यूपी चुनाव : दो चरणों के बाद छंटने लगा धुंधलका

बीते सोमवार को मतदान के दूसरे चरण के दौरान जिस तरह मुरादाबाद की कुंदरकी, बदायूं की शेख़ूपुर, सहारनपुर की बेहट और बिजनौर की नजीबाबाद सीट पर वोटिंग के शुरुआती रूझान आए, उससे भाजपा की रणनीति सफल होती दिखी। लेकिन बाक़ी 55 सीटों पर मुसलमान वोटों के बीच बड़ा बिखराव संभवत: नहीं हुआ है। सैयद जैग़म मुर्तजा की त्वरित टिप्पणी

क्या उत्तर प्रदेश चुनाव के पहले दो चरण में मुसलमान और पिछड़ों के ध्रुवीकरण ने भाजपा को भारी नुक़सान पहुंचाया है? राज्य में पहले दो चरण की वोटिंग के बाद इस तरह के क़यास लगा जा रहे हैं यादव, जाट, गूजर, और सैनी वोटरों के एक बड़े हिस्से के अलावा दलितों के भी कुछ वोट समाजवादी पार्टी (सपा) के नेतृत्व वाले गठबंधन को मिले हैं। हालांकि यह महज़ क़यास हैं, लेकिन यह तो कहा ही जा सकता है कि जिस तरह का धुंधलका पहले मतदाताओं के मन में था, अब छंटने लगा है।

ध्यातव्य है कि राज्य में पहले दो चरण में कुल 403 में से 153 सीटों पर वोट डाले जा चुके हैं। रुहेलखंड इलाक़े के आठ ज़िलों, शाहजहांपुर, बरेली, बदायूं, रामपुर, मुरादाबाद, संभल, अमरोहा, और बिजनौर के अलावा ऊपरी दोआब इलाक़े के सहारनपुर ज़िले में 14 फरवरी को वोट डाले गए। ये ज़िले तीन वजहों से काफी अहम हैं। एक तो इन इलाक़ों में मुसलमान, दलित, जाट, यादव और गूजर वोट ठीक-ठाक तादाद में हैं। दूसरे, इन ज़िलों में किसान आंदोलन और इससे पहले हुए नागरिकता क़ानून विरोधी आंदोलन का असर होना माना जा रहा था। तीसरे, ये इलाक़े राज्य में मुसलमान और दलित राजनीति का भी केंद्र हैं।

पिछले पांच वर्षों के दौरान जिस तरह मुसलमानों से जुड़े मुद्दों पर राजनीति हुई है, उसके चलते माना जा रहा था कि रुहेलखंड में भाजपा को मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है। इस इलाक़े की कुल 58 सीट में से 2017 में भाजपा ने 38 पर जीत हासिल की थी। इसकी एक वजह मुसलमान वोटों का सपा-कांग्रेस गठबंधन और बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के बीच तक़रीबन बराबर का बंटवारा था। तब ऐन चुनाव के वक़्त तमाम मुसलमान धर्मगुरुओं ने बसपा के पक्ष में वोट करने की अपील की, जिसकी वजह से वोटरों में भ्रम की स्थिति पैदा हुई। इसका फायदा रुहेलखंड के अलावा अवध, दोआब और पूर्वांचल में भी भाजपा को मिला। इस बार भी भाजपा को उम्मीद है कि एक लाख से ज़्यादा वोट वाली तक़रीबन 30 सीटों पर लड़ रहे 77 मुसलमान उम्मीदवार उसकी राह आसान करेंगे।

यूपी के मुरादाबाद में मतदान केंद्र पर दिखी महिलाओं की लंबी कतार

बीते सोमवार को मतदान के दूसरे चरण के दौरान जिस तरह मुरादाबाद की कुंदरकी, बदायूं की शेख़ूपुर, सहारनपुर की बेहट और बिजनौर की नजीबाबाद सीट पर वोटिंग के शुरुआती रूझान आए, उससे भाजपा की रणनीति सफल होती दिखी। लेकिन बाक़ी 55 सीटों पर मुसलमान वोटों के बीच बड़ा बिखराव संभवत: नहीं हुआ है। इसकी एक बड़ी वजह 2017 के चुनाव नतीजे हैं और मुसलमान वोटरों की समझ-बूझकर जिताऊ पार्टी के साथ जाने की रणनीति है। सपा, आरएलडी (राष्ट्रीय लोकदल), और सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (सुभासपा) गठबंधन मुसलमान वोटरों की शायद यह भरोसा दिला पाने में कामयाब रहा है कि उसके पास भाजपा को हरा पाने लायक़ वोट हैं।

भाजपा के लिए दूसरे चरण में तीन बातें ऐसी हैं जो उसके लिए चिंता का सबब हैं। एक तो जाट और यादव वोटरों के अलावा कुछ जगहों पर सैनी, गूजर और दलित वोटरों का गठबंधन की तरफ झुकाव। दूसरा, राज्य के कर्मचारियों का पुरानी पेंशन बहाली के वादे के बाद सपा की तरफ झुकाव। तीसरा, मुसलमान वोटरों के बीच एमआईएम, पीस पार्टी और बीएसपी के मुसलमान उम्मीदवारों को लेकर दिखाई गई बेरुख़ी। मुसलमान बीएसपी और कांग्रेस के पक्ष में वहीं वोटिंग करता दिख रहा है, जहां उसे यक़ीन है कि गठबंधन कमज़ोर है और बीएसपी या कांग्रेस उम्मीदवार स्थानीय समीकरणों के बूते जिताऊ हालत में है।

अगर सपा-आरएलडी-सुभासपा गठबंधन पहले दो चरण में मिले समर्थन को अगले दो तक और क़ायम रख पाता है तो यक़ीनन उसके नेता राज्य में सरकार बनाने का दावा कर सकते हैं। भाजपा के नेताओं की भाषा, उनके हावभाव और उनके द्वारा लगातार की जा रही धांधली की शिकायतें इशारा कर रही हैं कि पार्टी 2017 जैसी मज़बूत हालत में नहीं है। 

मसलन, भाजपा महामंत्री और राज्य में चुनावी टीमों के बीच संयोजन का काम देख रहे जेपीएस राठौर ने चुनाव आयोग को पत्र लिखकर चुनाव में बोगस वोटिंग का आरोप लगाया। उन्होंने लिखा कि बुर्क़ा पहन कर वोट डालने आ रही महिलाओं की पहचान सुनिश्चित की जाए। इसी बीच शाहजहांपुर के तिलहर में भाजपा कार्यकर्ताओ ने फर्ज़ी वोटिंग का आरोप लगाते हुए हंगामा किया। इससे पहले शामली से चुनाव लड़ रहे भाजपा सरकार में मंत्री सुरेश राणा पहले चरण में फर्ज़ी वोटिंग का आरोप लगाते हुए 40 बूथ पर पुनर्मतदान की मांग कर चुके हैं। इधर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ अब विकास का राग छोड़कर शरीयत, ग़ज़वा ए हिंद और संविधान की बातें कर रहे हैं। कुल मिलाकर भाजपा वह सब हथकंधे आज़मा रही है जो उसके आख़िरी हथियार माने जाते हैं।

हालांकि पार्टी नेता अभी भी राज्य में जीत के दावे कर रहे हैं लेकिन जिस तरह की वोटिंग पहले दो चरण में हुई है, उसके मद्देनज़र भाजपा की राह आसान नहीं है। बूथ पर पार्टी कार्यकर्ताओँ में पहले जैसा उत्साह नहीं दिख रहा है, शहरी बूथों पर वोटर कम हैं और जगह-जगह भाजपा उम्मीदवारों को विरोध का सामना करना पड़ रहा है। भाजपा के लिए संकेत अच्छे नहीं हैं, फिर भी अभी से लड़ाई को ख़त्म या एकतरफा मान लेना अभी जल्दबाज़ी होगी।

(संपादन : नवल/अनिल)


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