रुहेलखंड : केवल बसपा के कारण नहीं हारी समाजवादी पार्टी

इन नौ ज़िलों में बसपा का ख़ासा प्रभाव रहा है। दलित वोटरों को बसपा यह समझाने में कामयाब रही कि सपा जीत गई तो उनकी ज़मीनों के पट्टे जाट, गूजर और यादव क़ब्ज़ा लेंगे। जंगलराज और ग़ुंडाराज के नॅरेटीव दलित मतदाताओं के बीच ख़ूब बिके। बता रहे हैं सैयद जै़गम मुर्तजा

उत्तर प्रदेश के रुहेलखंड इलाक़े को समाजवादी पार्टी (सपा) का गढ़ माना जाता रहा है, लेकिन तमाम कोशिशों के बावजूद वह यहां इस बार उम्मीदों के मुताबिक़ प्रदर्शन नहीं कर पाई। माना जा रहा था कि पार्टी यहां एकतरफा जीत हासिल करेगी, लेकिन बदायूं, बिजनौर, अमरोहा, बरेली और पीलीभीत में पार्टी के उम्मीदवार भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की रणनीति में फंस गए। ऐसे में लोग सवाल कर रहे हैं कि पार्टी से आख़िर चूक कहां हुई कि वह अपने ही मज़बूत इलाक़े में तमाम सीटों पर चुनाव हार गई?

उत्तर प्रदेश के बरेली और मुरादाबाद मंडल के नौ ज़िले, यानी बदायूं, बरेली, शाहजहांपुर, पीलीभीत, रामपुर, मुरादाबाद, संभल, अमरोहा और बिजनौर में सपा हमेशा से मज़बूत रही है। 2017 में भी, जब सपा महज़ 44 सीटों पर सिमट गई थी, तब भी पार्टी को सर्वाधिक सीटें इन्हीं दो मंडल से हासिल हुई थीं। इन नौ ज़िलों में मुसलमान, जाट और यादव मतदाताओं के अलावा सैनी और गूजर वोटों की अच्छी ख़ासी तादाद है। इसके चलते माना जा रहा था कि सपा के उम्मीदवार आसानी से जीत हासिल कर लेंगे, लेकिन ऐसा नहीं हुआ।

बरेली मंडल की 25 में से 20 सीटों पर सपा के उम्मीदवारों को हार का मुंह देखना पड़ा। हालांकि मुरादाबाद मंडल की 27 में से 17 सीटों पर सपा की जीत हुई, लेकिन यह संतोषजनक नहीं कहा जा सकता। दोनों ही मंडल में किसी भी ज़िले में क्लीन स्वीप नहीं कर पाई। पीलीभीत और शाहजहांपुर ज़िलों में सपा एक भी सीट पर जीत नहीं हासिल कर पाई। आज़म ख़ान के गृह जनपद रामपुर में भी पार्टी पांच में से दो सीटों पर चुनाव हार गई।

मायावती व अखिलेश यादव की तस्वीर

अमरोहा ज़िले में सपा को चार में से दो, संभल की चार में से तीन, मुरादाबाद की छह में से पांच, और बिजनौर की आठ में से चार पर ही जीत हासिल कर पाई। हालांकि बिजनौर शहर, मुरादाबाद शहर, धनौरा, और हसनपुर, में सपा के उम्मीदवार काफी नज़दीकी मुक़ाबले में हारे हैं। पीलीभीत, शाहजहांपुर, बदायूं, बरेली में सपा के लिए हार पचा पाना आसान नहीं है। इसकी एक वजह है कि बदायूं और बरेली ज़िलों में मुसलमान वोटरों के अलावा यादव बड़ी तादाद में हैं। इसके अलावा पार्टी का दूसरी जातियों पर भी ख़ासा प्रभाव रहा है। 

इन दो मंडलों में सपा की हार की कई वजहें हैं। इनमें उम्मीदवारों का ख़राब चयन, आख़िरी वक़्त में कई उम्मीदवारों का बदला जाना, पार्टी के दूसरी पंक्ति के नेताओं की अनुपस्थिति के अलावा बहुजन समाज पार्टी (बसपा) और ओवैसी की पार्टी एमआईएम की मुसलमान उम्मीदवार भी रहे। मुरादाबाद, बिजनौर, धनौरा, बदायूं, शाहजहांपुर, जलालाबाद, तिलहर, ददरौल, पीलीभीत, में बसपा के मुसलमान और यादव उम्मीदवारों ने सपा के वोटों में ख़ासी सेंध लगाई। हालांकि बसपा का एक भी उम्मीदवार चुनाव नहीं जीता, लेकिन उसके उम्मीदवारों ने इतना तो कर ही दिया कि इन सीटों पर सपा के उम्मीदवार नज़दीकी मुक़ाबले में हार गए।

सपा को इस इलाक़े में आज़म ख़ान की कमी भी काफी खली। जेल में होने की वजह से आज़म ख़ान पार्टी के लिए प्रचार नहीं कर पाए। इसके अलावा सलीम शेरवानी, धर्मेंद्र यादव, जैसे दूसरी पंक्ति के नेता भी प्रचार से नदारद थे। इस इलाक़े में सपा गठबंधन के तरफ से अखिलेश यादव और जयंत चौधरी के अलावा कोई बड़ा नेता प्रचार में नज़र नहीं आया। ज़ाहिर है, पार्टी या तो इस इलाक़े की सीटों को लेकर अति-आत्मविश्वास में थी, या फिर पार्टी की तैयारी आधी-अधूरी थी। 

उत्तर प्रदेश मे पहले दो चरण की वोटिंग के दौरान कोविड नियमों के तहत प्रचार पर चुनाव आयोग की पाबंदियां भी पार्टी के पक्ष में नहीं गईं। सपा का अधिकतकर वोटर पिछड़ा और डिजिटल माध्यमों से दूर है। इसका असर पार्टी के प्रचार अभियान पर भी पड़ा। पार्टी आम लोगों तक अपना संदेश उस तरह से नहीं पहुंचा पाई जिस तरह पहुंचाना चाहिए थे। सोशल मीडिया पर सपा के तमाम बड़े नेता नदारद दिखे और जो थे, वह उसका समुचित इस्तेमाल नहीं कर पाए। स्वामी प्रसाद मौर्य, ओम प्रकाश राजभर, लालजी वर्मा, इंद्रजीत सरोज, सलीम शेरवानी, इमरान मसूद, धर्म सिंह सैनी, और वीर सिंह की सभाएं अगर अलग-अलग जगह होतीं तो यक़ीनन सपा को इसका फायदा मिलता।

इधर बसपा के तमाम उम्मीदवारों ने सपा को दोहरा नुक़सान पहुंचाया। जहां मुरादाबाद, बदायूं, धनौरा, बिजनौर जैसी सीटों पर बसपा उम्मीदवारों ने मज़बूती से लड़कर सपा के वोटों में विभाजन किया, वहीं कई सीट ऐसी भी रहीं, जहां बसपा उम्मीदवार लड़ते ही नहीं दिखे। इसका फायदा भाजपा को मिला। हालांकि भाजपा राशन की थैलों और दूसरी योजनाओं का हवाला देकर बड़ी तादाद में दलित और मुसलमान वोटरों के अपनी तरफ आने का दावा कर रही है, लेकिन मामला दूसरा ही है।

इन नौ ज़िलों में बसपा का ख़ासा प्रभाव रहा है। दलित वोटरों को बसपा यह समझाने में कामयाब रही कि सपा जीत गई तो उनकी ज़मीनों के पट्टे जाट, गूजर और यादव क़ब्ज़ा लेंगे। जंगलराज और ग़ुंडाराज के नॅरेटीव दलित मतदाताओं के बीच ख़ूब बिके। इसके अलावा बहुत से दलित मतदाता धार्मिक ध्रुवीकरण का भी शिकार हुए। बहरहाल, इसमें सपा की भी कमज़ोरी है। वीर सिंह और धर्म सिंह सैनी जैसे नेता को पार्टी में शामिल करने के बावजूद सपा दलित और सैनी मतदाताओं को अपने पाले में नहीं ला पाई।

सपा अगर इन नौ ज़िलों में दस से पंद्रह फीसदी तक दलित मतदाताओं को लुभा पाने में कामयाब हो जाती तो यह तय था कि भाजपा को इस तरह की सफलता, कम से कम इस इलाक़े में तो नहीं मिलती। इसके अलावा अगर पार्टी ने टिकट वितरण सही किए होते और अपने बाग़ियों को बसपा में जाने से रोक पाती, तब भी बेहतर नतीजे आ सकते थे। सपा ने रही सही कसर अपने कार्यकर्ताओं की अनदेखी करके मुखिया गूजर जैसे संघ कार्यकर्ता को टिकट देकर पूरी कर ली। मुखिया गूजर वोट तो पार्टी को दिला नहीं पाए, उल्टा बड़ी तादाद में मुसलमान नाराज़ हो गए।

(संपादन : नवल/अनिल)


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