एबीसीडी सीखो, मिहनत करनेवालों

‘इंडियन इंग्लिश डे’ के मौके पर पढ़ें प्रो. कांचा इलैया शेपर्ड का यह आलेख। उनके मुताबिक, केंद्रीय विश्वविद्यालयों और सभी शासकीय शैक्षणिक संस्थाओं के विद्यार्थियों को ‘इंडियन इंग्लिश डे’ को बड़े पैमाने पर मनाना चाहिए और उन शक्तियों को शिकस्त देनी चाहिए जो नहीं चाहते कि संपन्न द्विज युवाओं की तरह दलित, आदिवासी और शूद्र भी इस वैश्विक भाषा पर अपना अधिकार बना सकें

आज 5 अक्टूबर, 2021 को भारत में अंग्रेजी भाषा 204 वर्ष की हो गई। पिछले कुछ सालों से इस दिन को ‘इंडियन इंग्लिश डे’ के रूप में मनाने का चलन बढ़ता जा रहा है। भारत में अंग्रेजी माध्यम के पहले स्कूल की स्थापना कलकत्ता में सन् 1817 में 5 अक्टूबर को हुई थी। तबसे भारत ने इस भाषा को मरने नहीं दिया है। न केवल भारत में, बल्कि पूरी दुनिया में अंग्रेजी का तेजी से विस्तार और विकास हो रहा है। चीन, जो सभी अंग्रेजी-भाषी देशों को चुनौती दे रहा है, ने मंदारिन के साथ-साथ अंग्रेजी को भी आधिकारिक भाषा का दर्जा देता है। अगर भारत और चीन अपने सभी बच्चों को उनकी स्थानीय भाषा (जैसे आंध्रप्रदेश के लिए तेलुगू) के साथ-साथ अंग्रेजी भी सिखाने लगें, तो पूरे विश्व में देशों के परस्पर जुडाव में आशातीत परिवर्तन आएंगे।

बहुत पहले इजराइल के एक भविष्यवक्ता ने भविष्यवाणी की थी कि एक दिन पूरी दुनिया एक ही भाषा में बात करेगी। हालांकि उसने यह नहीं बताया था कि वह भाषा कौन-सी होगी। परंतु अब हम विश्वास से कह सकते हैं कि वह भाषा अंग्रेजी होगी। 

वर्तमान में अंग्रेजी इस पृथ्वी पर सबसे ज्यादा लोगों द्वारा बोली, लिखी और समझी जाने वाली भाषा है। मानव जाति के इतिहास में ऐसी कोई भाषा नहीं हुई, जो पहुंच, विस्तार और मानव विकास के साधन के रूप में अंग्रेजी के सामने ठहर सके। 

दुनिया में भाषाओं को बोलने और लिखने का इतिहास लगभग 4,000 वर्ष पुराना है। इस अवधि में किसी भाषा ने मानव जाति को उतना लाभ नहीं पहुंचाया जितना कि अंग्रेजी ने। आज अंग्रेजी की वजह से ही धरती के कोने-कोने के लोग एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं और एक-दूसरे के बारे में इतना जानते हैं जितना कि मानव इतिहास में इससे पहले कभी नहीं जानते थे। 

मानव इतिहास के एक लंबे कालखंड में कबीलों के अनेक ऐसे समूह थे, जो परस्पर संवाद तो कर पाते थे परंतु उसी देश के अन्य समूहों के साथ संवाद करने में सक्षम नहीं थे। धीरे-धीरे हर देश में बड़े या छोटे पैमाने पर ऐसे समूहों में अंग्रेजी ने अपनी जगह बना ली। अंग्रेजी वह एकमात्र भाषा है, जिसने अनेक ऐसे समूहों को वे शब्द और वाक्य उपलब्ध करवाए, जिनसे वे उनके लिए तब तक अनजान स्थानों के लोगों से और व्यापक बाज़ार से संवाद कर सकने में सक्षम हुए।

सकारात्मक बदलाव की ओर : अंग्रेजी के वर्णमाला सीखते नौनिहाल

भारत एक ऐसे देश का अच्छा उदाहरण हैं, जहां अलग-अलग भाषाएं बोलने वाले ऐसे हजारों छोटे-छोटे समूह थे, जिनका एक-दूसरे से कोई संवाद नहीं था। यहां अनेक आदिवासी और पहाड़ी समूह थे, जो अन्य समूहों और शहरी बाज़ारों के बारे में बहुत कम जानते थे। भारत के दूर-दराज़ के इलाकों में रहने वाले मेहनतकश लोगों के लिए अन्य संस्कृतियों से मेलजोल बढ़ाने की राह में भाषा सबसे बड़ा अवरोधक थी। अंग्रेजी ने पिछले 200 वर्षों में यह अवरोध लगभग समाप्त कर दिया है, विशेषकर पिछले 30 वर्षों में जब वैश्वीकरण ने पूरी दुनिया के बाज़ारों को एक कर दिया है। ऐसा नहीं है कि सरकारों ने स्कूलों में लोगों को अंग्रेजी सिखाई। दरअसल पूरी दुनिया के लोगों और समूहों, यहां तक कि निरक्षर लोगों को भी, बाज़ार ने अंग्रेजी सिखाई है। 

उदाहरण के लिए समाज और बाज़ार में रोज़मर्रा के जीवन के लिए आवश्यक और रोजाना व्यवहार में आनी वालों चीज़ों जैसे वाटर, फ़ूड, बस, ट्रेन, साल्ट, राइस, टिकट, मिल्क, टी, बेड, फ़ोन, लिकर, ट्रेन, प्लेट इत्यादि के इन अंग्रेजी नामों को वे लोग भी जानते-समझते हैं, जो ठीक से अंग्रेजी बोलना या लिखना नहीं जानते हैं। यह भारत के कोने-कोने के बारे में ही नहीं, दुनिया के भी कोने-कोने के बारे में भी सही है।  

आंध्र प्रदेश के पिछड़े से पिछड़े इलाके के गांवों और टोलों में निरक्षर मजदूर भी 250 से 300 अंग्रेजी शब्द जानता है। पूरे देश में रिक्शावाले, ऑटोवाले, टैक्सीवाले, अनाज और सब्जियां बेचने वाले और मजदूर यदि उनकी भाषा के अतिरिक्त किसी अन्य भाषा के सबसे अधिक शब्द जानते हैं तो वह अंग्रेजी ही है। कई अंग्रेजी शब्द उनके हिंदी पर्यायों से कहीं अधिक प्रचलित हैं। 

अनजान से अनजान स्थान पर भी 250 से 300 शब्द अन्य लोगों से संवाद करने के लिए काफी होते हैं। कहने का मतलब यह कि यदि भारत के किसी गांव के एक मजदूर को किसी अफ़्रीकी या लातिनी अमरीकी देश में भेज दिया जाए तो भी वह इन जीवनरक्षक, बाज़ार-उपयोगी शब्दों के सहारे बिना स्थानीय भाषा सीखे हुए भी लंबे समय तक वहां रह सकता है। अगर वह उस देश की भाषा सीख ले और अपनी अंग्रेजी थोड़ी सुधार ले तो उसके लिए और आसानी हो जाएगी। दुनिया में कोई और दूसरी ऐसी भाषा नहीं है, जिसके केवल कुछ शब्दों की जानकारी के सहारे आप दुनिया में कहीं भी अपना काम चला सकते हैं। 

अंग्रेजी भाषा और उसके शब्द आखिर क्यों और कैसे दुनिया के कोने-कोने में और विश्व के दूरदराज़ के इलाकों तक पहुंचे? अंग्रेजी का प्रसार बाज़ार के वैश्वीकरण का नतीजा है। ब्राह्मण और अन्य सवर्ण जातियों, चाहे वे किसी भी राजनैतिक दल या संगठन से जुड़े हुई क्यों न हों, ने संस्कृत पर अपना एकाधिकार बनाये रखा। और अब वे अंग्रेजी पर कब्ज़ा करने का प्रयास कर रहे हैं। प्राचीन काल में संस्कृत की तरह उच्च दर्जे की अंग्रेजी उनके कब्ज़े में आ चुकी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 74वें स्वाधीनता दिवस भाषण के माध्यम से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने हम सब को सूचित कर दिया है कि देश के सभी सरकारी स्कूलों, कॉलेजों और विश्वविद्यालयों, जहां शूद्र, दलित, आदिवासी और गरीब परिवारों के विद्यार्थी पढ़ते हैं, में ‘मातृभाषा’ (गैर-अंग्रेजी) शिक्षा का माध्यम होगी। आरएसएस-भाजपा की केंद्र सरकार केंद्रीय विश्वविद्यालयों और शैक्षणिक संस्थानों में भी हिंदी को शिक्षा का माध्यम और यहां तक कि पीएचडी शोध-प्रबंधों के लेखन का माध्यम बनाने का प्रयास कर रही है। परंतु वही केंद्रीय और राज्य सरकारें निजी विश्वविद्यालयों, शैक्षणिक संस्थानों, कॉलेजों और स्कूलों को केवल अंग्रेजी में शिक्षण और शोध कार्य करने की अनुमति दे रहीं हैं।    

सवर्णों (ब्राह्मण, बनिया, कायस्थ, खत्री, क्षत्रिय) के मालिकाना हक वाली एकाधिकारवादी कंपनियों ने काफी धन खर्च कर एमीटी, अशोका व ओ.पी. जिंदल जैसे निजी विश्वविद्यालय स्थापित किए हैं। वे इंग्लैंड-अमरीका की तर्ज पर पाठ्यक्रम विकसित कर अंग्रेजी माध्यम से शिक्षा प्रदान कर रहे हैं। आरएसएस-भाजपा सभी शासकीय शैक्षणिक संस्थानों को क्षेत्रीय भाषाओं, विशेषकर हिंदी, के माध्यम से शिक्षा देने पर मजबूर कर रहे हैं। इससे दलित, ओबीसी व आदिवासी युवाओं के जीवन में ठहराव आ जाएगा। दरअसल, संघ-भाजपा के लोग नहीं चाहते कि उत्पादक जातियों और समुदायों में अंग्रेजी में बोलने और लिखने वाले बुद्धिजीवी जन्में। 

केंद्रीय विश्वविद्यालयों और सभी शासकीय शैक्षणिक संस्थाओं के विद्यार्थियों को ‘इंडियन इंग्लिश डे’ को बड़े पैमाने पर मनाना चाहिए और उन शक्तियों को शिकस्त देनी चाहिए जो नहीं चाहते कि संपन्न द्विज युवाओं की तरह दलित, आदिवासी और शूद्र भी इस वैश्विक भाषा पर अपना अधिकार बना सकें। ग्रामीण भारत को पढ़ना चाहिए, लिखना चाहिए और लड़ना चाहिए।  

(आलेख मूल रूप से अंग्रेजी में 24 सितंबर, 2021 को वेब पत्रिका काउंटरकरेंट्स द्वारा तथा इसका हिंदी अनुवाद यहां लेखक की अनुमति से प्रकाशित)

(अनुवाद: अमरीश हरदेनिया, संपादन : नवल/अनिल)


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