नजरिया : दिल्ली नहीं, यूपी की राजनीति करें अखिलेश, तभी मजबूत होगी सपा

हाल के चुनाव में सपा ने मज़बूत वापसी की है। हालांकि अखिलेश यादव सत्ता से दूर रह गए, लेकिन उनको अपार जनसमर्थन मिला है। ज़ाहिर है क उनके लिए 2027 का विधानसभा चुनाव 2024 के लोक सभा चुनाव से कहीं ज़्यादा अहम है। बता रहे हैं सैयद जै़गम मुर्तजा

उत्तर प्रदेश से ख़बर है कि राज्य में सरकार बनाने में नाकाम रहे समाजवादी पार्टी (सपा) अध्यक्ष अखिलेश यादव करहल विधानसभा सीट से इस्तीफा देंगे। ख़बर यह भी है कि अब यूपी में शिवपाल यादव पार्टी की तरफ से मोर्चा संभालेंगे। इसके पीछे दलील दी जा रही है कि अखिलेश यादव आज़मगढ़ से अपना रिश्ता बनाए रखना चाहते हैं। हालांकि विधानसभा सीट पर लोक सभा की सदस्यता को वरीयता देने की तमाम वजहें हो सकती हैं, लेकिन सवाल यह है कि ऐसा करके अखिलेश यादव क्या हासिल कर लेंगे?

हाल ही में संपन्न हुए विधानसभा चुनावों में अखिलेश यादव ने करहल विधानसभा सीट से चुनाव लड़ा। इस सीट पर उन्होंने भाजपा के उम्मीदवार व आगरा के मौजूदा सांसद सह केंद्रीय मंत्री एसपी सिंह बघेल को क़रीब 67 हज़ार वोटों से मात दी। विधानसभा के अलावा अखिलेश यादव आज़मगढ़ सीट से सांसद भी हैं। ज़ाहिर है अखिलेश को फैसला करना है कि वह लोक सभा की अपनी सदस्यता बरक़रार रखें या फिर इस्तीफा देकर विधानसभा में मज़बूती से अपनी पार्टी और अपने वोटरों की नुमांदगी करें।

निश्चित तौर पर यह अखिलेश यादव का निजी फैसला है कि वह आगे संसद की राजनीति करना चाहते हैं या फिर राज्य में बने रहकर अगले चुनावों की गंभीर तैयारी करते हैं। संसद की सदस्यता जारी रखने के उन्हें तीन फायदे हैं। दिल्ली में सरकारी आवास बना रहेगा, दिल्ली में मीडिया कवरेज बेहतर होता है, और संसद में उठाए गए मुद्दों को महत्व मिलता है। लेकिन यह तब तक ठीक है जब आपको राष्ट्रीय राजनीति में अपना विस्तार करना हो या फिर यूपी के बाहर, दूसरे राज्यों में पार्टी मज़बूत करनी है। मौजूदा हालात में इनमें से कोई भी कारण नज़र नहीं आता। 

सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव

राष्ट्रीय राजनीति के ज़रिए हो सकता है अखिलेश यादव 2024 के लोक सभा चुनावों में अपनी पार्टी की कुछ सीट बढ़ा लें। मगर अखिलेश को लंबे अरसे की राजनीति करनी है तो करहल छोड़ना समझदारी भरा फैसला नहीं माना जाएगा। हाल के चुनाव में सपा ने मज़बूत वापसी की है। हालांकि अखिलेश यादव सत्ता से दूर रह गए, लेकिन उनको अपार जनसमर्थन मिला है। ज़ाहिर है कि उनके लिए 2027 का विधानसभा चुनाव 2024 के लोक सभा चुनाव से कहीं ज़्यादा अहम है। ऐसे में उत्तर प्रदेश विधान सभा का सदस्य बने रहना, और स्थानीय मुद्दों पर लगातार राजनीति करना उनके लिए ज़रुरी है।

अखिलेश यादव उत्तर प्रदेश में रहेंगे तो ज़ाहिर है उनके कार्यकर्ता लगातार सक्रिय रहेंगे। उनकी पार्टी लोगों के बीच बनी रहेगी तो पार्टी भी मज़बूत होगी और सरकार पर भी जनहित में काम करने का दबाव बना रहेगा। इसका फायदा अगले लोक सभा चुनावों में ख़ुद-ब-ख़ुद समाजवादी पार्टी को मिल जाएगा। वैसे भी अब जिस तरह की राजनीति हो रही है, ऐसे में प्रदेश में दमदार नेताओं की मौजूदगी ज़रूरी है। अखिलेश लखनऊ में रहकर अपने कोर वोटर को तो संरक्षित करेंगे ही, अपनी पार्टी का दूसरे जातीय समूहों में विस्तार करने का मौक़ा भी उनके पास रहेगा। कार्यकर्ताओं की नेता तक पहुंच न होने की शिकायत भी ख़त्म होगी।

आज़मगढ़ सीट से अखिलेश यादव स्वामी प्रसाद मौर्य, या जयंत चौधरी को संसद में भेजकर गठबंधन या फिर पार्टी का दूसरे जातीय समूह में विस्तार कर सकते हैं। वह आज़मगढ़ से किसी मुसलमान को चुनाव जिताकर इलाक़े में एमआईएम जैसी पार्टियों के विस्तार के ख़तरे को ख़त्म कर सकते हैं। साथ ही वह चाहें तो विपक्ष के किसी मज़बूत नेता को सांसद बनाने के नाम पर अपनी पार्टी में शामिल कर सकते हैं। इसका लंबी अवधि में फायदा उनकी ही पार्टी को मिलेगा। संसद में मुलायम सिंह यादव, आज़म ख़ान, और रामगोपाल यादव जैसे नेता पहले से ही हैं। ऐसे में वह संसद में नहीं भी रहेंगे तब भी पार्टी को कोई नुक़सान होने वाला नहीं है।

आख़िर में इतना ही कहा जा सकता है कि उत्तर प्रदेश में भाजपा से मुक़ाबला तभी किया जा सकता है जब अखिलेश यादव ख़ुद ज़मीन पर रहकर काम करें। चुनाव ख़त्म होते ही उनकी पार्टी के सदस्यों पर मुक़दमे दर्ज होने शुरु हो गए हैं। राज्य के दलित, पिछड़ों में अजीब से ख़ौफ का माहौल है। उनको सरकारी ज़्याद्तियों से बचाने के लिए संरक्षण की ज़रूरत है और मौजूदा हालात में अखिलेश से बेहतर संरक्षक कोई दूसरा नहीं हो सकता।  

(संपादन : नवल/अनिल)


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