आरक्षण की हो रही हकमारी, मुंह ताक रहे बहुजन नेता

1980 के दशक के बाद विभिन्न जातियों के दबंग नेता अपने राजनीतिक दबदबे के बल पर जातियों की सुविधाएं दिलवाने का प्रयास करते रहे हैं। जबकि वे भूल जाते हैं कि आरक्षण जातिवाद को मजबूत करने का हथियार नहीं है। जबतक जातियोें के बीच सामाजिक दीवारेें नहीं तोड़ी जाती हैं, तबतक सारा संघर्ष सुविधाएं लेने के लिए ही रहेगा। बता रहे हैं इंजीनियर राजेंद्र प्रसाद

अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति की सूची में शामिल होने के लिए विभिन्न प्रकार के हथकंडे अपनाए जा रहे हैं। इसके जरिए हो यह रहा है कि इनके आरक्षण पर डाका डाला जा रहा है। दुखद स्थिति यह है कि संसद में बैठे तमाम बहुजन नेता खामोश हैं। 

दरअसल, भारतीय संविधान के अनुच्छेद 341 और 342 के अनुसार राष्ट्रपति किसी राज्य या केन्द्र शासित क्षेत्र के राज्यपाल की सलाह से अथवा संसद द्वारा पारित अधिनियम के आलोक में अधिसूचना जारी करके किसी जाति को अनुसूचित जाति/जनजाति में शामिल कर सकता है अथवा निकाल सकता है, जिन्हें उस राज्य में अनुसूचित जाति/जनजाति माना जाता है।

सर्वविदित है कि संविधान में अनुसूचित जाति और जनजाति के उत्थान हेतु विभिन्न प्रावधान किए गए हैं। इन प्रावधानों के लोभवश अन्य जातियों के लोग अनुसूचित जाति और जनजाति की सूची में शामिल होने के लिए विभिन्न प्रकार के दांव-पेंच करते रहते हैं। साथ ही, उनके वोट पाने के लिए तमाम राजनीतिक दल विभिन्न दूसरी जातियों को अनुसूचित जाति और जनजाति में शामिल कराने का प्रयास समय-समय पर करती रहती हैं। वहीं इन सभी दलों के दलित सांसद, विधायक और प्रभावशाली दलित नेता विरोध तक नहीं करते हैं। 

दिल्ली के जंतर-मंतर पर प्रदर्शन करते दलित कार्यकर्ता (फाइल फोटो)

ये बिल्कुल वैसे ही हैं, जैसे हैं दिसम्बर, 2012 में संसद में पदोन्नतियों में आरक्षण संबंधी बिल को मुलायम सिंह की पार्टी के दलित नेताओं ने उनके आदेश पर फाड़नेे से लेकर हंगामा तक किया था। इससे स्पष्ट है कि ऐसे निर्वाचित जनप्रतिनिधि अपने वर्ग के प्रतिनिधि से ज्यादा अपने-अपने राजनीतिक दल के शीर्ष नेतृत्व के अधीन होते हैं। जबकि सर्वोच्च न्यायालय ने अपने कई निणर्यों में अनुसूचित जाति और जनजाति की सूची के लिए राष्ट्रपति की अधिसूचना को मान्यता दी है, राज्य सरकार के परिपत्र को नहीं। फिर भी राजनीतिक फायदे के लिए ऐसे अन्य जातियों को अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजातियों में शामिल करने की गतिविधियां की जाती रही हैं। 

गौरतलब है कि सन् 1950 मेें जब अनुसूचित जातियों और जनजातियों की सूचियों की घेाषणा की गई तो उस समय बहुत सी जातियों को यह भी मालूम नहीं था कि उनकी सामाजिक और शैक्षणिक स्थिति को देखते हुए उन्हें सूची मेें शामिल किया गया है। इसलिए कुछ जातियों के नेताओं को उस समय हरिजन और आदिवासी कहलाने पर भी आपत्ति थी। उन्हें अपने को अछूतों के समकक्ष रखना अपमानजनक लगता था। इसलिए अनुसूचित जाति के कुछ उपजातियों के लोगों द्वारा उन दिनों सरकार के पास कई स्मरण पत्र भेजे गए, जिसमें उनलोगों को अनुसूचित जाति कीे सूची से अपनी जाति को निकालने की प्रार्थना की गई थी। विभिन्न राज्यों की सूचियों में विसगंतियों की शुरूआत यहीं से हुई। 

लेकिन विकास के क्रम में जब लगा कि अनुसूचित जाति या जनजाति अपनी जाति में रहकर सरकार की विशेष सुविधाओं को ले सकता है तो अनेक जातियों के रहनुमाओं द्वारा अपनी-अपनी जातियों को अनुसूचित जातियों और जनजातियों मेें शामिल करवाने की होड़ मची। यही स्थिति पिछड़ी जातियों की भी है। वोट की राजनीति ने इसको परवान चढ़ाया। आज स्थिति यह है कि किसी प्रभावशाली जाति के सरासर झूठे दावोें को भी राजनीतिक दल समर्थन देते हैं। सरकार भी अन्य जातियों को अनुसूचित जाति और जनजाति में शामिल करती रही है। यह कमजोर वर्ग के वास्तविक लाभार्थियों के हक को छीनने जैसा है। 

एक मामला और है। सवर्ण जाति के लोग भी फर्जी जाति प्रमाण पत्र बनवा कर अनुसूचित जाति या जनजाति आरक्षण का लाभ ले रहे हैं। यही नहीं ऐसे फर्जी जाति प्रमाण पत्र के आधार पर लाभान्वित लोगों के विरुद्ध शिकायत करने पर भी अधिकतर के खिलाफ कार्रवाई नहीं की जाती है। बल्कि,कहीं-कहीं तो शिकायकर्ता को ही विभिन्न तरह से प्रताड़ित किया जाता है। इस कारण डंके की चोट पर न केवल फर्जी जाति प्रमाण पत्र बनवाकर लोग लाभ ले रहे हैं, बल्कि ऐसे लोग विधायिका जैसे महत्वपूर्ण पदों पर भी आसीन होने लगे हैं। पटना के फतुहां अनूसूचित जाति सुरक्षित विधानसभा क्षेत्र से 2001 में एक ऐसे राजद प्रत्याशी दिनेश चौधरी भूतपूर्व केन्द्रीय मंत्री राम विलास पासवान के समधी पुनित राय को पराजित कर विजयी हुए थे। बाद में लंबी लड़ाई के बाद उनके विरुद्ध कानूनी कार्रवाई की गई। फिर भी वे पांच साल तक वह विधायक बने रहे। 

वैसे तो फर्जी जाति प्रमाण पत्र के आधार पर लाभ लेने के मामले पूरे देश में हैं। लेकिन उत्तर प्रदेश और बिहार में सरकार के सहयोग से यह ज्यादा फल-फूल रहा है। बिहार सरकार के अधिकारियों और राजनेताओं की मिलीभगत से अनुसूचित जाति और जनजाति के विभिन्न आरक्षित पदों पर सवर्ण जाति के लोग किसी तरह कब्जा करते रहते हैं, जिसमें सवर्ण पिता द्वारा अंतर्जातीय विवाह से उत्पन्न बच्चे, गोद लेने के तरीके और अपनी जाति को छिपाकर अनुसूचित जाति, जनजाति वाली जाति का दावा कर प्रमाण पत्र लेना शामिल है। 

एक ज्वलंत उदाहरण से यह स्पष्ट होगा कि यह किस तरह सभी सरकारों के कार्यकाल में अबाध रूप से जारी है। बिहार विधान सभा की अनुसूचित जाति और जनजाति कल्याण समिति ने अपने 1987-88 की 19वें प्रतिवेदन, जो 30 मार्च 1989 को सदन में पेश किया गया था, जिसमें तत्कालीन कार्मिक एवं प्रशासनिक सुधार विभाग के सचिव के विरुद्ध कड़ी कार्रवाई और उनके द्वारा निर्गत पत्रों को वापस लेने की अनुशंसा की थी। वह निर्देश आज तक कार्यान्वित नहीं किया गया। सभी पार्टियों की सरकारों के कार्यकाल में इसपर कार्रवाई करने की मांग की जाती रही। लेकिन यह पिछले 40 वर्षों से अबतक जारी है।

बिहार में भाजपा-जदयू की सरकार ने 1 जुलाई, 2015 को एक संकल्प ज्ञापांक 9532 जारी कर तांती, ततवा जाति को अनुसूचित जाति घोषित कर दिया। तदनुसार उन्हें अनुसूचित जाति का प्रमाण पत्र भी निर्गत कर नियुक्ति और पंचायत चुनाव में प्रतिनिधियों को आरक्षण का लाभ मिलने लगा। और भी अन्य जातियों को शामिल करने की अधिसूचना जारी की गई। यह ठीक बिहार विधान सभा चुनाव 2015 के पहले किया गया। भाजपा-जदयू ने अपने चुनावी वोटों में वृद्धि की। शिकायत करने पर भारत सरकार के सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय ने अपने पत्रांक 12017-2-2015 दिनांक 23.9.2015 द्वारा रद्द करने संबंधी निर्देश बिहार के सामान्य प्रशासन विभाग के प्रधान सचिव को दिया। पत्रांक 12017-7-2018 दिनांक 12.12.2018 द्वारा अन्य जातियों के मामले भी रद्द करने का निर्देश दिया। पुनः अपने पत्रांक 12017-7-2018 द्वारा प्रधान सचिव को स्मारित किया। फिर भी बिहार सरकार ने अपने स्तर से उसे रद्द नहीं किया और अनुसूचित जाति और जनजाति के अधिकारों की राज्य सरकारों के माध्यम से लूट जारी है। इस पूरे मामले में भारत सरकार और दलित प्रतिनिधि इस गंभीर संविधान-विरोधी कृत्यों पर मूकदर्शक बने हुए हैं। 

दरअसल, 1980 के दशक के बाद विभिन्न जातियों के दबंग नेता अपने राजनीतिक दबदबे के बल पर जातियों की सुविधाएं दिलवाने का प्रयास करते रहे हैं। जबकि वे भूल जाते हैं कि आरक्षण जातिवाद को मजबूत करने का हथियार नहीं है। जबतक जातियोें के बीच सामाजिक दीवारेें नहीं तोड़ी जाती हैं तबतक सारा संघर्ष सुविधाएं लेने के लिए ही रहेगा। मूल समस्या तो वहीं की वहीं रह जाएगी। डॉ. आंबेडकर ने प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु से यह प्रस्तावित किया था कि कम से कम राजकीय सेवा में नियुक्ति उसे दी जाय। जो अन्तर्जातीय विवाह किया हो या करे। परंतु, उनके प्रस्ताव की अनदेखी की गई। जिसका कुफल हम आज भोग़ रहे हैं। जाति संबंधी रुढ़ियां तमाम प्रयासोें के बावजूद नहीं समाप्त हो रही हैं, बल्कि चुनावी राजनीति में और भी विकृृत होकर मजबूत हो रही है। इसके लाभ लेने के लिए विभिन्न प्रकार के ओछे हथकंडे अपनाए जाते हैं और परिणम यह है कि जातीय विद्वेष चरम पर है।

(संपादन : नवल/अनिल)


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