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आंखन-देखी : अपने गांव-गिरांव में जननायक कर्पूरी ठाकुर 

कर्पूरी ग्राम में जननायक के बड़े बेटे व राज्यसभा सांसद रामनाथ ठाकुर अदब से मिले। कहने लगे कि मेरे पिता ने देखी थी भीषण गरीबी। 1940 में फार्म भरा जाना था। दो रुपये फीस लगती थी। उनके पास पैसे नहीं थे कि फार्म भरें। वे शंभू पट्टी के बच्चा बाबू के पास गए और अपनी समस्या बतलायी। बच्चा बाबू ने उन्हें 27 बाल्टी से स्नान कराया, तब जाकर उन्होंने दो रुपया दिया। जननायक की जन्मस्थली से बता रहे हैं अरुण आनंद

 जननायक कर्पूरी ठाकुर (24 जनवरी, 1924 – 17 फरवरी, 1988) पर विशेष

बिहार में पिछड़ा वर्ग के लिए आरक्षण लागू कर सामाजिक न्याय का बिगुल फूंकने वाले जननायक कर्पूरी ठाकुर की तरह ही उनके गांव का भी एक आकर्षण है। जननायक अपनी सोच में जितने आधुनिक थे, अपनी रहन-सहन के लिहाज से उतने ही ग्रामीण। मानो कार्ल मार्क्स, आंबेडकर और गांधी का एक अभिराम युग्म उनके व्यक्तिव का हिस्सा हो। उनके गांव जाकर उनके बारे में जानने की एक इच्छा दबी पड़ी थी। कोई संयोग नहीं बन रहा था। इसी वर्ष हाल ही में एक सुबह पटना से उनके गांव के लिए हम रवाना हुए। कई दिनों के कोहरे के बाद अच्छी धूप निकली थी। 

पटना से समस्तीपुर पहुंचे तो पत्रकार राजकुमार राय से मुलाकात हुई, जिनके कारण हमारी यह यात्रा सुगम हो गई। हमारी गाड़ी समस्तीपुर मुख्यालय से ताजपुर की ओर बढ़ती है। यह वही ताजपुर मार्ग है जो ताजपुर प्रखंड मुख्यालय को जाती है, जहां से कर्पूरी जी 1952 से 1962 तक लगातार विधायक रहे। इस मार्ग से 7 किलोमीटर की दूरी पर बाईं ओर एक सड़क मुड़ती है, जहां मुख्य मार्ग पर ही कर्पूरीग्राम का बोर्ड लगा है। सड़क के दोनों ओर पक्के मकान हैं। आगे बढ़ने पर दाहिने ओर पेट्रोल पम्प फिर खजूर, केले और ताड़ के पेड़ नजर आते हैं। खेतों में आलू की हरी-खूबसूरत पत्तियां नजर आती हैं। फिर परती खेत दिखते हैं, जहां कई दिनों के बाद निकली धूप में स्त्रियां कपड़े धो रही हैं और लड़के खेल खेलने में मस्त। 

गांव की सीमा पर लगा साइन बोर्ड

आगे बढ़ता हूं तो रामनाथ ठाकुर का मकान नजर आता है, जहां कई बड़ी गाड़ियां लगी हैं। उन्हें छोड़ आगे कर्पूरी स्मृति भवन की ओर बढ़ता हूं। तिमंजिले स्मृति भवन के आगे लम्बा खुला हुआ ढलाई किया भूखंड है, जिसके बायें हिस्से में रंग-बिरंगे फूल खिले हैं। एक चापाकल लगा है। पास में ही सूखने के लिए गेहूं के दाने फैलाये गए हैं और स्मृति भवन द्वार के पास ही लोगों को कोरोना से बचाने के लिए टीकाकरण केंद्र चल रहा है, जहां दो महिलाएं तैनात हैं। वहीं पर हमारी भेंट होती है पिंटू सिंह से। वे निशा ठाकुर का परिचय देते हैं। लेकिन वह पिंटू सिंह से ही बात करने को कहती हैं। पिंटू बाबू साहब [अधिकारी] हैं। कहते हैं– “हमारे पूर्वज राजस्थान के धारनगर से आकर यहां बसे। हमारे पूर्वज रामजी चौधरी 22 मौजे के मालिक थे।” यह पूछने पर कि गांव में अधिकतम कितनी जमीन वाले रह गए हैं, वे कहते हैं, “अब लोगों की जमीन काफी कम गई है। फिर भी 50 बीघे जमीन कई लोगों के पास है।” 

कर्पूरी जी की चर्चा चलने पर उन्होंने कहा कि उनके पास रहने के अलावा अलग से कोई जमीन नहीं थी। “पितौंझिया [जननायक के गांव का पुराना नाम, अब कर्पूरी ग्राम] के साढे बारह कट्ठे जमीन में उनकी नाई जाति का एक ही परिवार था। उनके पिता गोखुल ठाकुर बटईया (बटाईदारी) खेती करते थे और साथ में बाल-दाढी बनाने का पुश्तैनी काम।”

 यह भी पढ़ें – जननायक कर्पूरी ठाकुर को जैसा मैंने देखा : अब्दुल बारी सिद्दीकी (पहला भाग)

कर्पूरी स्मृति भवन के पास ही का एक शिलापट्ट है। इसके मुताबिक, बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद द्वारा 17 फरवरी, 1997 को इसका शिलान्यास किया था। निशा ठाकुर कुछ बात करना चाहती हैं। खुद को वह कर्पूरी ठाकुर की चचेरी पुतोहू बतलाती हैं। उन्होंने कर्पूरी जी को देखा नहीं लेकिन इस स्मृति भवन की केयर टेकर वही हैं। उन्होंने बतलाया कि गोखुल ठाकुर के दो बेटे थे। बड़े कर्पूरी ठाकुर और छोटे रामस्वारथ ठाकुर। कर्पूरी ठाकुर के दो बेटे हुए– रामनाथ ठाकुर और वीरेंद्र ठाकुर। और एक बेटी हुईं रेणु जो दिवंगत हो गईं। रामनाथ संप्रति राज्यसभा के सदस्य हैं और वीरेंद्र ठाकुर पेशे से डाक्टर हैं। रामस्वारथ ठाकुर 2007 मेें दिवंगत हो गए। उनके भी दो पुत्र हुए जिनमें बड़े कपिलेश्वर ठाकुर दिवंगत हो गए। उनके दूसरे पुुत्र नित्यानंद ठाकुर गांव के ही वित रहित काॅलेज में हेड क्लर्क हैं। निशा ठाकुर उन्हीं की पत्नी हैं। वह भी आंगनबाड़ी सेविका हैं। इस स्मृति भवन के पीछे ही उनका घर है जो इंदिरा आवास योजना के तहत बनाई गई है। 

वह बतलाती हैं कि कर्पूरी ठाकुर का पुश्तैनी आवास झोपड़ी रूप में मौजूद था। तब यहां आने के लिए सड़क नहीं थी। पतली-सी पगडंडी थी, जो ज्यादातर समय पानी में ही डूबी रहती थी। स्मृति भवन निर्माण के समय यह रास्ता निकाला गया, तब आज यहां गाड़ी भी आती है। वह बतलाती हैं कि जब उनकी शादी हुई थी तो घर तक गाड़ी नहीं आ सकी। कीचड़ में ही फंस कर रह गई। उन्हें गाड़ी पर से उठाकर यहां लाया गया था। झोपड़ी थी। दरवाजा भी संकरा था, झूककर जाना पड़ता था। उनकी मानें तो कर्पूरी जी के परिवार को कोई दिक्कत न थी, लेकिन शौक से पुश्तैनी काम उनके माता-पिता और पत्नी भी करती थीं।

कर्पूरी स्मृति भवन में पिता गोखुल ठाकुर, कर्पूरी ठाकुर व उनकी मां रामदुलारी देवी की आवक्ष प्रतिमाएं

निशा ठाकुर द्वारा संचालित आंगनबाड़ी केंद्र जननायक स्मृति भवन के ही बाहर बायीं ओर के बने कमरे में चलता है। उनके साथ स्मृति भवन के अंदरखाने में दाखिल होता हूं। सामने घनी मूछों में कर्पूरी जी की जीवंत आदमकद प्रतिमा है। कमरे के दाहिने ओर एक बेंच है और बाईं-दाई ओर एक-एक कमरे हैं। उपर के तल पर चढ़ता हूं, जहां से दाहिनी ओर आंगन दिखता है। वहां सिलौटी पर पालक और मूली की हरी-हरी सब्जियां रखी हैं। नल और वाटर प्यूरीफायर लगा है। बर्तन रखने का स्टैंड है। उसके उपर वाले तल पर भी कुछ कमरे हैं। छत पर जाता हूं। हमें कहीं भी पुराने दिनों के कोई अवशेष वहां नजर नहीं आते। सामने एक खंडहर होने की ओर बढ़ती हुई हवेली नजर आती है। तत्क्षण हमें एक घटना की याद हो आती है। सुना था कर्पूरी जी ने मैट्रिक प्रथम श्रेणी में उतीर्ण किया था। उनके पिता ने गांव के ऐसे ही किसी हवेली के बाबू साहब के पास अपने बेटे की सफलता की खुशी साझा की और उनसे मदद का आग्रह किया। तो उस बाबू साहब ने कहा था कि नान्हका (बेटा) पढ़ लिखकर क्या करेगा। आओ हमारा पैर दाबो। 

कर्पूरी जी ने कभी इन घटनाओं को अपने जीवन से नहीं सटाया, लेकिन यह कैसी विडम्बना है कि सौ वर्ष से भी कम समय में वह हवेली खंडहर होती गई और झोपड़ी में कैद कर्पूरी जी का वह घर हर साल राजकीय समारोह का मुख्य आकर्षण बन गया। 

स्मृति भवन से सटे शम्मी का पेड़ है। पेड़ के नीचे उनके पित्तर महामाया गोंसाई का पिंड है। आगे परीत खेत है, उसके बाद वाले टोपड़े (छोटे भूखंड) में आलू की फसल लगी है और उसके बाद खपड़ैल मकान है। गांव के दूसरे लोगों से मिलने के ख्याल से वहां से आगे बढ़ता हूं तो सामने एक नाटे कद की सांवली-सी महिला बहुत उत्सुकता के साथ हमें अपने जद में ले लेती हैं। उनका नाम निर्मला देवी है। वह मजदूरी करती हैं। कहती हैं गांव के पुरूषों के मुकाबले हमें मजदूरी की दर पच्चास रुपए कम मिलती है। अपने गांव में आये हम जैसे नवागंतुक उनकी सुनें और उनकी समस्या का निराकारण हो, इस उम्मीद में वे हमसे अपनी ही बानी में संवाद करती हैं। वह कहती हैं गोतिया (आपसी परिवार एक ही गोत्र के) के लोग आने-जाने का रास्ता नहीं देना चाहते। बराबर तंग करते हैं। उसके घर तक बिजली का खंभा भी नहीं है। उसने खुद की कोशिश से बिजली की तार अपने घर तक किसी तरह तान रखी है। तीन संतानों की मां पार्वती हमसे मिन्नत करती रही कि मैं उनके गोतिया दियाद से उसके घर आने-आने का रास्ता दिलवा दूं। 

हमने कहा कि रामनाथ ठाकुर से क्यों नहीं कहती हैं तो पार्वती एकदम से खामोश हो जाती हैं। 

मैं उनके घर जाता हूं तो पतई से बनी उनकी झोंपड़ी पर नजर जाती है। साथ में उनके बच्चे वहीं पर खड़े हैं। उन्हें देखकर मुझे कर्पूरी जी के समय, परिवेश और संघर्ष का कुछ-कुछ अंदाजा मिलता है। पार्वती स्वयं उसी गांव में एक ही घर से बसे नाई परिवार से ही आती हैं, और उनकी सुनने वाला कोई नहीं। वह कहती हैं बाबू कुछ ऐसा कीजिए की जीने का मकसद मिले। आगे उन्होंने जो कहा, वह सुनकर तो मैं दंग रह गया। उसने बतलाया कि कर्पूरी स्मृति भवन जहां बनी हुई है, उसका एक हिस्सा हमारी सास की जमीन का है। स्मृति भवन की जमीन पहले सीधी नहीं थी, हमारे हिस्से की जमीन दी गई तब वह ढंग की हो पाई और आज वे ही हमें तंग करने का कोई मौका नहीं छोड़ते।

पितौंझिया गांव को कर्पूरी ग्राम के रूप में राजस्व ग्राम का दर्जा बिहार के मुख्यमंत्री भागवत झा आजाद के कारण मिला। वर्तमान में ढाई से तीन हजार की आबादी वाले इस गांव में दो तिहाई राजपूत हैं। उनके यहां तकरीबन दो सौ घर हैं। इसके अलावे दस घर धानुक (ओबीसी), उतने ही पासवान, चमार जाति समूह हैं। 4 घर नाई, 2 घर ब्राह्मण और 4 घर बढ़ई परिवार भी यहां वास करते हैं। कर्पूरी ग्राम में कुल 15 वार्ड है। वर्तमान में कर्पूरी स्मृति भवन सात नंबर वार्ड में अवस्थित है। इसकी मुखिया सविता देवी पासवान हैं और हरेंद्र राम वार्ड सदस्य हैं। यह वह ग्राम पंचायत है जहां सामुदायिक भवन, पुस्तकालय, काॅलेज, हाई स्कूल, मिडिल स्कूल, प्राइमरी स्कूल, सरकारी अस्पताल, बैंक और रेलवे स्टेशन भी हैं। चमार जाति समूह के लोग लगभग भूमिहीन हैं। वे सरकारी जमीन पर बसे हैं। गांव में कुल 1664 वोटर हैं और दो मतदान केंद्र। यह सूचना स्कूल परिसर में ही एक सूचना पट्ट पर दर्ज है। गांव में खेती किसानी का पैटर्न पारम्परिक गति से ही होता रहा है। बहुत सारे लोग आज भी मजदूरी के लिए बिहार से बाहर पलायन को विवश रहे हैं। गांव में दस साल पहले गिट्टी मंडी खुला है। एक दिन में एक से तीन हजार तक की कमाई वहां लोगों को हो जाती है। इस बिजनेस पर गांव के बाबू साहबों (राजपूतों) का कब्जा है। 

गांव में मजदूरी की दर पुरुषों के लिए तीन सौ और उसी काम के लिए महिलाओं को ढाई सौ दिया जाता है। गांव में ही हमारी मुलाकात रामचंदर महतो से होती है। वे खेती-किसानी करते हैं। कहते हैं खुद खेती करता हूं, लेकिन यह फायदे का नहीं, घाटे का सौदा है। मजदूर कहां मिलता है? लाभ से ज्यादा लागत ही लग जाती है। यह पूछने पर कि फसलों की बीमा भी करवाते हैं, तो कहते हैं कि गेहूं, धान का बीमा करवाया था। 

मैं आगे तिरहुत एकेडमी में जाता हूं, जहां कर्पूरी जी हेडमास्टर रहे थे और 1942 के आंदोलन में हिस्सेेदारी के कारण बाद में उन्हें जेल की सजा दी गई। वहां से निकलता हूं तो रामनाथ ठाकुर के आवास के पास रूकता हूं। उनका बड़ा-सा बैठका है। बाईं ओर शेड़स लगे हैं और दाहिनी ओर दर्जन भर कुर्सियां लगी हैं। वहां लगभग आधा दर्जन लोग बैठे हैं। उनमें एक महिला हैं। नाम है शकुंतला वर्मा। 

रामनाथ ठाकुर बड़े अदब से मिलते हैं औरों का परिचय देते हैं। वहीं हमारी मुलाकात पुनास गांव के दिनेश सिंह से होती है। उनके पास कर्पूरी जी से जुड़ी ढेरों स्मृतियां हैं। बतलाते हैं कि 1979 के चुनाव में कर्पूरी जी हमारे गांव गए। गांव में मर्डर हो गया था, जिसकी वजह से लोगों ने वोट का बहिष्कार किया था। जीतने के बाद जननायक गांव गए। जिसका मर्डर हुआ था, उसके पक्ष में प्रशासन को मुस्तैद करके अपराधी को सजा दिलवाई। उन्होंने एक और घटना का जिक्र किया, जिसकी चर्चा यहां लाजमी है। 

बेगूसराय में एक इंस्पेक्टर की लोगों ने हत्या कर दी थी। कर्पूरी जी मुख्यमंत्री थे। वे उस गांव में गए। उस घटना से पूरा गांव दुखी था। लोगों ने उन्हें घेर लिया और अभद्र भाषा का उपयोग करने लगे। डीजीपी और मुख्य सचिव ने बार-बार बल प्रयोग करने की इजाजत मांगी, लेकिन कर्पूरी जी ने इसकी इजाजत नहीं दी। लेकिन वही कर्पूरी जब श्राद्ध के दिन उस गांव गए तो लोगों ने अपार श्रद्धा के साथ उनका स्वागत किया। 

रामनाथ ठाकुर कहते हैं, “मेरे पिता ने देखी थी भीषण गरीबी। 1940 में फार्म भरा जाना था। दो रुपये फीस लगती थी। उनके पास पैसे नहीं थे कि फार्म भरें। वे शंभू पट्टी के बच्चा बाबू के पास गए और अपनी समस्या बतलायी। बच्चा बाबू ने उन्हें 27 बाल्टी से स्नान कराया, तब जाकर उन्होंने दो रुपया दिया। तब तिरहुत एकेडमी में उनका फार्म भराया। वे जब सीएम हुए तो वही गरीबताई (गरीबी) उनके ध्यान में थी, जिसको ध्यान में रखकर अंग्रेजी की अनिवार्यता उन्होंने खत्म की।” रामनाथ आगे कहते हैं कि हमने पिता जी का मैट्रिक का अंकपत्र निकलवाया तो देखा कि अंग्रेजी में उन्हें 86 प्रतिशत नंबर आये थे। 

राज्यसभा सांसद रामनाथ ठाकुर

गांव में प्रभावती रामदुलारी इंटर महाविद्यालय का रूख करता हूं। गोखुल कर्पूरी ग्राम महाविद्यालय उसका नाम है। काॅलेज के अंदर एक कमरे में कर्पूरी जी और उनके मां-पिता की भव्य त्रिमूर्ति लगी है, जिसका उद्घाटन 24 जनवरी 2006 को नीतीश कुमार द्वारा किया गया। इसके पहले मुलायम सिंह यादव का भी एक शिलापट्ट नजर आता है। 1997 में इस इंटर डिग्री काॅलेज की स्थापना की गई थी। पहले इंटर काॅलेज खुला। मुलायम सिंह के प्रयास से टाटा ने इसकी बिल्डिंग बनवाई। हम जब पहुंचे तो महाविद्यालय वीरान था। एक टीचर मिले तो हमने कहा कैसे हैं, इसपर उनकी भृकुटी तन गई। कहने लगे कि वर्ष 12 से अभी तक हमें अनुदान के पैसे नहीं मिले और आप पूछते हैं कि कैसे हैं? 

मुझे उस समय कर्पूरी जी का वह भाषण याद आता है जो सदन का उनका आखिरी वक्तव्य था। उन्होंने कहा था, “हमारे यहां दो प्रकार की शिक्षा प्रणाली चल रही है। एक अंगीभूत महाविद्यालय, जिसके शिक्षकों को आर्थिक लाभ मिलता है और उन्हें हर प्रकार की सुविधा दी जाती है। दूसरा संबद्ध महाविद्यालय है, जिसके शिक्षक और शिक्षकेतर कर्मचारियों को समय पर वेतन तक नहीं मिलता है। आज इंटर कालेज और सम्बद्ध महाविद्यालय की स्थिति यह है कि उसके शिक्षक और शिक्षकेत्तर कर्मचारी वेतन के लिए मारे-मारे फिरते हैं। लोकतंत्र में समान शिक्षा होनी चाहिए। यही समाजवाद की मूलधारा है। अगर सरकार आर्थिक समता और सामाजिक समता के विपरीत काम करती है तो वह पूंजीवाद की पोषक है।”

आगे हमारी मुलाकात राजद के पूर्व विधायक दुर्गा प्रसाद सिंह से होती है, जो कर्पूरी ठाकुर के साथ गहराई से जुड़े रहे। उनके पास कर्पूरी जी से जुड़े संस्मरणों का भंडार है। हम देर तक समस्तीपुर के सर्किट हाउस में दुर्गा बाबू की आंखों देखी कर्पूरी किस्सों की यादें में रमते रहे और दुर्गा बाबू अपनी यादों की पोटली से एक से एक संस्मरण साझा करते रहे। उन्होंने एक किस्सा वरिष्ठ समाजवादी लीडर चौधरी देवीलाल का सुनाया। यह कर्पूरी जी के निधन के बाद का प्रसंग है। बकौल दुर्गा बाबू, “देवीलाल हरियाणा में एक कार्यक्रम करवा रहे थे। उस समय अजीत मेहता समस्तीपुर से सांसद थे। देवीलाल की इच्छा थी कि कार्यक्रम में कर्पूरी जी का बैनर लगवायें। इसके लिए कर्पूरी जी का फोटो उन्हें कूरियर से भेजा गया। समय से उनतक फोटो नहीं मिलने के कारण देवीलाल इतने अधीर हो गए कि इस बीच उन्होंने 85 बार फोन किया। इसके लिए मुझे इतनी डांट पड़ी कि अंततः मुझे स्वयं वहां जाना पड़ा। तब वह 13 लोधी स्टेट रोड वाले आवास में रहते थे। कूरियर वाले को उनका घर मिल नहीं रहा था। मैं कूरियर वाले को साथ लिए हुए ही उनके घर पहुंचा था। तो यह सम्मान था एक समाजवादी नेता का कर्पूरी जी के प्रति।”

बात उन दिनों की है जब कर्पूरी जी लोकसभा का चुनाव रामदेव राय से हार गए थे। उसी का पुनर्मतदान हुआ था। “पतरिया गांव में कर्पूरी जी की गाड़ी खराब हो गई। रामदेव राय उसी रास्ते मोटरसाइकिल से जा रहे थे। उन्होंने कर्पूरी जी को इस हालत में देखा तो उन्हें अपनी मोटरसाइकिल पर बैठा लिया और दोनों साथ पथरिया गए। हालांकि उस चुनाव में कर्पूरी जी रामदेव राय से चुनाव हार गए, लेकिन इसपर रामदेव राय से लोगों ने प्रतिक्रिया जाननी चाही तो उन्होंने कहा कि कर्पूरी जी न चुनाव हारे हैं न हारने वाले हैं। वे स्टाॅलवर्ट हैं। रामदेव राय कर्पूरी जी के खिलाफ लड़ने के पक्ष में नहीं थे। राजीव गांधी के दबाव पर उन्हें लड़ना पड़ा था।” 

कर्पूरी जी लोक मानस में अपने समय से कहीं ज्यादा आज नजर आते हैं, यह हमने अपनी इस यात्रा में अलग-अलग लोगों से मिलकर महसूस की। लोक में उनकी छवि गहरे रूप मेंमकबूल हो चुकी है। उनकी शोहरत एक आदर और आदर्श का रूप ले चुकी है। अपने पुरखा लड़ाका की इस मकबूलियत से मैं गहरे अभिभूत होकर वापस लौट चलता हूं।

(संपादन : नवल/अनिल)

लेखक के बारे में

अरुण आनंद

लेखक पटना में स्वतंत्र पत्रकार हैं

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