पसमांदा समाज की बात क्यों नहीं कर रहे हैं सेक्युलर दल?

‘पसमांदा डेमोक्रेसी’ के संपादक अब्दुल्ला मंसूर के मुताबिक, अशराफ़ वर्गों का वर्चस्व मस्जिदों, मदरसों और अखबार आदि अन्य संस्थाओं पर है। चुनाव में ये संस्थाएं अहम हो जाती हैं। अशराफ़ वर्ग को ही कोई भी पार्टी अपना टिकट क्यों न दे? कोई भी पार्टी उम्मीदवार के जीतने की संभावना के आधार पर ही टिकट देगी। असद शेख की रपट

अगले वर्ष के प्रारंभ में ही उत्तर प्रदेश में होनेवाले विधानसभा चुनाव को लेकर गहमागहमी शुरू हो चुकी है। नए नए वादे और अनेकानेक दावों के साथ सभी राजनीतिक दल फिर से जनता के सामने हैं। इस क्रम में एक बड़ा सवाल सूबे के पसमांदा मुसलमानों का है, जिन्हें आकर्षित करने के लिए सत्तासीन भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने भी पहल शुरू की है। इस क्रम में केंद्र व राज्य सरकार के द्वारा कार्यक्रमों का आयोजन किया गया है। वहीं दूसरी ओर तथाकथित धर्मनिरपेक्ष दल हैं, जिन्हें पसमांदा मुसलमानों का वोट अबतक मिलता रहा है, वे खामोश हैं। ऐसे में क्या दलों नहीं पूछा जाना चाहिए कि आप पसमांदा समाज की बात क्यों नहीं कर रहे हैं?

दरअसल, समाजवादी (सपा) से लेकर बहुजन समाज पार्टी (बसपा) तक और कांग्रेस से लेकर राष्ट्रीय लोकदल (रालोद) तक पसमांदा समाज की समस्याओं का उल्लेख नहीं कर रही हैं। ऐसे में यह सवाल तो उठता ही है कि उनके मुद्दों व इनकी राजनीतिक चिंताओं में पसमांदा समाज क्यों नहीं हैं? भाजपा को हराने का हुंकार भरने वाले और सेक्युलर होने को अपनी ताकत बनानेवाले ये दल पसमांदा समाज की मौजूदा राजनीति स्थिति और उनके असल मुद्दों से अनभिज्ञ प्रतीत होती हैं। या फिर वे ऐसी राजनीति को बनाए रखने के लिए मानते हैं कि मुसलमानों का वोट उन्हें भाजपा को हराने के नाम पर आराम से मिल ही जायेगा तो असल मुद्दों पर बात क्यों की जाए?

इस संबंध में मेरठ ज़िलें की सिवाल खास विधानसभा क्षेत्र में रहने वाले पेशे से पत्रकार और पसमांदा समाज की भागीदारी पर विचार रखने वाले खालिद इक़बाल कहते हैं कि “जब भी आप उत्तर प्रदेश के परिप्रेक्ष्य में पसमांदा समाज की बात करते हैं तो वहां ये सभी मुद्दे सिर्फ हिन्दू-मुसलमान की राजनीति की भेंट चढ़ जाते हैं। तो फिर पसमांदा समाज की राजनीतिक भागीदारी या सामाजिक भागीदारी की चर्चा इन राजनीतिक दलों द्वारा किया जाना बहुत दूर की बात हो जाती है। बल्कि ये मुस्लिमों के हित की बात करने के नाम पर इफ़्तार पार्टी तक सिमट चुकें नेता सिर्फ भाजपा को हराने की ज़िम्मेदारी पसमांदा समाज के कंधों पर डाल देते हैं।”

अगले वर्ष 2022 में होने वाले इस राजनीतिक समर से पहले यदि हम आंकड़ों पर गौर करें तो आबादी के हिसाब से देश की क़रीबन 14 फीसदी मुस्लिम आबादी में से 85 फीसदी मुस्लिम आबादी सिर्फ पसमांदा समाज की ही है। लेकिन भागीदारी के नाम पर, हिस्सेदारी के नाम पर यानी विधानसभा से लेकर लोकसभा में सदस्यों की संख्या पर न्यून ही है। 

ऑल इंडिया पसमांदा मुस्लिम महाज़ के राष्ट्रीय अध्यक्ष और पूर्व राज्यसभा सांसद अली अनवर अंसारी अपने एक लेख में लिखते हैं कि “क्या आज के भारत की यह एक तल्ख़ हकीकत नहीं है कि मुसलमानों के जान की कोई कीमत नहीं रही और न हीं उसके वोट का कोई महत्व रह गया। मगर ऐसा सिर्फ मुसलमानों और दूसरे अल्पसंख्यकों के साथ ही नहीं, बल्कि दलित, आदिवासी एक हद तक तमाम पिछड़े और गरीबों के जान माल, इज्जत आबरू भी महफूज नहीं है। महंगाई, बेरोजगारी, बीमारी-महामारी, बाढ़-सूखा, दंगा-फसाद में सबसे बुरा हाल तो सभी धर्मों के पसमांदा तबकों का ही होता है। इसलिए इन सबका इलाज सभी धर्मों के पसमांदा तबकों के बीच एकता ही है। धर्म आधारित राजनीति से तो देश और रसातल में ही चला जाएगा।”

85 फीसदी पसमांदा मुसलमानों पर 15 फीसदी अशराफ मुसलमानों का वर्चस्व

‘पसमांदा’ जिसका शाब्दिक अर्थ ‘पीछे छोड़ दिया गया’, आज ये समाज उस स्थिति में पहुंचता हुआ नजर आ रहा है, जहां इस समाज की राजनीतिक भागीदारी पर विचार और विमर्श तक भी नही किया जा रहा है। 

इस स्थिति के पीछे सबसे बड़े कारणों में एक वजह यह है कि पसमांदा समाज या उनकी राजनीति करने वाले दल या नेताओं की कमी नज़र आती है। वहीं एक समय था जब संसद से लेकर विधानसभा तक और दिल्ली, उत्तर प्रदेश और बिहार तक पसमांदा समाज के नेताओं की आवाज़ें गूंजा करती थीं। 

वेब पत्रिका ‘पसमांदा डेमोक्रेसी’ के संपादक अब्दुल्ला मंसूर कहते हैं कि “हर चुनाव में मुसलमान के नाम पर अशराफ़ ही चुने जाते हैं। सारी पार्टियों में मुसलमानों के नाम पर अशराफ़ मुसलमान काबिज़ हैं जो कि जातीय पूर्वाग्रहों के तहत पसमांदा का टिकट कटवा देते हैं। 

वे आगे कहते हैं कि “अशराफ़ वर्ग को ही कोई भी पार्टी अपना टिकट क्यों न दे? कोई भी पार्टी उम्मीदवार के जीतने की संभावना के आधार पर ही टिकट देगी। अशराफ़ वर्गों का वर्चस्व मस्जिदों, मदरसों और अखबार आदि अन्य संस्थाओं पर है। चुनाव में ये संस्थाएं अहम हो जाती हैं।” 

उनके मुताबिक “अभिव्यक्ति के खतरे न उठाने की वजह से पसमांदा आंदोलन हमेशा रक्षात्मक रहता है। आज भी पसमांदा कार्यकर्ता अपना वक़्त अशराफ़ वर्ग और उनके पसमांदा गुलामो के सवालों के जवाब देने में गुज़ारते रहते हैं। सारी ऊर्जा यही खर्च कर देने के बाद न वक़्त बचता है न शांत दिमाग जो आगे का रास्ता देख सके। इसका परिणाम यह होता है कि पसमांदा समाज आज भी अशराफ़ वर्ग का मानसिक गुलाम है। इसलिए ही आज मुस्लिम राजनीति पसमांदा समाज केंद्रित नही है।”

अब इन विचारों और वक्तव्यों को आधार बनाकर अगर अपने सवाल का जवाब हम ढूंढना चाहें तो वह यह है कि पसमांदा राजनीति करने वाले नेताओं को जमीनी स्तर पर मेहनत करते हुए फिर से एक पसमांदा राजनीति को केंद्र में लाना होगा। क्योंकि न सिर्फ ये ‘मुस्लिम राजनीति’ के मिथक को तोड़ेगा बल्कि सांप्रदायिक राजनीति कर रही भाजपा के लिए भी एक चुनौती भी जरूर बनेगा ।

लेकिन सवाल फिर भी यही है कि क्या ‘सेक्युलर दल’ ऐसा करने की हिम्मत दिखा पायेंगे? क्या पसमांदा राजनीति फिर राजनीतिक दलों के लिए मुद्दा बन पाएगी? क्या फिर से ‘मुसलमान’ न होकर मुद्दा पसमांदा हो पायेगा? जहां पर “जिसकी जितनी संख्या भारी उसकी उतनी भागीदारी” वाले विचार पर ज़मीनी कार्य किया जा सकेगा? ये सवाल उठाया जाना अति महत्वपूर्ण है कि क्यों आखिर भाजपा की बिछी बिसात पर राजनीति करते हुए ये सेक्युलर दल नज़र आ रहे हैं।

(संपादन : नवल)


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