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पश्चिम बंगाल में रवींद्रनाथ के जैसे पढ़ाए जाएं डॉ. आंबेडकर : डॉ. विजय कुमार भारती

‘बंगाल में जो हिंदी भाषी समाज है, वह अपने रुग्ण संस्कारों को छोड़ नहीं पाया और बंगाल का जितना खुलापन है, जो उदारवादी विचार है, उनको ग्रहण नहीं कर पाया। इसलिए मैं बंगाल को दोषी नहीं मानता। बंगाल में जो उत्तर प्रदेश और बिहार के लोग आये, वे अपने जातिवाद के संस्कार को नहीं छोड़ पाए। दुख इस बात का है।’ पढ़ें, पश्चिम बंगाल दलित साहित्य अकादमी के सदस्य डॉ. विजय कुमार भारती का ज्योति पासवान द्वारा खास साक्षात्कार

[डॉ. विजय कुमार भारती पश्चिम बंगाल के जाने-माने हिंदी दलित साहित्यकार व अध्येता रहे हैं। वर्तमान में वे बंगाल हिंदी साहित्य अकादमी व बंगाल दलित साहित्य अकादमी के सदस्य हैं। बंगाल में हिंदी दलित साहित्य और बांग्ला में दलित साहित्य से जुड़े कई सवालों को लेकर फारवर्ड प्रेस के लिए ज्योति पासवान ने उनसे विस्तृत बातचीत की। प्रस्तुत है इस बातचीत का संपादित अंश]

कृपया अपने जन्म व अपनी पारिवारिक पृष्ठभूमि के बारे में हमें बतायें । आपने उच्च शिक्षा कैसे ग्रहण की और आपको किन-किन कठिनाईयों का सामना करना पड़ा? 

मेरा जन्म 1 जून, 1967 को पश्चिम बंगाल के एक छोटे से शहर नैहट्टी में गौरीपुर के छोटे से इलाके में हुआ। यही नैहट्टी बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय की जन्मभूमि रही है और संदेश बसु जैसे विख्यात कथाकार का भी जन्म यहीं हुआ है। जहां तक मेरी पारिवारिक पृष्ठभूमि की बात है तो मेरे दादाजी का नाम देवनाथ दास था। वे मूलत: उत्तर प्रदेश, गाजीपुर के रहनेवाले थे। वे ‘इंडियन नेशनल आर्मी’ में थे। वर्मा के युद्ध में उन्होंने नेताजी सुभाष चंद्र बोस के साथ मिलकर युद्ध किया था। इस युद्ध में उनकी एक आंख में गोली का छर्रा लगा, जिसकी वजह से उन्हें सेना की नौकरी छोड़नी पड़ी। उसके बाद वे बंगाल चले आये और आजाद भारत में उन्हें रेलवे के वर्कशॉप में नौकरी मिल गई। इसके बाद गौरीपुर (बंगाल) में एक जमीन खरीदी और तब से हमारा परिवार वहीं रहने लगा। मेरा जन्म भी वहीं हुआ है। मेरे पिताजी का नाम रामसकल राम था। वे बहुत प्रतिभाशाली थे। वे खलासी के पद से कार्य शुरु किये और ऑफिस सुपरिटेंडेट बनकर सेवानिवृत्त हुए। रेलवे के अंदर उन्होंने एससी-एसटी का एक संगठन बनाया था। उनके हितों के लिए वे बराबर संघर्ष करते रहे थे। वे हर साल डॉ. आंबेडकर जयंती और रविदास जयंती मनाया करते थे। वे स्वयं तो रेलवे में थे। लेकिन जब आंबेडकर जयंती मनाते तो जूट मिल के दलित समाज के कर्मचारी भी शरीक होते थे। उस समय मेरे पिताजी मान्यवार कांशीराम, बाबू जगजीवन राम जैसे नेताओं से मिल चुके थे। मेरी माँ का नाम अनुराधा भारती था। वह एक गरीब परिवार से थी। उनकी माँ भी जूट मिल में काम करती थीं। मेरी माँ केवल चौथी पास थीं। घर की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी। हमारा परिवार भी बड़ा था। हम पाँच भाई और हमारी एक बहन थी। भाइयों में मेरा स्थान दूसरा है।

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लेखक के बारे में

ज्योति पासवान

दिल्ली विश्वविद्यालय से हिंदी साहित्य में एम.ए. ज्योति पासवान काज़ी नज़रुल विश्वविद्यालय, आसनसोल, पश्चिम बंगाल में पीएचडी शोधार्थी हैं

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