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बहस-तलब : आरएसएस के निशाने पर रहे हैं दलित-बहुजन

भारत का ब्राह्मण वर्ग आज भी मुसलमानों से इसीलिये नफरत करता है, क्योंकि वह जानता है कि यह मुसलमान पुराने दलित-बहुजन हैं, जो कि गुलाम थे और आज हमसे टक्कर ले रहे हैं। बता रहे हैं हिमांशु कुमार

भारत में ज्यादातर मुसलमान वे हैं, जिनके पूर्वज दलित-बहुजन थे और ब्राह्मणवादी वर्णव्यवस्था के शिकार थे। उन्हें न तो मंदिर में प्रवेश की इजाज़त थी और ना ही सार्वजनिक पेयजल स्रोतों से पानी पीने की। उनके साथ ब्राह्मणवादी ना तो खाना खाते थे और ना ही इनके साथ कोई रिश्ता रखते थे। आज भी कमोबेश यही स्थिति कायम है।

चारवर्णी व्यवस्था के शिकंजे में जकड़े दलितों ने जब देखा कि मुसलमान बनने के बाद वे कम से कम मस्जिद में सबके साथ नमाज़ तो पढ़ ही सकते हैं। मुसलमान बने अलग-अलग जातियों के लोग एक साथ रोटी खा सकते हैं। 

दलितों द्वारा इस्लाम कबूल किए जाने से सबसे अधिक परेशान ब्राह्मण वर्ग के लोग ही थे। ये वे लोग थे, जो दलितों को धर्म का डर दिखा कर सदियों से आर्थिक, सामजिक और राजनीतिक तौर पर गुलाम बनाये हुए थे। लेकिन जब इस्लाम धर्म लोग भारत आए और जब दलितों ने देखा वहां अपने लिए सम्मान देखा तब वे ब्राह्मणों के धर्म के शिकंजे से बाहर निकल गए थे। 

आरएसएस पर उठते रहे हैं सवाल

भारत का ब्राह्मण वर्ग आज भी मुसलमानों से इसीलिये नफरत करता है, क्योंकि वह जानता है कि यह मुसलमान पुराने दलित-बहुजन हैं, जो कि गुलाम थे और आज हमसे टक्कर ले रहे हैं। इस संबंध में प्रसिद्ध समाजवादी डॉ. राममनोहर लोहिया ने कहा था कि भारत में सांप्रदायिकता असल में परंपरागत जातिवाद का ही एक रूप है। जिस दिन भारत से जातिवाद समाप्त होगा, उस दिन सांप्रदायिकता भी खत्म हो जायेगी। 

भारत में रहनेवाले मुसलमान हिन्दुओं से नफरत नहीं करते। तब भी नहीं जब उन्हें ब्राह्मण वर्ग ने म्लेच्छ कहा। इस्लामिक शासकों ने कभी भी ब्राह्मण वर्ग की जीवन शैली, उनकी पूजा पद्धति व रहन-सहन पर कोई आपत्ति नहीं की। मसलन, किसी भी मुस्लिम शासक ने कभी नहीं कहा कि वे सूअर नहीं खाते, इसलिए भारत में सूअर खाने पर कानूनी प्रतिबन्ध लगना चाहिए। लेकिन मुसलमानों की हरेक बात पर प्रतिबंध लगाने की लगातार कोशिशें ब्राह्मण वर्गों द्वारा की जाती रही हैं। यहां तक कि भीड़ ने अख़लाक़ के घर में घुस कर उनके फ्रिज में रखे बकरे के गोश्त को देखकर उनकी हत्या कर दी। ऐसी ही वारदात के शिकार पहलू खान हुए जो कि मवेशीपालक थे और दूध का कारोबार करते थे। 

भारत में अब तक हुए हिन्दू-मुस्लिम दंगों का इतिहास बताता है कि ज़्यादातर दंगे उन्हीं जगहों पर हुए हैं, जहां पसमांदा मुसलमान यानी पुराने दलित जो अब मुसलमान बन चुके हैं, उनके काम धंधों के बड़े केंद्र रहे। जैसे यूपी का मुरादाबाद, बनारस, फिरोजाबाद, बिहार में भागलपुर और महाराष्ट्र का भिवंडी और मालेगांव। इन सभी जगहों पर मुख्यतः मुसलमान कारीगर मजदूर काम करते थे और अपने छोटे-मोटे धंधे चला रहे थे। दंगों के दौरान चुन चुन कर यहां के कुटीर उद्योगों को आग लगा दी गई।

यदि हम आरएसएस का इतिहास और उसका सामाजिक दायरा देखें तो यह बेहिचक कहा जा सकता है कि आरएसएस की स्थापना मुसलमानों के नहीं, दलितों के खिलाफ की गई थी| दरअसल, भारत में ब्राह्मण वर्गीय जातियों के जो लोग बिना मेहनत-मजदूरी के हर तरह की सुख का उपभोग करते थे, उन्हांने ही मेहनत करने वाली श्रमण जातियों को नीच घोषित किया हुआ था। वे भारत में खड़े हो रहे सामाजिक राजनैतिक बदलाव लाने वाले आंदोलनों से घबराए हुए थे, जिन्हें लगने लगा था कि अब हमारे बुरे दिन आने वाले हैं क्योंकि अब बराबरी और इन्साफ की मांग उठने लगी है। इसलिए आरएसएस ने दलितों को हमेशा गुलाम बनाकर रखने और अपने परम्परागत वर्चस्व को बनाए रखने के लिए आरएसएस का गठन किया और कहा कि हमें बराबरी नहीं चाहिए। तब उन्होंने कहा कि यह मांग तो हमारे धर्म के दुश्मन कम्युनिस्टों की है जो हमारे धर्म को भ्रष्ट कर देना चाहते हैं। 

(संपादन : नवल/अनिल)


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लेखक के बारे में

हिमांशु कुमार

हिमांशु कुमार प्रसिद्ध मानवाधिकार कार्यकर्ता है। वे लंबे समय तक छत्तीसगढ़ में आदिवासियों के जल जंगल जमीन के मुद्दे पर काम करते रहे हैं। उनकी प्रकाशित कृतियों में आदिवासियों के मुद्दे पर लिखी गई पुस्तक ‘विकास आदिवासी और हिंसा’ शामिल है।

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