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महिलाओं की अस्मिता से खिलवाड़ कर कैसा देश बनाना चाहते हैं हमारे हुक्मरान?

‘सुल्ली डील्स’ के बाद अब ‘बुल्ली बाई’ ऐप में कुछ नए एंगल जोड़ दिए गए हैं। उन्हें सिर्फ़ अल्पसंख्यक महिलाओं को टारगेट नहीं करना, उन्हें सिक्खों और किसानों को भी नीचा दिखाना है, जिनकी ज़िद और जज़्बे ने प्रधानमंत्री को भी माफ़ी मांगने पर मजबूर किया। वरिष्ठ कथाकार सुधा अरोड़ा की टिप्पणी

इधर चौतरफ़ा ‘बुल्ली बाई’ नाम से तैयार किये गए मोबाइल ऐप को लेकर राजनीतिक माहौल में एक ओर आक्रोश का माहौल है, दूसरी ओर एक बड़ी जमात अपनी इस नई खुराफाती ईजाद पर लहालोट है। बदसलूकी के चरम पर पहुंचा हुआ यह ऐप भारतीय संस्कृति, तहज़ीब और नैतिक मूल्यों के तो परखच्चे उड़ा ही रहा है, बहुत से ज़रूरी सवालों को भी जन्म दे रहा है। ये सवाल सिर्फ़ महिलाओं की अस्मिता से जुड़े सवाल नहीं हैं, ये सवाल हमारे देश के दिन-पर-दिन होते हुए पतन और क्षरण को बयां कर रहे हैं। इससे आका़ओं का एक बड़ा तबका लहालोट है कि आखिर बरसों की मशक्कत के बाद वे 18-22 वर्ष के युवाओं के अंदर खास धर्म व तबकों के लोगों के प्रति, स्त्रियों के प्रति इतना जहर भरने में कामयाब रहे। 

चुनाव के पास आते ही उन राजनेताओं में एक हड़बोंग मचता है, जिन्होंने अपने कार्यकाल में कोई सकारात्मक काम किया नहीं, कहने को उनके पास कुछ है नहीं ! लुभाने की कागज़ी योजनाओं से जनता वाकिफ़ हो चुकी है तो चुनाव सामने आते ही वोट पाने को लेकर बौखलाए राजनेता और उनकी नाकारा पार्टी क्या करेगी? वे अपने गुंडों और लठैतों का मुंह जोहते हैं। अब तो लाठी और डंडों की भी ज़रूरत नहीं। सबसे वल्नरेबल चीज़ है स्त्री की अस्मिता। अपने घर की स्त्रियों का सम्मान करना भी वे नहीं जानते, तो दलित और अल्पसंख्यक स्त्रियां तो सबसे साॅफ्ट टारगेट हैं।

पिछले सात सालों से उनके वेतनभोगी युवा कार्यकर्ता तरह तरह के रोमांचक प्रलयंकारी खेल का तमाशा सामने ला रहे हैं। पहले अल्पयंख्यकों की नामी गिरामी हस्तियों के मुंह खोलने पर ही जत्थे के जत्थे लोग ट्रोलिंग करने लग जाते थे। अब सोशल मीडिया ने उनके हाथ लंबे और औजार पैने कर दिए हैं। किसी एक को ट्रोल करके और मां-बहन की गालियां देकर भी वह पीठ पर शाबासी लिए घूम रहे थे, अब उन्होंने थोक  स्तर पर स्त्री की अस्मिता के परखच्चे उड़ाने के लिए शाब्दिक लठैती पर अपने हाथ और दिमाग़ को आजमाना शुरु कर दिया है। और अब तो यह उन आम युवाओं तक पहुंच गया है, जिन्हें अपनी तीक्ष्ण बुद्धि और मानसिक क्षमता का इस्तेमाल देश व समाज के हित में करना चाहिए था, इसके बजाय वे अपनी सारी वैज्ञानिक सोच रसातल में डालते हुए टुच्ची और बेसिर पैर की खौफ़नाक राजनीति और सांप्रदायिक नफरत के विस्तार में जुट गए हैं। सच यह भी है कि जब सामूहिक रूप से अपराधियों का फूलमालाओं से स्वागत किया जाता हो, वहां 19 से 22 साल के तथाकथित ज़हीन लड़के-लड़कियां नफ़रत की आंधी के बहकावे में आकर क्यों कर अपना नये से नया कारनामा नहीं दिखाना चाहेंगे?

इस नयी ईजाद से वे एक साथ कई शिकार कर रहे हैं। जिस देश में स्वयं प्रधानमंत्री ‘कपड़ों से पहचाने जाते हैं’ जैसे विषाक्त बोल बोल रहे हों, जिस राज्य में मुख्यमंत्री सामाजिक कार्यकर्ताओं को देशद्रोह के मामले में फंसाकर जेल में बंद करने के बाद भी उनके फोटो के होर्डिंग्स शहर की सड़कों पर उनके नाम पते सहित डिस्प्ले करवाते हों, वहां छोटे स्तर पर काम करने वाले तकनीक से लैस कार्यकर्ता अपने आप ही अपने लिए उसी गाइडलाइन पर चलते हुए उसी ढर्रे का काम ढूंढ लेते हैं।

युवाओं के मन में नफरत बो रही राजनीति

इस तरह की खुराफ़ातों की टाइमिंग पर ध्यान देना ज़रूरी है। बंगाल चुनाव के समय ‘सुल्ली डील्स’ ऐप आया था जिसमें अल्पसंख्यक सफल महिलाओं को टारगेट किया गया। जिन 83 महिलाओं को इसमें टारगेट किया गया, उनमें से एक हाना मोहसिन खान का बयान आपने पढ़ा होगा।  इसकी शिकार कई महिलाओं ने सोशल मीडिया से अपने को अलग कर लिया। वे किस पीड़ा से गुजरीं, कितनी मानसिक यातना के बाद उन्होंने अपनी ज़बान खोली, यह हमारी कल्पना से बाहर की चीज़ है। कुछ साल पहले ‘मी टू’ अभियान के लिए कुछ प्रबुद्ध महिलाओं ने भी कहा कि आखिर इतने समय बाद ज़ुबान क्यों खोली जा रही है। ऐसी महिलाएं इस ऐप की शिकार शख्सियतों से सहानुभूति रखेंगी, इसमें संदेह है। इस पर सांसद स्मृति ईरानी से तो कोई उम्मीद नहीं, लेकिन जया बच्चन से लेकर तमाम नामी गिरामी महिला सांसद इस मुद्दे पर चुप्पी लगा गईं। महुआ मोइत्रा ने कुछ बोला हो तो मुझे जानकारी नहीं।

‘बुल्ली बाई’ ऐप में जिन्हें टारगेट किया गया, उन्हें तो एक मज़बूती के साथ इसका सामना करना है। यह एक चुनौती है कि वे अपना हौसला बुलंद रखें। देश में अब भी एक तरक्की पसंद मज़बूत इरादों वाली बहुसंख्यक जमात है जो इन सबके साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़ी है।

अब उत्तर प्रदेश और पंजाब समेत पांच राज्यों के चुनाव सामने हैं। ‘सुल्ली डील्स’ के बाद अब ‘बुल्ली बाई’ ऐप में कुछ नए एंगल जोड़ दिए गए हैं। उन्हें सिर्फ़ अल्पसंख्यक महिलाओं को टारगेट नहीं करना, उन्हें सिक्खों और किसानों को भी नीचा दिखाना है, जिनकी ज़िद और जज़्बे ने प्रधानमंत्री को भी माफ़ी मांगने पर मजबूर किया। इसलिए उसमें पंजाबी भाषा का पुट भी डाला गया। आप देखें कि ये खुराफ़ाती युवा दिमाग़ राजनीति की शतरंज पर बिसात देखकर अपने मोहरे तय करते हैं।

2012 में निर्भया कांड पर कुछ महत्वपूर्ण निर्णय लिए गए थे कि बलात्कार की रिपोटिंग के समय इलस्ट्रेशन में अपने घुटनों को बांहों से घेरे झुके कंधों में मुंह छिपाए एक बेबस लड़की की तस्वीर देना एक पूरे मुद्दे को डाइल्यूट कर देना है। जिस पर बलात्कार हुआ, इज्ज़त उसकी गई या उसके बलात्कारी की। मुंह छिपाने की ज़रुरत दरअसल किसको है? इस ‘सुल्ली डील्स’ या ‘बुल्ली बाई’ ऐप में शोषण की शिकार अल्पसंख्यक लड़कियां महिलाएं नहीं, इस देश की हर तबके की – सवर्ण हों या दलित, सब एक चुनौती हैं – इस खुराफ़ाती अपढ़ असंस्कारी युवा जमात के लिए, जो अपना भविष्य सिर्फ़ फौरी राजनीति के छिछलेपन में देखती है और उसका शिकार बनकर रह गई है। 

‘बुल्ली बाई’ ऐप में जिन्हें टारगेट किया गया, उन्हें तो एक मज़बूती के साथ इसका सामना करना है। यह एक चुनौती है कि वे अपना हौसला बुलंद रखें। देश में अब भी एक तरक्की पसंद मज़बूत इरादों वाली बहुसंख्यक जमात है जो इन सबके साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़ी है।

दूसरी ओर इस तरह के अमानवीय कार्यों को अंजाम देते, नफ़रत का ज़हर उगलते, टेक्नोलॉजी का दुरुपयोग करते, इंजीनियरिंग के इन छात्रो और कुंठित बच्चों – जो पूरी तरह युवा भी नहीं है – पर हम तरस खा सकते हैं, परंतु उनके इस कदर नफ़रत उगलती सनक मन में खौफ और चिंता पैदा करती है कि वे देश के लिए और अपने लिए कैसा भविष्य बना रहे हैं, जहां इंसान को जाति, धर्म, नस्ल, लिंग के नाम पर खौलती नफ़रत के हवाले किया जा रहा है।  चिंता इसलिए भी कि विरोध और नफरत के लिए जो टूल्स इस्तेमाल हो रहे हैं, उनसे पूरी मानवता को खतरा है।

आज धर्म के नाम पर जो कुटिल हिंसा और नफरती रवैया है, कल जाति के नाम पर हो सकता है, लिंग के आधार पर हो सकता है। नकारात्मक होना एक अंतहीन सिलसिला है, जो कहीं ठहर कर सोचता नहीं, रुकता नही।

उनका भविष्य क्या है, यह उन अठारह-बीस साल के नौजवानों और लड़कियों को खुद सोचना है। वे यह जान लें कि देश में बढ़ती महंगाई और बेरोजगारी के कारण बढ़ते आक्रोश का इलाज यह नहीं है कि वे आसानी से संकीर्ण सोच वाले राजनीतिक दलों की महत्वकांक्षा  का शिकार हो जाएं। 

किसी भी देश में सत्तासीन पार्टी के लिए चुनाव जीतना एक बड़ी चुनौती है। अपनी जीत को मुकम्मल करने के लिए विकास तो दूर, देश को विनाश, संहार और मानसिक दिवालियापन के रास्ते ले जाकर भी अगर उन्हें लाखों घर फूंक तमाशा देखना पड़े तो वे कमर पर फेंटा बांधे तैयार खड़े रहते हैं। एक पढ़ा लिखा युवा वर्ग अगर अपने विलक्षण दिमाग को उनके पास गिरवी रख देता है और उन्हें अपने को मोहरा बनाने की छूट देता है तो इसमें गलती किसकी है?

क्या कोई वह पल भूलेगा जब दिल्ली के शाहीनबाग में सीएए और एनआरसी के विरोध में हो रहे आंदोलन के दौरान एक नौजवान ने भाजपा के एक नेता के आह्वान पर पुलिसकर्मियों पर ही पिस्तौल तान दी थी? क्या बिना राजनीतिक संरक्षण के यह संभव है कि ऐसे युवा जो देश के विकास में भूमिका निभा सकते हैं, उन्हें देश की गंगा-जमुनी तहजीब को खत्म करने के लिए उनके अंदर सांप्रदायािकता का जहर भरा जा रहा है ? 

याद करें वे दिन जब जम्मू-कश्मीर में लागू धारा 370 को निष्प्रभावी बनाने के लिए संसद में कानून बनाया गया था, तब भाजपा के एक बड़े नेता ने किस तरह की स्तरहीन बयानबाजी की थी। उसने कहा था कि धारा 370 के खात्मे के बाद हमारे युवा जम्मू-कश्मीर में जाकर शादी कर सकेंगे, वहां के खूबसूरत माहौल में ज़मीन -जायदाद खरीद सकेंगे। उस समय यदि भाजपा के उस बड़े नेता के खिलाफ उनकी पार्टी ने कार्रवाई की होती तो संभवतः हालात कुछ और ही होते।

यह तो एक छोटा सा उदाहरण है। पूरे देश ने देखा है कि किस तरह मॉब लिंचिंग करनेवालों को भाजपा के बड़े नेताओं द्वारा सम्मानित किया गया। हाल ही में कुलदीप सेंगर को जमानत दी गयी, जबकि एक युवती के साथ बलात्कार के बाद उसके पूरे रिश्तेदारों और परिवार को उसने नेस्तनाबूद कर दिया था। ऐसे संहारक संमय में युवाओं को आंखें और दिमाग़ खोलकर चलना है, न कि अपनी बुद्धि को गिरवी रख देना है ?

जाहिर तौर पर इस हालात के लिए किसी एक राजनीतिक संगठन को जिम्मेदार मानकर नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता है। आज एक बड़ा सवाल है कि लोगों की आंखों में इतना ज़बरदस्त घुंघलका क्यों है ? आज एक ऐप बनाकर एक धर्म की महिलाओं की अस्मिता के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है, कल अपने घर की बहन-बेटियों के साथ भी वे ऐसा ही सुलूक करेंगे। अंततः यह पुरुषसत्ता वाहक जड़ परंपरा का उदाहरण है, जिसे स्त्रियां भी अपना कंधा देती हैं।

याद करें चार दशक पहले हमने सौंदर्य प्रतियोगिताओं में लड़कियों के लगभग अधनंगे होने पर सवाल उठाए थे, प्रतिरोध दर्ज किया था। आज हममें से कोई इस बात पर नहीं बोलता है, क्योंकि हमें इसकी आदत हो गई है। हम देखते हैं और आंखें फेर लेते हैं। यह नया नॉर्मल है। आज अपने देश की महिलाओं की बेइज्जती पर जैसे तिलमिला रहे हैं, हो सकता है कि इसकी भी हमें आदत हो जाए और हम इसे कुछ सनके हुए युवाओं की खुराफ़ात समझकर न्यू नॉर्मल मान लें। इसमें कोई संदेह नहीं कि इस तरह की हरकतें हमारे देश की मूलभूत संवेदना को, इंसान होने की इंसानियत को ध्वस्त कर रही हैं। इससे पहले कि हमें इसकी आदत हो जाए हमें इस गलाजत को फैलने से रोकना है। इस पर पूर्णविराम लगाना है।

(संपादन : नवल/अनिल)

(आलेख परिवर्द्धित : 8 जनवरी, 2022 12:36 PM, 11 जनवरी, 2022 12:23 PM)


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लेखक के बारे में

सुधा अरोड़ा

चर्चित कथाकार सुधा अरोड़ा स्त्री आन्दोलनों में भी सक्रिय रही हैं। अब तक उनके बारह कहानी संकलन तथा एक उपन्यास और वैचारिक लेखों की दो किताब। 'आम औरत : जि़ंदा सवाल’ और 'एक औरत की नोटबुक’ प्रकाशित हो चुकी हैं। सुधा जी की कहानियां भारतीय भाषाओं के अतिरिक्त अंग्रेजी, फ्रेंच, पोलिश, चेक, जापानी, डच, जर्मन, इतालवी, ताजिकी भाषाओं में अनूदित।

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