द्विजों के शोर के बीच अखिलेश यादव का उभार

मीडिया द्वारा अक्सर यादवों को गुंडागर्दी के पर्यायवाची के रूप में प्रस्तुत किया जाता था। अखिलेश लोगों को सफलतापूर्वक यह समझा सके हैं कि दरअसल ठाकुर राज आतंक पर्याय है। लोग अब मुख्यमंत्री के तौर पर अखिलेश के कार्यकाल और योगी आदित्यनाथ, जो मनुष्यों से ज्यादा गायों से प्रेम करते हैं, के राज में अंतर को देख पा रहे हैं। बता रहे हैं कांचा इलैया शेपर्ड

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव का नतीजा चाहे जो हो, अब यह स्पष्ट है कि अखिलेश यादव राष्ट्रीय राजनीति में एक महत्वपूर्ण नेता के रूप में उभर चुके हैं। जिस हिम्मत, आत्मविश्वास और चतुराई से उन्होंने भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) एवं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के शीर्ष नेताओं और उत्तर प्रदेश में इन संस्थाओं के विशाल नेटवर्क को चुनौती दी, उसने अखिलेश को पूरे देश के युवाओें का नायक बना दिया है। ओबीसी युवक उन्हें एक ऐसे नेता के रूप में देखते हैं जो भविष्य में नरेंद्र मोदी को चुनौती दे सकता है। 

नरेन्द्र मोदी ने वर्ष 2014 में निम्न ओबीसी जातियों का वोट हासिल करने के लिए स्वयं को ओबीसी नेता के रूप में प्रस्तुत किया। अब यह धारणा मजबूत हो रही है कि उन्होंने जनता के प्रति ईमानदारी नहीं बरती। सन् 2014 के चुनाव के पहले उन्होंने कभी भी ओबीसी के हितों की बात नहीं की। संघ और भाजपा के तंत्र, जिसने ओबीसी को आरक्षण देने की मंडल आयोग की सिफारिश का कभी समर्थन नहीं किया, उसने अचानक मोदी को ओबीसी का नेता घोषित कर दिया।

अखिलेश एक ऐसे ओबीसी परिवार से आते हैं, जिसने उत्तर प्रदेश में ओबीसी को आत्मसम्मान से लैस करने और राजनीति में आगे बढ़ने का मौका देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। पूरा देश जानता है कि अखिलेश के पिता मुलायम सिंह यादव ने लालकृष्ण आडवाणी के नेतृत्व में निकाली गई रथयात्रा से निपटने में किस तरह की दृढ़ता का परिचय दिया था। इस यात्रा, जिसमें मोदी ने भी भाग लिया था, का उद्देश्य मंडल की रेलगाड़ी को पटरी से उतारना था। 

अंग्रेजी माध्यम के आधुनिक स्कूलों, कालेजों और विदेश में भी पढ़े-लिखे अखिलेश ने यह साबित कर दिया है कि वे एक निपुण राजनीतिज्ञ हैं। 

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भाजपा/आरएसएस की केन्द्र और राज्य सरकारें उन लोगों का मोहरा बन गई हैं, जिन्हें भाजपा नेता और पूर्व मंत्री अरूण शौरी औद्योगिक अर्थव्यवस्था के शहंशाह कहते हैं और साथ ही उन साधुओं और सन्यासियों की भी जो महात्मा गाँधी के बारे में दुर्वचन कहते नहीं थकते। ये सरकारें सार्वजनिक क्षेत्र के प्रतिष्ठानों का निजीकरण कर रही हैं ताकि शूद्रों (ओबीसी), दलितों (एससी) और आदिवासियों (एसटी) को रोजगार के अवसरों से वंचित किया जा सके। उद्योग जगत के शहंशाह मामूली कीमतें चुकाकर इन प्रतिष्ठानों के मालिक बन रहे हैं और अपना धन विदेशों में निवेश कर रहे हैं। वे दुनिया भर में ऐसे स्थानों पर महल-नुमा मकान खरीद रहे हैं, जहां वे तब रह सकेंगे जब देश को यह पता चल जाएगा कि उन्होंने देश के साथ किस तरह की धोखाधड़ी की है। अंबानी द्वारा लंदन में खरीदा गया मकान इसका उदाहरण है। भाजपा के राज में ही विजय माल्या और नीरव मोदी देश को लूट चुके हैं। गौतम अडाणी के विदेशों में भारी निवेश के बारे में सबको पता है। निजी कंपनियां शूद्रों, दलितों और आदिवासियों को रोजगार नहीं देतीं। उनके कर्मचारी केवल द्विज – ब्राह्मण, बनिया, कायस्थ, खत्री और क्षत्रिय – होते हैं। उत्कृष्टता के नाम पर कई तरह के छल-कपट किए जा रहे हैं।

दूसरी ओर आरएसएस/भाजपा से जुड़े साधु और सन्यासी धर्मसंसदों का आयोजन कर रहे हैं, जिनमें खाद्यान्न उत्पादकों ही नहीं, बल्कि हमारी लोकतांत्रिक प्रणाली के खिलाफ भी युद्ध की घोषणा की जा रही है। सन् 2020-21 में किसानों के लंबे संघर्ष ने राजनैतिक विमर्श को अल्पसंख्यकों के स्थान पर शूद्र, दलित और आदिवासी खाद्यान्न उत्पादकों पर केन्द्रित कर दिया है। यह एक ऐतिहासिक सच है कि हिन्दुत्ववादी शक्तियां हमेशा से शूद्रों, दलितों और आदिवासियों को अपना शत्रु मानती रही हैं। अब अल्पसंख्यक भी उनके दुश्मनों की सूची में जुड़ गए हैं। हिन्दुत्ववादियों ने ही जाति प्रथा का निर्माण किया और उसका इस्तेमाल खाद्यान्नों के उत्पादकों को हमेशा के लिए अपना गुलाम बनाने के लिए किया। शूद्रों के प्रति द्विजों का शत्रुता का भाव सहस्त्रादब्यिों पुराना है।

आरएसएस-भाजपा से जुड़े कुबेर खाद्यान्न उत्पादकों को ठग रहे हैं। साधु-सन्यासी बिना कोई मेहनत किए पकवान उड़ा रहे हैं। परंतु आरएसएस/भाजपा के लिए किसान देशद्रोही और परजीवी धोखेबाज हैं और उपभोक्ता राष्ट्रवादी। यही उनका परिप्रेक्ष्य है। राम माधव एवं अन्य द्विज सिद्धांतकारों का कहना है कि यही राष्ट्रवाद का प्राचीन मॉडल है।

लखनऊ में साइकिल रैली के दौरान अखिलेश यादव

अब समय आ गया है कि अल्पसंख्यक – मुसलमान व ईसाई – शूद्रों, दलितों और आदिवासियों के साथ खड़े हों। चौदह महीने तक चले किसानों के आंदोलन में मारे गए 750 खाद्यान्न उत्पादकों की तुलना हिन्दुत्व के रथ के नीचे कुचले कुत्ते के पिल्लों से की गई। युद्धभूमि का खाका अब एकदम साफ है। एक ओर हैं देश के सभी अनाज उत्पादक और दूसरी ओर संघ/भाजपा के किसान-विरोधी हिन्दुत्ववादी। असादुद्दीन ओवैसी जैसे लोग इस लड़ाई में आरएसएस/बीजेपी की मदद कर रहे हैं। यह मुस्लिम बौद्धिकतावाद के बुरे दिनों का सूचक है। 

अखिलेश, जो स्वयं एक उत्पादक जाति से आते हैं, मैदान में उतर गए हैं। उनके रामराज्य के नारे के खिलाफ वे कृष्ण राज का नारा बुलंद कर रहे हैं। जब द्विज कहते हैं कि ओबीसी भाजपा के साथ है तब अखिलेश का जवाब होता है भाजपा झूठ की सबसे बड़ी सौदागर है। वे लोगों को बता रहे हैं कि कैसे वे अपने निजी अनुभव से सीख सकते हैं कि भाजपा द्वारा झूठ को सच का मुल्लमा चढ़ाकर परोसा जा रहा है। शूद्रों, दलितों और आदिवासियों को इस सरकार से कुछ भी नहीं मिला है। मायावती चुनावी मैदान से गायब हैं और राहुल और प्रियंका स्वयं को खांटी ब्राह्मण घोषित कर चुके हैं। ऐसे में अखिलेश गैर-यादव ओबीसी और जाटों को ‘नए समाजवाद’ के उदय के लिए संघर्ष करने को प्रेरित कर रहे हैं। उन्होंने यह सुनिश्चित किया है कि समाजवादी पार्टी को केवल यादवों के कुल के रूप में न देखा जाए। उन्होंने पार्टी के उन नेताओं को हाशिए पर पटक दिया है, जो भ्रष्ट माने जाते थे।

सबसे बढ़िया बात यह है कि वे हिन्दुत्ववादी मीडिया से दृढ़ता और चतुराई से निपट रहे हैं। मीडिया द्वारा अक्सर यादवों को गुंडागर्दी के पर्यायवाची के रूप में प्रस्तुत किया जाता था। अखिलेश लोगों को सफलतापूर्वक यह समझा सके हैं कि दरअसल ठाकुर राज आतंक पर्याय है। लोग अब मुख्यमंत्री के तौर पर अखिलेश के कार्यकाल और योगी आदित्यनाथ, जो मनुष्यों से ज्यादा गायों से प्रेम करते हैं, के राज में अंतर को देख पा रहे हैं। 

हिन्दुत्व मीडिया कई दशकों से – मुलायम और लालू प्रसाद के काल से ही – यह प्रचार करता आ रहा है कि यादव शासन करने के लिए नहीं, बल्कि मवेशियों को चराने के लिए बने हैं। अखिलेश और तेजस्वी यादव ने यह साबित कर दिया है कि मंडलवादी अयोग्य और निकम्मे नहीं होते और ना ही योग्यता पर केवल द्विजों का अधिकार है। 

मोदी-शाह के इशारे पर डाले जा रहे छापे और दादागिरी के बाद भी अखिलेश एक ऐसे नेता के रूप में उभरे हैं जिन्होंने पूरे देश के युवा, धर्मनिरपेक्ष और उदारवादी नेताओं में एक नई आशा का संचार किया है। कांग्रेस एक थकी हुई पार्टी है और साम्यवादी दल आरएसएस/भाजपा का राष्ट्रीय विकल्प प्रस्तुत करने में असफल रहे हैं। ऐसे में किसानों के संघर्ष की ताकत की मदद से अखिलेश यादव आशा की एक नई किरण के रूप में उभरे हैं।

(अनुवाद: अमरीश हरदेनिया, संपादन : नवल)

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