किसानों की आंखों में जीत से अधिक हुक्मरान के प्रति अविश्वास और अपनों को खोने का गम

गाजीपुर बार्डर पर पिछले एक साल से आंदोलरत लखीमपुर खीरी के किसान बलविंदर सिंह ने फारवर्ड प्रेस से बातचीत में कहा कि उन्हें प्रधानमंत्री की घोषणा पर विश्वास नहीं है। तो जबतक सबकुछ लिखित में नहीं हो जाता है, तबतक किसान आंदोलन खत्म नहीं होग। उन्होंने यह भी कहा कि लखीमपुर खीरी में हमारे किसानों पर गाड़ी चढ़ा दी गयी। अबतक हमारे सात सौ किसान बेमौत मारे गए। सरकार को इसका जवाब देना चाहिए। फारवर्ड प्रेस की खबर

आज 19 नवंबर, 2021 को सुबह-सुबह दिल्ली-उत्तर प्रदेश की सीमा गाजीपुर बार्डर पर पिछले एक साल से आंदोलनरत किसान गुरु नानक जयंती की तैयारियों में लगे थे। इस तैयारी में गैर सिक्ख किसान भी जुटे थे। आंदोलन स्थल पर चल रहे लंगरों में इसके लिए खास तैयारी की जा रही थी कि आज आंदोलन में शामिल होनेवालों को अलग-अलग जायकेवाले व्यंजन परोसे जाएं। इस बीच सुबह 9 बजे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बड़ा ऐलान कर दिया। देश को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री ने तीनों कृषि कानूनों को वापस लेने की घोषणा कर दी। उन्होंने कहा कि संसद के शीतकालीन सत्र में सरकार तीनों कृषि कानूनों को निष्प्रभावी बनाने के लिए विधेयक लाएगी। प्रधानमंत्री की यह घोषण जैसे ही किसानों के बीच पहुंची, उनके चेहरे पर जीत की खुशी दिखी। लेकिन यह खुशी अधूरी थी। हालांकि कई किसानों ने इस मौके पर आतिशबाजी की, परंतु वे भी यह कहते नजर आए कि जबतक सरकार संसद में विधेयक लेकर नहीं आती है, तबतक उन्हें प्रधानमंत्री पर भरोसा नहीं है। वहीं उनकी आंखों में अपनों के खोने का गम भी दिखा।

ये तीन कानून होंगे वापस

दरअसल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जिन तीन कानूनों को निष्प्रभावी बनाने केे लिए विधेयक लाने की बात कही है, उन कानूनों को सरकार पिछले ही साल कोरोना काल में बिना किसी विमर्श के बहुमत के बल पर संसद के दोनों सदनों में पारित करवाने में कामयाब हो गई थी। ये तीनों कानून हैं– कृषि उत्पादन व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सुविधा) अधिनियम, 2020, मूल्य आश्वासन एवं कृषि सेवाओं पर कृषक (सशक्तिकरण एवं संरक्षण) अनुबंध विधेयक 2020 और आवश्यक वस्तु संशोधन अधिनियम, 2020। किसानों का विरोध इन तीनों कानूनों के अलावा न्यूनतम समर्थन मूल्य की गारंटी वाला कानून बनाने की मांग को लेकर पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसानों द्वारा 26 नवंबर से दिल्ली में शुरु हुआ किसान आंदोलन 25 नवंबर को अपने एक साल पूरे कर रहा है। किसान सिंघु, टिकरी, कुंडली, शाहजहांपुर बॉर्डर पर विगत एक साल से डेरा डाले हुये हैं।

आसान नहीं थी किसानें की राह, सरकार ने सड़कों पर ठोंक दी थी कीलें

हालांकि यह इतना आसान नहीं था। संयुक्त किसान मोर्चा के बैनर तले ‘दिल्ली चलो’ नारे के साथ 25 नवंबर को दिल्ली के लिए निकले तमाम किसान संगठनों के किसान और कृषि मजदूर 26 नवंबर को दिल्ली पहुंचे तो हरियाणा और केंद्र सराकर द्वारा आंसू गैस, वॉटर कैनन, लाठीचार्ज किया गया। जेसीबी मशीनें लगवाकर सड़क और हाईवे खुदवा डाला गया ताकि किसान राजधानी दिल्ली में प्रवेश न कर सकें। सड़कों पर कीलें ठुकवा दी गई। किसानों और दिल्ली के बीच 12 लेयर की बैरिकेंडिग करके कंटीले तार लगवा दिये गये।

प्रधानमंत्री पर विश्वास नहीं : लखीमपुर खीरी के किसान बलविंदर सिंह

वहीं आंदोलन करने दिल्ली पहुंचे किसान संगठनों ने पहले दिन से ही यह स्पष्ट कह दिया था कि वो पूरे साल भर का राशन साथ लेकर दिल्ली आये हैं। उन्हें कोई जल्दबाजी नहीं है। 28 नवंबर 2020 को केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने दिल्ली की सीमाओं को खाली करके बुराड़ी के संत निरंकांरी मैदान पर जाने की शर्त पर किसानों के साथ बातचीत करने की पेशकश की। किसानों ने जंतर-मंतर पर धरना देने की मांग करते हुए उनके प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया था। संयुक्त किसान मोर्चा के नेताओं ने कहा हम दिल्ली में घिरकर बैठने के बजाय दिल्ली को घेरकर बैठेगें। किसान आंदोलन शुरु होने के बाद 3 दिसंबर से लेकर 22 जनवरी के दर्म्यान (3,5,8,30 दिसंबर तथा 4,8,15,20,22 जनवरी) सरकार के प्रतिनिधि मंत्रियों और संयुक्त किसान मोर्चा में शामिल 40 किसान संगठनों के नेताओं के बीच 9 बैठकें हुईं।    

किसानों और सरकार के बीच कई दौर की बैठकें रहीं बेनतीजा

20 जनवरी, 2021 की बैठक में सरकार ने तीनों कृषि कानूनों पर एक से डेढ़ साल तक अस्थायी रोक लगाने और साझा कमेटी के गठन का प्रस्ताव दिया। ऐसा किसानों के ट्रैक्टर रैली पर सुप्रीम कोर्ट के रुख और न्यूनतम समर्थन मूल्य पर पंजाब, हरियाणा के इतर दूसरे राज्यों में बहस शुरू होने के कारण हुआ। सरकार का प्रपोजल नामंजूर करते हुये किसान संगठनों ने कहा कि कृषि कानून रद्द होने चाहिए, और एमएसपी की गारंटी मिलनी चाहिए। 

किसान नेताओं ने कहा– केवल कानूनों को वापस लेने से खत्म नहीं होगा आंदोलन

बहरहाल, अब जबकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कानूनों को वापस लेने की घोषणा कर दी है, किसान संगठनों ने हालांकि इसका स्वागत किया है। परंतु, अभी भी वे आंदोलन खत्म करने को तैयार नहीं हैं। किसान नेता गुरनाम सिंह चढूनी ने ट्वीटर पर जारी अपने बयान में कहा है कि “आंदोलन में शहीद हुए किसान साथियों को श्रद्धांजलि और आंदोलनकारी किसान साथियों के संघर्ष को सलाम। आपकी एकता और कड़े आंदोलन के आगे दुनिया के सबसे हठी आदमी को झुकना पड़ा और अगला फ़ैसला संयुक्त किसान मोर्चा की मीटिंग में लिया जाएगा।” वहीं भारतीय किसान यूनियन के नेता राकेश टिकैत ने ट्वीटर पर जारी अपने बयान में काह है कि “आंदोलन तत्काल वापस नहीं होगा, हम उस दिन का इंतजार करेंगे जब कृषि कानूनों को संसद में रद्द किया जाएगा। सरकार एमएसपी के साथ-साथ किसानों के दूसरे मुद्दों पर भी बातचीत करे।”

गाजीपुर बार्डर पर पिछले एक साल से आंदोलरत लखीमपुर खीरी के किसान बलविंदर सिंह ने फारवर्ड प्रेस से बातचीत में कहा कि उन्हें प्रधानमंत्री की घोषणा पर विश्वास नहीं है। यह सरकार जुमलाें की सरकार है। तो जबतक सबकुछ लिखित में नहीं हो जाता है, तबतक किसान आंदोलन खत्म नहीं होग। उन्होंने यह भी कहा कि लखीमपुर खीरी में हमारे किसानों पर गाड़ी चढ़ा दी गयी। अबतक हमारे सात सौ किसान बेमौत मारे गए। सरकार को इसका जवाब देना चाहिए।

गाजीपुर बार्डर पर आतिबाजी करते कुछ किसान

किसानों की नजर में यह चुनावी राजनीति, लेकिन नहीं मिलेगा भाजपा को लाभ

वहीं उत्तराखंड के किसान चौधरी विश्वजीत सिंह ने बताया कि “यह किसानों की जीत जरूर है, लेकिन अभी भी यह अधूरी है। यह जीत तो तब पूरी होगी जब भारत सरकार तीनों कानूनों को खत्म करने के लिए पुख्ता तौर पर कदम उठाएगी। सरकार बोलने को तो बहुत कुछ बोलती रहती है। साथ ही सरकार एमएसपी का कानून बनाना पड़ेगा। किसान आंदोलन के दौरान अबतक जितने लोगों के खिलाफ झूठे मुकदमे दर्ज किए गए हैं, उन्हें वापस लेने होंगे। इसके अलावा उन्हें बिजली की दरों के निर्धारण के लिए कानून बनाना होगा।”

प्रधानमंत्री का यह ऐलान राजनीतिक मजबूरियेां की वजह से भी है। इस बारे में जालंधर के किसान गुरबक्श सिंह ने कहा कि “पूरा देश नरेंद्र मोदी के चरित्र से वाकिफ है। अभी जबकि पंजाब, उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश में चुनाव हैं, सरकार कानूनों को वापस लेने को बाध्य हुई है। यदि चुनाव नहीं होते तो सरकार पीछे नहीं हटती। हालांकि जिस मंशा से नरेंद्र मोदी ने यह निर्णय लिया है, इसका कोई लाभ उन्हें नहीं मिलेगा। किसानों ने अपने उपर हुए जुल्म-सितम को अपनी आंखों से देखा है।”

 (संपादन : अनिल)


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