भारतीय मौलिक समाजवाद का दस्तावेज (चंद्रिका प्रसाद जिज्ञासु का साहित्य- पहला भाग)

चंद्रिका प्रसाद जिज्ञासु की पहली कृति ‘भारत के आदि-निवासियों की सभ्यता’ वर्ष 1937 में प्रकाशित हुई थी। इसमें उन्होंने शूद्र कौन थे, उनका अतीत, उनका साहित्य और दर्शन क्या था, इस विषय को लेकर इतिहास का अनुसंधान किया। पढ़ें, कंवल भारती की समीक्षा

[भारतीय सामाजिक व्यवस्था के बुनियादी सिद्धांतों में से एक जातिगत भेदभाव और छुआछूत तथा इसके धार्मिक संरक्षण को लेकर आवाजें उठती रही हैं। सत्य शोधन की इस परंपरा का आगाज जोतीराव फुले ने 19वीं सदी में किया। बीसवीं सदी में इस परंपरा को अनेक लोगों ने बढ़ाया, जिनमें मुख्य तौर पर डॉ. आंबेडकर का नाम भी शामिल है। चंद्रिका प्रसाद जिज्ञासु भी ऐसे ही सत्य शोधक थे। कंवल भारती उनकी किताबों की पुस्तकवार समीक्षा कर रहे हैं। आज पढ़ें चंद्रिका प्रसाद जिज्ञासु की पहली कृति ‘भारत के आदि-निवासियों की सभ्यता’ की समीक्षा, जिसका पहला संस्करण 1937 में प्रकाशित हुआ।]

चंद्रिका प्रसाद जिज्ञासु की पहली कृति – ‘भारत के आदि-निवासियों की सभ्यता’   

  • कंवल भारती

बीसवीं सदी की शुरुआत में ही दलित-पिछड़ी जातियों में अपने इतिहास को जानने की जिज्ञासा पैदा हो गई थी। यह खोज आर्य-सिद्धांत पर खत्म हुई। दलित विचारक इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि उनका इतिहास, साहित्य और दर्शन आर्य-अनार्यों के संघर्ष में निहित है। इसी सिद्धांत पर उत्तर प्रदेश में पिछड़ा वर्ग आंदोलन के प्रवर्तक स्वामी बोधानंद ने 1930 में ‘मूल भारतवासी और आर्य’ नाम से ग्रन्थ लिखा और उसी दशक में स्वामी अछूतानन्द ने ‘आदि हिन्दू’ आन्दोलन चलाया। उन्होंने शूद्र और अतिशूद्र जातियों को आदि हिन्दू माना, और द्विज हिन्दुओं को गैर-हिन्दू करार दिया। स्वामीजी ने भी आदिहिन्दू इतिहास पर अनेक नाटकों और काव्य-कृतियों की रचना की। चन्द्रिका प्रसाद जिज्ञासु उन्हीं के मित्र और स्वामी बोधानन्द के पटु शिष्य थे। स्वामी द्वय के सम्पर्क में आने के बाद जिज्ञासु के विचारों में आमूल-चूल परिवर्तन हुआ, जबकि वे इससे पूर्व आर्य समाज के प्रभाव में थे। जिज्ञासुजी ने मूलनिवासी सिद्धांत को आगे बढ़ाया, और साहित्य के माध्यम से भारतीय मौलिक समाजवाद की विचारधारा को स्थापित किया। इस विचारधारा की उनकी पहली कृति ‘भारत के आदि-निवासियों की सभ्यता’ है। यह कृति 1937 में प्रकाशित हुई थी। इसका चौथा संशोधित संस्करण 1956 में और पाॅंचवाॅं परिवर्द्धित संस्करण 1965 में प्रकाशित हुआ था। इसके पहले संस्करण की भूमिका से, जो भदन्त बोधानन्द ने लिखी थी, पता चलता है कि यह पुस्तक जिज्ञासुजी के वृहद ग्रन्थ ‘भारत के आदि-निवासी’ का केवल चौथा अध्याय है, जो अपने विषय की एक पूर्ण पुस्तक है। इस वृहद ग्रन्थ के तीन अध्याय ‘सृष्टि और मानव-समाज का विकास’ नाम से छपे, जिसका एक ही संस्करण प्रकाशित हुआ। यह पुस्तक अब उपलब्ध् नहीं है। ‘भारत के आदि-निवासियों की सभ्यता’ के संशोधित संस्करण के बारे में जिज्ञासुजी ने लिखा : “आजादी की तीसरी लड़ाई के आरम्भ होते ही कुछ ऐसी संकटपूर्ण स्थिति आई कि कार्यालय के राष्ट्रीय ही नहीं, सभी प्रकाशन बन्द हो गए। आज सन् 56 के आजाद भारत में यह प्रश्न उठ खड़ा हुआ कि अस्सी प्रतिशत से अधिक जनता सामाजिक, आर्थिक व शैक्षिक क्षेत्र में जातिगत रूप से पिछड़ी हुई क्यों हैं? इसे दबोचने वाले कौन हैं? और इन दबी-पिछड़ी जातियों की पहचान क्या है? दूसरी ओर इन दबी-पिछड़ी जातियों के पढ़े-लिखे लोग अब अपने पतनकारी शोषकों की कूटनीति समझने के लिए व्याकुल दिखाई देती हैं। ऐसी परिस्थिति में, आशा है, इस पुस्तक का यह नया संशोधित संस्करण उपयोगी सिद्ध होगा।” 

पुस्तक के आरम्भ में कविता की ये चार पंक्तियाॅं हैं–

आदि-निवासी बन्धु! लीजिए, यह निज गौरवमय इतिहास।
आर्य जाति ने छल-कौशल से, जिसे कर दिया था सब नाश।
पढ़िए इसे मिटाकर मन की सब दुर्बलता, भ्रम, तम, त्रास।
हृदय-कमल यह खिला करेगा, नवजीवन का दिव्य ‘प्रकाश’।

ये पंक्तियां बताती हैं कि जिज्ञासुजी ने इस पुस्तक में शूद्र कौन थे, उनका अतीत, उनका साहित्य और दर्शन क्या था, इस विषय को लेकर इतिहास का अनुसंधान किया है। यह इतिहास उन्हें आर्य-अनार्य संघर्ष में मिला। उन्होंने लिखा कि वेदों और अन्य ब्राह्मण-ग्रन्थों में आर्य-अनार्य संघर्ष और आर्य राजाओं के विजय-गीतों को पढ़कर यह प्रश्न उठता है कि वे लोग कौन थे, जिन्हें इन ग्रन्थों में असुर, दैत्य, दानव, दास आदि कहा गया है? उन्होंने इन्हीं ग्रन्थों के हवाले से बताया कि वे असुर थे, और शिव के उपासक थे, उनके नगर तथा किले पत्थरों के थे और उनके राज्य में धर्म चारों पैरों पर खड़ा था और मनुष्य दीर्घजीवी होते थे। 

इतने सुसभ्य और सुसंस्कृत असुर आदि अनार्यों का पतन कैसे हो गया? उनका साहित्य क्यों उपलब्ध् नहीं है? जिज्ञासु लिखते हैं : “उनकी उच्च कोटि की सभ्यता का जैसा पता हमें वेद-पुराणादि आर्य ब्राह्मणी ग्रन्थों से चलता है, उससे यह निर्णय नहीं किया जा सकता कि उनमें ग्रन्थ लिखने की योग्यता नहीं थी। यही समझ पड़ता है कि उनका सारा साहित्य और इतिहास नष्ट कर दिया गया। पराजित जातियों की सभ्यता और इतिहास को नष्ट कर देना अथवा उसके गौरवपूर्ण रूप को बदलकर उसे अपने अनुकूल बनाकर उस पर अपने महत्व की छाप लगा देना विजेता जातियां अपना कर्तव्य समझती रही हैं, और ब्राह्मण-पंडितों की तो यह परिपाटी-सी रही है कि वे लोग अपने मतलब की बातें उड़ाकर विरोधियों के साहित्य को प्रायः जला या डुबोकर नष्ट कर दिया करते थे।” इसमें सन्देह नहीं, आज हमें जो आजीवकों और चार्वाकों का साहित्य नहीं मिलता, और बुद्ध के वचनों में जो दुःख की अलौकिक व्याख्याएं मिलती हैं, उसका कारण यही है कि ब्राह्मणों ने विरोधी साहित्य को नष्ट किया था और जिसे वे नष्ट नहीं कर सके, उसे विकृत कर दिया था। उन्होंने केवल साहित्य का ही नाश और विकृतीकरण नहीं किया था, अपितु, उनका चरित्र-हनन भी किया था। ब्राह्मणी मत के अनुसार दैत्य और असुर आदि लोगों के वंशज आज इसलिए जीवित नहीं है, क्योंकि उनकी उत्पत्ति आर्यों से ही हुई थी, पर चूॅंकि वे धर्म-विरोधी और पापी थे, इसलिए उनका विनाश कर दिया गया था। किन्तु जिज्ञासु इसका खण्डन करते हैं। वे कहते हैं कि अगर यह मान भी लिया जाए कि उनका विनाश कर दिया गया था, तो ‘प्रश्न पैदा होता है कि जब परशुराम द्वारा 21 बार क्षत्रियों का विनाश करने के बाद भी राम, कृष्ण, युधिष्ठिर आदि अनेक सूर्यवंशी-चन्द्रवंशी क्षत्रियगण विद्यमान थे, तो क्या उन दैत्य, दानव, असुर आदि की संतान भी विनाश होने से बच न रही होगी?’ उन्होंने लिखा : “अवश्य बच रही होगी और विशेषज्ञों का मत है कि भारत के अस्सी प्रतिशत वर्णसंकर छूत-अछूत ‘शूद्र’ नामधरी प्राणी उन्हीं पुण्यकर्मा, सत्यनिष्ठ आर्य-पूर्व असुरादिकों की सन्तान हैं, जिनका ऐतिहासिक भाषा में द्रविड़, दामल-तामल और कोल आदि नाम भी रखा गया है।” जिज्ञासु का मत है कि ब्राह्मण-ग्रन्थों में इन शूद्रों को अनुलोम-प्रतिलोम क्रम से वर्णसंकर या दोगली सन्तान कहा गया है। वे इसे शूद्रों का घोर अपमान बताते हैं, और चुटकी लेते हैं : “इतनी विशाल संख्यावाली दोगली सन्तान को पैदा करके उसका हिसाब-किताब रखा और उसे बुरा भी बताया।”

“संख्या का आधार सरकारी जनगणना की रिपोर्ट है। मगर उसमें गड़बड़ी की गई। सन 1931 की जनगणना अंग्रेजी राज्य में हुई थी। उसमें धर्म, कुलदेवता, जाति का पुराना और नया नाम, पेशा, रीति-रिवाज, शिक्षा आदि 22 खाने बनाकर गणना का काम किया गया था, जो बहुत ही महत्वपूर्ण और आंखें खोलने वाला था। उसमें देश की जनता की सही तसवीर सामने आ गई थी।” 

जिज्ञासु का मत है कि ये भारत के आदि-मूल-निवासी लोग थे, जिनकी सभ्यता आर्यों से श्रेष्ठ थी। इसकी पुष्टि में वे ‘अमरकोश’ के एक श्लोक को उद्धृत करते हैं, जिसमें कहा गया है कि असुर, दैत्य, इन्द्र के शत्रु, दानव, शुक्र-शिष्य, दिति-सुत आदि देवताओं के पूर्ववर्ती तथा सुरों के द्वेषी थे। यथा–

असुरा दैत्य दैतेय दनुजेन्द्रारि दानवाः।
शुक्रशिष्याः दितिसुता पूर्वदेवा सुरद्विष।। (1-12)

इस श्लोक से, जिज्ञासु लिखते हैं, यह पता चलता है कि ये असुर, दैत्य, दनुज आदि वैदिक आर्य देवों के इस देश में आने से पहले ही यहाॅं मौजूद थे, और आर्यों के आगमन से प्रसन्न नहीं थे। वे इस देश के शासक थे, जिनके नाम, उनके अनुसार, राजा विक्रम, वैरोचन, मुचकुंद, भैरव, नंदक, अंधक, हिरण्याक्ष, हिरण्यकशिपु, बलि, कपिलासुर, कपिलभद्र, सहस्रबाहु कार्तवीर्य अर्जुन, त्रिपुर, जलंधर आदि। जिज्ञासु के अनुसार इनकी तीनों लोकों में गति थी। 

चंद्रिका प्रसाद जिज्ञासु की पहली कृति ‘भारत के आदि-निवासियों की सभ्यता’ का आवरण पृष्ठ

जिज्ञासु ने ब्रह्मपुराण (अध्याय 73) के हवाले से, अनार्य राजा बलि के बारे में लिखा है कि वह प्रजा-रक्षक और धर्मिक था, जिसके राज्य में अनावृष्टि और अधर्म का शब्द भी सुनाई न पड़ता था और न कहीं गुंडे-बदमाश थे। इससे देवता बेचैन हो गए और वे विष्णु के पास गए और उससे कहा, “आप ही बतावें, हम लोग दैत्यों के आगे कैसे सिर झुकाएं?” जिज्ञासु कहते हैं: “इससे सिद्ध हुआ कि आर्य देवताओं में धर्म-अधर्म के विवेक पर कोई बात नहीं थी। उनका सारा मामला जातिगत था। अन्यथा जब बलि राजा इतना न्यायी, धर्मवान और श्रेष्ठ था … तो ऐसे श्रेष्ठ राजा के आगे सिर झुकाने में देवता लोगों की क्या हानि थी? … बलि तो वैदिक काल का ही राजा था। साफ जाहिर है कि वैदिक काल में भी आर्य शब्द का अर्थ श्रेष्ठ नहीं था, वरन् आर्य जाति था।”

प्रश्न है कि उन प्रतापी अनार्य राजाओं की पराजय कैसे हुई? जिज्ञासु के अनुसार आर्यों के लिए उन्हें युद्ध में हराना आसान काम नहीं था। इसलिए उन्हें छल-कपट और षडयंत्र रचकर मारा गया, और उनका सारा राज्य हड़प लिया गया। महात्मा जोतीराव फुले ने ‘गुलामगिरी’ में इस संघर्ष का विस्तार से वर्णन किया है। जिज्ञासु के अनुसार दैत्यराज हिरण्याक्ष ने विश्व-विजय किया था। उसको विष्णु ने वाराह का अवतार लेकर मारा। हिरण्यकशिपु विष्णु का विरोधी था। उसे ऐसे जन्तु ने मारा, जो आधा शेर और आधा मनुष्य था। इसे भी विष्णु का अवतार बताया गया। विरोचन महाज्ञानी और दानी था। देवताओं ने ब्राह्मण का वेष बनाकर उससे उसकी आयु दान में मांग ली। बलि ने अपने पराक्रम से चढ़ाई करके आर्यों के स्वर्ग को जीत लिया था और देवराज इन्द्र स्वर्ग छोड़कर भाग गया था। वह भी महादानी था। एक छली वामन ब्राह्मण ने उसका सर्वस्व दान में छीन लिया था, बाद में उसे मार दिया था। इसी प्रकार, जिज्ञासु के अनुसार, तारकासुर और त्रिपुरासुरों का संहार किया गया। इससे, जिज्ञासु का निष्कर्ष है, साफ पता चलता है कि वैदिक आर्य देवता छली, कपटी, विद्वेषी और पापमय थे, जो अपने हित के लिए किसी भी वैभवशाली का सर्वनाश करने में संकोच नहीं करते थे। इस अध्याय का अन्त जिज्ञासु इन शब्दों के साथ करते हैं : “अतएव ब्राह्मणी स्मृतियों के लेखानुसार पूर्वोक्त अस्सी प्रतिशत प्राणियों को वर्णसंकर सन्तान मान लेने की अपेक्षा पुण्यवान दानव-सन्तान कहलाना कहीं अधिक गौरव-पूर्ण और महत्वशाली है।” 

अन्य महत्वपूर्ण साक्षियाॅं

जिज्ञासु ने लिखा है कि आज के करोड़ों वनवासी लोग वही हैं, जिन्हें ब्राह्मणों ने शहरों से निर्वासित कर वनों में खदेड़ दिया था। उनके अनुसार, ब्राह्मणों ने अनार्य राजाओं का विनाश करने के बाद वर्णव्यवस्था का राज्य स्थापित किया, जिसमें “ब्राह्मणों की इस व्यवस्था के विरुद्ध जिसने जबान खोली, उसे नाना प्रकार से पीड़ा और क्लेश पहुॅंचाकर राजशक्ति से उसका दमन किया गया।” उनके मतानुसार, “जो लोग आर्यों के प्रभुत्व और ब्राह्मणी विधि-विधानों को मानने से इनकार करते, उन्हें क्षत्रिय राजा समाज-बहिष्कृत करके बस्तियों से निकाल देते थे।… इस प्रकार ‘बहिष्कृत’ या ‘निर्वासित’ आदि-निवासियों में कितने ही सदैव के लिए वन-वासी हो गए और बस्तियों को लौटकर आ ही न सके, जैसे कि गोंड, कोल, भील, संताल, ओरावॅं, पणि, मुंडा, हो, आदि तथा जिन बहिष्कृत लोगों ने बस्तियों में रहने की प्रार्थना की, उन्हें अनेक शर्तों के साथ गाॅंव-बाहर बसने की इजाजत हुई और उनके लिए कड़े-से-कड़े परिश्रम के काम नियत किए गए।” जिज्ञासु के अनुसार, आर्य-द्विजातीय लोग इनसे जब चाहे बेगार लेते थे, जिसकी उजरत माॅंगने का भी कोई हक नहीं था। 

जिज्ञासु आगे कहते हैं कि आर्यों का प्रभुत्व स्थापित हो जाने के बाद ब्राह्मणों ने प्राचीन भाषाओं और प्राचीन साहित्य का विनाश करने के लिए अपनी संस्कृत भाषा बनाई, और सर्वसाधरण के लिए शिक्षा का द्वार बन्द कर दिया। उन्होंने लिखा कि ब्राह्मणों ने अपने विराधियों का सारा इतिहास मिटा दिया, जो हजारों वर्षों तक अतीत के गर्भ में दबा रहा। किन्तु सात समन्दर पार से आए यूरोपियन विद्वानों ने उसे खोजा निकाला और इस तरह अनार्य असुरों की महान सुसभ्यता और संस्कृति का इतिहास सामने आया। “उन्होंने अपनी जन-विज्ञान, भाषा-विज्ञान और भूगर्भ-शास्त्र आदि विद्याओं, पुराने खंडहरों की खुदाई तथा शिला-लेख, ताम्र-लेख व सिक्के आदि पुरानी वस्तुओं की ढूॅंढ़-खोज और पुरानी पुस्तकों के अंग्रेजी में अनुवाद व विधिवत उनके सूचीपत्र आदि तैयार करके, सबके तुलनात्मक अध्ययन द्वारा, भारत के सच्चे इतिहास का पता लगाने का भारी काम शुरू किया, जिससे ब्राह्मणों का हजारों बरसों से तैयार किया हुआ हवाई महल मटियामेट होने लगा।” 

इस संबंध में जिज्ञासु ने एक दिलचस्प घटना का उल्लेख किया है। “पुरातत्व-विभाग की खोज में सन 1795 ई. में प्राचीन ब्राह्मी लिपि के कुछ लेख मिले थे। उस समय उस लिपि को कोई पढ़ने वाला न था। मेजर बलफर्ड उनकी नकलें लेकर काशी आए और पंडितों से उनके पढ़ने की प्रार्थना की। पंडितों ने फौरन उन्हें पढ़कर बता दिया कि “ये पांडवों के लेख हैं। अज्ञातवास और वनवास के समय, जब वे वन-वन मारे-मारे फिरते थे। तब उन्होंने अपने साथियों की जानकारी के लिए, अज्ञात लिपि में ये लेख गुफाओं और शिलाओं पर खोद दिए थे। पंडितों ने बे-सिर-पैर का उनका अर्थ भी बता दिया और पुरानी अज्ञात लिपियों की एक पुस्तक भी दिखाकर खूब लंबी रकम ऐंठ ली।” इस प्रकार पश्चिमी विद्वानों को इतिहास की खोज में अनेक कठिनाइयों से गुजरना पड़ा, क्योंकि वे स्वयं भी इस देश की भीतरी बातों से परिचित न थे। इसलिए ब्राह्मणों ने इनके मार्ग में बाधाएं पैदा कीं, क्योंकि वे नहीं चाहते थे कि उनके पूर्वजों द्वारा किए गए शोषण तथा अन्यायों का उद्घाटन हो और सताए व दास बनाए हुए लोगों को सिर उठाकर चलने का मौका मिले। 

तीसरे और चौथे अध्यायों में जिज्ञासु ने जन-विज्ञानियों तथा भाषा-विज्ञानियों की परीक्षाओं के हवाले से भारत के आदिनिवासियों की पहिचान लिखी है। उनके अनुसार, जन-विज्ञानियों ने रंग के हिसाब से संसार के मनुष्यों को चार जातियों में बाॅंटा है– इथियोपिक, अमरीकन, मंगोलियन और काकेशियन। इस वर्गीकरण के अध्ययन के आधार पर विद्वानों के निष्कर्ष चौंकाने वाले हैं। जिज्ञासु ने संक्षेप में इन निष्कर्षों का उल्लेख किया है। उनके अनुसार, “आधुनिक भारतवासियों में केवल कश्मीर, पंजाब और राजपूताने में आर्य जाति के लोग हैं। इसके अतिरिक्त प्रायः समस्त भारतवर्ष में अनार्य द्रविड़ जाति के लोग फैले हुए हैं।” वे कहते हैं, “यह देश ही द्रविड़ों का है।” और “इतिहास लेखकों ने जिन्हें द्रविड़ लिखा है, उन्हें ही आर्य ब्राह्मणों ने अपने संस्कृत साहित्य में दैत्य, दानव, असुर, राक्षस, वानर तथा रीछ आदि लिखा है, एवं वेदों में उन्हीं को दस्यु और दास कहा गया है।”

भारत के आदिनिवासियों की भाषा क्या थी? इसे भाषा-विज्ञानियों बोल-चाल की प्राकृत भाषाओं के आधार पर जिज्ञासु ने बताया है कि “भाषा-विज्ञानियों के मत से द्रविड़ी भाषाएं संख्या में 13 हैं, जिनमें 4 मुख्य हैं, जो हैं– तमिल, तेलगू, मलयालम और कन्नड़। श्री योगेचन्द्र पाल के हवाले से उन्होंने लिखा कि भारत में सबसे पहले तमिल भाषा का प्रचार हुआ और संस्कृत साहित्य तामिल का अंश मात्र है। इस आधार से तमिल द्रविड़ों की भाषा है। पंडितों ने ‘पैशाची’ या ‘पिशाच’ भाषा का नाम दिया है। आगे उन्होंने मिश्रबंधुओं का मत व्यक्त किया है : “प्राकृत भाषा वैदिक से निकट है, संस्कृत से नहीं। प्राकृतलक्षणकार चार प्राकृत मानते हैं, प्राकृत, अपभ्रंश, पैशाचिकी और मागधी। अपभ्रंश में साहित्य अधिकता से है। यही भाषा बढ़कर समय पर हिन्दी हो गई। हिन्दी के मुख्य उपविभागों में मैथली, मगही, भोजपुरी, अवधी, वघेली, छत्तीसगढ़ी, उर्दू, राजपूतानी, ब्रजभाषा, कन्नौजी, बाॅंगरू, दक्षिणी, खड़ी बोली आदि भाषाएं हैं।” उन्होंने पुरुषोत्तम दास टंडन के मत से उद्धरण दिया है : “यदि हम हिन्दी भाषा की धरा पर उपर की ओर (विकास की ओर) चढ़ते जाएं, तो हमें संस्कृत का स्रोत कहीं नहीं मिलेगा, किन्तु अपभ्रंश, फिर प्राकृत और फिर मूल-प्राकृत तक हम पहुॅंच जायेंगे। संस्कृत स्वयं बहुत ऊंचे पर जाकर मूल प्राकृत से निकलती हुई एक धारा दिखाई पड़ेगी, जो बहुत दूर तक पृथक प्रबल वेग से बहती है और अन्त में ऐसे रेगिस्तान में पहुॅंच जाती है, जहाॅं उसका जल सर्वथा लुप्त तो नहीं हो जाता, किन्तु एक गहरे कुंड में गिरकर और इकट्ठा होकर आगे बढ़ने का सामर्थ्य खो बैठता है।” 

जिज्ञासु ने लिखा है कि संस्कृत का बहुत सा साहित्य प्राकृत भाषाओं के साहित्य से चोरी करके लिखा गया है। इस संंबंध में उन्होंने ‘कथा-सरित-सागर’ का दिलचस्प उदाहरण दिया है, जिसे कश्मीर के पंडित सोमदेव भट्ट ने महाकवि गुणाढ्य के पैशाची भाषा में लिखे गए ‘वृहत्कथा’ नामक ग्रन्थ से नकल करके तैयार किया था। कथा इस प्रकार है–

“गुणाढ्य अपने ग्रन्थ को लेकर राजा सातवाहन के पास गया, पर ब्राह्मणों के भड़काने पर राजा ने उसका तिरस्कार किया। तब गुणाढ्य अपने शिष्यों सहित वन में चला गया और कुंड खोद, उसमें आग जला, पृथ्वी को गुण-ग्राहक-हीन समझ, अपने महाकाव्य का एक-एक पन्ना, अन्तिम बार, जोर-जोर से पढ़कर कुंड की आग में डालने लगा। लेकिन वह काव्य इतना मधुर और मनोहर था कि उसे सुनने के लिए वन के सारे पशु-पक्षी दाना-पानी छोड़, महाकवि गुणाढ्य को घेरे बैठे रहते थे। इतने में राजा बीमार हो गया। बीमारी की जांच होने लगी। राजवैद्यों ने पता लगाया कि दूषित मांस खाने से राजा बीमार हुआ है। मांस की जांच होने से पता चला कि जिस वन के पशु-पक्षियों का शिकार होकर मांस आता है, उसमें कई साधु आए हैं, जो दिन-भर पशु-पक्षियों को ऐसी मधुर कथा सुनाते रहते हैं, जिसके कारण उन्होंने दाना-चारा छोड़ दिया है और रोया करते हैं। अधिक जांच होने पर पता चला कि वे साधु वही महाकवि गुणाढ्य और उनके शिष्य हैं, जिनका कि राजा ने तिरस्कार किया था।” 

जिज्ञासु आगे लिखते हैं कि राजा सातवाहन ब्राह्मणों की दुष्टता से क्षुब्ध् होकर महाकवि से अपना अपराध क्षमा कराने के लिए वन में गया। किन्तु जिस समय राजा वहां पहुंचा, महाकवि अपने सात लाख श्लोक आग में फूंक चुका था। शेष एक लाख श्लोक राजा ने जलने से बचा लिए। उन्हीं एक लाख श्लोकों के आधार पर संस्कृत में ‘कथा सरित सागर’ लिखा गया। महाकवि गुणाढ्य का पिशाच भाषा का मूल महाकाव्य लुप्त हो गया। जिज्ञासु कहते हैं कि इस कथानक से कलई खुल जाती है कि “दूसरों की उत्तम रचनाएॅं उड़ाकर अपना काव्य गढ़ लेना और फिर मूल रचना को नष्ट कर देना संस्कृत लेखकों का खास काम रहा है।”

जिज्ञासु का सारांश है कि “भारत की मूल भाषा को न वैदिक आर्य संस्कृत बना सके, न मुसलमान अरबी-फारसी और न अंग्रेज अंग्रेजी। सब अपने-अपने शब्द इसमें ठूंसते रहे और यह वैदिक, संस्कृत, अरबी, फारसी, अंग्रेजी आदि विदेशी शब्दों को आत्मसात करती रही। और अन्त में, हार मानकर, आजाद भारत की सरकार को भी, इसी हिन्दी (अर्थात भारत के आदि-निवासियों की भाषा) को ही भारत की राष्ट्र-भाषा स्वीकार करना पड़ा।”

जिज्ञासु ने पाॅंचवें अध्याय में पुरातत्व विभाग की खोजों का वर्णन किया है और तदनुसार भारत के आदिनिवासियों की सभ्यता और संस्कृति का दिग्दर्शन कराया है। इसकी पुष्टि उन्होंने छठे अध्याय में ऋग्वेद की साक्षियों से की है। उन्होंने लिखा कि “अब तक सारे संसार के पुराविदों की धारणा थी कि मानव-सभ्यता का जन्मस्थान मिस्र देश है, किन्तु पिछले दिनों भारतीय पुरातत्व विभाग ने पंजाब के मुलतान जिले के ‘हड़प्पा’ स्थान और सिंध् के लरकाना जिले के ‘मोहेनजोदरो’ स्थानों में जो खुदाई की गई है, उसमें मिली हुई चीजों ने इस धारणा को पलट दिया है।” इन चीजों के आधार पर “पुराविदों को यह मानने के लिए मजबूर होना पड़ा कि जिन लोगों ने ये चीजें बनाई हैं, उनकी सभ्यता वैदिक सभ्यता व मिस्र तथा यूनान की सभ्यता से भिन्न और पुरानी है।” मोहेनजोदरो की खुदाई का काम सर जाॅन मार्शल के नेतृत्व में हुई थी। जिज्ञासु के अनुसार, सर जाॅन मार्शल ने लिखा कि “जिस सभ्यता का हम यहां साक्षात्कार करते हैं, वह एक युग की प्राचीन सभ्यता है, जिसकी अमिट छाप भारत के प्रत्येक रजकण पर अंकित है। युग-युगान्तरों तक लाखों-करोड़ों मनुष्यों के अनवरत श्रम और प्रयास के बाद कहीं वह अपने इस रूप को पा सकी है। अतः आज से ईरान, इराक और मिस्र के साथ-साथ हमें भारत की भी गणना सभ्यता की उन महत्वपूर्ण आदिम जन्म-भूमियों में करनी पड़ेगी, जहां सर्वप्रथम मानव-सभ्यता का अंकुर प्रस्फुटित हुआ।” 

जिज्ञासु मत व्यक्त करते हैं कि “जिस समय आर्यों ने भारत में कदम रक्खा, उस समय वह महान सभ्यता प्रौढ़ होकर वृद्ध हो गई थी। अतएव, जो लोग यह कहते हैं कि आर्यों के आने से पूर्व यहाॅं जंगली और असभ्य लोग रहते थे, आर्यों ने इस देश में आकर लोगों को सभ्यता सिखाई, वे लोग बिल्कुल झूठे और बकवादी हैं।” उन्होंने कहा कि इतिहास-सिद्ध बात यह है कि भारत के प्राचीन आदि-निवासी पूर्व सभ्य थे, और उनकी सभ्यता इतनी महान थी कि उसकी तुलना की सभ्यता सारे संसार के इतिहास में नहीं मिलती। सबसे आश्चर्यजनक बात, जो मोहेनजोदरो नगर की खुदाई में देखी गई, वह जिज्ञासु के अनुसार, यह है कि उस नगर में राजा और प्रजा के घरों की बनावट में कोई अन्तर नहीं है, दोनों के घर एक समान हैं। यह देखकर एक पुरातत्वविद चक्कर में हैं और कल्पना करते हैं, क्या इस नगर में रहने वाले ‘साम्यवादी’ थे? जिज्ञासु ने लिखा कि यह सिर्फ कल्पना नहीं थी, बल्कि भारत के आदि-निवासियों में वास्तव में पंचायत-प्रथा और गणतन्त्र शासन प्रचलित था- पंचों का चुनाव सर्वसाधरण से होता था, इसलिए उनमें राजा और प्रजा की भावना ही नहीं थी। 

भारत की आदिम सभ्यता का जो पता मोहेनजोदरो और हड़प्पा की खुदाई से चला, जिज्ञासु ने उसकी पुष्टि ऋग्वेद से की है। उनके अनुसार ऋग्वेद की अनेक ऋचाओं में भारत के आदि-निवासियों की सभ्यता का परिचय मिलता है। ऋग्वेद के चौथे मंडल के श्लोक (30-20) में कहा गया है: “हे इन्द्र! आपने शंबर नाम के दास के पत्थर से बने सौ नगरों को विध्वंस करके हव्य देने वाले दिवोदास को दिए।” जिज्ञासु का मत है कि “शंबर वही जाति है, जिसे इतिहासकारों ने ‘शबर’ लिखा है और रामायण के अनुसार जिस जाति की दयालु माता शबरी ने राम को मीठे फल खिलाए थे।” ऋग्वेद के तीसरे मंडल के श्लोक (12-5) में कहा गया है कि “हे इन्द्र! आपने एक ही प्रयास से दास राजाओं के 90 नगरों को कॅंपा दिया।” जिज्ञासु कहते हैं कि इससे पता चलता है कि दासों में सैकड़ों-हजारों नगरपति राजा थे। अवश्य ही दास सुसभ्य जाति के लोग थे। ऋग्वेद के प्रथम मंडल के श्लोक (104-4) की साक्षी है : “अयु (कुयव) पानी में एक गुप्त किले में रहता है। वह पानी की बाढ़ में आराम से रहता है। अंजसी, कुलिशी और वीरपत्नी नदियों के पानी उनकी रक्षा करते हैं।” जिज्ञासु कहते हैं कि “अयु नामक आदिनिवासी का किला पानी के भीतर ऐसा सुरक्षित और सुदृढ़ बना था कि बाढ़ में भी वह उसमें आनन्द से रहता था और वह अंजसी, कुलिशी और वीरपत्नी नदियों के बीच में था।” इसी तरह ऋग्वेद के दसवें मंडल के श्लोक (22-8) की साक्षी है : “हम चारों ओर दस्यु जाति से घिरे हैं। वे यज्ञ नहीं करते, उनके कर्मकांड भिन्न हैं, वे मनुष्य नहीं हैं। हे ‘शत्रुहंता! उन्हें मारो। दस्यु जाति का विनाश करो।” इस संबंध में जिज्ञासु कहते हैं कि इससे पता चलता है कि आदि-निवासी दस्यु जाति के लोग चारों ओर से आर्यों को घेरे थे। वे यज्ञ नहीं करते थे। आर्य लोग उन्हें अपना शत्रु समझते थे और इसलिए इन्द्र से उनका विनाश करने को कहते हैं। 

सातवें अध्याय में जिज्ञासु ने उन इतिहास-लेखकों की सम्मतियों का खंडन किया है, जिन्होंने भारत के आदि-निवासियों के संबंध में भ्रम फैलाने का कार्य किया है। एक प्रकार से उन्होंने इस अध्याय में ब्राह्मणों के सुनियोजित षडयंत्र को उजागर किया गया है। यह षडयंत्र शैक्षिक पाठ्यक्रमों में इतिहास के गलत पाठ के रूप में किया गया था। जिज्ञासु ने ऐसे तीन तरह के इतिहास-लेखकों का उल्लेख किया है। पहले वे हैं, “जो भारत के प्राचीन इतिहास को ‘प्रागैतिहासिक’ कहकर एक शब्द में उड़ा देते हैं, और भारत के आदि-निवासियों को असभ्य, जंगली, कोल-भील-संथाल आदि कहकर आर्यों की विजय और आर्यों की महिमा के गपोड़े बड़ी श्रद्धापूर्ण शैली से विद्यार्थियों को पढ़ाने लगते हैं। लेकिन उसके बाद जब वैदिक आर्यों के अनर्थों का खाका उड़ाने वाला जैन-बौद्ध काल आ जाता है, तो इतिहास-लेखक महोदय गण इधर से उधर और उधर से इधर कूद-फाॅंदकर अगल-बगल से निकल भागते हैं। फिर मुस्लिम काल में आकर ये लोग मुसलमानों के अत्याचारों को इस मजे से वर्णन करते हैं, मानो मुसलमान भारत की सर्वसाधरण प्रजा के भयानक शत्रु थे और क्षत्रिय राजा केवल धर्म की रक्षा और प्रजा की भलाई के लिए ही उनसे लड़ते थे, उन्हें अपने भोग-विलास की तनिक भी चिन्ता न थी।” 

दूसरी तरह के इतिहास-लेखक, जिज्ञासु के अनुसार, आर्य लोग अनादि काल से भारत में रहते आए हैं, जिन्हें सृष्टि के आदि में परमेश्वर ने पैदा किया। परमेश्वर ने उन्हीं के आदिम पूर्वजों को अपना वेद रूपी ज्ञान दिया था। लेकिन उनके कुछ नालायक वंशधरों ने वैदिक विधि-विधानों के विरुद्ध आचरण किया, और वे सब पतित कर दिए गए। उन्हीं पतितों की संतान वर्तमान छूत-अछूत, शूद आदि हैं। 

जिज्ञासु के अनुसार, तीसरे वर्ग के इतिहास-लेखक वे हैं, जो यह मानते हैं कि इस देश का कोई भी दावेदार और हकदार नहीं। उनका मानना है कि यहाॅं कोई मूलनिवासी नहीं है, सभी विदेशी हैं। ऐसे इतिहासकारों का मत है कि “आर्यों के आने से पूर्व दो विदेशी जातियाॅं इस देश में आईं थीं। पहली जाति के लोग कोल या कोलारियन थे, जो तिब्बत और तातार से आए, दूसरी जाति के लोग द्रविड़ थे, जो भूमध्य सागर से यहाॅं आए थे। द्रविड़ लोग पंजाब को केन्द्र बनाकर सारे भारत में फैल गए और कोलों को मार भगाया। कोल लोग जंगलों और पहाड़ों में जा छिपे और आदिनिवासियों में मिल जाने के कारण वे लोग भी आदिनिवासी कहलाते हैं।” जिज्ञासु के अनुसार, द्रविड़ों के बारे में उन इतिहास-लेखकों का मत है कि “आर्यों ने पंजाब पर अधिकार करके द्रविड़ों को दक्षिण में भगा दिया, तथा द्रविड़ लोगों ने आर्यों की अधीनता स्वीकार कर ली और आर्यों के धर्म को अपना धर्म मान लिया।” लेकिन साथ ही यह भी वे कहते हैं कि द्रविड़ लोग भारत के आदि-निवासियों को ‘आदि-द्रविड़’ कहते हैं। इस पर जिज्ञासु चुटकी लेते हैं, “क्या खूब! भेड़ियाधसान इतिहास-लेखक एक ही मुॅंह से आग और पानी दोनों का वमन करते हैं।” 

इसके बाद जिज्ञासु ने द्रविड़ों के संबंध में कुछ विशेषज्ञ इतिहास-लेखकों की सम्मतियां उद्धृत की हैं, जो उनके कथन की पुष्टि करने के साथ-साथ भारत के आदि-निवासियों की सभ्यता पर भी प्रकाश डालती हैं। ऐसे पांच विद्वानों की सम्मतियां उन्होंने उद्धृत की हैं, जिनमें जयचन्द्र विद्यालंकार, रघुनन्दन शर्मा, सुबलचन्द्र मित्र, मनमथनाथ राय और राखालदास बनर्जी। जिज्ञासु ने जयचन्द्र विद्यालंकार के ग्रन्थ ‘भारतभूमि और उसके निवासी’ से उद्धृत किया है कि “द्रविड़-वंश या नस्ल का मूल और एक मात्र घर दक्खिन भारत ही है।” वे रघुनन्दन शर्मा के ग्रन्थ ‘वैदिक संपत्ति’ से उद्धृत करते हैं : “कोई-कोई कहते हैं कि द्रविड़ नाम की किसी जाति ने किसी दूसरे देश से आकर भारत में निवास किया था, लेकिन इसका कोई सन्तोषजनक प्रमाण नहीं है। कुछ लोगों का मत है कि इस जाति के लोग दक्षिण भारत के आदिनिवासी हैं। यह जाति प्राचीन काल में सुसभ्य और समृद्धशाली थी।” जिज्ञासु के अनुसार, मनमथनाथ राय ने अपने ग्रन्थ ‘भारत के इतिहास’ में लिखा है : “तमिल जाति वस्तुतः एक बड़ी सभ्य जाति थी। ये लोग हथियार आदि लोहे के बनाते थे, तथा मुर्दों को मिट्टी के बर्तन में बन्दकर उसके बगल में खान-पान कर सामग्री, वस्त्र, हथियार आदि रख देते थे।… वे खेतीबाड़ी करते थे तथा चावल, ज्वार आदि खाते थे। उनको धोती बुनने की विद्या अच्छी तरह से आती थी। सोने के गहने पहनते थे, मस्तक पर सोने का मुकुट तथा कड़ा, कुंडल, हार आदि भी पहनते थे। मर्द लोग लम्बी दाढ़ी रखते थे तथा स्त्रियाॅं बड़ी सावधनी से बालों को संवारती थीं। इनको लिखने की विद्या भी आती थी। तमिल लोग अच्छे व्यापारी भी थे। छोटे-छोटे जहाजों पर चढ़कर समुद्री राह से दूर-दूर के देशों तथा बैबीलोनिया, सीरिया के साथ व्यापार करते थे। छोटे-छोटे राज्यों में एक-एक राजा के अधीन होकर रहते थे। ताॅंबे के सिक्के भी इस्तेमाल करते थे। उनका निजी एक धर्म भी था। वे परमात्मा को मानते तथा शिवजी, भूमिजी, नाग आदि की पूजा करते थे।” 

राखालदास बनर्जी का ग्रन्थ है ‘बांगलार इतिहास’। जिज्ञासु के अनुसार, बनर्जी ने लिखा, “बैबिलोन के पुराने भग्नावशेषों की पुरानी सुमेर जाति की जो प्रतिमूर्तियाॅं मिली हैं, उनके अंगों और मुॅंह की बनावट भारतीय द्रविड़ों की तरह की हैं। जिस समय द्रविड़ों ने बैबिलोन पर अधिकार किया था, उस समय वे वहाॅं के निवासियों से अधिक सभ्य थे।… यह कल्पना बिल्कुल मिथ्या है कि आर्यों की तरह द्रविड़ लोग भी मध्य-एशिया या उत्तर-एशिया से भारत आए। आर्यों के इस देश में आने से पहले जिस जाति का भूमध्य-सागर से बंगोपसागर तक अध्किार था, उसी जाति को, जान पड़ता है, ऋग्वेद में दस्यु या दास कहा गया है। प्राचीन द्रविड़ जाति ही अंग, बंग और सौराष्ट्र की भी आदि-निवासिनी थी।” 

इन विद्वानों के आधार पर जिज्ञासु का निष्कर्ष है कि द्रविड़ और कोल जाति कहीं बाहर से नहीं आई, वरन वे भारत की ही मूलनिवासी थीं। जब आर्य इस देश में आए, तो उस समय ये लोग यहाॅं सैकड़ों फाटकों वाले नगरों में रहते थे और बेहतर राज्य-व्यवस्था चलाते थे।

आदिवासियों की पहचान और संख्या

अन्तिम अध्याय में जिज्ञासु ने आदि-निवासियों की पहचान और संख्या पर विचार किया है। उनके अनुसार आदि-निवासियों की 16 पहचानें हैं, जिनमें मुख्य हैं : जिनमें जातीय पंचायतें हैं, जिनके अनुष्ठानों में ब्राह्मण नहीं बैठते, जिनकी उत्पत्ति हिन्दू स्मृतियों में अनुलोम-प्रतिलोम वर्णसंकर से मानी जाती है , जिनको पक्का मकान बनाने की आजादी नहीं थी, जो नाग, शिव, वृक्ष, नदी, भुइयाॅं भवानी की पूजा करती हैं, जिनका व्यवसाय खेती करना, लोहे, चाॅंदी, सोने, बाॅंस, पत्थर, लकड़ी आदि की वस्तुएं बनाना तथा अन्य उत्पादन कर्म करते हैं, जो गाय, भैंस, बकरी, भेड़ी, और सुअर आदि पालने का व्यवसाय करते हैं, और जिन्हें उच्च शिक्षा से वंचित रखा गया है।

भारत में आदि-निवासियों की संख्या के बारे में भी जिज्ञासु ने इस अध्याय में चर्चा की है। उनका कहना है, “संख्या का आधार सरकारी जनगणना की रिपोर्ट है। मगर उसमें गड़बड़ी की गई। सन 1931 की जनगणना अंग्रेजी राज्य में हुई थी। उसमें धर्म, कुलदेवता, जाति का पुराना और नया नाम, पेशा, रीति-रिवाज, शिक्षा आदि 22 खाने बनाकर गणना का काम किया गया था, जो बहुत ही महत्वपूर्ण और आंखें खोलने वाला था। उसमें देश की जनता की सही तसवीर सामने आ गई थी।” चूॅंकि जनगणना हर दस साल बाद होती है, इसलिए, जिज्ञासु के अनुसार, 1941 में अंग्रेज सरकार पिछली गणना से भी अधिक पता लगाने वाली जनगणना कराना चाहती थी, “क्योंकि उसी के आधर पर अंग्रेज भारतीयों को सत्ता हस्तांतरित करना चाहते थे। किन्तु शोषक समुदाय (ब्राह्मणों) द्वारा शासन-सत्ता अपने हाथों में रखने के उद्देश्य से सन् 1941 की जनगणना में इतनी अड़चनें डाली गईं कि गणना और छॅंटनी का काम न हो सका।”

1947 में भारत स्वतन्त्र हुआ, और 1951 की जनगणना भारत की स्वतन्त्र सरकार ने करवाई। किन्तु, जिज्ञासु के अनुसार, इस गणना में “जाति का खाना ही उड़ा दिया गया और धर्म का भी ध्यान नहीं रखा गया, जिसका नतीजा यह हुआ कि भारत के आदि-निवासियों का अस्तित्व ही समाप्त हो गया।” 

1951 की जनगणना में ब्राह्मणों की सरकार ने एक नई सूझ से काम लिया। जिज्ञासु ने लिखा कि उसने काल्पनिक राष्ट्रीयता की झोंक में एक विशिष्ट पेशा की कल्पना की, जिसके आधार पर पेशेवरों की संख्या मालूम की गई। “मतलब यह कि दर्जी, हलवाई, भुर्जी, पटवा, लोहार, बढ़ई सब पेशे हैं– कपड़े सीनेवाला दर्जी है, उसकी जाति चाहे खत्री, ब्राह्मण, मुसलमान, ईसाई, सिख, कोई भी हो, फर्नीचर बनाने वाला बढ़ई है, उसकी जाति कायस्थ, चमार, मुसलमान, या सिख कोई भी हो।” इस नई सूझ का कारण जिज्ञासु ने बताया : “सन 1950 में जिस समय पार्लियामेंट में डाक्टर श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने चेलैंज दिया कि भारतवर्ष में, हिन्दुओं में 90 प्रतिशत संख्या शूद्रों की है, तो सत्ताधरी सवर्ण हिन्दुओं का दिल दहल उठा और इस बड़ी संख्या को कम करने के उद्देश्य से उन्होंने जातिवार गणना का विरोध कर पेशों और उद्योगों पर जोर दिया और गणना ‘सेलेक्टेड आक्युपेशन’ के अनुसार कराई गई।” इस आधार पर, जिज्ञासु के अनुसार, 1951 की जनगणना में सेलेक्टेड पेशों के लोगों की संख्या 23,20,31,784 पाई गई, जबकि भारत की कुल जनसंख्या 35,64,29,487 थी। जिज्ञासु लिखते हैं कि इन्हीं सेलेक्टेड पेशों वाले लोगों को पिछड़ा वर्ग कमीशन की रिपोर्ट में ‘पिछड़ी जातियों के लोग’ बताया गया। 

अन्त में जिज्ञासु का निष्कर्ष बहुत ही रोचक है : “हमारा कहना है कि यदि डा. श्यामाप्रसाद मुखर्जी हिन्दुओं में 90 फीसदी शूद्र समझते थे, जिसका समर्थन मेरठ के भाषण में पं. नेहरू ने भी किया था, तो मुसलमानों, सिक्खों, ईसाइयों और बौद्धों में भी 90 फीसदी से ज्यादा संख्या भारत के आदिनिवासियों की है। इस दृष्टि से देखिए, ढूंढ़िए और सही तरीके से सही जांच कीजिए तो आपको देश में 90 प्रतिशत से ज्यादा आबादी भारत के आदिनिवासियों की मिलेगी और 10 फीसदी से कम विजेता शोषक जातियों की।”

जिज्ञासु ने इस पुस्तक का समापन इन पंक्तियों से किया है: “यह कितने परिताप की बात है कि जो जिस भूमि का नैसर्गिक स्वामी हो, वह अपने देश में बेजुबान बना दासता, अभाव और कष्ट का जीवन बिताए और विदेशी, विधर्मी, विजेता प्रभु बनकर वहाॅं मौज उड़ावें, और उन बेकसों को आजादी से साॅंस लेना भी मना हो! खूब–

हम आह भी भरते हैं, तो हो जाते हैं बदनाम,
वो कत्ल भी करते हैं, तो चर्चा नहीं होती।”

बहरहाल, जिस काल में जिज्ञासु ने ‘भारत के आदि-निवासियों की सभ्यता’ पुस्तक लिखी, उस काल में दलित-पिछड़ी जातियों के समक्ष अपना इतिहास और अपनी अस्मिता जानने का यह महत्वपूर्ण दस्तावेज था, जिसने उन्हें संगठित और संघर्ष करने की नई ऊर्जा दी थी।

(संपादन : नवल/अनिल)


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