राष्ट्रनायक डॉ.आंबेडकर, जिन्हें पीढ़ियां रखेंगीं याद

‘आजादी मुझे प्यारी है, लेकिन पहले सामाजिक आजादी चाहिए। मैं इस देश की राजनीतिक आजादी से ज्यादा जरुरी अपने करोड़ों अछूत भाइयों की सामाजिक आजादी समझता हूं। हम भी इंसान हैं, इंसान होने के नाते सभी नागरिक अधिकारों के हकदार हैं और जब तक सारे अधिकार हासिल नहीं कर लेते हैं, हमें चैन से नहीं बैठना चाहिए। हम अपने उचित मानवीय अधिकारों को खुद हासिल करेंगे, यही हमारा मकसद होना चाहिए।’ यही कहा था डॉ. आंबेडकर ने 28 जून, 1931 को अहमदाबाद की एक सभा को संबोधित करते हुए। बता रहे हैं आर. के. गौतम

डॉ. भीमराव आंबेडकर (14 अप्रैल, 1891 – 6 दिसंबर, 1956) पर विशेष

राष्ट्रनायक बाबा साहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर 20वीं सदी के एक ऐसे महापुरुष हैं, जिनकी प्रासंगिकता राष्ट्रीय ही नहीं अपितु अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर दिन-ब-दिन बढ़ती जा रही है। अभी हाल ही में हमने देखा कि सीएए, एनआरसी और किसानों से जुड़े मुद्दे को जो आंदोलन हुए हैं, उनमें लोग डॉ. आंबेडकर की तस्वीर के समक्ष भारतीय संविधान की प्रस्तावना पढ़ते हुए नजर आए। यह अकारण नहीं है। दरअसल, जिसके कारण डॉ. आंबेडकर आज तमाम वंचित-बहुजनों की प्रेरणा के स्रोत हैं, वह उनके द्वारा प्रारूप समिति के अध्यक्ष के रूप में डॉ. आंबेडकर द्वारा बनाया गया भारतीय संविधान एवं उनके द्वारा किए गए सामाजिक व राजनीतिक आंदोलन है। 

सर्वविदित है कि 29 अगस्त 1947 को डॉ. आंबेडकर संविधान प्रारूप समिति के अध्यक्ष चुने गए। अथक प्रयास से उन्होंने समता,स्वतंत्रता, बंधुता और न्याय आधारित भारतीय संविधान का निर्माण किया। वे संविधान के माध्यम से शिक्षा, संपत्ति, सम्मान एवं अधिकार से वंचित शोषितों, पिछड़ों, मजदूरों एवं महिलाओं को मुख्यधारा में लाकर एक मजबूत राष्ट्र का निर्माण करना चाहते थे, इसीलिए उन्होंने भारत के समस्त नागरिकों को अनुच्छेद 12 से 35 तक मूल अधिकार प्रदान किए तथा साथ ही सामाजिक एवं शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़े अनुसूचित जातियों जनजातियों एवं पिछड़े वर्गों के लिए अनुच्छेद 15-(4),16- (4), 330, 332, 335, 340, 341, 342 सहित कई अन्य अनुच्छेदों में भी इनके लिए अवसर व प्रतिनिधित्व की विशेष व्यवस्था का प्रावधान किया, जिससे अनुसूचित जाति, जनजाति, पिछड़े और महिलाएं समाज की मुख्यधारा में आ सकें और फलतः एक सशक्त राष्ट्र का निर्माण हो सके।

डॉ. आंबेडकर ने संविधान निर्माण के समय यह महसूस किया कि भारत अभी राष्ट्र नहीं है, बल्कि राष्ट्र बनने की प्रक्रिया में है। वस्तुतः देश एक भौगोलिक इकाई का नाम है और राज्य एक राजनीतिक इकाई। वहीं राष्ट्र उसे कह सकते हैं जहां के समस्त नागरिक प्रेम-सौहार्द्रपूर्वक समता आधारित जीवन जी रहे हों। भारत एक जाति प्रधान देश है। इसी कारण 25 नवम्बर 1949 को संविधान सभा में डॉ. आंबेडकर ने इस मुल्क को चेताया कि हमारी राजनैतिक आजादी तभी सार्थक होगी, जब इस देश के बहुसंख्यक दलित-बहुजनों व महिलाओं को सामाजिक, आर्थिक एवं मानवीय अधिकारों के साथ जीवन जीने की आजादी मिल जायेगी। परंतु, दुखद कि हमने अपने संविधानवेत्ता के सपनों को नजरअंदाज कर दिया। आजादी के 75 साल बाद भी संविधान में दिए गए समता के सिद्धांत और मौलिक अधिकारों से कोसों दूर हैं I देश में आज भी अनुसूचित जातियों, जनजातियों, पिछड़े वर्गों एवं महिलाओं पर जातीय दम्भ में चूर सामंती और शरारती तत्वों द्वारा प्रतिदिन हमला किया जाता है।

डॉ. भीमराव आंबेडकर (14 अप्रैल, 1891 – 6 दिसंबर, 1956)

अभी हाल ही में 26 नवंबर, 2021 को राजस्थान के जयपुर में अनुसूचित जाति के एक दूल्हे को अपनी शादी में घोड़ी पर चढ़ने के कारण उसे मारा गया और पूरे बरात पर पथराव किया गया। यह 21वीं सदी का का भारत है।हम अपने संविधान की मूलभावना के साथ आज भी खिलवाड़ कर रहे हैं। बीते 28 नवंबर, 2021 को सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश में 1991 में घटित ऑनर किलिंग के मामले को लेकर जातीय हिंसा पर तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि “आजादी के 75 वर्ष बाद भी नहीं खत्म हुआ जातिवाद। संविधान के समता के उद्देश्य को बाधित करती है जातीय कट्टरता।” शीर्ष अदालत की यह टिप्पणी सभी सरकारों और नागरिकों के लिए विचारणीय ही नहीं, अपितु चिन्तनीय भी है।

डॉ. आंबेडकर इन्हीं सब घटनाओं से निज़ात पाने के लिए राजनीतिक आजादी के साथ-साथ सामाजिक आजादी के भी प्रबल पक्षधर थे। उन्होंने 28 जून, 1931 को अहमदाबाद की एक सभा को संबोधित करते हुए कहा था– “आजादी मुझे प्यारी है, लेकिन पहले सामाजिक आजादी चाहिए। मैं इस देश की राजनीतिक आजादी से ज्यादा जरुरी अपने करोड़ों अछूत भाइयों की सामाजिक आजादी समझता हूं। हम भी इंसान हैं, इंसान होने के नाते सभी नागरिक अधिकारों के हकदार हैं और जब तक सारे अधिकार हासिल नहीं कर लेते हैं, हमें चैन से नहीं बैठना चाहिए। हम अपने उचित मानवीय अधिकारों को खुद हासिल करेंगे, यही हमारा मकसद होना चाहिए।” 

इसीलिए डॉ. आंबेडकर का स्पष्ट मानना रहा कि जातियों के साथ जनतंत्र नहीं रह सकता है, क्योंकि जातियां राष्ट्र निर्माण में बाधक हैं। वे इसका समूल नाशकर एक जातिविहीन समाज की स्थापना करना चाहते हैं।

उन्होंने हिंदू समाज व्यवस्था में सुधार के अनेक प्रयत्न किए, किंतु कुछ धर्म के ठेकेदारों ने उनकी एक न सुनी। अंततः उन्होंने 14 अक्टूबर, 1956 को अशोक धम्मविजयादशमी के दिन समता, स्वतंत्रता, बंधुता, न्याय, मैत्री, करुणा एवं अहिंसा आधारित बौद्ध धम्म स्वीकार कर लिया।

जहां स्त्री अधिकारों एवं उन्नति की बात हो, डॉ. आंबेडकर को याद किया जाना स्वभाविक ही है। उनका मानना था कि “मैं किसी समाज की प्रगति का अनुमान इस बात से लगाता हूं कि उस समाज की महिलाओं ने कितनी उन्नति की हैं।” उनकी दृष्टि में किसी भी समाज की उन्नति का मापदंड नारी भी है, मात्र पुरुष नहीं। 

डॉ. आंबेडकर स्वतंत्र भारत के प्रथम विधि मंत्री थे। देश का संविधान पूर्ण करने के बाद उन्होंने भारतीय महिलाओं को अधिकार दिलाने के लिए संयुक्त परिवार एवं महिलाओं की संपत्ति से संबंधित हिंदू कोड बिल संसद में प्रस्तुत किया। आर्य समाज, हिंदू महासभा एवं कई अन्य संकीर्णतावादी नेता भी इस बिल का प्रबल विरोध किये। उन्होंने इसे हिंदू रीति-रिवाजों तथा संस्कृति पर एक कुठाराघात बताया, जबकि डॉ.आंबेडकर ने स्पष्ट किया कि हिंदू कोड बिल का उद्देश्य हिंदू कानून में सुधार करके उसे एक निश्चित स्वरूप प्रदान करना है। किंतु भिन्न-भिन्न वर्गों और संप्रदायों के हितों का प्रतिनिधित्व करने वाले जनप्रतिनिधि अपने संकीर्णताओं से उबर नहीं पाए थे। इसी कारण यह बिल समग्र रूप से पारित नहीं हो सका। तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू एवं कांग्रेस पार्टी की मंशानुरूप बिल का सिर्फ एक भाग, जो कि विवाह और तलाक से संबंधित था, को 17 सितंबर को दुबारा पेश किया गया। किंतु भारी विरोध के कारण बिल पास नहीं हो सका। इसी कारण डॉ. आंबेडकर ने 27 सितंबर, 1951 को कानून मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया।

डॉ. आंबेडकर ने समाजशास्त्री, अर्थशास्त्री, राजनीतिज्ञ, कानूनविद, इतिहासकार एवं पत्रकार आदि के रूप में महान कार्य किया है। हम दलितों का नेता कहकर उनके व्यक्तित्व का मूल्यांकन कम कर देते हैं। उनके द्वारा बनाया गया संविधान समूचे राष्ट्र के लिए है। समस्त भारतीय महिलाओं के उन्नति के लिए उनके द्वारा लाया गया हिंदू कोड बिल के साथ ही आरबीआई, दामोदर घाटी पनबिजली प्रोजेक्ट, योजना आयोग, वित्त आयोग, चुनाव आयोग आदि कई संवैधानिक संस्थाओं के निर्माण में भी उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा।

निष्कर्षतः डॉ.आंबेडकर ने इस भारत को सच्चे अर्थों में एक जागृत राष्ट्र बनाने के लिए अनेकशः प्रयास, किए।किन्तु उनका समग्र मूल्यांकन किया जाना अभी शेष है।

(संपादन : नवल/अनिल)


फारवर्ड प्रेस वेब पोर्टल के अतिरिक्‍त बहुजन मुद्दों की पुस्‍तकों का प्रकाशक भी है। एफपी बुक्‍स के नाम से जारी होने वाली ये किताबें बहुजन (दलित, ओबीसी, आदिवासी, घुमंतु, पसमांदा समुदाय) तबकों के साहित्‍य, सस्‍क‍ृति व सामाजिक-राजनीति की व्‍यापक समस्‍याओं के साथ-साथ इसके सूक्ष्म पहलुओं को भी गहराई से उजागर करती हैं। एफपी बुक्‍स की सूची जानने अथवा किताबें मंगवाने के लिए संपर्क करें। मोबाइल : +917827427311, ईमेल : info@forwardmagazine.in

फारवर्ड प्रेस की किताबें किंडल पर प्रिंट की तुलना में सस्ते दामों पर उपलब्ध हैं। कृपया इन लिंकों पर देखें 

मिस कैथरीन मेयो की बहुचर्चित कृति : मदर इंडिया

बहुजन साहित्य की प्रस्तावना 

दलित पैंथर्स : एन ऑथरेटिव हिस्ट्री : लेखक : जेवी पवार 

महिषासुर एक जननायक’

महिषासुर : मिथक व परंपराए

जाति के प्रश्न पर कबी

चिंतन के जन सरोकार

About The Author

Reply