ऐसे थे के. नाथ

कंवल भारती बता रहे हैं दलित लेखक व पत्रकार के. नाथ के बारे में, जो दलित समाज के सवालों को लेकर हमेशा प्रतिबद्ध रहे

संस्मरण

कैलाश नाथ उर्फ के. नाथ 3 अक्टूबर, 1945 को कानपुर देहात के गाॅंव दुआरी में जनमे, 31 अक्टूबर 2003 को कानपुर नगर की सरकारी सेवा से निवृत हुए और 30 अक्टूबर 2021 को संसार-सेवा से निवृत हुए। अक्टूबर महीने का यह अद्भुत संयोग उनके साथ रहा। 

2006 में जब के. नाथ मेरे बड़े पुत्र के विवाह में शरीक होने के लिए रामपुर आए, तो मैंने अपनी पत्नी से उनका परिचय कराते हुए कहा, “विमला, यह के. नाथ हैं और यह इनकी पत्नी रानी नाथ।” उन्होंने मेरी पत्नी को नमस्कार किया, पर मैंने देखा कि उनके चेहरे पर एक दुख की रेखा खिंच गई थी। बाद में मुझे याद आया, विमला उनकी पहली पत्नी का नाम था, जिसने बहुत ही गरीबी और अभावों में उनके साथ संघर्ष के दिन गुजारे थे। उन्होंने अपनी आत्मकथा ‘तिरस्कार’ में लिखा है, “रेनू मेरी बेटी, विमला और मेरे बीच एक ऐसी ममता लेकर आई थी कि इतने गरीब होकर भी वह मुझे अमूल्य निधि लगती थी। मैं आलू बेचता, विमला चादर में रेनू को लपेटे धूप में बैठी रहती। गरीबी के कारण झगड़ा होता रहता था। कुछ दिन बाद नेहरू नगर में दूसरा घर लिया (किराए पर)। बिल्कुल गिरा हुआ मकान, कच्ची मिट्टी की दीवारों से नोना गिर रहा था। पीछे गन्दी गली थी। वहीं से निकलने का रास्ता था। गली के लोग शौच करते थे। सुअरों का बसेरा था। यहीं दूसरी बेटी रंजना का जन्म हुआ। उसके जन्म के बाद बिल्हौर तहसील चला गया। एक सुनार के मकान में रहा। उसमें काला नाग रहता था। वहाॅं से भागकर अजीज मुसलमान के घर रहा। वहीं राहुल का जन्म एक दुछत्ती में हुआ। छोटी सी कोठरी, दो बच्चे पहले से और राहुल। यहीं विमला मानसिक रोगी हो गई।” (पृष्ठ 90-91) ऐसी ही परेशानी में मैंने और मेरी पत्नी विमला ने भी लखनऊ में संघर्ष के दिन गुजारे थे। वे बहुत बुरे दिन थे, जिन्हें याद करने में भी अब बहुत तकलीफ होती है। 

के. नाथ की दूसरी पत्नी रानी नाथ जब तक जियीं, हमेशा उनके साथ रहीं, उनके हर फैसले में वह उनके साथ रहती थीं, यहाॅं तक कि यात्राएं भी वे साथ-साथ करते थे। के. नाथ से मेरी पहली मुलाकात कब, कहाॅं और कैसे हुई, यह याद नहीं आ रहा है। लेकिन इस बात का रिकार्ड मौजूद है कि उनके निमंत्रण पर मैं तीन बार कानपुर गया था। यह रिकार्ड उन दिनों के अखबारों की कतरनों में मिला। इन तीनों यात्राओं का वर्ष 1999 था। पहली बार के. नाथ ने मुझे मुख्य वक्ता के रूप में 21 फरवरी 1999 को एक सेमिनार में बुलाया था, जिसका विषय था– ‘धर्मान्तरण क्यों?’ यह सेमिनार ‘बौद्ध उपासक संघ’ की ओर से, जिसके वह कानपुर शाखा के अध्यक्ष थे, ईदगाह चौराहे पर सम्पन्न हुआ था। इस सेमिनार की अध्यक्षता एम. एल. आजाद ने की थी और उसका संचालन स्वयं के. नाथ ने किया था। दूसरे दिन के अखबारों में मेरा मुख्य वक्तव्य इस शीर्षक से छपा– ‘धर्मान्तरण से राष्ट्र को नहीं, वर्णव्यवस्था को खतरा।’ उसी दिन, सेमिनार की समाप्ति के बाद, मैं लखनऊ चला गया था, इसका उल्लेख स्वयं के. नाथ ने ‘तिरस्कार’ में किया है। (पृष्ठ 69)  

दलित लेखक व पत्रकार के. नाथ

दूसरी बार मैं उनके निमंत्रण पर 21 मई, 1999 को कानपुर गया था। उस रात उन्होंने मुझे अपने शास्त्राी नगर स्थित सरकारी आवास टी-2/224 में ठहराया था। दूसरे दिन 22 मई को बिरहाना रोड पर खत्री धर्मशाला में उनकी किताब ‘मेरे गाॅंव का कुआं’ के विमोचन का कार्यक्रम था। उस दिन मौसम का मिजाज बिगड़ा हुआ था। जब के. नाथ मुझे लेकर धर्मशाला पहुॅंचे, तो देखा कि वहाॅं दस-पाॅंच लोग ही मौजूद थे, एक-दो पत्रकार भी आ गए थे। के. नाथ ने कुछ देर कुछ और लोगों के आने का इंतजार किया, पर जब कोई नहीं आया, तो कार्यक्रम शुरू करा दिया। एक तखत पर दरी बिछाकर मंच बनाया गया। श्रोताओं के लिए पड़ी कुर्सियों पर गिनती के दस लोग भी नहीं थे। अध्यक्षता ‘खत्री-गौरव’ पत्रिका के संपादक श्रीकृष्ण माधव खत्री ने की और मेरे द्वारा ‘मेरे गाॅंव का कुआं’ किताब का पैकेट खुलवाकर विमोचन करवा दिया गया। मैंने कुछ मिनट किताब के बारे में बताया, जिसे मैं, पहले ही मिलने के कारण, पढ़ चुका था। इसके बाद खत्री जी ने के. नाथ के बारे में कुछ चर्चा की, जिसमें उन्होंने बताया कि वह दलितों के प्रति इतने संवेदनशील हैं कि उनकी समस्याओं को लेकर हमेशा आन्दोलन-रत रहते हैं। यह सब आधे घंटे में ही खत्म हो गया।

तीसरी बार के. नाथ ने कानपुर में 10 अक्टूबर 1999 को दलित साहित्यकार सम्मेलन का आयोजन कराया। इस सम्मेलन का मुख्य वक्ता भी उन्होंने मुझे ही बनाया था, जबकि अध्यक्षता के लिए दिल्ली से वरिष्ठ आंबेडकरवादी चिंतक भगवान दास जी को बुलवाया था। संयोग से भगवान दास जी दिल्ली से और मैं रामपुर से चलकर, 9 अक्टूबर की रात में ही कानपुर पहुॅंच गए थे। वहां जाकर पता चला कि जिस बृजेन्द्र स्वरूप पार्क के मैदान में सम्मेलन का आयोजन होना था, वहाॅं आसाराम बापू (जो अब जेल में हैं) का प्रवचन-कार्यव्रफम चल रहा था। इससे कार्यक्रम में बाधा आ रही थी, जिसकी वजह से के. नाथ बहुत परेशान थे। उस समय कुछ प्रभावशाली लोग उनके सहयोगी थे, जिससे समस्या का समाधन निकाल लिया गया। आधे मैदान में सम्मेलन का पंडाल लगा दिया गया। आधे में हिन्दुत्व का प्रचार बाकायदा जारी रहा। के. नाथ ने हमारे ठहरने की व्यवस्था कानपुर के गैन्जेस क्लब में एक रूम बुक कराकर की हुई थी। उसी में मैं और भगवान दास जी उस रात रहे। भगवान दास जी के साथ इतने निकट रहने का यह मेरा पहला अवसर था। उनसे ढेर सारी बातें हुईं, जिसने मुझे काफी उर्जावान किया था। सम्मेलन दिन-भर चला। मंच पर मेरे और भगवानदास जी के अलावा हरी किशन सन्तोषी और एक बौद्ध भिक्षु भी उपस्थित थे। मुझे यह साहित्यकार सम्मेलन बिल्कुल भी नहीं लग रहा था, उसका कुछ भी माहौल साहित्य वाला नहीं था। वह पूरी तरह एक राजनीतिक आयोजन था। उसमें दलित-पिछड़ी जातियों के लोगों की बेतरतीब भीड़ थी। वहां गरीब लड़कियों को पीतल के कलश, विधवा स्त्रिायों को साड़ियाॅं और बूढ़ों को कुर्ता-अंगोछा दान किया जा रहा था। सारी भीड़ इसी दान के लालच में आई हुई थी, जिसे साहित्य या धर्म की चर्चा से कोई लगाव नहीं था। भीड़ में छीना-झपटी थी और चीखने-चिल्लाने का शोर मचा हुआ था। दान-कार्यक्रम के बाद जब मेरा वक्तव्य हुआ, तो मैं यह कहे बिना नहीं रह सका कि दलित समाज की जैसी दयनीय स्थिति मैं यहाॅं देख रहा हूॅं, वैसी अन्य समाज की नहीं हो सकती। इसी मैदान के दूसरे हिस्से में आसाराम बापू का प्रवचन सुनने के लिए दूसरे समाजों की भीड़ उमड़ी पड़ रही है। वहाॅं धर्म की अफीम देकर लोगों को सुलाया जा रहा है, जिसकी वजह से आज दलित समाज की यह स्थिति हो गई है कि वे छोटे से उपहार के लिए भी छीना-झपटी कर रहे हैं। 

अन्त में के. नाथ ने मुझे और भगवान दास जी को भी चाॅंदी की परत वाली तश्तरी और बुद्ध की प्रतिमा देकर तथा शॉल ओढ़ाकर सम्मानित किया।

के. नाथ लेखक कम और सामाजिक कार्यकर्ता ज्यादा थे। नौकरी के साथ ही उनका भूख-हड़ताल पर बैठना, धरना देना, प्रदर्शन करना और जुलूस निकालना भी चलता रहता था। जाहिर है कि शासन-प्रशासन में ऐसे लोगों को, खासकर वह व्यक्ति अगर दलित हो, अच्छा नहीं समझा जाता। के. नाथ को भी दलित के रूप में अपने एक्टीविज्म का खमियाजा भुगतना पड़ा। वह नौकरी से निकाले गए, परिवार चलाने के लिए दर-दर भटके, कभी सब्जियां बेचीं, कभी किसी के साथ रहकर हैल्परी की। किसी तरह कुछ दलित अधिकारियों की दया से वह बहाल भी हुए। पर वह जिस मिट्टी से बने थे, वह बदलना नहीं जानती थी। उनका एक्टीविज्म बन्द नहीं हुआ, बल्कि सेवा से मुक्त होने के बाद और भी जोर से चला। वह एक नहीं, कई संगठनों के बैनरों के तले आन्दोलन-रत रहते थे। एक तरह से हम कह सकते हैं कि वह आन्दोलन-जीवी व्यक्ति थे। निःसन्देह, वह एक दलित लेखक के रूप में उभर रहे थे, पर उनका लेखन उन्हें किसी राष्ट्रीय मुकाम पर नहीं ले जा सका। उनके पास विचार थे, भावनाएं थीं, परन्तु उनको प्रस्तुत करने की कला नहीं थी। वह तूफान मेल की तरह कागज पर शब्दों को दौड़ाते थे, और भूल जाते थे कि लेखन में ठहरना भी होता है, तथ्यों पर विचार भी करना होता है। हालाॅंकि वह एक जोशीले और जजबाती व्यक्ति थे, लेकिन राष्ट्रीय और अकादमिक स्तर पर होने वाले सेमिनारों के लिए यह उपयुक्त योग्यता नहीं थी। इसलिए ऐसे सेमिनारों में वह नहीं बुलाए गए। 

उसके बाद के. नाथ से मेरी भेंट वर्ष 2000 में हुई, जब मैंने ‘माझी जनता’ का संपादन आरम्भ किया। उसका प्रवेशांक 28 मई 2000 को निकला। उसी दिन लखनऊ के दारुल शफा हाॅल में उसका विमोचन हुआ। इस अवसर पर मेरे द्वारा बुलाए गए लोगों में माता प्रसाद, एस. आर. दारापुरी, जयप्रकाश कर्दम, डा. तेज सिेंह, मुकेश मानस और रजनी तिलक के अलावा के. नाथ भी उपस्थित थे। के. नाथ अपनी पत्नी रानी नाथ के साथ आए थे। इस अवसर पर उनका जोशीला भाषण हुआ था, जिसके वह आदी थे। इसके बाद मैंने ‘माझी जनता’ में के. नाथ से लिखने के लिए कहा। मैं जानता था कि वह पत्रकारिता करते थे, इसलिए वह बहुत खुश हुए। लेखक अगर पत्रकार भी है, तो संवेदना के स्तर पर यह सोने में सुहागा है।

उन्होंने अपना पहला आलेख ‘पिछड़ी जातियों का दर्द’ लिखकर भेजा। यह एक विचारोत्तेजक लेख था, जिसमें लिखा था– “पिछड़ी जातियों के लोग हमारे टोले में आते थे, तो जो बात करने का ढंग सवर्ण हिन्दुओं का था, वही पिछड़ी जातियों का था। अछूतों के चबूतरे से दूर खड़े होकर बात करते थे। हिंदू शास्त्रों को पढ़ते थे, पर वर्णव्यवस्था के प्रति अज्ञान थे। अछूतों को शूद्र समझते थे। अपने को राजपूत-क्षत्रिय की श्रेणी में लाकर तिरस्कार का दर्द नहीं महसूस करते थे।” यह लेख मैंने ‘माझी जनता’ के अंक-5 में छापा था।

के. नाथ की दूसरी रिपोर्ट मुझे मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के दलित अधिकार सम्मेलन की मिली, जिसे कानपुर में प्रकाश करात और दलित लेखक भगवान दास ने सम्बोधित किया था। यह आलोचनात्मक रिपोर्ट थी। आम तौर पर पत्रकारिता में आलोचनात्मक रिपोर्ट अच्छी नहीं मानी जाती। पर जब साहित्य में आलोचना हो सकती है, तो पत्रकारिता में क्यों नहीं? पत्रकारिता में आलोचना की शुरूआत दलित पत्राकार ही कर सकता है। चूॅंकि मैं स्वयं आलोचक पत्रकार था, इसलिए के. नाथ की यह रिपोर्ट मुझे अच्छी लगी। यह रिपोर्ट ‘माझी जनता’ के अंक-9 में प्रकाशित हुई। 

इसके बाद उन्होंने अपनी तीसरी रिपोर्ट रामराज के (जो तब तक उदित राज नहीं बने थे) संविधन-बचाओ सम्मेलन के बारे में भेजी। यह भी आलोचनात्मक रिपोर्ट थी। इसे मैंने अंक-11 में छापा। उनकी चौथी रिपोर्ट, जो मुझे सबसे अच्छी लगी, और जिसका मैं यहाॅं जिक्र करना चाहूॅंगा, वह अंक– 20-21 में छपी थी। उसका शीर्षक था– ‘टुकड़ों में बॅंटा दलित आन्दोलन, जिस दिन एक हो जायेगा, भारत की धरती पर उसका राज होगा।’ यह लंबी रिपोर्ट थी, जिसे उन्होंने बिखरी हुईं दलित जातियों– वाल्मीकि, पासी, कंजर, मेघवाल, हेला, खटिक, आरकेटिया, गिहार, कोरी, धोबी, धनुक, कोली, शंखवार आदि के बारे में उनके बीच चल रहे आन्दोलनों और सामाजिक गतिशीलता का जिक्र करते हुए उनके नेताओं के साथ वार्ता और संवाद करके लिखा था। यह रिपोर्ट इसीलिए खास थी, क्योंकि इसमें अलग-अलग जातियों के लोगों के साक्षात्कार थे। इस रिपोर्ट के साथ के. नाथ ने उन सभी लोगों के फोटो भी भेजे थे, जिनके उन्होंने साक्षात्कार लिए थे। 

‘माझी जनता’ में कुछ और लेख भी उनके छपे। लेकिन ‘माझी जनता’ की उमर ज्यादा नहीं रही। तीस अंक निकालने के बाद आर्थिक कारणों से उसे मुझे बन्द करना पड़ा। मुझे अपनी नौकरी भी देखनी थी, इसलिए मैं उसके लिए समय देने की स्थिति में बिल्कुल नहीं था। अखबार के मालिक नागपुर में रहते थे। के. नाथ को जब मैंने ‘माझी जनता’ बन्द करने की सूचना दी, तो वह परेशान हो गए। वह चाहते थे कि ‘माझी जनता’ बन्द न हो। अतः वह तुरन्त नागपुर चले गए। वहाॅं उनकी ढोरे साहब से क्या वार्ता हुई, यह तो नहीं पता, पर लगभग एक महीने के बाद मुझे ‘माझी जनता’ के कानपुर-संस्करण की एक प्रति मिली, जिस पर के. नाथ और रानी नाथ दोनों के ही नाम संपादक के रूप में छपे थे। मुझे आश्चर्य नहीं हुआ, क्योंकि मैं जानता था कि ऐसा होना है। पर, दुख इस बात का हुआ कि उन्होंने ‘माझी जनता’ को कानपुर के सरकारी विभागों में व्याप्त भ्रष्टाचार के खिलाफ लिखने का साधन बना दिया था, उसमें साहित्य और विचार गायब हो गया था। 

2000 के दशक में इलाहाबाद के झूॅंसी में गोबिन्दवल्लभ पन्त सामाजिक विज्ञान संस्थान में प्रोफेसर बद्री नारायण तिवारी ने दलित संसाधन केन्द्र कायम किया था। इसी केन्द्र की ओर से उन्होंने 2008 में ‘मेरा लेखक मेरा गाॅंव’ श्रृंखला के अन्तर्गत कुछ दलित लेखकों के गाॅंव में जाकर ग्राम-सम्मेलन आयोजित किए थे। इसमें उन्होंने जौनपुर से माता प्रसाद, लखनऊ से इतिहासकार राजकुमार, इलाहाबाद से गुरुप्रसाद मदन, अलीगढ़ से ए. आर अकेला और कानपुर से के. नाथ को शामिल किया था। इन सम्मेलनों में व्याख्यान देने के लिए संस्थान ने मुझे भी आमंत्रित किया था। कुछ परिस्थितियों वश मैं गुरुप्रसाद मदन, ए. आर अकेला और के. नाथ पर केन्द्रित ग्राम-सम्मेलनों में नहीं जा सका था। पर, इतिहासकार राजकुमार और माता प्रसाद जी पर आयोजित कार्यक्रमों में मैं उपस्थित था। शायद पहला सम्मेलन इतिहासकार राजकुमार पर ही लखनऊ में हुआ था। उस सम्मेलन में के. नाथ भी अपनी पत्नी रानी नाथ के साथ मौजूद थे। मैं इतिहासकार राजकुमार के बारे में कुछ नहीं जानता था और न मैंने उससे पहले उनका नाम सुना था। मैं इसी असमंजस में था कि क्या बोलुॅंगा? इसी बीच के. नाथ को मंच पर बुलाया गया। मैं आश्चर्यचकित रह गया, जब उन्होंने अपने भाषण में मेरी प्रशंसा के पुल बाॅंधने शुरू कर दिए। उन्होंने यहाॅं तक कह दिया कि वह कॅंवल भारती की वजह से ही आज इस मंच पर हैं। “कॅंवल भारती ने ही मुझे पहली बार माझी जनता में छापा और मुझे लेखक बनाया। मैं उन्हीं के लेखों और किताबों को पढ़कर लेखन में आया।” सभागार में सभी लोग के. नाथ को सुन रहे थे और कुछ लोग, जो मुझे पहचानते थे, मुझे भी देख रहे थे। मुझे अब अपने भाषण का विषय मिल गया था। मैंने के. नाथ के जोश, अध्ययन, लगन, मिशन की तारीफ की और लगातार आगे बढ़ने के लिए शुभकामनाएं दीं। मैं इतिहासकार राजकुमार पर कुछ नहीं बोला। 

के. नाथ की आर्थिक स्थिति मजबूत नहीं थी, यह मैं जानता था। एक बार उन्होंने मुझे फोन करके कहा, “क्या आप मुझे 14 अप्रैल के लिए अपनी किताबें बेचने के लिए उधार दे सकते हैं?” मैंने कहा, “जरूर, आप आ जाइए।” मेरे अपने प्रकाशन से छपी मेरी बहुत सी किताबें थीं, जिन्हें आसपास के विक्रेता मेरे घर से आकर ले जाते थे। इसके बावजूद काफी किताबें विकय होने से बच गईं थीं। मेरे लिए अच्छा ही थी कि किसी तरह बाकी किताबें यहाॅं से निकलें। यह 2008 की बात है। के. नाथ 8 अप्रैल को रामपुर आए। इस बार वह अकेले ही थे, रानी उनके साथ नहीं थीं। वह ज्यादा नहीं, लगभग तीन हजार रुपए की किताबें ले गए। सभी पेपर बैक थीं। 33 प्रतिशत छूट के साथ बिल काटा गया था। इस बात को सालों हो गए। न मैंने उनसे पैसे माॅंगे और न उन्होंने भिजवाए। 

लेकिन, इस बीच उनसे मिलना-जुलना होता रहा। झूॅंसी में ही संस्थान के कई कार्यक्रमों में के. नाथ से मिलना हुआ। मैंने अनुभव किया कि वह दलित आन्दोलन और डा. आंबेडकर के मिशन के लिए समर्पित और जजबाती व्यक्ति थे। उनकी सबसे बड़ी विशेषता थी कि वह सहयोगी स्वभाव के थे। जिन दिनों मैं स्वामी अछूतानन्द ‘हरिहर’ पर काम कर रहा था, तो सामग्री की खोज में मैंने कानपुर की यात्रा की और के. नाथ से मिला। वह उस दिन सारे समय मेरे साथ रहे और ऐसे कई लोगों से मुझे मिलवाया, जो स्वामीजी के सम्पर्क में रह चुके थे। उनके सहयोग से मुझे कई महत्वपूर्ण अभिलेख प्राप्त हुए। जो किताब मुझे मिल नहीं पा रही थी, वह भी उन्होंने अपने ही संग्रह से खोजकर उपलब्ध् कराई। उस दिन की एक घटना मैं नहीं भूल पाता। रात के 8 बजे थे। वह मुझे स्टेशन छोड़ने आए। जब स्टेशन आ गया, तो मैंने उनसे विदा ली। पर वह बोले, “अभी नहीं, जब तक गाड़ी नहीं आ जाती, और आप उसमें बैठ नहीं जाते, तब तक विदाई नहीं।” वह मेरे साथ ही प्लेटफार्म तक आए, जब गाड़ी आई, तो मेरे साथ-साथ खुद भी कोच में चढ़ गए और साथ ही बर्थ पर बैठ गए। बोले, “कुछ देर बैठना चाहता हूॅं, आपके साथ।” मैंने कहा, “जरूर।” गाड़ी शायद दस मिनट रुकती थी। दस मिनट बीत गए और ट्रेन चल दी। न मैंने ध्यान दिया और न उन्होंने। अचानक प्लेटफार्म पर मेरी नजर गई, जो पीछा छूटता नजर आया। मैं चीखा, “के. नाथ जी, गाड़ी चल दी, जल्दी उतरिए।” तब घबड़ाकर वह चलती गाड़ी से उतरे। खैर हुई कि ट्रेन ने रफ्तार नहीं पकड़ी थी, वरना पता नहीं क्या होता? 

ऐसे थे के. नाथ।

(संपादन : नवल/अनिल)


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