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बहस-तलब : आदिवासियों के लिए आदिवासियत ही सर्वश्रेष्ठ

मैं जब वर्ष 1992 में बस्तर आया तब तक गावों में रहने वाले आदिवासियों को होली, दीपावली, शिवरात्रि जैसे त्यौहारों के बारे में जानकारी नहीं मिली थी। आदिवासी गाय और बैल दोनों का उपयोग हल चलाते हेतु करते थे। बता रहे हैं हिमांशु कुमार

आदिवासियों को अपना धर्म सिखाने में सभी मज़हबों के लोग बराबर के दोषी हैं। अफ्रीका में आदिवासियों को मुसलमान बनाया गया। ईसाईयों ने बाद में आकर बचे हुए आदिवासियों को ईसाई बनाया। आज यह जानना भी मुश्किल है कि मुसलमान या ईसाई बनने से पहले अफ्रीकी आदिवासियों का अपना धर्म क्या था?

आज अफ्रीका में खनिज और हीरों के लिए जिन आदिवासियों को मारा जा रहा है, वे या तो ईसाई हैं या फिर मुसलमन। अपने मुनाफे के लिए हिंसा करने वाले भी इन्हीं धर्मों के लोग हैं। इस विषय पर वर्ष 2006 में बनी एडवर्ड जेविक की फिल्म ‘ब्लड डायमंड’ देखी जा सकती है।

भारत की बात करें तो झारखंड, छत्तीसगढ़ और उडीसा आदि आदिवासी बहुल राज्यों में आदिवासियों से उनकी ज़मीनें छीनी जा रही हैं। उन्हें गावों से उजाड़ा जा रहा है। इस काम में भी धर्म का इस्तेमाल किया गया है। छत्तीसगढ़ में सलवा जुडूम जैसा गैर-संवैधानिक अभियान चलाया गया। इस अभियान की शुरुआत हिन्दुत्ववादी समूहों ने गीदम के आसपास के गावों में ग्राम रक्षा दलों का गठन करने से की थी। बाद में यह पूरा अभियान आदिवासियों की ज़मीन हडपने के भाजपा सरकार के बड़े एजेंडे के रूप में काम आया। इस आभियान के कारण हज़ारों आदिवासियों और सुरक्षाकर्मियों की जान गई। लाखों आदिवासियों को बेघर होना पड़ा। बड़ी संख्या में आदिवासी महिलाओं की अस्मत पर हमले हुए। धर्म और राजनीति के गंठजोड़ को पूंजीवादी एजेंडे के लिए कैसे इसतेमाल किया जाता है, यह इसका हालिया उदाहरण है।

बस्तर में सांकृतिक कार्यक्रम के मौके पर अपने पारंपरिक परिधानों में महिलाएं

याद रखिये छत्तीसगढ़ के प्रयोग से उत्साहित होकर ही हुकूमत ने देश में इसी फासीवादी माडल पर काम करने की हिम्मत जुटाई क्योंकि उसे समझ आ गया कि आप धर्म, पैसा और राजनीति को मिला दें, तो लोग ना सिर्फ चुप हो जाते हैं, बल्कि आपके गलत कामों का समर्थन भी करने लगते हैं।

मैं जब वर्ष 1992 में बस्तर आया तब तक गावों में रहने वाले आदिवासियों को होली, दीपावली, शिवरात्रि जैसे त्यौहारों के बारे में जानकारी नहीं मिली थी। आदिवासी गाय और बैल दोनों का उपयोग हल चलाते हेतु करते थे। यह उनके आहार में भी शामिल थे। बाद में भाजपा का शासन आने के बाद उन पर बजरंग दल के सदस्यों ने उनपर हमले करने शुरू किये और खेती के लिए बाज़ार से गाय, बैल ले जाने वाले आदिवासियों को पीटा और पशु छीन लिए। बाद में बड़े बड़े भ्रष्टाचार उजागर हुए कि कैसे यह गो-रक्षक इन गायों की गोशाला के नाम पर सरकारी पैसा डकार गए और गायों को भूखा मार दिया। 

बस्तर में दशहरे पर रावण का पुतला जलाने का कोई रिवाज़ नहीं था। बाद में भाजपा समर्थित समूहों ने बस्तर में रावण के पुतले जलाने की शुरुआत की। इस तरह जो लोग अपने त्यौहार बिना नफरत के मना रहे थे, उन समुदायों के बीच भी नफरत फैलाई गई। वैसे भी भारत में कुल्लू और मैसूर जैसी जगहों पर आज भी दशहरे पर रावण का पुतला नहीं जलाने का रिवाज़ है। 

जब मैं बस्तर आया था तब आदिवासियों के शादी संस्कार अपने थे ना कि ब्राह्मणवादी संस्कार। ना फेरे, ना सिंदूर और ना ही पति को परमेश्वर मानने की पुरुषवादी सोच। यहां तक कि महिलाओं द्वारा न पाँव छूना और ना ही करवा चौथ पर उपवास रखना। लेकिन आज आदिवसियों में यह सब फ़ैल गया है। इसका फायदा भाजपा ने चुनाव जीतने में खूब किया है।

दुनिया भर के मज़हब अपने मानने वालों के बीच फसाद को खत्म करने में विफल रहे हैं। मुसलमान ही मुसलमानों को मारते हैं। हिंदुओं में दबंग जातियों के लोग निम्न जातियों के लोगों को मारते हैं। ईसाई यूरोप और अमेरिका में हुए बड़े जनसंहारों के लिए ज़िम्मेदार हैं ही। इसके बावजूद ये सभी आदिवासियों को ‘सभ्य’ बनाने के लिए अपने धर्म में लाने की कोशिशें करने का दावा करते रहते हैं। 

लेकिन आदिवासियों की हालत बदलने का अगर कोई रास्ता है तो वह आदिवासियत का है क्योंकि आदिवासियों की भौगोलिक स्थिति अलग है। उनकी समस्याएं अलग हैं और उनके निदान के रास्ते भी अलग हैं। हिन्दू-मुसलमान-ईसाई बन कर वे अपनी समस्याओं का समाधान नहीं कर सकते। इस विषय में आदिवासी लेखिका कवि और कार्यकर्ता जेसिनता केरकेट्टा की यह पोस्ट पढ़ी जानी चाहिए– 

“पिछले दिनों एक अवॉर्ड [सम्मान] के लिए फोन आया। यह इंडियन कैथोलिक प्रेस एसोसिएशन (आईसीपीए) और कैथोलिक बिशप्स कांफ्रेंस ऑफ इंडिया (सीबीसीआई) द्वारा संयुक्त रूप से आदिवासियों से जुड़े मामलों पर लेखन के लिए देश के किसी एक पत्रकार को दिया जाता है। 

“इस अवॉर्ड को लेकर फोन आने के बाद मैंने उनका वेबसाइट पढ़ा और जाना कि यह सिर्फ़ ईसाई पत्रकार को दिया जाता है। मैंने उन्हें यह कहते हुए एक ईमेल भेजा कि मैं खुद को किसी धर्म के दायरे में नहीं रखती। मेरे माता-पिता से अपने आप जो संगठित धर्म मुझे मिला, होश संभालने के बाद मैंने खुद को उससे बाहर कर लिया है। संगठित धर्म ने आदिवासियों को जोड़ने की बजाय उनके बीच विभाजन पैदा किया है। समय है कि उस भेद को मिटाकर लोग आदिवसियत के नाम पर एक साथ आएं। गांवो में यही प्रयास है। मैं बतौर आदिवासी अपनी जड़ें तलाश रही हूं और यूनिवर्सल वैल्यू को ही केन्द्र में रखकर आदिवासियों की बात करती हूं। मुझे किसी धर्म के खेमे में रखे बिना जनपक्षधर लेखन के लिए कोई सम्मान दिया जाए तो खुशी होगी। 

“उन्होंने दूसरे दिन मेरी स्पष्टता की प्रशंसा करते हुए कहा कि यह अवार्ड सिर्फ़ ईसाई पत्रकार के लिए है और वे बंधे हुए हैं।

“बाद में देर तक सोचती रही जो खुद बंधे हुए हैं, वे दूसरों की मुक्ति की बात कैसे करते हैं? वह ईश्वर, जो उन्हें मुक्त नहीं कर पा रहा, वह शेष लोगों को किस तरह मुक्त करेगा? आदिवासियों के मुद्दों पर लेखन करने वाले आदिवासी क्यों सम्मानित नहीं किए जा सकते? उनका किसी संगठित धर्म से होना क्यों जरूरी है? मुझे खुशी और संतोष है कि समय रहते मैं अपनी बात कह सकी। 

“यह अनुभव सिर्फ़ इसलिए साझा कर रही हूं कि मानवता, व्यापकता की बात करते हुए भी कोई धर्म कैसे अपने आप में संकुचित होता है। यह लोगों को समझना चाहिए।”

(संपादन : नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

हिमांशु कुमार

हिमांशु कुमार प्रसिद्ध मानवाधिकार कार्यकर्ता है। वे लंबे समय तक छत्तीसगढ़ में आदिवासियों के जल जंगल जमीन के मुद्दे पर काम करते रहे हैं। उनकी प्रकाशित कृतियों में आदिवासियों के मुद्दे पर लिखी गई पुस्तक ‘विकास आदिवासी और हिंसा’ शामिल है।

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