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गुरुकुल बनते सरकारी विश्वविद्यालय और निजी विश्वविद्यालयों का दलित-बहुजन विरोधी चरित्र

हिंदू राष्ट्रवाद का जोर प्राचीन हिंदू (भारतीय नहीं) ज्ञान पर है और उसका लक्ष्य है अंग्रेजी माध्यम से और विदेशी ज्ञान के शिक्षण को बंद करवाना। उदाहरण के लिए, राजनैतिक विचारधाराओं के पाठ्यक्रम में यूरोपीय विचारधाराओं को हटाकर उनके स्थान पर वेदों और उपनिषदों को शामिल किया जा रहा है। बौद्ध विचारों को तो शामिल किया ही नहीं जाता। बता रहे हैं कांचा इलैया शेपर्ड

वर्ष 2014 से भारत पर हिंदुत्व की विचारधारा का संपूर्ण नियंत्रण है। दिल्ली में नरेंद्र मोदी और अमित शाह तथा नागपुर में मोहन भागवत एवं दत्तात्रेय होसबले व राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के अन्य नेता, सत्ता में आने के बाद से राष्ट्रवाद की एक अजीबोगरीब विचारधारा को लागू कर रहे हैं। सैद्धांतिक स्तर पर हिंदुत्व की विचारधारा अपने धार्मिक, भाषाई और राष्ट्रवादी लक्ष्यों को ‘हिंदू-हिंदू-हिंदुस्तान’ के रूप में परिभाषित करती आई है। ‘हिंदू-हिंदू-हिंदुस्तान’ प्रथम दृष्टया एक समावेशी राष्ट्रवादी लक्ष्य लगता है। ऐसा बताया जाता है कि यह विचारधारा बहिष्करण की शिकार रहीं जातियों और समुदायों, बशर्ते वे हिन्दू हों, को अध्यात्मिक प्रणाली, शैक्षणिक संस्थानों में किसी विशिष्ट भाषा में शिक्षण और राष्ट्रीय संसाधनों से वंचित नहीं करती। कहने की ज़रुरत नहीं कि यह विचारधारा मुसलमानों और ईसाईयों को ‘अलग’ मानती है।

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लेखक के बारे में

कांचा आइलैया शेपर्ड

राजनैतिक सिद्धांतकार, लेखक और सामाजिक कार्यकर्ता कांचा आइलैया शेपर्ड, हैदराबाद के उस्मानिया विश्वविद्यालय में राजनीति विज्ञान के प्राध्यापक और मौलाना आजाद राष्ट्रीय उर्दू विश्वविद्यालय, हैदराबाद के सामाजिक बहिष्कार एवं स्वीकार्य नीतियां अध्ययन केंद्र के निदेशक रहे हैं। वे ‘व्हाई आई एम नॉट ए हिन्दू’, ‘बफैलो नेशनलिज्म’ और ‘पोस्ट-हिन्दू इंडिया’ शीर्षक पुस्तकों के लेखक हैं।

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