यूपी चुनाव : चार चरणों के मतदान के बाद कयासबाजियां और संभावनाएं

यूपी में सत्ता की दावेदार दोनों प्रमुख पार्टियों, यानी भाजपा और सपा के नेताओं के हाव-भाव और आत्मविश्वास में फर्क़ साफ महसूस किया जा सकता है। हो सकता है पहले चार चरण में दो सौ सीटों पर जीत की अखिलेश का दावा अतिश्योक्ति हो, लेकिन 403 में से बची हुई 171 सीटों में पलड़ा सपा के पक्ष में झुका हुआ साफ नज़र आ रहा है

त्वरित विश्लेषण

उत्तर प्रदेश में चार चरण की वोटिंग पूरी हो चुकी है। चौथे चरण की अधिकतर सीट उस इलाक़े में हैं जिसे पारंपरिक तौर पर भाजपा का गढ़ माना जाता है। लेकिन क्या भाजपा अवध और तराई में अपने मज़बूत क़िले बचाने में कामयाब रहेगी? यह एक ऐसा सवाल है जिसका जवाब सीधे तौर पर भाजपा के नेता भी अब देने से बच रहे हैं।

गत 23 फरवरी, 2022 को जिस वक़्त उत्तर प्रदेश में चौथे चरण के लिए मतदान हो रहा था, बहराइच की एक चुनावी सभा में सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने दावा किया कि उनकी पार्टी अब बहुमत के क़रीब है। हालांकि पिछले एक दो दिन में गृह मंत्री अमित शाह समेत भाजपा के भी कई नेता इस तरह के ऐलान करते नज़र आए हैं। लेकिन यूपी में सत्ता की दावेदार दोनों प्रमुख पार्टियों, यानी भाजपा और सपा के नेताओं के हाव-भाव और आत्मविश्वास में फर्क़ साफ महसूस किया जा सकता है। हो सकता है पहले चार चरण में दो सौ सीट की अखिलेश का दावा अतिश्योक्ति हो, लेकिन 403 में से बची हुई 171 सीटों में पलड़ा सपा के पक्ष में झुका हुआ साफ नज़र आ रहा है।

अनौपचारिक बातचीत में पहले दो चरण के दौरान नुक़सान की बात भाजपा के नेता भी स्वीकार कर रहे हैं। हालांकि भाजपा नेताओं का मानना था कि पहले चरण का नुक़सान मध्य यूपी में, दूसरे चरण का बुंदेलखंड में और तीसरे की भरपाई अवध क्षेत्र में आराम से हो रही है। पूर्वांचल में भाजपा अपने लिए बढ़त की उम्मीद लगा रही थी। चौथे चरण की वोटिंग में जिस तरह के रुझान सामने आ रहे हैं उसे देखते हुए भाजपा के लिए चिंता बढ़ना लाज़िम है। न सिर्फ तराई में, जहां किसान आंदोलन के अलावा पार्टी की अंदरूनी कलह से नुक़सान है, लखनऊ जैसे भाजपा के मज़बूत क़िले में भी दरारें नज़र आ रही हैं।

कयास लगाया जा रहा है कि चौथे चरण में भाजपा जहां लखनऊ कैंट, लखनऊ पूर्वी, हरदोई, लखीमपुर खीरी, उन्नाव, बांदा, सेवता, फतेहपुर, जैसी सीटों पर मज़बूत दिख रही है। वहीं लखनऊ पश्चिम, लखनऊ मध्य, सरोजिनी नगर, बख़्शी का तालाब, मलीहाबाद, सफीपुर, मोहान, पुरवां, संडीला, शाहबाद, निघासन, पलिया, अयाह शाह, हुसैनगंज, खागा, तिंदवारी और नरैनी, हरचंदपुर, ऊंचाहार, बिसवां, सिधौली और लहरपुर में सपा का पलड़ा भारी है। 

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के एक ग्रामीण इलाके में वोट के लिए कतार में लगे लोग। बड़ी संख्या में महिलाएं भी हुईं हिस्सेदार

चौथे चरण में 9 ज़िलों की जिन 60 सीटों के लिए वोट डाले 2017 में उनमें से 51 भाजपा ने और एक सीट उसकी सहयोगी अपना दल (एस) ने जीती थी। बसपा को एक, कांग्रेस को तीन और सपा को चार सीटों पर सफलता मिली थी। बाद में बसपा और कांग्रेस के विधायक भाजपा में शामिल हो गए। भाजपा को उम्मीद थी कि वह 2017 का प्रदर्शन दोहरा का पहले तीन चरण में हुए सीटों के नुक़सान की बहुत हद तक भरपाई कर लेगी। जानकार मान रहे थे कि सत्ता की रेस में बने रहने के लिए भाजपा को 60 में से कम से कम 50 सीट जीतना ज़रूरी है। लेकिन क्या ऐसा हुआ है?

भाजपा के लिए इस दौर में कई मुश्किलें सामने थीं। एक तो 2017 के बाद यह पहला चुनाव है जिसमें लखनऊ में वोटिंग हुई और अटल बिहारी वाजपेई का चेहरा ग़ायब है। दूसरा, सिख, मुसलमान और पिछड़ी जातियों की गोलबंदी उसका चुनावी गणित बिगाड़ रही है। तीसरे, इस इलाक़े में महंगाई, बेरोज़गारी, कोरोना कुप्रबंधन और आवारा पशु बड़े चुनावी मुद्दे हैं। इस सबके बीच सबसे बड़ी दिक़्क़त यह है कि वोटर साम्प्रदायिक मुद्दों पर की गई तमाम बयानबाज़ी और ध्रुवीकरण की तमाम कोशिशों पर ख़ामोश हैं। 

तो क्या चौथे चरण के बाद लड़ाई ख़त्म हो गई है, जैसा कि सपा के नेता दावा कर रहे हैं? लड़ाई अभी ख़त्म नहीं हुई है, लेकिन भाजपा के लिए सत्ता बचाए रख पाना थोड़ा मुश्किल ज़रुर हो गया है। अभी भी 171 सीटों पर वोटिंग बाक़ी है। राजनीति में, जहां एक दिन में माहौल और मुद्दे बदल जाते हैं, वहां सपा की जीत का ऐलान अभी जल्दबाज़ी है। लेकिन हां, दो बातें साफतौर पर कही जा सकती हैं। एक तो यह कि भाजपा 2017 का प्रदर्शन बिल्कुल भी नहीं दोहरा रही है। दूसरी, भाजपा के लिए यूपी में सत्ता बचाए रख पाना अब इतना आसान नहीं है जितना दो महीने पहले नज़र आ रहा था।

(संपादन : नवल/अनिल)


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