कहानी झारखंड के लहंगवीर और तुलसीवीर की (रांची डायरी : भाग -1)

विनोद कुमार ने बताया कि दलित अर्थात अनुसूचित जातियों में सबसे अधिक संख्या ‘भुइयां’ जाति की है। ‘भुइयां’ नाम सुनकर मुझे अपने गुरु चन्द्रिकाप्रसाद जिज्ञासु का स्मरण हो आया, जिन्होंने अपनी पुस्तक ‘शिव तत्व प्रकाश’ (1962) में इसके बारे में लिखा है। पढ़ें, कंवल भारती की रांची यात्रा की डायरी की पहली किश्त

झारखंड के तीसरे स्थापना दिवस के मौके पर, नवंबर 2003 में, झारखंड की प्रसिद्ध पत्रकार व लेखिका वासवी किड़ो ने हम चार पत्रकारों– मुझे, मोहनदास नैमिशराय, श्यौराज सिंह बेचैन और सुभाष गताड़े– को नवगठित झारखंड की प्रगति और वस्तुस्थिति का अवलोकन करने के लिए रांची बुलाया था। हम चारों लोग 14 नवंबर, 2003 को नई दिल्ली एयरपोर्ट से सुबह 10 बजे इंडियन एयरलाइंस की उड़ान आई.सी./बी.09 से रांची के बिरसा मुंडा एयरपोर्ट पहुंचे। उसी दिन हमारे पहुंचने की एक छोटी-सी खबर हमने ‘प्रभात खबर’ में छपी देखी। हम सभी को विधायक निवास में ठहराया गया, जहां कमरा नंबर 226 में मैं और नैमिशराय एक साथ थे। यह मेरी पहली हवाई यात्रा और पहली रांची यात्रा थी। हम रांची में चार दिन रहे। हमने बहुत से ऐतिहासिक स्थलों को देखा। अनेक आदिवासी पत्रकारों और समाजसेवियों से मिले, जिनसे आदिवासी जीवन-संस्कृति पर बहुत सारी आशचर्यजनक और उपयोगी जानकारियां प्राप्त हुईं। बिरसा मुंडा का स्मारक देखा तथा जयपालसिंह मुंडा स्टेडियम में आयोजित भव्य आदिवासी सम्मेलन के हम साक्षी बने। हमने रांची विश्वविद्यालय देखा, और उसके आदिवासी कुलपति डॉ. रामदयाल मुंडा के आवास पर जाकर उनके साथ कुछ समय बिताने का सुअवसर मिला और उन्हें वाद्ययन्त्र (मांदड़) बजाते हुए देखा, जो उनके बैठक कक्ष में सजे हुए रखे थे।

मैं चारों दिन के संपूर्ण विवरण को तुरंत अपनी डायरी में लिखता जाता था, ताकि बाद में उसके आधार पर एक बेहतर रिपोर्ट और आलेख तैयार किया जा सके। यह संपूर्ण विवरण डायरी के 41 पृष्ठों में आया। उस समय मैं नौकरी में था और जौनपुर (उत्तर प्रदेश) में रह रहा था। रांची में अनेक संगठनों और मित्रों ने भी मुझे कुछ दस्तावेज, पंफलेट और पुस्तिकाएं दी थीं। इन सारी सामग्रियों को मैंने एक फाइल में रख दिया था। फाइल पर ‘झारखंड सामग्री’ का नाम लिख दिया था, ताकि पहचान बनी रहे। लेकिन पता नहीं क्यों, डायरी के 41 पृष्ठ उसमें नहीं रख सका। उन्हें डायरी से फाड़कर स्टिच करके कहीं और रख दिए। इधर नौकरी की परेशानियों और रोजमर्रा के नए-नए विषय पर लेखन की व्यस्तता के कारण इस सामग्री की ओर ध्यान ही नहीं गया। दिन, महीने, साल गुजर गए। जौनपुर से रामपुर आने के बाद उसका जब ध्यान आया, तो सारी फाइलें देख डालीं, झारखंड फाइल तो मिल गई, पर उसमें डायरी के पृष्ठ नहीं मिले। उसमें रखे होते, तो मिलते, जब उसमें रखे ही नहीं गए, तो कैसे मिलते। निराश होकर मैं यह मानकर बैठ गया कि वे पृष्ठ जौनपुर में ही कहीं खो गए, या किसी सरकारी फाइल में रख गए, जो चार्ज में चले गए। इस तरह एक अमूल्य दस्तावेज खो जाने का मुझे दुख बना रहा।

लेकिन बीते 13 सितम्बर, 2021 को 18 साल बाद, अचानक मैं खुशी से उछल पड़ा। ‘नई कहानी बनाम दलित कहानी’ पर काम करते हुए जब आज मैंने अपने काम से संबंधित कुछ लेखों की कतरनों और कहानियों के लिए पुरानी फाइलों को खंगालना शुरू किया, तो एक बदरंग फाइल में डायरी के वे 41 पृष्ठ रखे हुए मिल गए। एक अमूल्य दस्तावेज, जो खो चुका हो, और इतने सालों बाद अचानक मिल जाए, तो यह सुख कुछ इसी तरह का है, जैसे कोई लख्तेजिगर खो गया हो और सालों बाद सुरक्षित घर लौट आए।

यह झारखंड डायरी की मेरी भूमिका है। अब जैसे-जैसे मुझे समय मिलता जाएगा, मैं किश्तवार अपनी 2003 की चार दिन की रिपोर्ट आपको सुलभ कराता रहूंगा। प्रस्तुत है पहली किश्त

जैसाकि मैंने भूमिका में बताया, 2003 में झारखंड की राजधनी रांची जाने की यह मेरी पहली यात्रा थी, तो यह पहली यात्रा आदिवासी समाज को निकट से देखने और कुछ आधिकारिक रूप से जानने की भी थी। इससे पूर्व मैं झारखंड के इतिहास और उसकी जनसांख्यकीय स्थिति के बारे में कुछ भी ज्ञान नहीं रखता था। न मैं यह जानता था कि इस क्षेत्र में आदिवासियों की स्थिति क्या है, और ना ही यह कि उनकी संस्कृति तथा उनका धर्म क्या है? इसलिए जो कुछ भी मैंने जाना, वह इस यात्रा में ही जाना। यही जानकारी मैं अपनी डायरी के अनुसार आपको पेश कर रहा हूं ।

14 नवंबर, 2003, विधायक निवास, कमरा नंबर 226 : झारखंड के दलित-आदिवासी समाज से प्रथम परिचय

जिस व्यक्ति से मेरी पहली भेंट और बातचीत हुई, वह विनोद कुमार थे, जो डाल्टेनगंज, रेड़मा पांकी रोड, पलामू के निवासी थे। वह समाजवादी विचारों के सामाजिक कार्यकर्ता थे और जयप्रकाश नारायण के संपूर्ण क्रांति आंदोलन से निकले थे। डायरी में उनका लैंडलाइन फोन नम्बर (06562-224275) भी दर्ज है, जो मैंने उनके सम्पर्क में बने रहने के लिए उनसे लिया था। मोबाइल फोन के इस जमाने में यह लैंडलाइन नंबर अब शायद ही अस्तित्व में होगा, अगर होगा भी, तो बदल गया होगा। लेकिन सच कहूं, रांची से आने के बाद मेरा कोई सम्पर्क उनसे नहीं हुआ।

रांची स्थित बिरसा चौक की तस्वीर

मैंने जब विनोद कुमार से झारखंड में दलित जातियों के संबंध में जानकारी चाही, तो उन्होंने जो जानकारी मुझे दी, उसके अनुसार उस समय अनुसूचित जातियों की संख्या 11.85 प्रतिशत, अनुसूचित जनजातियों की 25 प्रतिशत, पिछड़ी जातियों की 34 प्रतिशत, मुसलमानों की 11 प्रतिशत और ईसाईयों की संख्या 2.65 प्रतिशत थी। यह उन्होंने अनुमानित जनसंख्या बताई थी, हालांकि 2001 की जनगणना में जनजातियों की जनसंख्या 7, 097,068 है, जो झारखंड की कुल जनसंख्या 26,945,829 का 26.3 प्रतिशत है। जनजातियों की सबसे अधिक संख्या ग्रामीण क्षेत्रों में है, जो अपनी संपूर्णजनसंख्या का 91.7 प्रतिशत भाग है।

विनोद कुमार ने बताया कि दलित अर्थात अनुसूचित जातियों में सबसे अधिक संख्या ‘भुइयां’ जाति की है। ‘भुइयां’ नाम सुनकर मुझे अपने गुरु चन्द्रिकाप्रसाद जिज्ञासु का स्मरण हो आया, जिन्होंने अपनी पुस्तक ‘शिव तत्व प्रकाश’ (1962) में लिखा है– ‘आज के सभ्य जगत ने मातृभूमि-वंदना के जिस तत्व को अपनाया है, महानुभाव भारत के आदिनिवासियों ने अनादि प्रागैतिहासिक काल से अपनी मान्यता का प्रमुख अंग बना लिया था तथा उसकी संतान आज भी व्याप्त भाव से भुइयां-माता की पूजा कर रही है। भारत के किसी गांव में, जहां भारत के आदिनिवासी रहते हैं और स्वाभिमान खो नहीं बैठे हैं, चले जाइए और देखिए। गांव के छोर पर प्रमुख मार्ग में किसी टीले पर, किसी नीम के पेड़ के नीचे, एक चबूतरा बना है, जिस पर एक लाल झंडी गड़ी है, और उसे ‘भुइयां माता’ कहकर कोई पुत्र माथा झुका रहा है। जन्म, अन्नप्राशन, केश-मुंडन, कर्ण-वेध और ब्याह आदि के जितने भी मांगलिक कार्य हैं, कोई भुइयां माता की पूजा के बिना पूरे नहीं हो सकते।’ (पृष्ठ 40)

विनोद कुमार जिस भुइयां जाति के बारे में बता रहे थे, वह ‘भुइयां माता’ की पूजक है या नहीं, यह तो उन्होंने नहीं बताया। किंतु यह उन्होंने जरूर कहा कि भुइयां का मतलब भूमिपुत्र होता है, अर्थात भूमि को जोतने वाला। शायद इसीलिए, भुइयां जाति, उन्होंने बताया, सामंतों की हलवाही जाति रही है। उन्होंने कहा, जमींदार-सामंतों ने उनसे सिर्फ गुलामी कराई, और उनका जबरदस्त शोषण तथा दमन किया। इसलिए उनकी सामाजिक और आर्थिक स्थिति आज भी सबसे खराब है। खेतिहर-मजदूर, रिक्शा-मजदूर, पत्थर-तोड़ मजदूर और बंधुआ मजदूर इसी जाति से आते हैं और पलायन भी सबसे ज्यादा इसी जाति से होता है। उन्होंने बताया कि सामंत इन्हें केवल झोपड़ी डालने लायक जमीन देता था और मजदूरी के तौर पर एक किलो अनाज और आधा किलो सत्तू देता था। जीवन जीने के लिए यह बहुत ही नाकाफी था। वे लोग महुआ को कूटकर लड्डू बनाते थे और मक्का की घुघनी (उबला हुआ) नमक-मिर्च के साथ खाकर गुजारा करते थे। उन्होंने बताया, उनके लिए सामंतों का नियम था, ‘सूर्योदय से पूर्व और सूर्यास्त से थोड़ा पहले तक वे काम करेंगे, बच्चे पढ़ाई नहीं करेंगे, कपड़े वही पहने रहेंगे, जो जमींदार (फटे-पुराने) देंगे। ‘ये कुछ उसी तरह के नियम और प्रतिबंध थे, जिनका उल्लेख डॉ. आंबेडकर ने अपनी पुस्तक ‘अनटचेबिल्स ऑर दि चिल्ड्रेन ऑफ इंडियन घेटो’ के ‘आउटसाइड दि फोल्ड’ नामक अध्याय में किया है, जिसके अनुसार हिंदुओं के गणतंत्र कहे जाने वाले गांवों में दलित जातियों पर अपने दास-सूचक नाम रखने, बच्चों को न पढ़ाने, जेवर न पहनने, अच्छे कपड़े न पहनने, घोड़ी पर न चढ़ने और छत न डालने आदि की निषेधाज्ञाएं लागू थीं।

विनोद कुमार ने बताया कि 1990 के बाद परिवर्तन आया, जब बंधुआ मजदूरी के खिलाफ आंदोलन चला। यह आंदोलन छात्र संघर्ष वाहिनी और पीपुल्स वार ग्रुप द्वारा चलाया गया। [छात्र संघर्ष वाहिनी लोकनायक जयप्रकाश नारायण द्वारा 1974 के बाद गठित की गई थी। वहीं पीपुल्स वार ग्रुप नामक सशस्त्र संगठन 22 अप्रैल, 1980 को अस्तित्व में आया]

उन्होंने मांग की– ‘घर-झोपड़ी हमारी होनी चाहिए, हमें रास्ता देना चाहिए और खेती के लिए भी जमीन देनी चाहिए।’ लेकिन यह आंदोलन पग-पग पर सामंतों के निशाने पर रहता था। उन्होंने बताया कि दलितों की छोटी सी मीटिंग में भी जमींदार का आदमी हथियार लेकर खड़ा रहता था और मीटिंग खत्म होने और नेताओं के जाने के बाद, वह दलितों को गंदी-गंदी गालियां देता था और उन्हें बुरी तरह मारता था। ऐसी स्थिति में वे लोग सशस्त्र क्रांति की ओर मुड़ गए। विनोद कुमार ने बताया– ‘एक बार छात्र संघर्ष वाहिनी ने एक गांव में प्रशिक्षण शिविर लगाया। इस शिविर में बड़ी संख्या में लोग सुनने के लिए आए, तो जमींदार के आदमियों ने उनकी मूंछें उखाड़ दीं, सिर के बाल उखाड़ दिए, खून बह रहा था, लेकिन विद्रोह इतना जबरदस्त था कि पीड़ितों ने जमींदार के आदमियों को उठाकर पटक दिया। पुलिस सामंतों के दबाव में थी, इसलिए उसने दलितों को ही पकड़कर बंद कर दिया। जब लोगों ने पुलिस के खिलाफ प्रदर्शन किया, तो दिखावे के लिए पुलिस ने जमींदारों के भी दो आदमी पकड़ लिये। उन्होंने बताया, ‘सामंतों का आतंक इतना भारी था कि पीड़ितों को अपनी पैरवी के लिए एक भी वकील नहीं मिला।’

विनोद कुमार ने बताया कि 1990 में जब बिहार में लालू प्रसाद यादव की सरकार बनी, तो पूरे प्रदेश में (तब तक झारखंड नहीं बना था) सामाजिक न्याय का आंदोलन उभरा। इस आंदोलन ने दलित-पिछड़े समुदायों में ‘एक भीतरी ताकत’ का निर्माण किया। लेकिन उन्होंने बताया, ‘आर्थिक विकास के सवालों पर आज भी संघर्ष नहीं है।’

विनोद कुमार ने भुइयां जाति के अलावा भी कुछ अन्य दलित जातियों के बारे में हमें बताया। इनमें तूरी (बांस का काम), घांसी (घास काटना), मुसहर (चूहा खानी), पासवान (चौकीदारी), पासी (ताड़ी निकालना), घटवार (खेत-मजदूरी), रजवार (मिट्टी का काम यानी कुम्हार), रविदास (चमार) और डोम (सफाई कर्मी) के नाम उन्होंने लिये। उन्होंने कहा कि इनमें दो जातियां सशक्त हैं– पासवान और रविदास। इसका कारण उन्होंने यह बताया कि इन दोनों जातियों में नेतृत्व पैदा हुआ, जिससे उनमें जागरूकता आई, उन्हें आरक्षण मिला और राजनीतिक प्रतिनिधित्व प्राप्त हुआ। उन्होंने ‘लहंगवीर’ और ‘तुलसीवीर’ के रूप में मुसहर और भुइयां के पुरखों के बारे में भी बताया। उन्होंने कहा, ‘तुलसीवीर एक वीर पुरुष था और हमारा रक्षक था। मुसहर लोगों का कहना है कि भुइयां लोगों ने लहंगवीर के ‘ढकार (गुलामी) को स्वीकारा, जबकि हमने बाघ (तुलसीवीर) के ढकार को सहन किया। वन संस्कृति के रक्षक माने जाने वाले लहंगवीर को मुसहर अपना पुरखा मानते हैं और तुलसीवीर को कृषि कार्य करने वाले भुइयां।’ चूहेखानी के बारे में विनोद कुमार ने बताया, ‘चूहे महिलाएं ज्यादा खाती हैं, पुरुष कम। वे केवल खेतों में अनाज खाने वाले चूहे खाते हैं।’

कहा जाता है कि मूस यानी चूहे खाने के कारण ही इस जाति का नाम मुसहर पड़ा। लेकिन मुझे यह ठीक प्रतीत नहीं होता। चूहे के लिए शब्द ‘मूस’ नहीं, ‘मूषक’ है और ‘मुस’ का अर्थ चोरी होता है, ‘मुसना’ यानी सब कुछ चोरी हो जाना। मुसहर वह जाति हो सकती है, जिसका सर्वस्व चुरा या छीन लिया गया हो। हिन्दी-अंग्रेजी शब्दकोश में मुसहर का अर्थ इस प्रकार दिया गया है– ‘ए नान-आर्यन ट्राइब विच सबसिस्ट्स आन सेलिंग मेडिसिनल प्लान्ट्स।‘ अर्थात मुसहर एक अनार्य जनजाति है, जो जड़ी-बूटियां बेचकर अपनी जीविका चलाती है। क्या ऐसा प्रतीत नहीं होता कि मुसहर एक सर्वहारा जाति रही हो, और चूहा खाना उनकी विवशता रही हो। डॉ. आंबेडकर ने कहीं लिखा है कि एक समय अछूत जातियों के लोग सड़ा हुआ मांस खाते थे, तो इसलिए नहीं कि वह उन्हें पसंद था, बल्कि इसलिए कि वह उनकी विवशता थी, उनके पास ताजा मांस खरीदने के लिए पैसा नहीं था। यही विवशता क्या निश्चित रूप से मुसहरों की भी नहीं रही होगी?

(क्रमश: जारी…)

(संपादन : नवल/अनिल)


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