गेल ऑम्वेट: अपने आसपास की दुनिया में तल्लीन एक समाजशास्त्री

-गेल ऑम्वेट एक निराली अध्येता थीं। वे अपनी पुस्तक ‘सीकिंग बेगमपुरा’ की पाण्डुलिपि पर काम करने के लिए तीन महीने तक एक कमरे में अपने को कैद रख सकती थीं तो बरसात में कीचड़ से लथपथ सड़कों और खेतों में भी चल सकती थीं और आंदोलनों का नेतृत्व भी कर सकती थीं

गेल ऑम्वेट ( 2 अगस्त, 1941 – 25 अगस्त, 2021) 

भारतीय समाजशास्त्र की अद्भुत समझ रखने वाली गेल ऑम्वेट नहीं रहीं। वे पिछले 2 अगस्त को 80 साल की हुई थीं। सन् 2017 की जनवरी में फारवर्ड प्रेस ने महाराष्ट्र के सांगली जिले के कसेगाँव में उनके अत्यंत साधारण से घर में उनसे मुलाकात की और जानना चाहा कि 1963-64 में जब वे पहली बार भारत आईं थीं और फिर 1978 में जब वे यहीं बस गईं, तब के और आज के भारत में वे क्या अंतर देखतीं हैं। उनका उत्तर था, “भारत में व्यवसायीकरण बढ़ गया है, ज़िन्दगी और तेजी से भागने लगी है…जाति अब भी महत्वपूर्ण बनी हुई है…इस मामले में कोई गुणात्मक बदलाव नहीं आया है।”  

गेल ने कुनबी जाति (ओबीसी) डाक्टर और कार्यकर्ता भरत पाटणकर से विवाह किया। भरत ने महाराष्ट्र में कई सामाजिक-सांस्कृतिक आंदोलनों का नेतृत्व किया है। भरत के नाना, मां और पिता, वामपंथी आंदोलन की अग्रिम पंक्ति में थे। यह उस समय गैर-ब्राह्मणों के लिए बहुत बड़ी बात थी। नीची छत और नीचे दरवाज़ों वाले पाटणकर के छोटे से घर में पानी की हमेशा कमी रहती थी। उस घर को गेल ने भारतीय समाज पर अपने शोध का केंद्र बनाया। वे वहां अपनी सास और पति के भाई और उनके परिवार के साथ रहतीं थीं। जब हम गेल और भरत से मिलकर बाहर निकल रहे थे तभी भरत के भाई उनके खेत में सिंचाई करने के लिए जा रहे थे।  

गेल बीमार थीं और बड़ी मुश्किल से हमलोगों से कुछ देर बात करने के लिए राजी हुईं। जब हमने उनसे भारतीय शिक्षा जगत के बारे में पूछा तो वे बोलीं, “विद्वतजन जितनी गंभीरता से चीज़ों को लेते हैं, उससे कहीं अधिक गंभीरता से लेना चाहिए अभी तो ये उनके लिए खेल भर है…उन्हें अपने आसपास की ज़िन्दगी पर ध्यान देने की ज़रुरत है।” 

गेल ऑम्वेट (दाएं); गेल ऑम्वेट और भरत पाटणकर एक प्रदर्शन में भाग लेते हुए.

महाराष्ट्र के उस गाँव में रहते हुए उन्होंने खूब देखा-सुना और खूब महसूस और अनुभव किया। “वे धाराप्रवाह मराठी बोलती थीं।” फॉरवर्ड प्रेस से जुड़े सामाजिक कार्यकर्ता और शिक्षक रामसूरत बताते हैं। “मराठी उनकी दूसरी भाषा थी।”  गेल की प्रतिबद्धता और परिश्रम करने की उनकी अथाह क्षमता को याद करते हुए रामसूरत बताते हैं कि गेल ने तीन महीने तक लगातार एक कमरे में बंद होकर अपनी पुस्तक ‘सीकिंग बेगमपुरा : द सोशल विज़न ऑफ़ एंटी-कास्ट इंटेलेक्चुअल्स” पर काम किया था। उस समय वे दिल्ली में उसी बिल्डिंग में रहते थे, जिसमें गेल रहतीं थीं। “गेल उत्तर प्रदेश में फूलन देवी के गांव जाना चाहतीं हैं और मैंने उनके साथ जाने की हामी भरी थी। परन्तु वह यात्रा नहीं हो सकी।” वे बताते हैं।   

गेल ने अमरीका छोड़ कर भारत के एक सूदूर गाँव में बसने का निर्णय किया। परन्तु भरत पाटणकर का कहना था कि इसे ‘त्याग’ बताना ठीक नहीं है। “यह त्याग की बात एक ग़लत धारणा है. त्याग का सवाल नहीं है, लेकिन उसको जो जीवन में खुशी थी, वह है। उसे जीवन में इसकी ख़ुशी थी कि वह इस तरह के आंदोलन में शामिल हो और उसका साथी भी आंदोलन का हो। दूसरा, अमेरिकी समाज में उस समय हर चीज़ को उत्पाद बनाने (खरीदने-बेचने योग्य बनाने) का दौर था। उस समय वह पीएच.डी. करने वाली थी। हालांकि, वहां माहौल आंदोलन का था, लेकिन तब तक आंदोलन का माहौल खत्म-सा हो चुका था। तो उसकी धारणा थी कि इधर (भारत में) लोग ज्यादा मानवीय हैं और देहातों में जो लोग रहते हैं, उनमें मानवता ज्यादा है और उनकी समझ भी हर तरह से ज्यादा है। मुझे उसकी एक बात जो बहुत अच्छी लगती है वह यह कि उसने गांव में रहने में कभी असमर्थता नहीं जतायी। हमारा घर करीब 80-90 साल पुराना है। पहले इसमें सेकेंड फ्लोर पर जाने के लिए जीना (सीढी) नहीं था। तो हम सीढ़ी लगाकर ऊपर जाते थे। तब प्राची (हमारी बेटी) बहुत छोटी थी। तो वह (गेल) बहुत ही अलग है और मुझे अचरज (आश्चर्य) लगता था कि गेल खुश रहती थी। खेतों में जाना और भरी बरसात में नंदुरबार जिले में गांव-गांव जाकर आंदोलन करना। पूरी झमाझम बारिश में, जिसमें सड़क पर कीचड़ रहती थी, चलते रहती थी। गेल बिल्कुल भी परेशान नहीं थी। उसकी जो साथी यहां आती थीं, कभी-कभी तो वो डरती थीं, कुछेक चीजों से। तो मुझे लगता है कि उसमें एक दृढ़ निश्चय है।”

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गेल के योगदान के बारे में पाटणकर कहते हैं कि उनकी तीन किताबें महत्वपूर्ण हैं. “‘बुद्धिज़्म इन इंडिया’, ‘कल्चरल रिवोल्ट इन कोलोनियल सोसाइटी’ और ‘री-इन्वेंटिंग रिवोल्यूशन : न्यू सोशल मूवमेंट एंड द सोशलिस्ट ट्रेडिशन इन इंडिया’…’वी शैल स्मैश दिस प्रिजन : इंडियन वुमेन इन स्ट्रगल’ की खासियत है कि ग्रामीण महिलाओं पर जो उसका अनुभव रहा, उसके आधार पर उसने लिखा। यह और बाबासाहब आंबेडकर पर किताब (‘आंबेडकर टूवर्ड्स एन एनलाइटेंड इंडिया’), जिसका बहुत सी भाषाओं में अनुवाद हुआ है, वे नया रास्ता दिखने वालीं हैं।  इन्हें भारत में ही नहीं, विश्व भर में पसंद किया जाता है। इस देश के आंदोलन को उसने यह बताने की कोशिश की है कि कौन-सी विरासत के आधार पर आप आगे जा सकते हैं। कांशीराम उनके जीवन के अंत तक कहते रहे कि उन्होंने फुले के बारे में जो भी जाना, उनके स्वयं के जो विचार हैं, वे सब गेल की देन हैं।  ‘कैडर कौम’ एक छोटी-सी किताब है, उसकी प्रस्तावना में भी कांशीराम के यह लिखा है। अगर गेल ने जो कुछ लिखा है, उस पर वामपंथियों ने उतनी ही गंभीरता से विचार किया होता जितना कि कांशीराम  ने किया था तो आंदोलन एक नई दिशा ले चुका होता।” 

गेल ने फारवर्ड प्रेस के अप्रैल 2014 के अंक में लिखा था, “गाँधी और नेहरु का अन्तर्निहित ‘नरम हिंदुत्व’ और जाति के यथार्थ को नज़रअंदाज़ करने वाला उनका सौम्य समाजवाद लम्बे समय से भारत की दिशा कर निर्धारण करता आया है। अब समय आ गया है कि हम दलितबहुजन विकल्पों पर विचार करें, भारत के विचार का पुनर्सृजन करें, ऐसे यूटोपिया (काल्पनिक आदर्शलोक) गढ़ें, जो हमें प्रेरणा दे सकें और इस दलदल से निकलने के हमारे संघर्ष के पथप्रदर्शक बन सकें।” 

(अनुवाद: अमरीश हरदेनिया, संपादन : नवल)

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