यूपी चुनाव : धर्म कितना अहम?

उत्तर प्रदेश में पहले तीन चरण के मतदान संपन्न हो चुके हैं और सभी दलों की निगाह अब अवध और पूर्वांचल पर है, जहां अगले चार चरणों में मतदान होने हैं। इसे देखते हुए भाजपा धर्म के आधार पर ध्रुवीकरण का प्रयास कर रही है। इस संबंध में पूर्वांचल के सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ताओं के विचार बता रही हैं आकांक्षा आजाद

राम मंदिर का मुद्दा भाजपा के लिए सबसे प्रमुख मुद्दों में से एक है। सन 1990 के बाद से ही भाजपा इसे भुनाने में लगी है। उत्तर प्रदेश में पहले तीन चरण के मतदान संपन्न हो चुके हैं और सभी दलों की निगाह अब अवध और पूर्वांचल पर है, जहां अगले चार चरणों में मतदान होने हैं। इसे देखते हुए भाजपा धर्म के आधार पर ध्रुवीकरण का प्रयास कर रही है। इसके लिए वह राम मंदिर का श्रेय ले रही है और यह नारा उछाला जा रहा है कि “चुनिए उन्हें जो राम को लाए हैं”। वहीं काशी विश्वनाथ मंदिर के सौंदर्यीकरण का श्रेय भी लेने की कोशिश जारी है। इस संबंध में पूर्वांचल के सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ताओं की राय अलग-अलग है।

जनता को मंदिर नहीं, स्कूल-कॉलेज-अस्पताल चाहिए

ऑल इंडिया प्रोग्रेसिव वुमेन एसोसिएशन (ऐपवा) उत्तर प्रदेश की सचिव कुसुम वर्मा कहती हैं कि भले ही भाजपा राम मंदिर के मुद्दे पर चुनाव जीतना चाहती है, लेकिन वास्तविकता यह है कि राम मंदिर का मुद्दा इस चुनाव में भाजपा को कोई फायदा नहीं पहुंचाएगा। प्रदेश की जनता संघ-भाजपा के मंदिर निर्माण और उसके पीछे की साम्प्रदायिक राजनीति को अच्छी तरह समझ चुकी हैं। पूरे प्रदेश में स्वास्थ्य, शिक्षा, गरीबी-भुखमरी की क्या हालत है। इन मुद्दों को ढकने के लिए योगी सरकार राम मंदिर का मुद्दा लाई है। वह कहती हैं कि कोरोना में प्रदेश की जनता ने स्वास्थ्य सुविधाओं के अभाव में अपनो को खोया है। योगी सरकार ने कोरोना के दौरान कोई विशेष तैयारी नहीं की। ऑक्सीजन के अभाव में कितने लोगों ने दम तोड़ दिया। गंगा में बहती लाशों को कौन भूल सकता है। इसलिए जनता चाहती है कि सरकार अस्पताल, स्कूल बनवाये। 

हिंदुत्व की राजनीति कारपोरेट की दलाली

भारतीय जीवन बीमा निगम के रिटायर्ड कर्मचारी, लेखक और भाकपा माले से जुड़े वी. के. सिंह कहते हैं सांप्रदायिक हिन्दुत्व की राजनीति में धार्मिक कर्मकांडो के नाम पर हिन्दू वोट की गोलबंदी उनका एकमात्र एजेंडा है। लेकिन आज के संदर्भ में भाजपा की सारे राजनीतिक दांव उलटे पड़ रहे हैं। सरकार जनता के हर मुद्दे यानि बेरोजगारी, महंगाई, शिक्षा और स्वास्थ्य आदि के मामले पर बुरी तरह से विफल रही है। समग्र रूप में देखें तो यह सरकार गरीब, दलित और अल्पसंख्यकों के जीवन अस्तित्व और अस्मिता की सबसे बड़ी दुश्मन साबित हो रही है। फासीवादी हिन्दुत्व राजनीति की नीतियों और नियत का जनता और उसके मुद्दों से दूर दूर तक कोई नाता नहीं है। उसकी एकमात्र प्राथमिकता कारपोरेट नव उदारवाद की दलाली है। ऐसे में वोट के लिए धर्म के आधार पर गोलबंदी के अलावा भाजपा के पास कोई चारा नहीं है। यहां यह समझना जरूरी है कि भाजपा के धर्म का हिन्दू धर्म अथवा संस्कृति से कोई लेना देना नहीं है। 

राम मंदिर का लाभ मिलेगा भाजपा को

जबकि अखिल भारतीय वैतालि अखाड़ा परिषद के प्रणवानन्द के अनुसार अयोध्या में राम मंदिर निर्माण भारतीय जनता पार्टी की नींव के ईंट के समान है। इसी नींव पर यह पार्टी फलेगी-फुलेगी। इस पार्टी ने कई सालों तक राम मन्दिर लिए अथक प्रयास किया। इसका इनाम इस चुनाव में भाजपा को जरूर मिलेगा। इसके साथ ही हिंदुत्व के एजेंडा और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद भी असर दिखेगा।

यूपी में मतदान के बाद महिलाएं

आकर्षणहीन हो गया है मंदिर का मुद्दा

वहीं, जय किसान आंदोलन से जुड़े किसान नेता रामजनम का स्पष्ट रूप से मानना है कि राम मंदिर का भाजपा को कोई विशेष फायदा मिलते नहीं दिख रहा भले भाजपा ने कितना भी प्रचार किया हो। जमीनी हकीकत तो कुछ और ही है। एक समय में हिंदू समाज में राम मंदिर का आकर्षण रहा है। इस मुद्दे को भाजपा ने 2017 और 2019 के क्रमशः विधानसभा और लोकसभा चुनावों में भी भुनाया था।

माहौल सांप्रदायिक लेकिन भाजपा का चेहरा उजागर

समाजवादी जनपरिषद के अफ़लातून अफ़्लू का मानना है कि राम मंदिर का मुद्दा जनता के लिए फीका पड़ चुका है। इससे भाजपा फायदा भी नहीं ले पाएगी। हालांकि विश्वनाथ कॉरिडोर का कुछ फायदा उन्हें इस चुनाव में मिल सकता है। इन सभी के कारण साम्प्रदायिकता का माहौल तो है ही लेकिन आज भाजपा पूरी तरह से एक्सपोज हो चुकी है। इसका कारण है किसान आंदोलन। 

जनता मंदिर के निर्माण से खुश

भारतीय जनता युवा मोर्चा के चतुभुर्ज स्वामी का मानना है कि भाजपा एक मात्र पार्टी है जो हिन्दू केंद्रित राजनीति कर रही है। राम मंदिर का निर्माण का पूरा श्रेय भाजपा व इसके कार्यकर्ताओं को जाता है। राम मंदिर निर्माण भारतीय राजनैतिक परिदृश्य में भाजपा के हिंदू केंद्रित राजनीति के प्रतिफल के रूप आम जनता में देखा जा रहा है। जनता भी मंदिर के निर्माण से खुश है। 2022 के विधानसभा चुनाव में इसका व्यापक असर दिखेगा। हमारी पार्टी बहुमत हासिल करके नम्बर वन पार्टी बनकर उभरेगी।

मंदिर के कारण बढ़ रही एकजुटता

अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के गतिविधियों में सक्रिय रजनीश का आकलन है कि अयोध्या, मथुरा और काशी का विषय हिंदुओ की धार्मिक और आध्यात्मिक चेतना से जुड़ा विषय है। राम मंदिर का निर्माण और काशी कॉरिडोर के निर्माण से निःसन्देह हिंदुओ के राजनीतिक एकीकरण के लक्ष्य प्रकटीकरण हो रहा है। इस चुनाव में इसका स्पष्ट प्रभाव दिखेगा। सिर्फ उत्तर प्रदेश ही नहीं अन्य राज्यों के चुनाव में भी इसका असर दिखेगा। 

मंदिर केवल मूल मुद्दों से जनता का ध्यान भटकाने के लिए है                 

उत्तर प्रदेश के जमीनी संस्कृतिकर्मी युद्देश बेमिसाल बताते हैं कि जब भी किसी देश में संकट की स्थिति होती है, बेतहाशा बेरोजगारी होती है और जनता में त्राहि-त्राहि कर रही होती है, तब भाजपा जैसी फासीवादी ताकतें एक आभासी दुश्मन खड़ा करती है। जिस तरह हिटलर ने जर्मनी में किया था। यह आभासी दुश्मन आंतरिक दोनों होता है। भाजपा ने भी कुछ ऐसा ही किया है। जनता का मूलभूत मुद्दों से ध्यान हटाने के लिए उसने भारत के अंदर पूरे मुसलमान समुदाय को ही एक दुश्मन की तरह प्रचारित कर दिया, जिसमें कॉरपोरेट की मीडिया ने उसका बखूबी साथ दिया। फासीवादी ताकतें लोगों में अंध-राष्ट्रभक्ति पैदा करती हैं। सेना को मजबूत करके उसी देश के जनता पर दमन का कोई मौका नहीं छोड़ती। जब भी जनता संकट के कारण अपना प्रतिरोध करती हैं तब इसी सेना द्वारा उनका दमन किया जाता है। हम देखते हैं कि लव जिहाद, राम मंदिर जैसे मुद्दे जनता के बेसिक मुद्दों से ध्यान हटाने का एक जरिया है। 

(संपादन : नवल/अनिल)


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