कर्पूरी ठाकुर को जैसा मैंने देखा : अब्दुलबारी सिद्दीकी (अंतिम भाग)

‘दो परिस्थितियों में आम आदमी का चरित्र सामने आता है। एक तो तब जब आदमी बड़ा होता है और सार्वजनिक जीवन जीता है और दूसरा तब जब उसकी मृत्यु हो जाती है। कर्पूरी जी के निधन के बाद वे भी जो बिल्कुल अंजान से थे, रो रहे थे कि अब हमारा क्या होगा? रिक्शावाला तक यह कह रहा था– हमारा नेता मर गया।’ पढ़ें, अब्दुलबारी सिद्दीकी का संस्मरण

[बिहार सरकार के पूर्व मंत्री अब्दुल बारी सिद्दीकी वर्तमान में राजद के वरिष्ठ नेता हैं। वे उन नेताओं में हैं, जो बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर के बेहद नजदीक रहे। कर्पूरी ठाकुर का जीवन कैसा था और अपने जीवन में उन्होंने किस तरह का उच्च राजनीतिक मानदंड स्थापित किया था, इसे सिद्दीकी जी ने फारवर्ड प्रेस के हिंदी संपादक नवल किशोर कुमार से दूरभाष के जरिए विस्तार से बताया है। प्रस्तुत है इस लंबी बातचीत की अंतिम कड़ी]

जननायक कर्पूरी ठाकुर (24 जनवरी, 1924 – 17 फरवरी, 1988) पर विशेष

गतांक से आगे : जिस दिन कर्पूरी जी का निधन हुआ 

हम लोग बिहार निवास से निकले और चाइना ऍम्बेसी तक गये। उन्होंने हमें बहुत सारी बात बतायी। वे बार-बार बताते थे कि “बाबू, राजनीति में बिना पैसे वाले के लिए टिकना बड़ा मुश्किल है।” उन्होंने रामविलास पासवान, जगजीवन बाबू, मुंशीलाल राय आदि के बारे में कुछ-कुछ बातें बताईं। 

उस समय बिहार निवास में सीएम चैम्बर हुआ करता था, उसमें तीन लोग होते थे। वह हमें मिल गया। उनका कोई अप्वाइंटमेट था। उस दिन वे मुझे डिक्टेशन लिखवा रहे थे। उसी बीच उन्होंने कहा, “बबुओ, मुझे जाना है, मैं 12 बजे लौटूंगा फिर डिक्टेशन लिखवाऊंगा।” उस समय हम लोग शादी-शुदा नहीं थे। हमारे अंदर स्टूडेंट वाला कैरेक्टर था। हमने सोचा कि वे 12 बजे थोड़े ही आयेंगे, 2 बजे के पहले नहीं आएंगे। ठीक 12 बजे वे आ गये। वे हमें खोजने लगे। पता चला कि मैं रूम में नहीं हूं। उस समय हरिकिशन सिंह सुरजीत भी थे। उन्होंने मुझे बहुत डांटा – “आप लोग निकम्मे लोग हैं, आप लोगों को समय का महत्व पता नहीं है, समय कितना बलवान होता है।”

कर्पूरी ठाकुर ऐसे ही थे। डांटते और समझाते रहते थे। तत्कालीन राजनीति की बातें उदाहरण के रूप में देते। अब तो उन बातों का जिक्र करना भी मुनासिब नहीं रह गया है। न जाने किसको कोई बात बुरी लग जाय। कर्पूरी जी के साथ मेरा संबंध कुछ अलग सा था। उनके दो बेटे थे – रामनाथ ठाकुर और डा. बीरेंद्र ठाकुर – तथा एक बेटी, रेणु। अब तो उसका निधन हो गया है। एक वही थी जो मुझे राखी बांधती थी। जब तक बांधती नहीं थी, भूखी रहती थी। 

एक प्रसंग याद आ रहा है। रेणु की शादी तब हो गई थी जब मैं कर्पूरी जी से जुड़ा नहीं था। उसकी शादी डाक्टर रमेश चंद्र से हुई थी। जहां उसकी शादी हुई, वह जगह जमशेदपुर के नजदीक है। विधानसभा क्षेत्र का नाम भूल रहा हूं। वहां से मलखान सिंह विजयी होते थे। यह पुरुलिया से नजदीक था। उसके गांव के लोग बांग्ला बोलते थे। बहुत बाद में जब लालू जी सत्ता में आए और मेरी भी चलती थी तब की बात है। मैंने वहां के जिला योजना पदाधिकारी से कहकर नदी पर बड़ा पुल बनवाया। उस जमाने में वह सत्तर लाख का पुल था। उस समय वहां के डीएम [उपविकास आयुक्त] अमित खरे थे, वे अब तो केंद्रीय प्रतिनियुक्ति के बाद सेवानिवृत्त भी हो चुके हैं और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सलाहकारों में एक हैं। डॉ. माधव नामक एक अधिकारी जिला योजना पदाधिकारी था। इन लोगों ने मुझे ही उस पुल के उद्घाटन के लिए बुलाया था। हो सकता है कि गांव के लोगों ने जिला प्रशासन को कहा होगा कि इसी गांव में कर्पूरी ठाकुर जी की बेटी रहती है। जब मैं उद्घाटन कर लौटा तब रेणु ने कहा– “भैया हो भैया, उ पुल बनाके बढ़िया कईल भैया”। मैंने कहा– “का होलऊ? [क्या हुआ तुम्हें]” तब उसने कहा– “भैया, जब हम्मर शादी होलई हल, तब बाबूजी मुख्यमंत्री हलथिन, हम्मर शादी में उनका सबके नदी में पानी में हेलके पार करे परलई हल, तब हम बहुत रोली हल भैया कि हम्मर बाबूजी मुख्यमंत्री होके हम्मर बियाह कहां करा देलन [तब जब बिहार में मिली-जुली सरकार बनी थी और कुछ दिनों के लिए ही चली थी, जब मेरी शादी हुई थी तब सभी को नदी में पानी में घुसकर आना पड़ा था, तब मैं बहुत रोई थी, मुख्यमंत्री होने के बावजूद मेरे पिताजी ने मेरी शादी कहां करा दी]।” 

कर्पूरी जी की खासियत यह थी कि वह राजनीति और परिवार दोनों को बिल्कुल अलग रखते थे। फिर चाहे उनकी पत्नी हों या दोनों बेटे या फिर उनकी बेटी रेणु। हालांकि दोनों बेटे तो तब थोड़े बहुत पालिटिकल हो गए थे, लेकिन किसी की भी हिम्मत नहीं होती थी कि कर्पूरी जी का कोई भी सामान इधर से उधर कर दें।

एक उदाहरण देखिए कि उनके बड़े बेटे रामनाथ ठाकुर को विधानसभा चुनाव लड़ने की बड़ी इच्छा रहती थी। तो होता यह था कि जब-जब विधानसभा का चुनाव आता वह चाचा लोगों (कर्पूरी जी के करीबी राजनेता) से पैरवी कराया करते थे। एक बार की बात है। एक वशिष्ठ नारायण सिंह थे। तब हम केवल तीन ही थे। एक मैं, वशिष्ठ बाबू और कर्पूरी ठाकुर जी। कर्पूरी जी बरामदे में बाहर बैठे हुए थे। कर्पूरी जी की सर्वहारा राजनीति की सबसे बड़ी खासियत यह थी कि उनसे कार्यकर्ता और नेता सब झगड़ भी जाया करते थे। आजकल यदि कोई किसी बड़े नेता से झगड़े तो उसकी तो राजनीतिक हत्या हो जाय। वशिष्ठ बाबू समस्तीपुर जिले के कल्याणपुर विधानसभा क्षेत्र से विधायक थे। तो उन्होंने अपनी भाषा में (समस्तीपुर में जो मैथिली बोली जाती है, वह दरभंगा में बोली जानेवाली मैथिली से अलग है) ठाकुर जी से कहा– “ठाकुर जी, एगो बात कहिअ।” तब ठाकुर जी एकदम शुद्ध हिंदी में बोले– “बोलिए वशिष्ठ भाई।” वशिष्ठ बाबू ने कहा– “अबरी रामनाथ के टिकट दे दू”।

इतना सुनते ही ठाकुर जी आपे से बाहर हो गए– “क्या बात करते हैं आपलोग? रामनाथ को टिकट दे दें? क्यों दे दें उसको टिकट?” जितनी आवाज में ठाकुर जी बोले, उससे अधिक आवाज में वशिष्ठ बाबू बोले– “क्यों नहीं दीजिएगा? रामनाथ इतने दिनों से पार्टी का काम कर रहा है।” फिर ठाकुर जी ने तेज आवाज में कहा और वशिष्ठ बाबू ने भी तेज आवाज में ही उत्तर दिया– “आपका सारा काम देखता है। पार्टी में दिन भर लगा रहता है। तो क्या उसका हक नहीं है? आप केवल इसलिए उसको टिकट नहीं देते हैं ना कि वह आपका बेटा है?” इतना सुनने के बाद (करीब दो मिनट समझिए) आंख बंद करके बैठकर सोचते रहे। फिर उन्होंने अपनी आंखें खोलीं और कहा– “वशिष्ठ भाई, आप ठीक कहते हैं। युवओं को राजनीति में आगे आना ही चाहिए।” यहां तक तो सब ठीक था। लेकिन फिर उन्होंने कहा– “इस बार लड़ेगा रामनाथ, मैं नहीं लड़ूंगा। अगर मैं लड़ूंगा तो रामनाथ नहीं लड़ेगा।” बात खत्म हो गई।

बिहार विधानसभा के मुख्य दरवाजे के पास कर्पूरी ठाकुर (पहली पंक्ति में दायें से दूसरे)

जिस बात का मुझे सबसे अधिक अफसोस है, वह उनसे आखिरी मुलाकात से संबंधित है। यह मुलाकात उनके निधन से ठीक एक दिन कबल (पहले) हुई। उनको हृदय की बीमारी थी। हालांकि उसके पहले भी उन्हें हदृयाघात हुआ था दरभंगा में। हालांकि मुझे तिथि तो एकदम से याद नहीं है, लेकिन मुझे लगता है कि वह 1983-84 का साल था। तब दरभंगा में ही उनका इलाज हुआ था और चार-पांच दिनाें तक चौबीसों घंटे उनकी तीमारदारी में लगा रहा। बाद में जब वे पटना आए तो उन्हें पटना मेडिकल कॉलेज अस्पताल (पीएमसीएच) में भर्ती कराया गया। तब भी मैं उनकी सेवा में था। एक उनका सेवक था। नाम था– ब्रह्मदेव। ठाकुर जी ने उसकी नौकरी विधानसभा में लगवा दी थी। बाद में तो वह झारखंड चला गया, जहां से वह डिप्टी डायरेक्टर के पद से रिटायर हुआ। 

खैर, जब कर्पूरी जी पीएमसीएच में इलाजरत थे तब चूंकि वह बड़े आदमी थे, इसलिए जो भी उनसे मिलने आता, अपने साथ तरह-तरह के फल, काजू, किशमिश व अन्य तरह के मेवा लाता ही था। जब कोई और होता तो कर्पूरी जी मुझसे पैर नहीं दबवाते थे। मना करते थे। 

कर्पूरी जी मेवा आदि तो खाते नहीं थे। उन दिनों कागज के ठोंगा का चलन था। प्लास्टिक आदि का चलन तो बाद में हुआ। तो होता यह था कि जब ठोंगा खोलते तो उससे कर्र-कर्र की आवाज आती और ठाकुर जी की नींद खुल जाती। वे करवट बदल लेते। लेकिन फिर जल्द ही करवट बदल लेते थे। उनको लगता कि इस करवट रहा तो ये लोग शर्म की वजह से खा नहीं पाएंगे। एक बार उन्होंने कहा– “यह जो ब्रह्मदेव है न, वह पूरी रात सेवा करता है।” मैंने कहा– “मेवा न खाता है, इसलिए सेवा करता है।” तब उन्होंने हंसते हुए कहा– “ठीक है। आप भी खाइए।”

कर्पूरी जी मेरे बच्चों को भी बहुत मानते थे। यह बात 1985-86 की है जब मेरी शादी हुई थी। यह बहुत चर्चित शादी थी। मैं और मेरी पत्नी ने कोर्ट मैरिज किया था और चूंकि हिंदू-मुस्लिम की शादी थी, इसलिए भी चर्चित रही थी। तब हमदोनों कुछ दिन किसी के यहां रहे, कुछ दिन किसी और के यहां। कर्पूरी जी के यहां भी हमदोनों करीब एक महीने तक रहे। तब उनके दूसरे बेटे बीरेंद्र ठाकुर की शादी हो चुकी थी। लेकिन कर्पूरी जी ने उनसे कहा– “बउओ, अपना कमरा खाली करके सिद्दीकी साहब को रहने के लिए दे दें।” कर्पूरी जी ने मुझे कभी केवल सिद्दीकी नहीं कहा। कभी सिद्दीकी जी तो कभी सिद्दीकी साहब। उसी दौरान कर्पूरी जी इलाज के लिए दिल्ली गए थे। वो वहां से भी पूछते रहते थे कि कोई दिक्कत तो नहीं है। तो वे बाप की तरह मानते थे। उनकी पत्नी, जिन्हें मैं चाची कहता था। लेकिन वह मां ही थी मेरी। दुनिया से उसको कोई खबर नहीं रहती थी। वह मेरी पत्नी को अपनी भाषा में समझाते रहती थीं– “ए कनिया, घबरईह मत”।

कर्पूरी जी के जीवन में सभी के लिए अपनापन था। उनका खाना-पीना, पहनावा, बोली, दूसरों के सम्मान और प्यार सब बहुत खास था। उस वक्त लालू जी हों या फिर वे सभी जो गरीब-गुरबों की बेहतरी की राजनीति करते थे, कर्पूरी जी से जुड़े थे। मेरा तो मानना है कि उनकी असमय मृत्यु हो गई। हालांकि वह भी विवादास्पद है। उसका जिक्र करना मुनासिब नहीं है। उनके निधन के एक दिन पहले उसने मिलकर आया था। अगले दिन उनको समस्तीपुर जिले के पूसा जाना था। वहां एक कार्यक्रम था। मुझे वहां आठ बजे पहुंचना था। लेकिन नाशता वगैरह करते-करते आधे घंटे की देरी हो गयी। मैं करीब साढ़े आठ बजे उनके आवास पर पहुंचा। वहां एकदम सन्नाटा था। एक ने कहा– आपको नहीं मालूम है कि ठाकुर जी को हार्ट अटैक् आया है, उनको पीएमसीएच ले जाया गया है। तब मैंने रिक्शा लिया। उन दिनों मेरे पास यही सवारी थी। जैसे ही सचिवालय से आगे बढ़ा, देखा कि उनकी लाश आ रही थी। 

दो परिस्थितियों में आम आदमी का चरित्र सामने आता है। एक तो तब जब आदमी बड़ा होता है और सार्वजनिक जीवन जीता है और दूसरा तब जब उसकी मृत्यु हो जाती है। कर्पूरी जी के निधन के बाद वे भी जो बिल्कुल अंजान से थे, रो रहे थे कि अब हमारा क्या होगा? रिक्शावाला तक यह कह रहा था– हमारा नेता मर गया। तब पत्रकार लोग उन लोगों से पूछ रहे थे, जो रो रहे थे कि आप कर्पूरी जी को कैसे जानते थे? कर्पूरी जी से मिले थे? तब लोग कहते कि मुलाकात तो नहीं हुई थी। तब पत्रकार पूछते कि फिर क्यों रहे हैं? लोग केवल यही कहते कि हमारा नेता मर गया। 

लालू जी उस समय कर्पूरी जी को लेकर हास्पीटल चले गए थे और लौटे तब उनकी गोद में कर्पूरी जी का सिर था और आंखों में आंसू। उन दिनों उनके पास चौधरी देवीलाल जी द्वारा दिया हुआ जीप हुआ करता था। उसी गाड़ी पर लालू जी कर्पूरी जी को ले गए थे। और वापस 1, देशरत्न मार्ग लौटे।

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मेरा मानना है कि जैसे कर्पूरी जी थे और उनका परिवार था, वैसे ही लालू जी और उनका परिवार था। दोनों गरीब परिवार के रहे। जब लालू जी अपनी गोद में कर्पूरी जी का पार्थिव शरीर लेकर लौटे तब उनका आर्शीवाद आम जनता के बीच संदेश के रूप में चला गया। वजह यह कि तब लालू जी से सीनियर अनेक नेता थे। लेकिन उत्तराधिकारी लालू जी ही बने। जब लालू जी कर्पूरी जी के बाद नेता विरोधी दल बने तब कई उम्मीदवार थे। अनूपलाल मंडल थे, मुंशीलाल राय थे वगैरह … वगैरह। लेकिन लालू जी के पक्ष में हम सभी एकजुट हुए। एक तो यह कि वे गरीब परिवार से थे, संघर्ष करके आए थे, छात्र संघर्ष वाहिनी से जुड़े थे। उस समय मैं विधायक नहीं था। मैं हारा हुआ था। लेकिन गौतम सागर राणा, राजेश कुमार (गया वाले) आदि सब नजदीकी दोस्त थे, एक-दूसरे के सुख-दुख में शामिल रहते थे, विधायक थे। कई लोग थे जो अनूपलाल मंडल को नेता बनाना चाहते थे, लेकिन हमलोगों ने मन बना लिया था। तो एक तो कर्पूरी जी का पार्थिव शरीर लालू जी द्वारा अपनी गोद में लाना और दूसरा यह कि नेता विरोधी दल की उनकी कुर्सी पर बैठना, लालू जी के लिए महत्वपूर्ण साबित हुआ।

खैर, आज भी मन में मलाल है। मैं स्वयं को भी कसूरवार मानता हूं। जब हम सरकार में थे तब हमारे पास पैसा नहीं होता था। लेकिन आज तो सरकार के पास पैसा है। वह चाहे तो कर्पूरी जी का आवास जो कि संग्रहालय के रूप में है, उसका विकास उसी तर्ज पर कर सकती है, जिस तरह से दिल्ली में डॉ. आंबेडकर का संग्रहालय है। अभी जो संग्रहलय है, उसमें ठाकुर जी से संबंधित चीजें धीरे-धीरे खराब हो रही हैं। कोई ध्यान नहीं दे रहा है। यह अफसोस की बात है।

(प्रस्तुति : नवल किशोर कुमार, संपादन : अनिल)


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