h n

जब राजेंद्र जी ने केवल तेरह दिन में छाप दी मेरी कहानी : रामधारी सिंह दिवाकर से खास बातचीत (दूसरी किश्त)

राजेंद्र जी को जो रचना पसंद आती थी, उसको वे सीमा से बाहर जाकर प्रशंसा करते थे। इसका एक उदाहरण है ‘हंस’ में ही छपी मेरी कहानी– ‘रंडियां’। यह कहानी ‘हंस’ में तेरह दिन में छपी। ऐसा शायद बहुत कम हुआ होगा कि हंस में भेजी कहानी इतनी जल्दी छप जाए। पढ़ें, बहुजन साहित्यकार रामधारी सिंह दिवाकर से युवा समालोचक अरुण नारायण की बातचीत की दूसरी किश्त

रामधारी सिंह दिवाकर हिंदी के उन चंद महत्वपूर्ण लेखकों में हैं, जिनकी कहानियों, उपन्यासों और संस्मरण पुस्तकों ने जाति, वर्ग और पितृसत्तात्मक जड़ता को अपने तरीके से टारगेट किया है। वह चाहे मंडल आंदोलन के पहले और बाद के हुए बदलाव हों या पंचायतों में महिलाओं की हिस्सेदारी के बाद का बदलता हुआ बिहार– रामधारी सिंह दिवाकर के संपूर्ण लेखन में इन बदलावों के सूक्ष्मतम रूप अभिव्यक्त हुए हैं। ‘पंचमी तत्पुरुष’, ‘अकाल संध्या’, ‘आग’, ‘पानी आकाश’, ‘टूटते दायरे’, ‘दाखिल खारिज’ आदि उनके छह प्रकाशित उपन्यास हैं और ‘अंतिम अध्याय’ प्रकाशनाधीन उपन्यास। लगभग इतनी ही संख्या में उनकी कहानियों के भी संकलन प्रकाशित हैं, जिनमें ‘मखान पोखर’, ‘वर्णाश्रम’, ‘हड़ताली मोड़’, ‘छोटे-छोटे बड़े युद्ध’ आदि मुख्य हैं। उत्तर बिहार के गांवों पर लिखी उनकी टिप्पणियों का भी एक संकलन– ’जहां आपनो गांव’ के नाम से प्रकाशित है।

रचनात्मक मेधा के लिए उन्हें श्रीलाल शुक्ल इफको सम्मान, बिहार राजभाषा जैसे प्रतिष्ठित सम्मान भी मिल चुके हैं। 1 जनवरी, 1945 को बिहार के अररिया जिले के नरपतगंज में जन्में रामधारी सिंह दिवाकर की आरंभिक शिक्षा अपने गांव के विद्यालय से हुई। तत्पश्चात मुजफ्फरपुर और भागलपुर से उच्च शिक्षा की डिग्री ली। उन्होंने 1979 से अध्यापन के पेशे में आए। निर्मली और सीएम काॅलेज, दरभंगा में अध्यापन कार्य किया फिर बिहार राष्ट्रभाषा परिषद के निदेशक बने। संप्रति पटना में रहकर पूर्णकालिक लेखन के काम में अबाध रूप से सक्रिय हैं। बिहार के युवा साहित्यकार व समालोचक अरुण नारायण ने उनसे खास बातचीत की। प्रस्तुत है उनसे बातचीत की दूसरी किश्त

आपकी पहली रचना कब और किस पत्रिका में प्रकाशित हुई? उन दिनों की परिस्थितियां कैसी थीं?

मूलतः मैं कवि हूं और कवि ही बनना चाहता था, लेकिन रामधारी सिंह दिनकर के नाम साम्य के कारण मैंने कविता का क्षेत्र छोड़ दिया। लोग एक ही सांस में रामधारी सिंह दिवाकर को रामधारी सिंह दिनकर पढ़ लेते थे। ऐसे में मेरी पहचान तो बन नहीं सकती थी, तो मैं कहानी के क्षेत्र में आ गया। वैसे मेरी कविताएं प्रकाशित हो चुकी थीं। पटना से प्रकाशित दैनिक ‘आर्यावर्त’ तब बहुत लोकप्रिय था। बल्कि संपूर्ण बिहार का वह सबसे बड़ा अखबार था। उसमें कई कविताएं छपीं, लेकिन बाद में जब मैं कहानी में आया तब भी मेरा पहला प्लेटफार्म ‘आर्यावर्त’ ही था। इसमें मेरे अभ्यासकाल की चार-पांच कहानियां छपीं।

पूरा आर्टिकल यहां पढें : जब राजेंद्र जी ने केवल तेरह दिन में छाप दी मेरी कहानी : रामधारी सिंह दिवाकर से खास बातचीत (दूसरी किश्त)

लेखक के बारे में

अरुण नारायण

हिंदी आलोचक अरुण नारायण ने बिहार की आधुनिक पत्रकारिता पर शोध किया है। इनकी प्रकाशित कृतियों में 'नेपथ्य के नायक' (संपादन, प्रकाशक प्यारा केरकेट्टा फाउंडेशन, रांची) है।

संबंधित आलेख

जिम्मेदार व निर्भीक पत्रकारिता के अग्रदूत थे संतराम बी.ए.
संतराम जी की पत्रकारिता की पड़ताल करने पर जो तथ्य सामने आते हैं, उनमें सबसे पहला है– बहुजन समाज के मुद्दों पर उनकी बिना...
सावरकर बनाम हम : गांधी की जगह सावरकर को राष्ट्रपिता बनाना चाहते हैं आरएसएस-भाजपा
आरएसएस-भाजपा और दक्षिणपंथी बुद्धिजीवी चाहते हैं कि गांधी-नेहरू की विरासत का स्थान सावरकर ले लें क्योंकि उन्हें पता है कि कांग्रेस का यदि आज...
‘पसमांदा जन आंदोलन 1998’ : मुस्लिम समाज में जातिवाद और हक की जद्दोजहद की दास्तान
मौजूदा सामाजिक और राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में यह किताब और भी अधिक प्रासंगिक हो जाती है। पसमांदा समाज के प्रतिनिधित्व की स्थिति आज भी लगभग...
वर्चस्ववादी सत्ता की मुखालफत करतीं मोहन मुक्त की कविताएं
मोहन मुक्त सांस्कृतिक वर्चस्व को सत्ता का सबसे चालाक रूप मानते हैं। वे कहते हैं कि मिथक, परंपरा, धर्म और भाषा के ज़रिए शोषण...
यूजीसी रेगुलेशन के पक्ष में बोलें सामाजिक न्याय की सियासत करने वाले नेता
उत्तर भारत की दलित-ओबीसी पार्टियों ने संशय की स्थिति में न केवल सामाजिक अपितु राजनीतिक स्तर पर लामबंदी का बड़ा अवसर खो दिया है।...