किसका घर और कैसी घर वापसी?

अगर घर त्यागने के कारण अभी भी यथावत है तो कोई भी उस समस्याग्रस्त घर में वापस क्यों लौटना चाहेगा? दूसरा सवाल यह है कि इस घर वापसी में लौटने वाले लोगों को घर के किस कोने में जगह मिलेगी? वे किस वर्ण और जाति, वर्ग, संप्रदाय के खांचे में फ़िट किए जायेंगे? आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत के नये संकल्प के आलोक में सवाल उठा रहे हैं भंवर मेघवंशी

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) प्रमुख मोहन भागवत ने चित्रकूट में हाल ही में आयोजित हिंदू एकता महाकुंभ में धर्म परिवर्तन कर अन्यान्य धर्मों में चले गये लोगों की घर वापसी करवाने का संकल्प लिया है। इस बात की बड़ी चर्चा हो रही है। संघ द्वारा पल्लवित और पोषित मीडिया इस संकल्प पर बहुत विमर्श गढ़ रहा है। इसे ऐसे प्रचारित किया जा रहा है कि जैसे हज़ारों हज़ार साल बाद कोई नवोन्मेष हुआ है और इस संकल्प के बाद घर वापस लौटने वालों की बाढ़ आ जाने वाली है। कुछ लोग इससे भ्रमित भी होते हैं। हालांकि जो दिग्भ्रमित हैं, वे तो भागवत जी और संघ के शाश्वत समर्थक ही है, किंतु जो क्षणिक भ्रमित होते हैं, चुनावी समय में भाजपा के समर्थक बन बैठते हैं। शायद इस प्रकार की बातें करने के पीछे का तात्कालिक उद्देश्य सत्ता में बैठे अपने स्वयंसेवकों के लिए कुर्सी तक पहुंचने की राह सुगम करना ही हो, दीर्घकालिक एजेंडा मुस्लिम और ईसाई धर्मावलम्बियों के प्रति विद्वेष फैलाना और उनके मध्य अंतर्विरोध उभारना भी है।

लेकिन भागवत जी, हिंदू धर्म उनके लिए घर जैसा अहसास नहीं कराता जो साधन विहीन हैं और जिनका स्थान वर्ण व जाति की असमान व्यवस्था में गड्ढे में हैं। यह आपके समवर्णियों और सजातीयों को ज़रूर घर लगेगा, जिनके पास मान सम्मान और ज़मीन जायदाद सब कुछ है, वे घर के मालिक हैं। जिनके पास न रहने को घर, न खेती और व्यापार वाणिज्य के लिए भूखंड और यहां तक कि मरने के बाद दफ़न अथवा दाह संस्कार तक के लिए जिनके पास एक इंच ज़मीन नहीं है, उनका कौन सा और कैसा घर? जिन घूमंतुओं को दर-दर भटकना पड़ रहा है, आदिवासियों को बार-बार विस्थापन झेलना पड़ रहा है, पूर्वोत्तर में बड़ी अल्पसंख्यक आबादी को नागरिकता के काग़ज़ों के नाम पर डिटेंशन सेंटरों में क़ैद करके रखा गया है, उनका घर कहां है? उनके ‘घर वापसी’ की उम्मीद कर रहे हैं? 

यह घर वापसी सिर्फ़ भारतीयता को नुक़सान पहुंचाने और अहिंदू धर्मों को लक्षित व लांछित करने का कुचक्र मात्र है। शायद आपको विषमतवादी कथित हिंदू घर छोड़ कर अन्यत्र जाकर समानता पा गए लोगों से दुश्मनी है, इसलिए उनको वापस लाकर उनको उसी ऊंच-नीच शोषण, अन्याय और अत्याचार की अंधी खाई में रखने की कोशिश की जा रही है। लेकिन क्या जो दलित, आदिवासी, घुमंतू व पिछड़े तबके आपका कथित घर छोड़ गये, क्या वे वापस लौट कर पुरातन व्यवस्था का हिस्सा बनना चाहेंगे? शायद कभी नहीं!

मोहन भागवत, आरएसएस प्रमुख

प्रश्न यह है कि यह घर वापसी का विशुद्ध राजनीतिक शिगूफ़ा इस वक्त ही क्यों छेड़ा गया है? लोग भागवत से जानना चाहते हैं कि आओ किसी एक विचार पर स्थिर क्यों नहीं हो पा रहे हैं? स्वयं इतने अधिक वैचारिक असमंजस में क्यों हैं? क्या कभी आप इस विषय पर भी सोचते-विचारते हैं अथवा नहीं? आप भारत के उच्च वर्णिय हिंदुओं के हितधारक समूह होकर भी स्वयं को राष्ट्रीय कहते हैं और खुद को ही राष्ट्र मानने लगते हैं। कभी आप सारे भारत के लोगों को हिंदू कहते है और मुसलमानों को मोहम्मदी हिंदू और क्रिश्च्यन को ख्रीस्ती हिंदू बताते है, तो कभी उन्हें विधर्मी बताकर उनकी बढ़ती आबादी को देश के लिए ख़तरा बताते हैं। फिर आप राष्ट्रवादी मुस्लिम मंच के मंच पर जा कर कह आते हैं कि भारत के तमाम लोगों का डीएनए एक है लगे हाथों आप लव जिहाद से हिंदू स्त्रियों की अस्मिता रक्षा की बातें भी करते हैं। सबको इसी घर का भी कहते हैं और घर वापसी का संकल्प भी लेते हैं? क्या आप जानबूझकर इस तरह की वैचारिक जलेबी बनाते हैं या वास्तव में खुद ही भ्रमित हैं? क्या आप अस्थिर वैचारिकी और मनोदशा निर्मित करने के अभियान पर है?

अब तक़रीबन आठ साल से दिल्ली के तख़्त पर संघ के स्वयंसेवक ही बैठे हैं, सत्ता प्रतिष्ठान पर जब आपके ही कार्यकर्ता क़ाबिज़ हैं तब तो घर वापसी का अभियान आगे बढ़ना चाहिए था। लेकिन ऐसा होता तो नज़र नहीं आता। जब इतनी अनुकूलता के बावजूद घर वापसी के लिए लोग उत्सुक नहीं दिखलाई पड़ रहे हैं तो कोई आत्म चिंतन की ज़रूरत आपको नहीं लगती है भागवत साहब?

चलिए, इन सब बातों को छोड़ दें और आपके घर वापसी के ताज़ा संकल्प पर लौटते हैं, जिसमें आपने यह संकल्प ग्रहण किया है– “मैं प्रतिज्ञा करता हूं कि किसी भी हिंदू भाई को हिंदू धर्म से विमुख नहीं होने दूंगा, जो भाई हिंदू धर्म छोड़कर चले गए, उनकी भी घर वापसी के लिए कार्य करूंगा। उन्हें परिवार का हिस्सा बनाऊंगा। मैं प्रतिज्ञा करता हूं कि हिंदू बहनों के सम्मान एवं शील की रक्षा के लिए मैं सर्वस्व अर्पण करूंगा। मैं जाति वर्ग, भाषा, पंथ के भेदभावों से ऊपर उठकर अपने हिंदू समाज को समरस, सशक्त और अभेद्य बनाने के लिए पूरी शक्ति से काम करूंगा।”

वैसे भी हिंदुत्ववादी ताक़तों का घर वापसी का अभियान जो विगत सवा सौ साल से चल रहा है, कभी शुद्धीकरण तो कभी धर्म परावर्तन तो कभी घर वापसी के नाम पर हिंदू धर्म छोड़ गए लोगों को वापस हिंदू बनाने का प्रयास जारी रहा है। आर्य समाज, हिंदू महासभा, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, विश्व हिंदू परिषद, वनवासी कल्याण परिषद, धर्म रक्षा समिति, बजरंग दल जैसे दर्जनों संगठन इस काम में ज़ोर शोर से जुटे हुए हैं। इसके बावजूद भी बड़े पैमाने पर घर वापसी के सफल कार्यक्रम कहीं भी नज़र नहीं आ रहे हैं। क्या यह अनायास है अथवा इसकी कोई ठोस वजह है, जिसके चलते लोग हिंदू धर्म की ओर लौटना नहीं चाह रहे हैं?

यह कहा जा सकता है कि पूर्व में आरएसएस विरोधी राजनीतिक शक्तियां सत्ता के केंद्र में रहीं। इसलिए उचित राज्याश्रय के अभाव में घर वापसी का कार्य समुचित स्वरूप नहीं ग्रहण कर पाया हो, लेकिन अब तक़रीबन आठ साल से दिल्ली के तख़्त पर संघ के स्वयंसेवक ही बैठे हैं, सत्ता प्रतिष्ठान पर जब आपके ही कार्यकर्ता क़ाबिज़ हैं तब तो घर वापसी का अभियान आगे बढ़ना चाहिए था। लेकिन ऐसा होता तो नज़र नहीं आता। जब इतनी अनुकूलता के बावजूद घर वापसी के लिए लोग उत्सुक नहीं दिखलाई पड़ रहे हैं तो कोई आत्म चिंतन की ज़रूरत आपको नहीं लगती है भागवत साहब?

असल बात तो यह हैं कि जिसे आप घर कह रहे हैं, वह हिंदू धर्म कभी उन लोगों का घर रहा ही नहीं, जो उसे छोड़ कर गये। आप लाख कहें कि लोग तलवार के बल पर मुसलमान बनाए गये या कि प्रलोभन से ईसाई बने हैं, लेकिन सच्चाई इससे इतर है। अधिकांश लोग बराबरी, सम्मान और मुक्ति की चाहत में हिंदू धर्म छोड़ कर गए और उन्होंने अपनी मर्ज़ी से मुस्लिम, ईसाई, सिख अथवा बौद्ध धर्म अपनाया है। उनके लिए हिंदू धर्म कभी अपना घर रहा ही नहीं, वह उनके लिए एक क़ैदखाना था, जिसे वे स्वेच्छा से मुक्त होकर अन्यत्र गये है। आज भी वह शेष बचे लोगों के लिए सामाजिक विषमता का यातना गृह बना हुआ है, जिससे मुक्त होने की तड़प बार-बार दिखती है। 

कुछ क्षणों के लिए आपके कहे अनुसार मान भी लें कि उनका घर था और इसमें वापसी करनी है तो यह सवाल बहुत लाज़िमी हो जाता है कि वे किन कारणों से और परिस्थितियों के चलते अपना घर छोड़ गए थे। मसलन, क्या उनके घर छोड़ने के कारणों का निदान हो चुका है? या वो सवाल अभी भी अनुत्तरित है? अगर घर त्यागने के कारण अभी भी यथावत है तो कोई भी उस समस्याग्रस्त घर में वापस क्यों लौटना चाहेगा? दूसरा सवाल यह है कि इस घर वापसी में लौटने वाले लोगों को घर के किस कोने में जगह मिलेगी? वे किस वर्ण और जाति, वर्ग, सम्प्रदाय के खांचे में फ़िट किए जायेंगे? क्या उनके लिए कोई समानता की नई व्यवस्था बनाई जायेगी या पुनः उनको उसी ऊँच-नीच वाली भेदभाव मूलक स्तरीकृत विषमता में समाहित होना पड़ेगा? क्या उनके लिए कोई नई जाति बनाई जाएगी या उनको वापस उन्हीं जातियों में रखा जायेगा, जिसके बंधन तोड़कर उनके पूर्वज चले गये थे? इस बारे में न आप कुछ बोलते हैं भागवत जी और न ही घर वापसी के अन्य प्रचारक कुछ बताते हैं? क्या दलित पुनः अछूत जातियों में जायेंगे और आदिवासी पुनः अपने मूल कबीलों में गिने जायेंगे? आपकी शपथ और संकल्प में घर वापसी का कोई स्पष्ट रोड मैप नहीं दिखलाई पड़ता है। एक आख़िरी सवाल यह है कि इस घर वापसी से संसाधनों का न्यायपूर्ण बंटवारा सुनिश्चत हो पायेगा? क्या घर लौट रहे लोगों के शिक्षा, चिकित्सा, भोजन, आवास और आजीविका के प्रश्न स्वतः हल हो जायेंगे अथवा उनको घर लौटकर भी इन्हीं बुनियादी ज़रूरत के सवालों से जूझते रहना होगा? अगर घर छोड़ने के कारणों, घर लौटने की वजहों और घर लौटने पर जीवन तथा गरिमा के प्रश्नों के उत्तर नहीं मिल पाते हैं तो यह घर वापसी महज़ एक राजनीतिक छलावा और स्टंट से अधिक कुछ भी नहीं।

वैसे भी विगत कुछ सालों से देश में दलितों, आदिवासियों, मुसलमानों और ईसाइयों सहित विभिन्न उत्पीड़ित जमातों के ज़बर्द्श्त दमन व शोषण के बावजूद भी कथित घर छोड़ने वालों की संख्या बढ़ती जा रही है। जबकि घर लौटने वालों की तादाद इक्का-दुक्का ही नज़र आ रही है। इसका बहुत साफ़ कारण यह है मोहन भागवत जी कि हम हाशिये के तबके के लोगों का कोई घर ही नहीं है। जब घर ही नहीं तो फिर वापसी कैसी? बस आप करते रहिये घर वापसी की नाटकबाज़ी। यह झुनझुना हमारे किसी काम का नहीं। इसे आप ही बजाइये।

(संपादन : नवल/अनिल)


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