हें छूने को भी कोई आरएसएस कार्यकर्ता या हिंदू संत तैयार नहीं था। उनके लिए राष्ट्रवाद का मायने था धनी और स्वस्थ लोगों की सेवा। 

स्टेन स्वामी हिंसा में विश्वास नहीं रखते थे। वे अपना गृहप्रदेश तमिलनाडु छोड़कर मध्य-पूर्व भारत के आदिवासी इलाकों में रहने लगे और विभिन्न कानूनी संस्थाओं के ज़रिए आदिवासियों को सचेत करने में जुट गए। औपनिवेशिक काल से ही ईसाई शैक्षणिक संस्थाएं और अस्पताल दमितजनों की बेहतरी के लिए काम करती आ रहीं हैं। परंतु जाने कैसे भारत सरकार और उसकी राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) इस निष्कर्ष पर पहुंच गए कि एक बूढ़ा और कमज़ोर आदमी भारतीय राज्य के खिलाफ षड़यंत्र कर रहा है। यह सब बहुत अविश्वसनीय है।

फादर स्टेन स्वामी (26 अप्रैल, 1937- 5 जुलाई, 2021)

इसके अलावा, यह परले दर्जे का पाखंड भी है। भारत के शासक वर्ग के अंग्रेजी माध्यम से शिक्षा प्राप्त तबके का एक बड़ा हिस्सा – जिसमें भाजपा के कई शीर्ष नेता भी शामिल हैं – ईसाई शैक्षणिक संस्थाओं से पढ़कर निकले हैं और उनमें से कई की गंभीर बीमारियों का इलाज भी ईसाई अस्पतालों में हुआ है। आज भी, भारत के जेसुइटों द्वारा संचालित स्कूल, देश की श्रेष्ठि वर्ग की पहली पसंद हैं। स्टेन स्वामी ऐसी कई संस्थाओं से जुड़े थे। सन् 1970 और 1980 के दशकों में वे बैंगलोर के इंडियन सोशल इंस्टिट्यूट के निदेशक थे। यह संस्था अपने सामाजिक कार्यों के लिए जानी जाती है। ऐसे व्यक्ति पर, जो अपने जीवन के अस्सी से ज्यादा साल पूरे कर चुका था, को गैरक़ानूनी गतिविधियां (निरोधक) अधिनियम – यूएपीए – जैसे सख्त कानून के अंतर्गत गिरफ्तार किया गया। यह कानून आपको तब तक दोषी मानता है जब तक कि आप निर्दोष साबित नहीं हो जाते।     

स्टेन स्वामी ने अपनी जान गंवा कर भारत को बचा लिया है। पूरी दुनिया के सामने भारत की शासन व्यवस्था की कलई खुल गई है। सबको यह पता चल गया है भारत में दमित वर्गों के लिए काम करने वालों को सूली पर चढ़ा दिया जाता है। यह साफ़ है कि हमारे देश के संवैधानिक लोकतंत्र बनने के बाद भी, उन लोगों के मन का जहर खत्म नहीं हो सका है जो आदिवासियों और दलितों को मनुष्य ही नहीं मानते। हमारे शासकों का दिल तो कुबेरपतियों से लगा है, जिनमें इतनी नैतिकता भी नहीं है कि वे महामारी से मर रहे गरीबों के लिए कुछ करें। उनकी आध्यात्मिकता ब्राह्मणवादी संतों के इर्द-गिर्द घूमती है जो पश्चिमी देशों में अपने साम्राज्य खड़े करते हैं और जो धन के पहाड़ पर विराजमान हैं। उनके मन में स्टेन स्वामी जैसे लोगों, जो तमिलनाडु में अपना आरामदायक जीवन त्यागकर दशकों तक आदिवासियों के बीच रहकर उन्हें मानवीय गरिमा और आत्माभिमान से लैस करने में रत रहे, के लिए कोई जगह नहीं है।   

संत स्टेन स्वामी दरअसल एक नैतिक वृक्ष बन चुके थे, जो उपेक्षित बहुजनों को संबल और साहस प्रदान करता था। इस वृक्ष को जला डालना ही शायद सांस्कृतिक राष्ट्रवाद है। परंतु संत स्टेन मरे नहीं हैं। यह वृक्ष राख नहीं हुआ है। वह फिर से उगेगा और अनेकानेक वृक्षों को जन्म देगा, जिनकी छांह में आदिवासी, दलित और शूद्र, गर्वित भारतीयों की तरह रह सकेंगे। संत स्टेन सभी से प्यार करते थे। उनका राष्ट्रवाद ही उन्हें आदिवासियों के बीच रहने के लिए प्रेरित करता था – उन आदिवासियों के बीच जो हड़प्पा की महान सभ्यता के असली उत्तराधिकारी हैं।  

(अनुवाद: अमरीश हरदेनिया, संपादन : नवल)


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