गंगा-जमुनी तहजीब का संवर्द्धन और धार्मिक-सामाजिक वर्चस्ववाद को चुनौती

व्यावहारिक अनुभव और ताप में पगे लेखक शमोएल अहमद का अनुभव जातिवाद, भ्रष्टाचार आदि सडाध के प्रति पाठकों में क्षोभ पैदा करता है। मार्च लूट का प्रसंग हो या कुर्सी को गंगाजल से पवित्र करने का– ये घटनाएं सिस्टम की बर्बरता को बतलाती हैं कि हमारी सोच से आज भी किस तरह से मध्ययुगीन बर्बरता अभी नहीं गई है। अरुण नारायण की समीक्षा

हिंदी-उर्दू में समान रूप से लोकप्रिय रहे क़िस्सागो शमोएल अहमद द्वारा लिखित पुस्तक “ऐ दिल-ए-आवारा” संस्मरण के पारंपरिक लीक से थोडा हटकर है। हर तरह के यथास्थिवाद और धार्मिक पोंगापंथ को बेपर्द करता हुआ। समय, समाज सियासत, साहित्य, संस्कृति और मानवीय रिश्तो के कई अनकहे प्रसंग की दिलचस्प किस्सा बयानी है इसमें। अपनी भाषिक और मुहावरेदार भाषा के साथ ही इस पुस्तक में बहुत सारे यादगार चरित्र उभरे हैं। यद्यपि यह संस्मरण बहुत ही तीव्र प्रवाह में अत्यंत संक्षिप्तता के साथ बुने गए हैं अगर वे और विस्तार पाते तो बिहार के समय, समाज और सूक्ष्मता में व्यौरेवार ढंग से परिलक्षित हो पाते। बावजूद इसके अपनी संक्षिप्तता में ही यह अपने समय की अनिवार्य पुस्तक है जिसमें कई जरूरी चीजों पर यहां आप लेखक के दोटूक विचार जान सकेंगे। इन संस्मरणों को खास बनाता है किसी सच को साहस और दिलेरी के साथ स्वीकार करने और उसे अभिव्यक्त करने की लेखक की साहसिकता। वह सच चाहे इस्लामिक समाज का हो, हिंदी के नामवरों का हो, समाज का हो या प्रशासन का – शमोएल उसे बेलाग ढंग से कहने में कभी चुकते नहीं।

इस्लामिक समाज की मूलभूत चिंताएं क्या रही हैं, उनके सपने और सरोकार क्या थे, उनकी अलग-अलग दौर की दैनंदिनी, जरूरतें, उनके साहित्यिक-सांस्कृतिक प्यास और भारत जैसे बहुभाषी और धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक देश में असुरक्षा आदि बहुत सारे सवालों पर शमोएल ने यहां बहुत बेबाक ढंग से अपने विचार रखे हैं। लेखक की स्पष्ट मान्यता है कि सांप्रदायिक दंगा हिंदुस्तान की राजनीतिक विचारधारा में शामिल है। सरकारी कामकाज के अनुभवों को भी लेखक ने दर्ज किया है। वह लिखता है– कार्यालय कोई भी हो अधिकारी से लेकर चपरासी तक सभी चांदी की जंजीर से बंधे होते हैं। ये जंजीर बहुत सूक्ष्म है। ये नजर भी आती है और नजर नहीं भी आती।  

लेखक खुद इन परिस्थितियों का भोक्ता है। इसलिए व्यावहारिक अनुभव और ताप में पगे ये अनुभव जातिवाद, भ्रष्टाचार आदि सडाध के प्रति पाठकों में क्षोभ पैदा करता है। मार्च लूट का प्रसंग हो या कुर्सी को गंगाजल से पवित्र करने का – ये घटनाएं सिस्टम की बर्बरता को बतलाती हैं कि हमारी सोच से आज भी किस तरह से मध्ययुगीन बर्बरता अभी नहीं गई है।

लेखक के खुद के आरंभिक जीवन परिवेश, राजकीय और साहित्य तीनों तरह के अनुभवों के रसायन से विस्तार पाता है यह संस्मरण। अपने पारिवारिक अनुभवों में ही वे जिन औरतों का कैरीकेचर खींचते हैं खासकर बांग्लादेश से आईं औरतों का, वह बेहद दिलचस्प है। लेखक ने मजहब के आधार पर पाकिस्तान विभाजन के कारणों की भी गहरी तफ्तीश की है। स्त्री पुरुष की साईकी, अपनी बहुत सारी कहानियों के विकसित करने की परिस्थितियां आदि बहुत सारे प्रसंग इस पुस्तक में आये हैं, जो लेखक की आजादख्याली से हमें रुबरु कराते हैं। दुनिया के सारे धर्माचार्य स्त्रियों के बारे में कमोबेश एक ही किस्म की सोच रखते हैं। वह सोच है कि वह पर्दे में रहे। शमोएल के संस्मरण की औरतों इस मर्यादा को ठेंगा दिखातीं ठीक इसके उलट हैं। पुस्तक के पहले वाक्य में आप उनके नजरिए को समझ सकते हैं जब वह कहते हैं- उन्हें शराब पीने वाली औरतें अच्छी लगती हैं। इसी तरह के और भी क्रियाकलाप, जो एक ठहरे हुए समाज में अतिरंजित माने जाते हैं। शमोएल उसे ही ज्यादा पसंद करते हैं। वे आगे कहते हैं– जो औरतों हर वक्त काम में लगी रहती हैं बहुत जल्द अपना आकर्षण खो देती हैं। लेखक के औरतों के बारे में व्यक्त ये विचार एक बंद समुदाय में उनकी मुक्ति की सबसे बडी मिसाल हो सकते हैं। ज्योतिषी और कथाकार दो परस्पर भिन्न व्यक्तित्वों से भरे पूरे लेखक ने अंततः कबूल किया है कि जब तक बेवकूफ जिंदा है अक्लमंद भूखा नहीं मरेगा। ज्योतिष के बारे में उसकी यह राय उसे अंततः भाग्यवादी होने से बचा ले जाती है।

पुस्तक के खंड 10 और एक ग्यारह में हिंदी उर्दू कहानियों में विभाजन के पसेमंजर और खुद को कतर में सम्मानित करने के जो प्रसंग दिए गए हैं वह इस किताब के स्वाभाविक विस्तार नहीं लगते। ऐसा लगता है जैसे अलग से उसे चस्पा कर दिया गया हो। बावजूद इसके यह दोनों खंड भी महत्वपूर्ण हैं क्योंकि इस संबंध में पाठकों में एक आलोचनात्मक विवेक जागृत होता है। यहां संस्मरणकार ने लेखकों की त्रासदी और हिंदी-उर्दू कथा परंपरा में विभाजन को लेकर लिखी गई कहानियों और कथाकारों का जो संदर्भ दिया है, वह बहुत ही महत्वपूर्ण है।

समीक्षित पुस्तक का कवर पृष्ठ

बिहार की राजधानी पटना के साहित्यक क्षितिज पर उन्होंने संक्षिप्त, लेकिन दिलचस्प बातें बतलाइ है। हिंदी-उर्दू साहित्य की तत्कालीन चिंताओं से जुड़े कई रोचक प्रसंग यहां आये हैं। खासकर चर्चित कवि आलोक धन्वा के युवावस्था के उनके आभामंडल के जो चित्र यहां खींचे गए हैं, वह गजब का कौतूहल पैदा करते हैं। लगता ही नहीं कि तब के इतने क्रांतिकारी का ऐसा बदलाव भी संभव हो सकता है कि वह सत्ता द्वरा संचालित संस्था के शीर्ष पर विराजमान हो जाय। आलोचक नामवर सिंह, जिन्होंने कभी उत्तर प्रदेश में उर्दू को द्वितीय राजभाषा घोषित किए जाने पर ‘बासी भात में खुदा का साझा’ जैसे उर्दू विरोधी लेख लिखा था और रवींद्र कालिया, जिन्होंने लेखक की ‘बेवफा औरत’ से संदर्भित विचार को ‘नया ज्ञानोदय’ में साया किया और उसका उल्लेख तक नहीं किया– इन सब पर बड़े ही सधे और बेलौस ढंग से लेखक ने अपना प्रतिरोध दर्ज किया है।

कुल मिलाकर कहें तो गागर में सागर की तर्ज पर अपने दौर की लगभग समग्र घटनाओं का ब्यौरा प्रस्तुत करने वाली यह बेहद बेलौस, धारदार और उम्दा गद्य में रची बसी अपूर्व संस्मरण की पुस्तक है, जिसे हर किसी को एकबार अवश्य पढना चाहिए।

समीक्षित पुस्तक : ऐे दिल-ए-आवारा
लेखक : शमोएल अहमद
प्रकाशक : संस्कृति प्रकाशन, भागलपुर, बिहार।
मूल्य : 300 रुपए

(संपादन : नवल/अनिल)


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