क्या यूपी के दलित, ओबीसी और मुसलमान मिलकर बदल पाएंगे सत्ता?

उत्तर प्रदेश में फिलहाल जो हालात हैं, उनके आधार पर कहा जा सकता है कि परेशानी के बावजूद दलित और पिछड़े लामबंद नहीं दिख रहे हैं। यूपी के जाट, गुर्जर, कुर्मी, और यादव वोटरों में असंतोष तो है, लेकिन कितना है, यह अभी सही-सही नहीं कहा जा सकता। बता रहे हैं सैयद जै़गम मुर्तजा

विश्लेषण

उत्तर प्रदेश में सबसे ज़्यादा कौन परेशान है? राज्य के मुसलमानों को अनदेखा कर दिया जाए तो जवाब मिलेगा दलित और पिछड़े। तादाद के लिहाज़ से देखा जाए तो राज्य में क़रीब अस्सी फीसदी आबादी किसी न किसी परेशानी में घिरी है, फिर भी सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के लिए यह किसी ख़ास परेशानी का सबब नहीं है। भाजपा नेताओं को पूरा यक़ीन है कि अभी भी पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) ओर दलितों के वोट का एक बड़ा हिस्सा उसे वोट करने जा रहा है और 2022 में उसके सामने कोई ख़ास चुनौती नहीं है।

2011 की जनगणना के मुताबिक़ उत्तर प्रदेश की जनसंख्या क़रीब 20 करोड़ थी। इनमें 4.14 करोड़ दलित और क़रीब 8 करोड़ ओबीसी हैं। हिस्सेदारी के लिहाज़ से दलित कुल आबादी का क़रीब इक्कीस फीसदी और ओबीसी कुल आबादी का क़रीब 40 फीसदी हैं। ओबीसी आबादी में पिछड़े मुसलमान और यादव निकाल दिए जाएं तब भी तीस फीसदी से ज़्यादा बचते हैं। इसी तरह कुल दलित आबादी में चमार जाति की सबसे ज़्यादा, क़रीब 56 फीसदी हिस्सेदारी है। इसके बाद लगभग 15 फीसदी हिस्सेदार के साथ पासी दलितों में दूसरा सबसे बड़ा समूह है।

इसके बरअक्स देखें तो उत्तर प्रदेश में सवर्ण आबादी महज़ 23 फीसदी है। इसके बावजूद सत्ता, सत्ता प्रतिष्ठान और तंत्र में सवर्णों का ही बोलबाला है। उत्तर प्रदेश विधान सभा के मौजूदा सदस्यों में 44.3 फीसद सदस्य सवर्ण जातियों की नुमाइंदगी करते हैं। वर्ष 2017 के चुनाव में 2012 के मुक़ाबले लगभग 12 फीसदी ज़्यादा सवर्ण सदस्य चुनकर आए। राज्य में दलित, ओबीसी और मुसलमान मिलकर लगभग 77 फीसदी हिस्सेदारी रखते हैं। ऐसे में ओबीसी, दलित और मुसलमानों की सियासी हिस्सेदारी का लगातार घटना हैरान करने वाली बाती है। तो सवाल है कि क्या यूपी में जाति नगण्य हो गई है?

सपा-बसपा के बीच गठबंधन के दौरान एक चुनावी सभा में अखिलेश यादव और मायावती की तस्वीर लिए उनके समर्थक (फाइल फोटो)

ज़मीन पर हालात इसके उलट नज़र आते हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो यानी एनसीआरबी के मुताबिक़ 2020 में देश भर में दलित उत्पीड़न रोकथाम क़ानून के तहत कुल 50,291 मामले दर्ज किए गए। 2019 के मुक़ाबले दलितों के ख़िलाफ घटित होने वाले अपराधों की संख्या में 2020 को दौरान 9 फीसदी से ज़्यादा इज़ाफा हुआ। 2018 के मुक़ाबले 2019 में इस तरह के अपराधों में 11.46 फीसदी की बढ़ोत्तरी दर्ज की गई थी। इस तरह के अपराधों में उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश की हिस्सेदारी बाक़ी देश के मुक़ाबले कहीं ज़्यादा है। उत्तर प्रदेश में दलित उत्पीड़न के लिहाज़ से देश के बाक़ी हिस्सों के मुक़ाबले बेहद बुरा हाल है।

उत्तर प्रदेश में ओबीसी वर्ग की अपनी समस्याएं हैं। कृषि, रोज़गार और बढ़ते अपराध समेत तमाम मसले हैं, जिन्हें लेकर पिछड़े और अति पिछड़े वर्गों में असंतोष है। लेकिन क्या यह असंतोष भाजपा को सत्ता से बेदख़ल करने के लिए काफी है? क्या दलित और पिछडों की राजनीति करने वाली पार्टियां भाजपा के ख़िलाफ गोलबंदी करने में सफल होंगी? फिलहाल जो हालात हैं उनमें कहा जा सकता है कि परेशानी के बावजूद दलित और पिछड़े लामबंद नहीं दिख रहे हैं। यूपी के जाट, गुर्जर, कुर्मी, और यादव वोटरों में असंतोष तो है लेकिन कितना है, यह अभी सही-सही नहीं कहा जा सकता।

हालांकि राज्य में अगले विधान सभा चुनाव के लिए क़रीब 5 महीने का समय बचा है, लेकिन विपक्षी पार्टियां ख़ुद अपनी चुनावी रणनीति को लेकर साफ रुख़ नहीं दिखा पा रही हैं। राज्य में कांग्रेस सक्रिय भूमिका में है, लेकिन उसके पास असंतोष को वोट में बदलने लायक़ कार्यकर्ताओं का नेटवर्क नहीं है। मायावती अभी भी ध्रुवीकरण और जातीय फैक्टर के भरोसे बैठी हैं और कोई ख़ास सक्रियता नहीं दिखा पा रही हैं। उनकी पार्टी के बड़े नेता एक-एक कर समाजवादी पार्टी में या बीजेपी में शामिल हो रहे हैं, लेकिन उन्हें इसकी शायद फिक्र नहीं है। 

समाजवादी पार्टी भी सत्ता विरोधी लहर और सत्ता विरोधी वोटों के ध्रुवीकरण की उम्मीद पर सत्ता मे वापसी का ख़्वाब देख रही है। लेकिन उसका अपना कोर वोटर यादव और मुसलमान सशंकित है। फिर दर्जन भर छोटी पार्टियां भी हैं, जो बनाने का तो पता नहीं लेकिन किसी भी दल का खेल बिगाड़ने में सक्षम हैं। इन सबकी दावेदारी दलित, ओबीसी औऱ मुसलमान वोटरों पर है। भाजपा को फायदा यह है कि सवर्ण वोटरों पर अभी भी उसकी पकड़ मज़बूत है और दलित, ओबीसी की तमाम जातियों में उसे थोड़ा-थोड़ा सही, लेकिन वोट ज़रुर मिलना है। ऐसे में भजपा 2017 के मुक़ाबले अपना नुक़सान तो मान रही है, लेकिन यह मानने को तैयार नहीं है कि यहा नुक़सान उसे सत्ता से बाहर करने लायक़ होगा।

(संपादन : नवल)


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