सपा के पक्ष में दलित-ओबीसी का नॅरेटिव : संजय कुमार

यादव, अति पिछड़ा, मुस्लिम के इर्द-गिर्द एक नॅरेटिव बनाया जा रहा है कि भाजपा सरकार में पिछड़ी जातियों की अनदेखी हुई है और इनके हितों को नजरंदाज किया गया है। इस नॅरेटिव का प्रभाव महत्वपूर्ण साबित हो रहा है। फारवर्ड प्रेस से विशेष बातचीत में प्रो. संजय कुमार

[उत्तर प्रदेश में चुनावी माहौल के संदर्भ में जो कुछ सामने आ रहा है, उसे लेकर तमाम तरह की कयासबाजियां व दावे किये जा रहे हैं। खासकर भाजपा के दलित-ओबीसी विधायकों, मंत्रियों व नेताओं द्वारा एक-एक कर सपा की सदस्यता लेने के बाद परिदृश्य में जो बदलाव आया है, उसके निहितार्थ क्या हैं। इसी आलोक में चुनावी विशेषज्ञ व सीएसडीएस के निदेशक प्रो. संजय कुमार से फारवर्ड प्रेस के हिंदी संपादक नवल किशोर कुमार ने दूरभाष पर बातचीत की। प्रस्तुत है इस बातचीत का दूसरा और अंतिम भाग] 

पसमांदा मुसलमानों के सवाल और उनकी भागीदारी को लेकर पहले भी सवाल उठता रहा है कि उन्हें केवल वोट बैंक के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है। क्या इस बार आप कोई परिवर्तन की अपेक्षा रखते हैं?

देखिए मुझे लगता है जिस तरीके की चर्चा पसमांदा मुसलमानों की बिहार में होती थी, वैसी चर्चा मुझे उत्तर प्रदेश में दिखाई नहीं पड़ रही है। लेकिन यह जरूर है कि उनके प्रतिनिधित्व को लेकर काफी चर्चा हो रही है। खासकर एआईएमआईएम इस बात का प्रचार कर रही है कि आपको [पसमांदा मुसलमानों को] हमेशा लॉलीपाप दिया गया। पार्टियों ने आपका वोट लिया, लेकिन कभी आप जीत करके असेम्बली में नहीं आए। इस बात का एआईएमआईएम बार-बार जिक्र भी करना चाह रही है कि पसमांदा मुसलमानों का हमेशा इस्तेमाल किया गया। बड़ी पार्टियों ने उनका वोट लिया और उनके हितों को नजरंदाज किया गया। और वो इस बात का जिक्र करते हैं कि जनसंख्या में पसमांदा मुसलमानों की कितनी हिस्सेदारी है और उनके कितने लोग जीतते हैं तथाअलग-अलग पार्टियों में उनकी हिस्सेदारी व हैसियत क्या रही है। सामान्यतया मुस्लिम समुदाय में अपील करने की कोशिश की जा रही है। मुझे नहीं लगता है कि खासकर पसमांदा मुसलमानों को निशाना बनाया जा रहा है। यह जरूर है कि एआईएमआईएम की कोशिश होगी की अगर पहले, मुस्लिम समुदाय के वोटरों में कोई उनकी ओर खिसकता हुआ दिखाई देगा, तो वे पसमांदा मतदाता ही होंगे। मैं एक बड़ा प्रश्न चिन्ह लगा रहा हूं। अगर कुछ वोट उनकी तरफ खिसकता है तब भी उनकी बड़ी भूमिका नहीं होगी। मुझे लगता है एआईएमआईएम के नेता कितना भी प्रचार-प्रसार कर लें तो भी, जैसे कांग्रेस महिला वोटरों के दम पर चुनाव जीतने की कोशिश कर रही उसी तरह ओवैसी मुस्लिम वोटरों के दम पर कई विधानसभा क्षेत्र में चुनाव जीतने की कोशिश कर रहे हैं। कुल मिलाकर मुसलमानों के लिए बड़ा सवाल क्या है? यह जानना जरूरी है। यूपी में उनके लिए बड़ा सवाल है भाजपा को हराना। और जब समाजवादी पार्टी के फेवर में एक मोमेन्टम बन रहा है, लोगों को लग रहा कि सपा भाजपा को हरा सकती है तो ऐसी स्थिति में मुझे नहीं लगता है कि मुस्लिम मतदाता ऐसी बेवकूफी करेंगे कि सपा के उम्मीदवार को छोड़कर सब बसपा या कांग्रेस या एआईएमआईएम के उम्मीदवार को वोट देंगे। अगर किसी एक-दो विधानसभा क्षेत्र में ऐसा हो जाय तो वह अलग बात होगी। परंतु मुझे लगता है कि मुस्लिम मतदाता एकमुश्त वोट सपा को देंगे। ऐसा नहीं होने की गुंजाइश होती, अगर सपा चुनावी टक्कर में दिखाई नहीं देती। लेकिन अब तो बिल्कुल नॅरेटिव समाजवादी पार्टी के पक्ष में दिख रहा है। 

किसान आंदोलन का कितना असर होगा इस बार के चुनाव में?

देखिए, किसान आंदोलन का प्रभाव तो जरूर पड़ेगा और इससे भाजपा को नुकसान होगा। लेकिन जितना नुकसान, बिल वापस होने के पहले होता उससे अब नुकसान कम होगा। लेकिन बिल वापस ले लेने मात्र से किसानों की सारी नाराजगी दूर हो गई, और सबके सब फिर से भाजपा को वैसा ही वोट करेंगे जैसा उन्होंने पहले के चुनाव में किया था, ऐसा मैं नहीं मानता। भाजपा को नुकसान जरूर होगा, लेकिन सीमित नुकसान होगा। यह नुकसान, पश्चिमी उत्तर प्रदेश के विधानसभा क्षेत्रों में होगा। पूर्वी उत्तर प्रदेश के किसान जो हैं उनकी मांग पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसानों से बिल्कुल भिन्न हैं। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के 70-80 जो सीटें हैं, वहां भाजपा को नुकसान हो सकता है। 

एक बड़ा इलाका है पूर्वांचल का और पूर्वांचल का जो मनमिजाज है, वह थोड़ा अलग जाता दिख रहा है। खासकर इस संदर्भ में कि वहां का अपना जातिगत समीकरण है। दूसरा यह कि वहां अपर कास्ट का वर्चस्व भी है। 

देखिए पूर्वांचल का महत्व क्या है, पहले इसे समझने की आवश्यकता है। यूपी के चुनाव में पूर्वांचल का सीधा-सीधा महत्व है इस इलाके के विधानसभा क्षेत्रों की संख्या। अगर हम पूर्वांचल को परिभाषित करें तो तकरीबन 145-150 विधानसभा सीटें पूर्वांचल में आती हैं। तो 403 में से 150 विधानसभाएं पूर्वांचल से ही हैं, तो समझिए कि लगभग एक तिहाई पूर्वांचल से आ रहा है। हमने देखा कि जिस किसी भी पार्टी की सत्ता बनती है, चाहे वह 2007 का चुनाव हो, 2012 का चुनाव हो या फिर 2017 का, जिस भी पार्टी की सरकार बनती है, वह पूर्वांचल में अच्छा प्रदर्शन करती है। अगर कोई पार्टी पूर्वांचल में अच्छा प्रदर्शन नहीं करेगी तो उसकी सरकार नहीं बनेगी। पूर्वांचल हर पार्टी के लिए महत्वपूर्ण है। भाजपा के लिए इस बार यह औरज्यादा महत्वपूर्ण हो गया है क्योंकि इस चुनाव में भाजपा को इस बात की उम्मीद है कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में तो उसे नुकसान जरूर होगा, क्योंकि यहां किसान आंदोलन रहा है। जाट बाहुल्य इलाका है। मुसलमानों की संख्या ज्यादा है तो मुस्लिम मतदाता उनको वोट करेंगे नहीं और जाटों के बीच में भी नाराजगी है। किसानों के बीच में नाराजगी है। इन सब का प्रभाव पड़ेगा कि भाजपा को पश्चिमी उत्तर प्रदेश में नुकसान होगा। तो आप देखिए कि भाजपा ने इसकी भरपाई के लिए पूर्वी उत्तर प्रदेश में काफी काम किया। आपने देखा कि तमाम तरह की रैलियां हुई हैं पूर्वी उत्तर प्रदेश में। उसके बाद पूर्वांचल एक्सप्रेस का उद्घाटन हुआ। तमाम तरीके की चीजें की गई हैं। और भाजपा उम्मीद कर रही है कि जो कुछ भी नुकसान पश्चिमी उत्तर प्रदेश से हो उसकी क्षतिपूर्ति पूर्वांचल से कर सकें। लेकिन जो घटनाक्रम पिछले 4-5 दिनों में चला है, इसका सारा अभि केंद्र अगर आप देखें तो वह पूर्वी उत्तर प्रदेश ही है। जो नेता भाजपा को छोड़कर समाजवादी पार्टी में जा रहे हैं उन सभी का जनाधार पूर्वी उत्तर प्रदेश में ही है। और जिन समुदायों से वे आते हैं, सभी दलित-ओबीसी हैं। इनका प्रभाव भी पूर्वी उत्तर प्रदेश की विधानसभाओं में ही ज्यादातर है। आप देखेंगे कि अब पूर्वी उत्तर प्रदेश भी भाजपा के लिए उतना आसान नहीं रहा जितना पहले रहा था। तो पश्चिमी उत्तर प्रदेश में नुकसान की गुंजाइश है और अब लगता है कि पूर्वी उत्तर प्रदेश भी भाजपा के लिए एक चुनौती के रूप में उभर रहा है।

एक क्षेत्र है बुंदेलखण्ड का। इसके बारे में चर्चा बहुत कम होती है। लेकिन राजनीतिक रूप से वह भी बहुत महत्वपूर्ण है।

चर्चा बहुत कम होने की वजह बहुत साफ है कि यूपी में शामिल बुंदेलखण्ड के इलाके में विधानसभाओं की संख्या बहुत कम है। और किसी खास समुदाय के वोटरों का खास प्रभाव भी वहां दिखाई नहीं देता। इसलिए चर्चा कम होती है। सबसे बड़ी वजह यही है कि बहुत ही छोटा सा इलाका है। विधानसभा सीटोंके आधार पर देखें तो शायद 17-20 विधानसभा सीटें वहां हैं। इतनी कम तादाद है कि उसका कोई ज्यादा प्रभाव नहीं पड़ता। अब जैसे आप कह सकते हैं कि स्कूल/कॉलेज में एक एडिशनल पेपर होता है, जिसे यह सोचकर रख लेते हैं कि चलो पास हो गये तो अच्छी बात है। वैसे ही पार्टियां उसे उसी तरह से देख रही हैं। इस चुनाव में तो खासकर पूर्वी उत्तर प्रदेश की चर्चा वैसे भी हर चुनाव में होती है, और पश्चिमी उत्तर प्रदेश की भी चर्ची हर चुनाव में होती है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में पूर्वी उत्तर प्रदेश की तुलना में सीटों की संख्या कम है, पर चर्चा हमेशा होती है, क्योंकि सीटों की संख्या है। और चुनाव सारा सीटों का खेल है। लेकिन पश्चिमी उत्तर प्रदेश एक खास किस्म का है, क्योंकि यहां मुस्लिम बाहुल्य आबादी है। बसपा हो, सपा हो, कांग्रेस हो या भाजपा हो इनका कमोबेश सारे इलाके में बराबर का प्रभाव है। लेकिन पश्चिमी उत्तर प्रदेश की चर्चा एक खास वजह से होती है। क्योंकि यहां एक दूसरी पार्टी है, जिसका प्रभाव सिर्फ पश्चिमी उत्तर प्रदेश में है और एक समय में वह बड़ी पार्टी थी। वह पार्टी थी राष्ट्रीय लोकदल। चौधरी चरण सिंह जिसके नेता हुआ करते थे, आज जयंत उनके नेता हैं। वे जाटों के नेता हैं और जाट बाहुल्य क्षेत्र है, इसलिए यूपी के चुनाव के मद्देनजर इन दो क्षेत्रों की चर्चा बहुत ज्यादा होती है। बाकी क्षेत्रों की चर्चा भी होती है, लेकिन उसमें इतना फोकस नहीं होता और उसमें भी बुंदेलखण्ड काफी पीछे रह जाता है।

प्रो. संजय कुमार, निदेशक, सेंटर फॉर दी स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसायटीज, नई दिल्ली

चुनाव तो 10 फरवरी से होंगे आपके हिसाब से भाजपा के पास क्या विकल्प बचा है, जिससे वह सत्ता में वापसी कर सकें?

दो चीजें हैं। अभी वो [भाजपा के नेता] कोशिश कर रहे हैं। देखिए अब यह साफ है कि नॅरेटिव क्या बना है इस बार के चुनाव में। हालांकि चुनाव में तो अंतिम तौर पर वोट के संख्या के आधार पर हारा या जीता जाता है। वोटों की गिनती के बाद ही पता चलता है कौन सी पार्टी जीती और कौन सी पार्टी हारी। उसके भी पहले खेल होता है, नॅरेटिव से लगने लगता है और एक माहौल बनता है। इस मामले में भाजपा अब पिछड़ी हुई दिखाई पड़ती है। यह बात मैं माहौल के तौर पर मैं कह रहा हूं। वोटों की गिनती तो हुई नहीं है और अभी तो पहले चरण का मतदान भी नहीं हुआ, लेकिन अगर एक माहौल के तौर पर देखें तो माहौल ऐसा बनने लगा है कि भाजपा बैकफुट पर है और सपा उसे कड़ा मुकाबला दे रही है। बल्कि सारा माहौल सपा के फेवर में बनता हुआ दिख रहा है। और इसकी वजह है, बिल्कुल जो पिछले पांच दिनों का जो घटनाक्रम है वो बड़ी वजह है। नेताओं का भाजपा को छोड़कर सपा में जाना और खासकर उन नेताओं का जो एक दलित-ओबीसी जातियों से आते हैं। सपा इस चुनाव में इसी गठबंधन पर भरोसा कर रही है। यादव, अति पिछड़ा, मुस्लिम के इर्दगिर्द एक नॅरेटिव बनाया जा रहा है कि भाजपा सरकार में पिछड़ी जातियों की अनदेखी हुई है और इनके हितों को नजरंदाज किया गया है। इस नॅरेटिव का प्रभाव महत्वपूर्ण साबित हो रहा है। यह एक बड़ा नॅरेटिव बन रहा है। और इसकी बदौलत सपा अपनी पकड़ वोटरों पर मजबूत करने की कोशिश कर रही है। 

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तो नॅरेटिव बिल्कुल सपा के फेवर में दिख रहा है। भाजपा को पहले इस नॅरेटिव को चैलेंज करना होगा। इसके लिए मुझे लगता है कि भाजपा कोशिश करेगी कि सपा के नेताओं में कुछ तोड़फोड़ करे और इस नॅरेटिव को ध्वस्त करने के लिए उन्हें सपा के 5-7 नेताओं को पूरे जोर-शोर से अपनी पार्टी में शामिल करें। यह जो नॅरेटिव है कि लोग डूबते हुए जहाज को छोड़कर ऐसे जहाज में शामिल होते हैं जो मजबूत दिखाई पड़ती है, ये नरेटिव अभी सपा के फेवर में है। और इसे पंचर करने के लिए पहला पत्ता भजपा यही खेलेगी। और इसकी पूरी कोशिश की जा रही है कि सपा के नेताओं को तोड़ा जाय और उन्हें अपने पक्ष में मिलाया जाय। और भाजपा की दूसरी कोशिश होगी कि वह अपने मौजूदा विधायकों को, जिसकी वो चर्चा भी कर रहे हैं कि बड़ी संख्या में उसके विधायक बेटिकट होंगे, इसे अमल में लाए। और जब वे ऐसा करेंगे तब यह उनके नॅरेटिव को मदद करेगी कि, ‘भाई ये देखिए, हमने तो कहा था कि कई वर्तमान विधायकों के टिकट कट रहे हैं, और ये स्वामी प्रसाद मौर्या हों चाहे दारा सिंह हों, इन सारे लोगों का टिकट कट रहा था तथा इस वजह से ये लोग भागे हैं न कि किसी अन्य कारण से। इनका न कोई ईमान-धर्म है न कोई मूल्यों की राजनीति है। आप देखिए हमने तो अभी उम्मीदवारों की घोषणा की, उसमें पहले से ही 50 मौजूदा विधायकों के टिकट काट दिए, उसमें इनका भी नाम था।’ तो मुझे लगता है कि इसका प्रमाण भाजपा के नेता देना चाहेंगे। तो सपा के पक्ष में जो नरेटिव है उसको पंचर करने के लिए ये दो चीजें भाजपा जरूर करेगी। वे हर सम्भव प्रयास करेंगे कि सपा से कुछ यादव नेताओं को तोड़ा जा सके या अन्य नेताओं को जिससे उन्हें नॅरेटिव को बनाने या पैदा करने में मदद मिले। ये दो अभी भी ट्रंप कार्ड भाजपा के पास हैं, जिसे वह खेलना चाहेगी। 

(संपादन : समीक्षा सहनी/अनिल) 


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