गैर-ओबीसी व्यक्ति को सीएम बनाना रही भाजपा की सबसे बड़ी भूल : संजय कुमार

जो घटनाक्रम यूपी में पिछले चार-पांच दिनों से चल रहा है, वह इसका प्रमाण है कि ओबीसी फिर से भाजपा के खिलाफ गोलबंद हो रहे हैं। वे बार-बार ये कह रहे हैं कि भाजपा ऐसी पार्टी है, जिसमें ऊंची जाति के लोगों का वर्चस्व है। फारवर्ड प्रेस से विशेष बातचीत में प्रो. संजय कुमार

[उत्तर प्रदेश में चुनावी माहौल के संदर्भ में जो कुछ सामने आ रहा है, उसे लेकर तमाम तरह की कयासबाजियां व दावे किये जा रहे हैं। खासकर भाजपा के दलित-ओबीसी विधायकों, मंत्रियों व नेताओं द्वारा एक-एक कर सपा की सदस्यता लेने के बाद परिदृश्य में जो बदलाव आया है, उसके निहितार्थ क्या हैं। इसी आलोक में चुनावी विशेषज्ञ व सीएसडीएस के निदेशक प्रो. संजय कुमार से फारवर्ड प्रेस के हिंदी संपादक नवल किशोर कुमार ने दूरभाष पर बातचीत की। प्रस्तुत है इस बातचीत की पहली कड़ी]

उत्तर प्रदेश में जो चुनाव पहले बहुकोणीय लग रहा था, अब वह दो खेमों के बीच सीधा मुकाबला बनता लग रहा है। हाल के दिनों में हुई गतिविधियों के संबंध में आपकी प्राथमिक टिप्पणी क्या है?

वैसे तो उत्तर प्रदेश में कई पार्टियां चुनाव लड़ रही हैं, जिनमें समाजवादी पार्टी (सपा), भाजपा कांग्रेस, बसपा, एआईएमआईएम सहित तमाम क्षेत्रीय पार्टियां हैं। इनमें राष्ट्रीय लोक दल है और ओमप्रकाश राजभर जी की पार्टी भी है। कुछ पार्टियों ने समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन कर लिया है, और कुछ पार्टियों ने भाजपा के साथ। कांग्रेस अभी भी चुनावी मैदान में है और अकेले चुनाव लड़ रही है। बसपा भी अपना दम ठोक रही है और अकेले चुनाव लड़ने का दावा कर रही है। बसपा ने कई सीटों के लिए अपने उम्मीदवार भी घोषित कर दिए हैं। तो एक तरफ भाजपा ने गठबंधन बनाया है तो दूसरी तरफ सपा ने भी गठबंधन बनाया है। देखने में तो ऐसा लगेगा, जैसे चार पार्टियां लड़ रही हैं, क्योंकि सपा है, भाजपा है, कांग्रेस है और बसपा है। लेकिन जिस तरह से यूपी में चुनावी माहौल बना है, उसे देखते हुए लगता है कि दो ध्रुवीय मुकाबला है। एक तरफ सपा का गठबंधन है तो दूसरी तरफ भाजपा गठबंधन। जैसे-जैसे चुनाव आगे बढ़ता जा रहा वैसे-वैसे यह दो ध्रुवीय होता जा रहा है। आज से महीने, डेढ़ महीने तक तो भाजपा आगे दिखाई पड़ती थी और समाजवादी पार्टी उसके पीछे चल रही थी। तो कुछ लोगों के दिमाग में सवाल था कि क्या समाजवादी पार्टी ही टक्कर दे रही है या बसपा भी टक्कर में आएगी? लेकिन जैसे-जैसे चुनाव आगे बढ़ रहा है और बिल्कुल एक आम मतदाता के नजरिए से अगर यू.पी. को देखें तो सभी को लगता है, कि चुनाव यहां दो ध्रुवीय है। जिस तरह से भाजपा से अब टूट करके उसके नेता सपामें जा रहे हैं, उससे इस बात को बल मिल रहा है कि सपा ही भाजपा को टक्कर दे रही है। स्पष्ट रूप से अब यह चुनाव दो ध्रुवीय है और इसमें शक-सुबहा की कोई बात नहीं है।

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