डेल्टा मेघवाल हत्याकांड : आरोपियों की मिली सजा, सवाल बरकरार

ऐपवा नेत्री कविता कृष्णन के अनुसार, डेल्टा के आरोपियों को तो सजा मिली। लेकिन आप यह देखें कि डेल्टा अपने परिवार की प्रतिभावान लड़की थी। उसके परिजनों ने कितने सपने देख रखे थे, जिसे आरोपियों ने एक झटके में खत्म कर दिया। आप यह भी देखें कि वह दलित वर्ग से आती थी। यदि वह जीवित रहती तो आज समाज में एक अच्छे मुकाम पर होती। इसलिए यह कहना मुश्किल है कि उसके परिजनों को इंसाफ मिला। प्रियंका प्रियदर्शिनी की खबर

राजस्थान के बीकानेर में पांच वर्षों के उपरांत डेल्टा मेघवाल बलात्कार व हत्याकांड मामले में फैसला आया है। पाक्सो अदालत ने समाज को शर्मसार करने वाली इस जघन्य घटना के मुख्य आरोपी विजेंद्र सिंह को आजीवन कारावास व दो अन्य आरोपियों 6-6 साल की कैद व दस हजार रुपए का आर्थिक दंड दिया है। इस प्रकार वर्ष 2016 में दलित किशोरी डेल्टा मेघवाल के साथ हुई घटना के आरोपियों को सजा तो मिली है, परंतु सवाल अब भी बरकरार है कि पाक्सो एक्ट के तहत दर्ज मामले में भी न्याय में इतनी देर कैसे हुई। 

घटना की बात करें तो पांच वर्ष पूर्व 2016 में राजस्थान के बीकानेर जिले के नोखा गांव की 17 वर्षीय दलित छात्रा ‘डेल्टा मेघवाल’ के साथ बलात्कार के बाद हत्या का मामला सामने आया था। वह अपने खानदान की पहली छात्रा थी, जिसने हाईस्कूल के बाद की शिक्षा हासिल की थी। उस समय चूंकि मृतका बालिग नहीं थी तो मामला पाक्सो (प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रेन फ्रॉम सेक्सुअल ऑफन्सेज) के तहत दर्ज किया गया था। तब इस मामले को दबाने की पूरी कोशिशें की गई थीं। लेकिन इस मामले में स्थानीय लोगों के दबाव के कारण आरोपियों को बचाने की साजिश नाकाम हुई और अंतत: पांच साल बाद अदालत ने सजा सुनाई है। 

टंकी में मिली थी डेल्टा की लाश

यह घटना मानवता और शिक्षक की गरिमा को शर्मसार करने वाली थी। स्नातक द्वितीय वर्ष की छात्रा रही डेल्टा मेघवाल के साथ उसके अपने ही महाविद्यालय के पीटी शिक्षक विजेंद्र सिंह, प्राचार्य व होस्टल वार्डेन ने मिलकर घटना को अंजाम दिया। जैन आदर्श कन्या शिक्षक प्रशिक्षण संस्थान, नोखा की छात्रा रही डेल्टा मेघवाल के साथ महाविद्यालय के होस्टल परिसर में घटना को अंजाम दिया गया था। मुख्य आरोपी विजेंद्र सिंह ने छात्रा के साथ बलात्कार किया था। बलात्कार के पश्चात छात्रा की हत्या कर दी गयी थी। बाद में हॉस्टल परिसर स्थित पानी की टंकी में छात्रा की लाश मिली थी। 

डेल्टा मेघवाल (दाएं) व उसके पिता महेंद्र जी पंवार की तस्वीर

हिल गयी थी राजस्थान की तत्कालीन हुकूमत

इस घटना में महाविद्यालय के प्राचार्य प्रज्ञा प्रतीक शुक्ला व उसकी पत्नी प्रिया शुक्ला जो महाविधालय की होस्टल वार्डेन भी थी, के उपर साजिश रचने का आरोप था। मामले को रफा-दफ़ा करने के लिए संस्था ने लिखित माफीनामा दिया था, किंतु छात्रा के पिता महेंद्र जी पंवार ने इसे अस्वीकृत करते हुए आरोपियों के तत्काल गिरफ्तारी की मांग की थी। इस जघन्य अपराध ने जनता में खूब आक्रोश पैदा किया था, जिसने राजस्थान की तत्कालीन राजनीति को भी प्रभावित किया। राजनीतिक दबाब के कारण ही तथाकथित उच्च जाति से आने वाले प्राचार्य व उसकी पत्नी की गिरफ्तारी हुई। 

डेल्टा के पिता के अनुसार होली की छुट्टियों के बाद 28 मार्च 2016 को उन्होंने बेटी को हॉस्टल पहुंचाया था। डेल्टा के दो वर्ष के कोर्स की परीक्षा का परिणाम अगले दिन 29 मार्च को आना था, लेकिन अगले रोज़ उस प्रतिभाशाली छात्रा का शव सामने आया। डेल्टा के पिता महेंद्र जी पंवार गांव से 400 किलोमीटर दूर एक विद्यालय में शिक्षक थे। वह अक्सर अपने छात्रों को डेल्टा के विषय में बताते थे एवं उन्हें प्रोत्साहित करते थे। 

सवाल जो शेष हैं

पाक्सो अदालत द्वारा फैसला दिए जाने के संबंध में अपनी प्रतिक्रिया में दलित लेखक संघ की अध्यक्ष अनिता भारती ने कहा कि “पांच साल बात डेल्टा मेघवाल के आरोपियों को सजी मिली है। यह एक तरह से महत्वपूर्ण जीत है। महत्वपूर्ण जीत इसलिए क्योंकि दलितों के खिलाफ होनेवाले अत्याचारों में कम मामले ही ऐसे होते हैं, जिनमें पीड़ित पक्ष को इंसाफ मिल पाता है। लेकिन चूंकि मामला पाक्सो एक्ट के तहत दर्ज किया गया था तो ऐसे मामलों की सुनवाई शीघ्र होनी चाहिए।” 

वहीं अपनी प्रतिक्रिया में ऑल इंडिया प्रोग्रेसिव वुमेन एसोसिएशन (ऐपवा) की राष्ट्रीय सचिव कविता कृष्णन ने कहा कि “डेल्टा के आरोपियों को तो सजा मिली। लेकिन आप यह देखें कि डेल्टा अपने परिवार की प्रतिभावान लड़की थी। उसके परिजनों ने कितने सपने देख रखे थे, जिसे आरोपियों ने एक झटके में खत्म कर दिया। आप यह भी देखें कि वह दलित वर्ग से आती थी। यदि वह जीवित रहती तो आज समाज में एक अच्छे मुकाम पर होती। इसलिए यह कहना मुश्किल है कि उसके परिजनों को इंसाफ मिला। रही बात फैसला आने में समय लगने की तो भारतीय अदालतें जजों की कमी के संकट से जुझ रही हैं। ऐसे भी मामलों के त्वरित निष्पादन में इंसाफ प्रभावित होता है।”

(संपादन : नवल)


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