सुरेन्द्र स्निग्ध : एक प्रतिबद्ध बहुजन पक्षकार

प्रो. सुरेन्द्र स्निग्ध की ख्याति एक कवि के रूप में ज्यादा चर्चाओं में रही। उनके काव्य स्वभाव का अनोखापन हाशिएये के चरित्रों, लोकजीवन और जातियता पर चोट करने वाली कविताओं के साथ ही उनकी प्रेम कविताओं में देखी जा सकती है और इन सबसे बढ़कर उनकी राजनीतिक कविताओं में। बता रहे हैं अरुण नारायण

प्रो. सुरेन्द्र स्निग्ध (5 जून, 1952 – 18 दिसंबर, 2017) की शख्सियत के कई पक्ष थे। एक प्रतिबद्ध संगठनकर्ता, संपादक, अध्यापक, प्रशासक, शोधकर्ता, कवि और उपन्यासकार के रूप में हिंदी में उनकी अच्छी-खासी लोकप्रियता रही। पूर्णिया के सुदूर गांव सिंघियान (भवानीपुर राजधाम) में 1950 में उन्होंने जन्म लिया। एक अति साधारण खेतिहर, पशुपालक ओबीसी परिवार से आने के कारण शिक्षा प्राप्ति में उन्हें बहुत कठिन संघर्षों से गुजरना पड़ा। बचपन में ही मां और पिता दोनों का साया उठ गया। फलस्वरूप बड़े भाई बालेश्वर यादव की देखरेख में उनकी पढ़ाई-लिखाई पूरी हुई। अपनी ‘खोज’ कविता में उन्होंने अपने इन दारुण दिनों के बारे में लिखा है– “अत्यंत निर्धन थे हम/घर में नहीं है किसी का फोटोग्राफ/न मां का/न पिता का/उनमें से अब किन्हीं का चेहरा नहीं है याद/ भागती हुई रेखाएं/साथ लेकर भाग गईं सब कुछ।” (‘संघर्ष के एस्ट्रोट्रर्फ पर’, पेज 145)

सुरेन्द्र स्निग्ध की आरंभिक शिक्षा अपने गांव और पड़ोस के शिक्षालयों से पूरी हुई। बड़े भाई ने आईएस.सी. में उनका नामांकन पटना साईंस काॅलेज में करवाया। लेकिन साईंस से अनिच्छा और शहरी जीवन में उनका दम घुटने लगा। फलस्वरूप पढ़ाई छोड़कर पूर्णिया लौट गए। कुछ दिनों तक बड़े उहापोह में रहे। फिर सीपीआई के प्रभाव में आए तो धीरे-धीरे सामान्य हुए। पार्टी की गतिविधियों में शाामिल होते रहे। पुनः पढ़ाई की सुध आई तो आर्ट्स संकाय में पटना काॅलेज में नामांकन लिया। यहां वर्षों टयूशन करवाया, स्लम इलाके में रहे, लेकिन अपनी पढ़ाई जारी रखी। पटना विश्वविद्यालय के एमए (हिंदी) टाॅपर रहे। एक छात्र के रूप में हमेशा उन्होंने बेहतर प्रदर्शन किया और अपने समय की साहित्यिक-सांस्कृतिक गतिविधियों से भी गहरे नाभिनाल रहे।

1980 के दशक में जब नव जनवादी सांस्कृतिक मोर्चा की नींव डाली गई तो सुरेन्द्र स्निग्ध राणा प्रताप और महेश्वर के प्रभाव में उसमें शामिल हो गए। इसके पहले वे प्रगतिशील लेखक संघ में सक्रिय थे। जन संस्कृति मंच (जसम) की आरंभिक कई बैठकें उनके घर पर हुईं। महेश्वर, राणा प्रताप और नचिकेता के साथ मिलकर एक दौर में साहित्यिक, सांस्कृतिक कार्यक्रमों की अनवरत गतिविधियां पटना में उन्होंने वर्षों चलाईं। इसमें दर्जनों लेखक संस्कृतिकर्मी विकसित हुए और पूरावक्ती कार्यकर्ता के रूप में जनवादी चेतना के प्रसार में लगे रहे। लेकिन कतिपय कारणों से यह स्थिति कमजोर हुई और जसम भी यथास्थिति और अकर्मण्यता में गर्क हुआ। स्निग्ध धीरे-धीरे अलग पड़ गए और अपने को साहित्य रचना में ही केंद्रित कर लिया।

उस दौर में उन्होंने कई पत्रिकाओं का भी संपादन किया, जिनमें ‘अयस्टर’ और ‘नई संस्कृति’ खासतौर से चर्चा में रही।‘नई संस्कृति’ का गोरख पांडेय पर केंद्रित अंक बेहद सराहनीय रहा। ‘अयस्टर’ के हिंदी संपादक के रूप में भी उन्होंने कई नई प्रतिभाओं को रेखांकित किया। बाद के दौर में ‘उन्नयन’ पत्रिका के बिहार की हिंदी कविता पर एकाग्र अंक का अतिथि संपादन किया। इसमें उनकी संपादकीय अंतर्दृष्टि और साहित्यिक विवेक की तीक्ष्णता को उद्धृत किया जा सकता है। जब वे बिहार नेशनल काॅलेज में अध्यापक हुए तो काॅलेज की विभागीय पत्रिका ‘भारती’ का संपादन किया, जो अपने दौर में खासी चर्चाओं में रही। इस मायने में उन्होंने नलिन विलोचन शर्मा की तरह ही विभाग से निकलनेवाली पत्रिकाओं की जो रुढ़ियां होती हैं, उससे उसे बाहर निकाला और अपने समय की जटिल चिंताओं के बरअक्स उसे ला खड़ा किया। अपने प्राध्यापकी के अंतिम दौर में दरभंगा हाउस के हिंदी छात्रों से उन्होंने ‘शब्दिता’ नाम की पत्रिका निकलवाई। इस पत्रिका की रचना से लेकर उसके डिजायन तक में वे पूरी तन्मयता से लगे रहे। और अंततः उस पत्रिका का प्रकाशन हुआ। उसमें भी आप देखेंगे कि एक जनवादी नजरिया, साहित्यिक सामाजिक पक्षधरता का गजब का संतुलन साधा गया है।

प्रो. सुरेन्द्र स्निग्ध (5 जून, 1952 – 18 दिसंबर, 2017)

काॅलेज मेें एक गंभीर, प्रतिबद्ध, रचनात्मक और छात्र हितैषी अध्यापक के रूप में उनकी लोकप्रियता रही। प्राध्यापक के रूप में उनकी पहली पोस्टिंग जमशेदपुर के टाटा काॅलेज में हुई। उसके बाद पटना विश्वविद्यालय के बी.एन. काॅलेज में उन्होंने ज्वाईन किया। यहां कई वर्षों तक कार्यरत रहे बाद में उनका तबादला दरभंगा हाउस में हो गया। दरभंगा हाउस के पी.जी. हेड के रूप में भी उन्होंने अपनी सेवाएं दीं और वहीं से अवकाश ग्रहण किया। वे उन जड़ और बज्रमूठ प्राध्यापकों में नहीं थे जो साहित्य की भूमिका भक्तिकाल, रीतिकाल और छायावाद तक ही सीमित होकर देखने के अभ्यासी थे। इस मामले में वे राजेंद्र यादव की इस बात को हमेशा उद्धृत करते कि “विश्वविद्यालय ज्ञान की कब्रगाह हैं। और वहां बैठे अध्यापक ज्ञान के दुश्मन।” 1990 के दशक से पहले तक विश्वविद्यालयों में पीएचडी सबसे ज्यादा भक्तिकाल, रीतिकाल और छायवाद पर ही होते थे, स्निग्ध जैसे अध्यापकों को यह श्रेय निश्चित रूप से जाएगा कि उन्होेंने इस जड़ और एकरस परिपार्टी से हमेशा लोहा लिया और समकालीन लेखन और अस्मितावादी लेखन पर केंद्रित शोध के लिए छात्रों को प्रोत्साहित किया। उन्होंने विश्वविद्यालय द्वारा निर्धारित हर काम को पूरे मनोयोग के साथ किया। इसी की नजीर है पटना विश्वविद्यालय का पत्रकारिता विभाग। जब इस विभाग का प्रभार सुरेन्द्र स्निग्ध को दिया गया तो उस समय तक यह विभाग बहुत अस्त-व्यस्त था। न कायदे की पढ़ाई न छात्रों को सही दिशा-निर्देश। अक्षम नेतृत्व के कारण विभाग बदनाम था। उन्होंने इसे गंभीर चुनौती के रूप में लिया और खुद गहरे सम्मिलित होकर स्वप्नशील और कल्पनाशील पत्रकारों को अपने विभाग से जोड़ा और छात्रों में एक रचनात्मक त्वरा पैदा की। वहां पुस्तकालय खोले गए। किताबें लाईं गईं और पढ़ने-लिखने का एक स्वस्थ वातावरण निर्मित होता गया। जिस कार्य के लिए स्निग्ध हो पुरस्कृत होना चाहिए था। लेकिन उनके बाद के प्रभारी ने उन्हें दंडित करने का षड्यंत्र रचा। आरोप लगाया गया कि पत्रकारिता विभाग में जो आलमारी गिफ्ट स्वरूप दिया गया है, उसमें वितीय अनियमितता की गई है। राजकमल प्रकाशन ने किताबें सप्लाई की थी और उसके जो कमीशन बने थे, वह प्रो. स्निग्ध को देना चाहता था। उन्होंने गलती अगर की थी तो यही कि उस पैसे की आलमारी खरीदकर राजकमल की ओर से पत्रकारिता विभाग को गिफ्ट में देने की बात कबूली थी। इस भलमनसाहत का पुरस्कार उन्हें अपमानित करके दिया गया। तत्कालीन प्रभारी ने इस पर उनके बारे में दुष्प्रचार किए। लेकिन ऐसे संकट में भी स्निग्ध हड़बड़ाए नहीं, उनका मुकाबला किया। उन्हें हमेशा अपमानित करने की घटनाएं होतीं रहीं। 

जिस माहौल में सुरेन्द्र स्निग्ध की परवरिश हुई थी, वहां उन्होंने देखी थी क्रूर जातीय, लैंगिक और वर्गीय खाई की अंतहीन निर्मम दुनिया। वे अति साधारण परिवार में जन्में और अपने संघर्षोे से समाज में एक प्रतिष्ठा अर्जित की। लेकिन यह उनका तात्कालिक मुकाम था। उनका स्थाई मकसद समानता पर आधारित समाज बनाने का था। जिसकी लड़ाई वे अपने साहित्य के माध्यम से और सांस्कृतिक स्तर पर भी अंत-अंत तक लड़ते रहे। स्त्री, दलित, आदिवासी और हाषिये के लोग सुरेन्द्र स्निग्ध के लेखन की केंद्रीय चिंता बनकर उभरे। उनके उपन्यास ‘छाड़न’ को जिन लोगों ने पढ़ा हो वे उनके इस दृष्टिकोण को भलीभांति जानते हैं। इस उपन्यास के माध्यम से उन्होंने औपनिवेशिक काल से लेकर आज तक के कोसी अंचल के लोमहर्षक खूनी संघर्ष की दास्तान अत्यंत ही मार्मिक रूप में रची है। उसे पढ़ते हुए आप सहज नहीं रह सकते। जिस तरह के अत्याचार वहां की प्रभु जातियों, अंग्रेजी और पितृसत्ता ने वहां की दलित दमित जाति समुदायों और स्त्रियों पर बरपाये – उसका बारीक निरूपण स्निग्ध के इस उपन्यास में हुआ है। ऐसी ही विषम स्थितियों में उस इलाके में नक्षत्र मालाकार जैसे रोबिनहुड पैदा हुए होंगे। ‘छाड़न’ में नक्षत्र एक छाया की तरह सर्वत्र मौजूद हैं। इसमें मृत्यु का एक अंतहीन सिलसिला चलता है जिसको पढ़ते हुए पाठक गहरी मायूसी और डर से भरे बिना नहीं रह सकते। अपनी मृत्यु से पहले समकालीन बिहार की विडंबना को रूपक बनाती एक महत्वपूर्ण उपन्यासिका भी उन्होंने रची जो संयोग से अभी साया नहीं हुई है।

सुरेेन्द्र स्निग्ध ने साहित्य की कई विधाओं में लेखन कार्य किया। नकेनवाद पर पटना विश्वविद्यालय से पी-एच.डी. की। तीन कविता संग्रहों की रचना की जिसमें ‘पके धान की गंध’, ‘कई-कई यात्राएं’ और ‘रचते गढ़ते’ मुख्य काव्य संग्रह हैं। इन्हीं संग्रह की रचनाओं से उन्होंने ‘अग्नि की इस लपट से कैसे बचाउं कोमल कविता’ ‘मां, काॅमरेड और दोस्त’ एवं ‘संघर्ष के एस्ट्रोटर्फ पर’ नामक कविता संग्रह साया किया। ‘सबद सबद बहुअंतरा’ और ‘जागत नींद न कीजै’ उनकी समसामयिक टिप्पणियों और फुटकर निबंधों की पुस्तक है। और ‘नई कविताः नया परिदृश्य’ उनकी आलोचना की पुस्तक है, जो नकेनवाद के मूल विचार को उसके गहरे सरोकार के साथ व्याख्यायित करती है। उन्होंने साहित्य अकादेमी दिल्ली के अनुरोध पर केसरी कुमार के अवदान को लेकर एक मोनोग्राफ भी लिखा, लेकिन पता नहीं क्यों अंततः वह किताब बिहार राष्ट्रभाषा परिषद से छपी।

प्रो. सुरेन्द्र स्निग्ध की ख्याति एक कवि के रूप में ज्यादा चर्चाओं में रही। उनके काव्य स्वभाव का अनोखापन हाशिएये के चरित्रों, लोकजीवन और जातियता पर चोट करने वाली कविताओं के साथ ही उनकी प्रेम कविताओं में देखी जा सकती है और इन सबसे बढ़कर उनकी राजनीतिक कविताओं में। उनकी एक अत्यंत लोकप्रिय कविता है, “जहां कोई दोस्त नहीं हो”। कवि लिखता है– “क्या रहना ऐसी जगह/जहां कोई मित्र यह नहीं पूछे/आपके किचन में आज क्या बन रहा है?/दूध नहीं है?/कोई बात नहीं/भाभी को कहिये/नींबू की चाय ही पिलायें।” (‘संघर्ष के स्ट्रोटर्फ पर’, पेज-62) 

इस कविता में हम मित्र की स्वभावगत विशेषता का तो वर्णन पाते ही हैं, लेेकिन महत्वपूर्ण है वह व्यापक दृष्टि जिसके कारण यह कविता जर्बदस्त राजनीतिक पक्षधरता को अंगीकार करते हुए अन्याय के खिलाफ खड़ा होने का पक्ष उ्घाटित करती है। इसी कविता में कवि आगे लिखता है, “ऐसी जगह क्या रहना/जहां के लोग/कुछ भी मतलब नहीं रखते/कि अन्याय के खिलाफ/लड़ने वाली जुझारू जनता/कहां मर कट रही है/कहां कर रही है विकसित अपना संघर्ष।” (‘संघर्ष के स्ट्रोटर्फ पर’ पेज-63)  हिंदी में शायद ही किसी कवि ने इतनी प्रखर काव्यात्मक सधाव के साथ ऐसी मुहावरेदार राजनीतिक कविता लिखी हो। ऐसी कविताएं वही कवि लिख सकता है जो आम बदहाल लोगों की तरह विषम जीवन जीने का अभ्यासी रहा हो। ऐसे ही क्षणों में यह चट्टानी एप्रोच जन्म लेता है। मंडल की आंधी आई तो अपने यहां के बहुत से मार्क्सवादी जातिवादी हो गए। लेकिन इन्होंने उसके नकारात्मक पक्ष के साथ सकारात्मक पक्ष की भी चर्चा की। जाहिर है इन्हें जातिवादी तक कहा गया। मार्क्सवादी दर्शन की ओर स्निग्ध का झुकाव अपने आसपास के व्यापक परिवेश की परिस्थितियों की वजह से हुआ। इसीलिए हम पाते हैं कि उनके पूरे साहित्य में मार्क्सवाद महज वैचारिक प्रेरणा का स्रोत भर नहीं, अपितु उनकी चेतना का अभिन्न हिस्सा बनकर आया है। यह अकारण नहीं जब वह कहते हैं, “मेरी कविता/आंधी बनकर दौड़ना चाहती है/ बिहार के उन गांवों में /जहां के मजदूर किसान रच रहे हैं नया इतिहास।” (‘संघर्ष के स्ट्रोटर्फ पर’ पेज-59) अपनी एक कविता में वे लिखते हैं, “हम तो पोंछना चाहते हैं आंसू/तुम्हारी तरह की/ हजारों मांओं की आंखों के आंसू/बोना चाहते हैं सपनों के बीज/लहलहा सके जिससे/मुक्ति की फसल/काट सकें जिसे आनेवाली संतान/तमाम सुखों और/समृद्धियों के साथ।” (‘संघर्ष के स्ट्रोटर्फ पर’,  पेज-68) स्निग्ध ने अपने अंतिम दौर के संग्रह में ‘नींद सीरिज’, ‘ब्राहमांड और तेरह जातिवादी’ कविताएं रचीं, लेकिन इनमें वे परिपक्वताएं आप नहीं पाएंगे, जो आरंभिक दोनों संग्रहों की कविताओं में हैं। हां यथास्थितिवाद और अकर्मण्यता पर चोट इन कविताओं में ज्यादा तल्खी भरे स्वर में की गई हैं।  

सुरेन्द्र स्निग्ध की कविताओं में स्त्रियों के कई रूप हैं। एक रूप जो कई कविताओं में आया है वह है प्रेमी के रूप में स्त्री को देखने की चेष्टा। यह पुरुषों का बहुत पारंपरिक आकर्षण रहा है और स्निग्ध की कई कविताओं में इस पक्ष को हम पाते हैं। स्त्री के साथ पितृसत्ता, सामंतवाद और हिन्दू धर्मव्यवस्था ने जो सलूक किया है उस पक्ष को वे वे अपनी कविताओं में बेहद मार्मिकता और सूक्ष्मता से सामने लाते हैं। ‘सुकनी की आंखों का सूरज’ स्निग्ध की एक ऐसी ही लंबी लेकिन बेहद मार्मिक कविता है जिसमें उन्होंने पूरी व्यवस्था किस तरह एक स्त्री के विपक्ष में खड़ी है इस बात को मुखर ढंग से अभिव्यक्त करते हैं। स्निग्ध की मृत्यु के बाद सहरसा की एक सांस्कृतिक टीम ने इस कविता का बड़ा ही प्रभावी मंचन किया। इसी मिजाज की उनकी एक और लंबी कविता ‘फटी बांहों का फ्रॉक वाली लड़की’ है, जिसमें वे उसकी बदहाली के कारणों की तफ्तीश करते समापन पंक्ति में लिखते हैं, “वर्षों से लगातार/दौड़ती नजर आती है/इसी प्लेटफार्म पर/कभी पकड़ नहीं पाती है/लोकल ट्रेन” (‘संघर्ष के स्ट्रोटर्फ पर’, पेज-126)

सुरेन्द्र स्निग्ध का उपन्यास हो या उनकी कविताएं। पता नहीं क्यों उनके यहां मृत्यु बार-बार एक अनिवार्यता बनकर आयी है। मृत्यु उनकी कई कविताओं में कई-कई रूपों में आयी है। कवि महेश्वर पर उन्होंने एक बहुत ही भावप्रवण और मार्मिक कविता लिखी है जो उनकी महत्वपूर्ण कविताओं में एक कही जा सकती है। यहां वे मृत्यु के बरअक्स महेश्वर को खड़ा करते हैं– “उनके लंबे अयाल/सूर्य की आगवानी में /बिछ गए थे रेड कार्पेट की तरह/मौत को भी धता बताते हुए/वह दौड़ता रहा/आंधी की तरह/तूफान की तरह/संघर्ष के एस्ट्रो टर्फ पर/ वह दौड़ता रहा।”(‘संघर्ष के एस्ट्रोटर्फ पर’– ‘मजबूत पुट्ठों वाला घोड़ा’, पेज 114-15)

इसी तरह गोरख पांडेय का स्मरण करते हुए स्निग्ध लिखते हैं, “मौत की ठंढ़ी गोद भी/नहीं बुझा सकी उसकी प्यास/फूलों से कटती हुई दिल्ली/बन गई उसका कब्रगाह।” (‘संघर्ष के एस्ट्रोटर्फ पर’– ‘प्रेमः एक दुर्गम पहाड़’, पेज 117)

जिस असमानता की गर्क होती दुनिया में प्रो. स्निग्ध ने होश संभाला था, उसे मिटाने का सपना वे अपने साहित्य में अंत-अंत तक बोते रहे। यह अन्यायपूर्ण समाज और उसका अभेद्य दुर्ग ध्वस्त हो, इसके लिए वे लेखक संगठन प्रलेस, जसम में जाते हैं, शिक्षक आंदोलन में जेल जाते हैं, पत्रिकाएं निकालते हैं फिर भी वे कटुताएं जब मिटती हुई नजर नहीं आती तो वे मायूस हो उठते हैं और अंततः इन सभी माध्यमों से उन्हें मोहभंग होता जाता है। उनके इस मोहभंग को उनकी ही एक कविता ‘डोंगी’ की इन पंक्तियों को पढ़ते हुए बेहतर ढंग से समझा जा सकता है–

‘किसी ने शायद ही समझा हो
मेरा दर्द
किसी ने शायद ही महसूस किया हो
मेरे अकेलापन का रहस्य।’
(‘संघर्ष के एस्ट्रोटर्फ पर’ पेज-88)

(संपादन : नवल/अनिल)


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