यूपी में सौ सीटों का गणित, वोटकटवा रहेंगे महत्वपूर्ण

उत्तर प्रदेश में सौ सीटें ऐसी हैं, जहां हार और जीत के बीच फासला बहुत कम रहा है। भाजपा की नजर इन सीटों पर है। दूसरी ओर विपक्षी पार्टियां भी इसी फिराक में लगी हैं। बता रहे हैं जैगम मुर्तजा

उत्तर प्रदेश में 2022 में होने वाले विधान सभा चुनाव दलितों, पिछड़ों और अल्पसंख्यक समुदायों के लिए काफी अहम हैं। पिछले चार साल में राज्य में इन वर्गों से जुड़े लोग अलग-अलग मुद्दों पर सरकार से नाराज़गी जताते रहे हैं। हालांकि यह नाराज़गी आपसी बिखराव की वजह से कभी भी सरकार के लिए चिंता का सबब नहीं बन पाई। अगर 2022 में यह बिखराव जारी रहा तो राज्य की 404 विधान सभा सीटों में कम से कम सौ सीटें ऐसी हैं, जहां सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को सीधा फायदा पहुंचेगा।

उत्तर प्रदेश में फरवरी-मार्च, 2022 में विधान सभा चुनाव होने हैं, लेकिन राज्य में चुनावी माहौल बनने लगा है। राज्य में मुख्य विपक्षी दल समाजवादी पार्टी (सपा) पंचायत चुनावों में धांधली, बढ़ती महंगाई और राज्य में क़ानून व्यवस्था के मुद्दे पर आवाज़ बुलंद कर रही है। कांग्रेस पार्टी के कार्यकर्ता भी हाल के दिनों में सक्रिय हुए हैं। हैदराबाद के सांसद असदुद्दीन औवैसी राज्य में जगह-जगह घूम कर सियासी हालात पढ़ने की कवायद कर रहे हैं। इधर बहुजन समाज पार्टी (बसपा) एक बार फिर ब्राह्मणों को लुभाने की कोशिशों में जुट गई है।

विपक्ष की चुनौती?

इन सबके बीच सवाल है कि क्या राज्य की विपक्षी पार्टियां भाजपा को सत्ता से बेदख़ल करने की हैसियत में हैं? सवाल और भी बहुत हैं। जैसे, क्या राज्य में सत्ता विरोधी माहौल है? इस माहौल को वोटों में बदलने या भाजपा को सत्ता से बेदख़ल करने के लिए विपक्षी दलों के पास क्या रणनीति हैं? इन तमाम सवालों का सीधा-सा जवाब है- हां। सरकार के ख़िलाफ लोगों में असंतोष है। वैसे भी हर सरकार के ख़िलाफ कम या ज़्यादा, लेकिन लोगों में सत्ता विरोधी रुझान होता ज़रुर है। अब सरकार को इससे निपटने का रास्ता खोजना है, जबकि विपक्ष को इसे भुनाने के लिए हर संभव कोशिश करनी है।

बसपा प्रमुख मायावती, सपा नेता अखिलेश यादव व उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ

मौजूदा हालात में दिक़्क़्तें सत्ताधारी पार्टी भाजपा के सामने ज़्यादा हैं। उत्तर प्रदेश में कई ऐसे मुद्दे हैं जिनपर योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार के पास लोगों के सवालों का जवाब नहीं है। विकास और क़ानून व्यवस्था में सुधार को लेकर सरकार मज़बूत आंकड़ों के साथ अपना पक्ष रखने की हालत में नहीं है। सिर्फ मुक़दमों का डर और सरकार विरोधी आवाज़ों के दबाकर राज्य में “सब ठीक है” नहीं कहा जा सकता। विपक्ष के पास क़ानून व्यवस्था, बेरोज़गारी, कारोबार, अर्थव्यवस्था, सरकारी नौकरियों में भर्ती, आरक्षण, नौकरियों में धांधली, आंदोलनकारी किसान, गन्ना मूल्य भुगतान, पलायन, कुपोषण, शिक्षा, स्वास्थ्य, कोरोना प्रबंधन, प्रशासनिक ढिलाई, तंत्र की कमज़ोरी समेत तमाम बुनियादी मसले हैं, जिनपर सरकार को चुनाव में घेरा जा सकता है।

इसके अलावा केंद्र सरकार की नीतियों का हिसाब भी भाजपा को जनता के बीच देना पड़ेगा। पेट्रोल, डीज़ल की लगातार बढ़ती क़ीमतें, बढ़ती महंगाई और बेरोज़गारी जैसे तमाम मुद्दे आगामी चुनाव में अहम भूमिका निभाएंगे। इन सबके बावजूद सत्ताधारी भाजपा किसी ख़ास मुश्किल में नज़र नहीं आ रही। सरकार को चुनावी वर्ष की चिंताएं हैं भी तो वह उन्हें ज़ाहिर नहीं होने दे रही। यह भाजपा का किसी भी तरह चुनाव जीत लेने का विश्वास है या फिर सरकार समझ रही है कि विपक्ष में चुनौती देने की ताक़त नहीं है?

भाजपा की रणनीति

भाजपा की चुनावी रणनीति को लेकर सबके अपने-अपने क़यास और अपने-अपने दावे हैं। लोगों का मानना है कि ब्रांड मोदी और राज्य में ब्रांड योगी अभी भी जनकल्याण से जुड़े मुद्दों और सत्ता विरोधी लहर से बड़े हैं। यानी लोग परेशानी उठा कर भी योगी और मोदी को नाम पर भाजपा को वोट करेंगे। एक तबक़ा है, जो मानता है कि योगी आदित्यनाथ की कार्यशैली ने उनके लिए एक अलग मतदाता वर्ग पैदा कर दिया है। यह वर्ग अपनी समस्या नहीं, बल्कि दूसरों को समस्याओँ में घिरा देखकर प्रसन्न है। जबकि एक और वर्ग है, जो मानता है कि भाजपा को चुनाव में हराना मुश्किल नहीं है। लेकिन विपक्ष में फूट और सत्ता विरोधी वोटों में बिखराव भाजपा की राह आसान कर देगा।

हालांकि, राज्य में कांग्रेस और बसपा जितनी मज़बूती से चुनाव लड़ेंगीं, भाजपा को उतना ही नुक़सान होने की आशंका से ख़ुद भाजपा के नेता इंकार नहीं करते। परंतु राज्य में दूसरी छोटी पार्टियों की मज़बूती इस नुक़सान की भरपाई करने में सक्षम है। महान दल, पीस पार्टी, आज़ाद समाज पार्टी, एआईएमआईएम, राष्ट्रीय उलेमा काऊंसिल, निषाद पार्टी, सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी, अपना दल, बहुजन मुक्ति पार्टी और राष्ट्रीय लोकदल जैसी पार्टियां अगर किसी बड़ी पार्टी से समझौता करने में नाकाम रहती हैं तो राज्य में कई सीटों पर नतीजों को प्रभावित करेंगी। इसका अधिक लाभ भाजपा को मिल सकता है।।

नज़दीकी मुक़ाबले वाली सीटों पर नज़र

हमने पिछले कुछ चुनावों में राज्य में 100 सीट का आंकड़ा बार-बार सुना है। एक पार्टी ने कहा हम सौ मुसलमानों को टिकट देंगे, एक और पार्टी आई और कहा कि हम सौ सीट पर चुनाव लड़ेंगे। इससे पहले कई क्षेत्रीय और छोटे दल सौ सीटों का ज़िक्र करते रहें हैं। इसकी एक ख़ास वजह है। राज्य में क़रीब सौ सीटें हैं, जहां हर बार नज़दीकी मुक़ाबला होता रहा है। 2017 के विधान सभा चुनाव में भी 104 सीटें ऐसी थीं, जहां हार-जीत का फासला 15 हज़ार वोटों से कम था। इस चुनाव में क़रीब आधा दर्जन सीटें ऐसी थीं, जहां हार-जीत का अंतर 500 वोटों से भी कम था।

वर्ष 2017 में डुमरियागंज में भाजपा के राघवेंद्र प्रताप ने बसपा की सैयदा ख़ातून को महज़ 171 वोटों से हराया था। मुज़फ्फरनगर की मीरापुर सीट पर भाजपा के अवतार सिंह भड़ाना समाजवादी पार्टी के लियाक़त अली से 193 वोट से जीते थे, मथुरा की मांट सीट पर भाजपा के श्याम सुंदर शर्मा ने राष्ट्रीय लोक दल (रालोद) के योगेश चौधरी को 432 वोट से हराया था जबकि श्रावस्ती में भाजपा के राम फेरन को सपा के रमज़ान अली ख़िलाफ 445 वोट से जीत हासिल हुई थी। मोहम्मदाबाद गोहना सुरक्षित सीट पर भाजपा के श्रीराम सोनकर को 538 जबकि सहारनपुर की रामपुर मनिहारन सीट पर भाजपा के देवेंद्र कुमार 595 वोट से जीते थे।

राज्य में कुल 44 सीटें ऐसी थीं, जहां हार-जीत का फासला 5 हज़ार वोट से कम था। कुल 31 सीटों पर हार-जीत का अंतर 10 हज़ार वोट से कम रहा, जबकि 29 सीट पर जीत का फासला 15 हज़ार से कम था। क़रीब एक दर्जन सीटें ऐसी भी थीं, जहां हार-जीत का अंतर 15-17 हज़ार के बीच था। ज़ाहिर है इन सीटों पर एक या दो वोटकटवा उम्मीदवार चुनावी नतीजों को बदल सकते हैं। ऐसे में भजपा चाहेगी कि इस सीटों पर ज़्यादा से ज़्यादा उम्मीदवार हों ताकि ध्रुवीकरण और वोटों के बंटवारे का गणित लगाकर बेहतर नतीजे हासिल किए जा सकें।

(संपादन : नवल/अनिल)


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