जानें, कौन हैं अशराफ, अजलाफ और अरजाल मुसलमान?

ये सभी मुख्य मुस्लिम समाज की वे जातियां हैं, जो हमारे सामने आती हैं। देश के अलग-अलग हिस्से में अब इनका नाम भी बदल चुका है। लेकिन नहीं बदली है तो इनकी सच्चाई। बता रहे हैं असद शेख

“भारत का संविधान लिखे जाने के वक़्त मुस्लिम नेताओं ने अपने समाज के किसी तरह का आरक्षण नहीं मांगा। जैसा कि दलित नेताओं ने किया था। ये अपने मरहूम रहनुमाओं की नीयत पर शक़ नहीं, बल्कि पिछले 50 साल के अनुभव का पीड़ादायक पहलू है कि अपने अंदर के भेदभाव और गैर बराबरी को छुपाने के नतीजा अब नासूर के रूप में फूट रहा है।”

ये शब्द हैं अली अनवर अंसारी के, जो राज्यसभा सांसद रहे हैं। राज्यसभा के सांसद रहने के अलावा उनकी एक बहुत बड़ी पहचान ये भी है कि उन्होनें “मसावात की जंग” जैसी बेहतरीन किताब लिखी है, जो देश के भर के मुस्लिमों से वह सवाल करती है, जो वह खुद से नहीं करना चाहते हैं।

भारतीय समाज की तरह ही भारत के मुसलमान भी कई तरह से बंटे हुए हैं। इनमें भी सैकड़ों जातियां हैं। और इनके भी अलग अलग आधार हैं, जो आपस में शादियां करने से रोकते हैं। जबकि धार्मिक तौर पर सब बराबर हैं।

आइये मुस्लिमों के भीतर के जातिवाद को समझते हैं और इसकी सच्चाई पर गौर करने की कोशिश करते हैं।

क्या है अशराफ, अज़लाफ़ और अरज़ाल?

अशराफ मुसलमान– ये वो मुसलमान हैं, जिनका संबंध मौजूदा समय के हिसाब से विदेश से होता है,इनमें चार प्रमुख जातियाँ होती हैं। सैयद, शेख, पठान और मुगल।

सैयद, जिनका संबंध पैग़म्बर मुहम्मद के परिवार से माना जाता है, एक तरह से ये उनके वंशज हैं। दूसरे हैं शैख़ज़ादे, जिनका संबंध अरब ही के क़ुरैश “कबीले” से है। 

आबादी के लिहाज से भारतीय मुसलमानों में 85 फीसदी पसमांदा मुसलमानों की मानी जाती है

वहीं पठानों का ताल्लुक़ अफगानिस्तान के आसपास के क्षेत्र से माना जाता है। इसके अलावा चौथे हैं मुग़ल, जो मुग़ल बादशाह बाबर से संबंधित हैं और उनके साथ भारत आए थे।

अज़लाफ़ मे दर्जी, धोबी, धुनिया, गद्दी, फाकिर, बढई-लुहार, हज्जाम (नाई), जुलाहा, कबाड़िया, कुम्हार, कंजरा, मिरासी, मनिहार, तेली समाज के लोग आते हैं।

अरज़ाल में वे दलित हैं जिन्होंने इस्लाम कबूल किया। जैसे कि हलालखोर, भंगी, हसनती, लाल बेगी, मेहतर, नट, गधेरी आदि।

ये सभी मुख्य मुस्लिम समाज की वे जातियां हैं, जो हमारे सामने आती हैं। देश के अलग-अलग हिस्से में अब इनका नाम भी बदल चुका है। लेकिन नहीं बदली है तो इनकी सच्चाई।

मुसलमानों मे जातिवाद और प्रश्न बरकरार

भारत मे जब मुस्लिम शासकों ने राज किया तभी से ही अलग-अलग धर्मों के लोगों ने अपना धर्म परिवर्तन किया और इस्लाम धर्म को अपनाया है, जिनमें बड़ी तादाद में वे लोग थे जो जातीय आधार पीड़ित थे या जिनका शोषण किया जाता था। इस धर्म परिवर्तन या बदलाव में सूफी संतों के सद्भाव ने बहुत अहम किरदार अदा किया था।

गौर करने वाली बात ये है कि ये ज़्यादातर लोग गैर सवर्ण समाज से थे, और उन्होंने अपना धर्म परिवर्तन किया था। लेकिन धर्म परिवर्तन करने के बावजूद भी इनकी जाति ज्यों की त्यों बनी रही थी और अब भी बनी हुई है।

समाजशास्त्री एमएन श्रीनिवासन का कहना है कि “भारत या दक्षिण एशिया में मौजूद जाति व्यवस्था इतनी मज़बूत थी कि कई बाहर से आए धर्मों ने इसे न चाहते हुए भी अपना लिया। हिंदू धर्म से इस्लाम में आने वाले सामान्य जीवन में इस जाति व्यवस्था के इतने आदी थे तो मुसलमान होने के बाद भी इन्हें इस सिस्टम को मानते रहने में दिक्कत महसूस नहीं हुई।”

1990 के दशक में भारतीय मुस्लिमों के बीच जातिवाद को लेकर और इसे खत्म करने को लेकर आंदोलन हुए थे। हालांकि बहस और सवाल पहले से ही हो रहे थे।

लेकिन 90 के दौर ने बड़े बदलाव किए थे, तभी से पसमांदा (इसका अर्थ होता है जो पीछे छूट गए हैं) जैसे शब्द मुसलमानों के बीच प्रसिद्ध होते गए हैं और इन मुद्दे पर लिखना और पढ़ना आरंभ हुआ है।

जातिवाद के विरुद्ध, सामाजिक आंदोलनों का एक ऐसा दौर चला, जिसने मुसलमानों के बीच चेतना और चिंतन पैदा करने शुरू कर दिये थे। ये आंदोलन करने वालों में बिहार से डॉ. एजाज़ अली (पूर्व सांसद) के ‘आल इंडिया बैकवर्ड मुस्लिम मोर्चा’, महाराष्ट्र से शब्बीर अंसारी के ‘आल इंडिया मुस्लिम ओबीसी आर्गेनाईजेशन’ और अली अनवर अंसारी के ‘आल इंडिया पसमांदा मुस्लिम महाज़’ जैसे संगठनों ने अपनी ज़िम्मेदारी निभाई थी।

बनते रहे कमीशन, परंतु नहीं बदले हालात

मुसलमानों और खासकर आर्थिक, सामाजिक और पिछड़े मुसलमानों के मद्देनजर कमीशन बने हैं, उन्होंने कार्य किये हैं रिसर्च किये हैं। मगर कोई भी स्थायी हल नहीं हो पाया है।

प्रो. अमिताभ कुंडू ने सच्चर कमिटी द्वारा की गयी सिफारिशों की जमीनी हक़ीक़त को जानने वाली “कुंडु कमिटी” की अध्यक्षता की थी। प्रोफ़ेसर अमिताभ कुंडू ने कहा है कि “मुस्लिमों में ऐसे बहुत से पेशे हैं जिनमें वे अनुसूचित जातियों वाले काम करते हैं। हमने कहा है कि उन्हें भी एससी (अनुसूचित जाति) के दर्जे में रखना चाहिए।

“उन्हें भी आरक्षण (रिज़र्वेशन) देना चाहिए। अनुसूचित जाति और जनजाति के लिए जो क़ानून है (अनुसूचित जाति और जनजाति, अत्याचार निवारण, क़ानून, 1989) उसके दायरे में मुस्लिम समुदाय को भी लाया जा सकता है।”

उन्होंने आगे कहा कि “रोज़गार के क्षेत्र में मुसलमानों की ऋण ज़रूरतें पूरी नहीं हो पा रही हैं, उन्हें बढ़ाने की कोशिश करनी चाहिए। शिक्षा के क्षेत्र में भी मुस्लिम लड़कियां विशेषकर 13 साल के बाद स्कूल छोड़ देती हैं, उसमें सुधार की ज़रूरत है।”

यह कमीशन इसलिए बनाया गया था कि सच्चर कमीशन कि रिपोर्ट के ज़रिए जो सिफारिशें की गई थीं, वे लागू हुई है या नहीं। गौर करने वाली बात यह है कि सच्चर कमिटी आयोग में मुसलमानों की स्थिति को दलितों से भी बदतर बताया गया था।

(संपादन : नवल/अनिल)


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