आंबेडकरवादी-चिंतन-परंपरा में भारतीय दर्शन का अवलोकन

वैदिक साहित्य के बारे में चिंतकों का मत है कि यदि हम इस साहित्य का साहित्यिक-कृति के तौर पर भी मूल्यांकन करें तो यह मानना पड़ेगा कि ब्राह्मण ग्रंथों में हमें केवल नीरस ग्रंथ मिलते हैं। सच्ची बात तो यह है कि भारतीय साहित्य में इतनी शुष्क और बोझिल शैली अन्यत्र कहीं नहीं मिलती। इतना होने के बावजूद भी अधिकतर भारत-वासियों का मोह इन वेदों में उसी प्रकार बना हुआ है जैसे कि एक सांप का अपनी बांबी से बना होता है। बता रहे हैं द्वारका भारती

भारत के दर्शन के ज्ञाता भली-भांति जानते हैं कि भारत की सांस्कृतिक पृष्ठभूमि, स्थूल रूप में दो दार्शनिक ध्रुवों के आधार पर ही व्याख्यायित की जाती रही है, जबकि यहां कई पुरातन मत-मतांतर प्रचलित रहे हैं। इन दो ध्रुवों को वैदिक व अवैदिक परंपरा के रूप में जाना जाता है। अवैदिक-ध्रुव में बौद्धमत तथा जैनमत का नाम लिया जाता है और वैदिक-ध्रुव को, जिसमें ब्राह्मणों का ही अधिकतर योगदान रहा है, हिन्दुमत का नाम दिया जाता है। यहां यह प्रश्न गौण है कि कौन-सी दार्शनिक-परंपरा पुरातन है और कौन-सी ज्यादा पुरानी नहीं, बल्कि यह प्रश्न अवश्य किया जा सकता है कि यदि भारत में अवैदिक परंपरा का उदय न हुआ होता तो भारत की संस्कृति का स्वरूप आज क्या होता? यदि इस अवैदिक परंपरा, जिसमें बौद्धमत, जैनमत के अतिरिक्त चार्वाक मत का नाम भी लिया जाता है, भारत की संस्कृति में मौजूद न होती तो इस देश का सामाजिक, वैचारिक और आर्थिक ढांचे का आज स्वरूप क्या होता? भारतीय संस्कृति की गहरी छाप जोकि बौद्ध मत के द्वारा एशिया के विभिन्न भागों में मिलती है, उसका स्वरूप बौद्धमत के न होने की सूरत में क्या होता? आज जबकि बौद्धमत बर्मा, थाइलैंड, कोरिया, जापान और चीन की वास्तु एवं ललित कला पर छाया हुआ है, बौद्धमत के बिना वहां भारत की पहचान क्या होती? ये कुछ ऐसे प्रश्न हैं जोकि अक्सर प्रत्येक भारतीय बुद्धिजीवी के मन में पैदा होते हैं। 

सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह, जो प्रत्येक आंबेडकरवादी की जेहन में पैदा होता है कि यदि अवैदिक परंपरा के रूप में बौद्धमत का अस्तित्व न होता तो बाबा साहेब कौन-सी दार्शनिक परंपरा को ग्रहण करते? क्या वे वैदिक-परंपरा का निर्वाहन करने को ही बाध्य होते? यह प्रश्न निस्संदेह आज भले ही कोई अर्थ न रखते हों लेकिन यह तय है कि यदि भारत की सांस्कृतिक-परंपरा में अवैदिक-परंपरा का अस्तित्व न होता तो इस देश का नाम बाहरी जगत के लिए उन अर्थों में कदापि इतिहास में दर्ज नहीं होता, जिन अर्थों में हम आज जानते हैं। 

भारत की छवि यदि आज एक आध्यात्मिक गुरु की है, तो इसका सबसे बड़ा कारण बौद्धमत की आध्यात्मिकता ही रही है। बहुत-से लोगों की मान्यता है कि भारत को यदि एक आध्यात्मिक गुरु माना जाता है तो इसका कारण भारत के ऋषि-मुनि रहे हैं। जबकि वास्तव में इन ऋषियों-मुनियों की भूमिका को बहुत बढ़ा-चढ़ा कर दर्शाया गया है। इनको एक अलौकिक प्रारूप मानकर प्रस्तुत किया जाता रहा है और बहुत से चमत्कार इनके साथ टांग दिए गए हैं। वास्तव में इन ऋषियों की भूमिका को यदि भली-भांति समझना हो तो इनकी जीवन-पद्धति को समीप से देखने का प्रयास करना होगा। डॉ. सुरेन्द्र अज्ञात, जोकि पौराणिक वाङ्मय के जाने-माने आलोचक हैं, का मानना है कि ‘ऋषि’ शब्द का अर्थ उन सुदूर अतीत के कवियों से जुड़ा है जोकि तत्कालीन भाषा में काव्य रचना करते थे। अपनी पुस्तक ‘भाड़ में जाए जाति : जन्मना व कर्मणा’ में उन्होंने ऋषि-मुनियों की भूमिका को बहुत गहरे खंगाला है। उन्होंने आगे लिखा है कि “यदि यह मान लिया जाए कि ऋषि को ऋषि इसलिए कहते हैं कि वे गतिशील थे – कूपमंडूक नहीं थे और वे श्रमशील थे” और व्यंग्य करते हुए कहते हैं कि यह बात अलग है कि “जो दुनिया उन्होंने देखी वह कितनी विशाल थी। और जो देखा वह कितना सही था व गलत था।” आगे डॉ. अज्ञात यह प्रश्न करते हैं कि, “क्या वे आज भी हमारे आदर्श और मार्गदर्शक हो सकते हैं?” 

वास्तव में ‘ऋषि’ शब्द भारतीयों के जेहन पर इतना गहरा खुद चुका है कि उस पर आलोचनात्मक दृष्टि कदापि सहन नहीं की जाती। इन ऋषियों-मुनियों की भूमिका को यदि किसी पश्चिमी विद्वान की नकार से देखना हो तो हमें ‘हक्सले’ की पुस्तक ‘इवेल्यूशन एण्ड ऐथिक्स’ (पृष्ठ 63) को देखना होगा, जिसे बाबा साहेब द्वारा उद्धृत किया गया है। (‘बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय’, खंड-6)  हक्सले लिखते हैं, “भारतीय संन्यासियों-तपस्वियों ने तपश्चर्या द्वारा शारीरिक रूप में जितना कष्ट सहा है, उसका अन्यत्र उदाहरण मिलना कठिन है। आधुनिक युग की किसी भी संन्यासी मठवादी प्रथा ने मानवीय मन को निर्विकार निद्रित अवस्था की उस हद तक नहीं गिराया है, जो उसकी सर्वमान्य पवित्रता को पागलपन की भावना से भर जाने का खतरा उत्पन्न करती हो।”

इन कथित ऋषियों-मुनियों व संन्यासियों द्वारा लिखे गए ग्रंथों में व्याप्त कृत्रिम आध्यात्मिकता की हक्सले ने खुले शब्दों में आलोचना ही नहीं की, बल्कि उन्होंने भारत के नवयुवकों को स्पष्ट रूप से यह संदेश दिया है कि वे अपने दुर्गन्धयुक्त आध्यात्मिक ग्रंथों में बुद्धिमता देखने का प्रयास न करें, क्योंकि उनके अनुसार इन ग्रंथों में शब्दों की अंतहीन कसरत के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है। वे भारत के नवयुवकों का आह्वान करते हैं कि वे यदि पढऩा ही चाहते हैं तो वाल्तेयर, प्लेटो, अरस्तू, मार्क्स और टॉलस्टॉय जैसे विचारकों को पढ़ें। यदि वे अपने जीवन तथा उसकी समस्याओं को सुलझाना चाहते हैं तो इन्हें इन विचारकों को पढ़ना ही चाहिए।

अधिकतर भारतीयों की रुचि आज भी पुरातन पंथ में अधिक देखी जा सकती है। यह पुरातनपंथ का मोह सदियों के बाद भी उनका पीछा नहीं छोड़ रहा है। वास्तव में हमारा मन आदर्शवाद पर ही टिका हुआ है। यह कहा जा सकता है कि बौद्ध परंपरा भी तो हजारों वर्ष पुरानी है, तो उसे भी क्यों न छोड़ा जाए? लेकिन यहां हमें यह बी देखना होगा कि बौद्ध-परंपरा में भी ऐसी विसंगतियां मौजूद हैं जोकि वैदिक-परंपरा में मौजूद देखी जाती हैं? क्या बौद्ध लोग भी वर्णव्यवस्था में विश्वास रखते हैं? क्या उनकी दर्शन-प्रणाली में भी ऐसी तहें मौजूद देखी जाती हैं, जिनके द्वारा एक विशेष वर्ग को तो जीवन के तमाम अधिकार प्राप्त हों और दूसरे निम्न वर्ग के जीवनदायक सभी मार्ग अवरूद्ध कर दिए गए हैं? यदि ऐसा कुछ है तो बौद्ध परंपरा की भी उसी प्रकार आलोचना होनी चाहिए जैसे कि वैदिक-परंपरा की होती है। त्रासदी यह है कि आज भी वैदिक-परंपरा का मोह पालते हुए अधिकतर भारतीय इसी परंपरा में ही भारत का उत्थान देखना चाहते हैं। यहां तक कि भारत की तमाम आधुनिक समस्याओं तथा विसंगतियों का समाधान भी इसी पुरातनता में खोजे जाने की प्रवृत्ति से हम पीछा नहीं छुड़ा पाए हैं। ऋषियों-मुनियों की छवि भारतीय जनमानस पर इस प्रकार गहरे गढ़ दी गई है कि उससे हम आज तक पीछा नहीं छुड़ा पाए हैं। 

पारलौकिक नहीं, समतामूलक मानवीय मूल्यों पर आधारित है आंबेडकरवादी चिंतन परंपरा

यदि हम इस प्रवृत्ति का कारण ढूंढे तो पाएंगे कि अन्य कई कारणों के अतिरिक्त यह थोथी आध्यात्मिकता भी मुख्य कारणों में एक है। ऋषियों-मुनियों के अस्तित्व का दूसरा नाम ही आध्यात्मिकता है। यहां हम यह प्रश्न कर सकते हैं कि वनों में बसे कथित आध्यात्मिकता का आधार तैयार करने वाले यह कथित ऋषि-मुनि समाज में व्याप्त समस्याओं के प्रति किस हद तक सोच सकते हैं? जंगलों में रहने वाले यह लोग वास्तव में प्रकृतिवादी तो कहे जा सकते हैं, लेकिन मानवीय समस्याओं के प्रति उनका कहां तक योगदान हो सकता है? जंगलों में बैठकर अपनी काव्यात्मक अभिव्यक्ति प्रकट करने वाले यह ऋषि-मुनि वास्तव में दार्शनिकों की श्रेणी में न होते हुए भी दार्शनिक घोषित कर दिए जाते रहे हैं। प्रसिद्ध चिंतकों की मान्यता है कि “ऋग्वेद के प्रारम्भिक सूत्रों में दर्शन के प्रति कोई अनुराग दिखाई नहीं देता है।” चिंतकों की मान्यता है कि, “इस प्रकार की बातें अर्थात् वेदों में दर्शन या ज्ञान आदि के तत्वों की बातें, वेद की विषय वस्तु की वास्तविक जानकारी की अपेक्षा वेद के प्रति अंधश्रद्धा ही अधिक दिखाती है।” (एचपी शास्त्री, ‘हरप्रसाद रचनावली’)

अन्य वेदों में उपलब्ध सामग्री में यदि दार्शनिकता के कुछ अंश हम पाते भी हैं तो यह ब्राह्मणों के हित साधने का ही एक कदम है। उदाहरण के रूप में यदि हम यजुर्वेद को देखें तो इसमें विभिन्न कर्मकांडों अथवा यज्ञों का ही वर्णन है। “वास्तव में यह कर्मकांड मूलरूप में जादू-टोने से संबंधित गतिविधियों जैसे रहें होंगे” – इस तरह का आकलन लगभग सभी प्रगतिवादी चिंतकों का रहा है। चिंतकों की दृष्टि में यह सारी प्रक्रिया अर्थात् यज्ञ-कर्मकांड के अर्थ यही हैं कि यदि लक्ष्य की पूर्ति के लिए भ्रान्ति पैदा की जाए तो उसे ही जादू कहा जाएगा। वास्तविक विद्या की पूरक एक भ्रामक विद्या। यहां यह स्पष्ट करना ठीक रहेगा कि इन कर्मकांडों का प्रकृतिपर तो कोई प्रभाव नहीं पड़ता था, परन्तु इन कर्मकांडों का संपादन करने वालों पर इनका प्रभाव पड़ सकता था और पड़ता भी था। अर्थात् ब्राह्मणों की श्रेष्ठता व उनकी हलवा-पुड़ी का इंतजाम होता रहता था। इन कर्मकांडों के संदर्भ में चिंतकों की मान्यता है कि उक्त कर्मकांड मूलत: प्रकृति के साथ मनुष्य के संबंध से थे, लेकिन उनका मानना है कि ब्राह्मण ग्रंथों में जिस रूप में उनकी चर्चा हुई है, वे अपने मूलसंदर्भ से अलग कर दिए गए हैं और उनका कार्य अब बिल्कुल विपरीत दिशा में हो गया है। अब वे एक नई क्रियाविधि के अस्त्र बन गए हैं अर्थात् मानव के विरुद्ध मानव के संघर्ष के अस्त्र बन गए हैं। (डीपी चट्टोपाध्याय, ‘भारतीय दर्शन में क्या जीवंत है और क्या मृत’)

वैदिक साहित्य के बारे में चिंतकों का मत है कि यदि हम इस साहित्य का साहित्यिक-कृति के तौर पर भी मूल्यांकन करें तो यह मानना पड़ेगा कि ब्राह्मण ग्रंथों में हमें केवल नीरस ग्रंथ मिलते हैं। सच्ची बात तो यह है कि भारतीय साहित्य में इतनी शुष्क और बोझिल शैली अन्यत्र कहीं नहीं मिलती। इतना होने के बावजूद भी अधिकतर भारत-वासियों का मोह इन वेदों में उसी प्रकार बना हुआ है जैसे कि एक सांप का अपनी बांबी से बना होता है।

इन ऋषियों-मुनियों की आध्यात्मिकता को भारत का आम नागरिक वही स्थान देता है जो स्थान यहां की गुरु-शिष्य परंपरा को दिया जाता है। डॉ. आंबेडकर इस कोरी आध्यात्मिकता को नापसंद करते हैं। विश्व के जाने-माने चिंतक भी इस कोरी आध्यात्मिकता के प्रति अपने नकारात्मक विचार प्रकट करते हैं। वे धर्म को महज आध्यात्मिकता का माध्यम नहीं समझते, जबकि वैदिक-परंपरा धर्म को आध्यात्मिकता के आवरण में लपेट कर अपने उद्देश्य के लिए प्रयोग करती रही है। अपने धर्मस्थानों को यह वैदिक-परंपरा आध्यात्मिक केन्द्र के साथ-साथ अपनी संस्कृति को बचाए रखने के लिए प्रयोग करती हुई भी देखी जाती है। वास्तव में यह आध्यात्मिकता धर्म के अनुरूप ही अपनी दिशा तय करती है। धर्म यदि वर्णव्यवस्था को बनाए रखने में अपने तत्वीय गुण रखता है तो यह तय है कि यह आध्यात्मिकता भी उसी तत्व को स्वीकार करने में कोई हिचकिचाहट नहीं दिखाती। 

शायद इसी कारण डॉ. अम्बेडकर अपनी तहरीरों में थोथे अध्यात्मिक है कि धर्म को कार्यरत नीतिशास्त्र बनना वाद के प्रति कठोरता भरा दृष्टिकोण रखते हैं। उनका मानना चाहिए, न कि केवल अध्यात्मवाद तक सीमित रहना चाहिए। इस प्रकार के धर्म को वे सख्त नापसंद करते हैं। वे एक पश्चिमी विद्वान प्लामन को उद्धृत करते हैं, जिसका कथन इस प्रकार है, “यदि धर्म एक कोरा अध्यात्मवाद बनकर रह जाए और उसके अलावा कुछ भी नहीं, तब एक बात निश्चित है कि उसका सीधे और आमजन से कोई संबंध नहीं होगा।” आगे प्लामन कठोर शब्दों में दो-टूक बात कहते हैं, “धर्म को पूर्णरूप से अध्यात्मवाद की पकड़ में रखने का अर्थ है, उसे मूर्खता का विषय बनाना, क्योंकि जिस प्रकार हम किसी ऐसी बात में जो प्रत्यक्ष तथा सजीव रूप से राजनीति में परिणामकारक नहीं है, विश्वास करते, उसी प्रकार अन्तत: धर्म में विश्वास करना भी कठोर शब्दों में एक मूर्खता ही है, क्योंकि किसी परिणामकारक अर्थ में ऐसा विश्वास करना भी कठोर शब्दों में एक मूर्खता ही है, क्योंकि किसी परिणामकारक अर्थ में ऐसा विश्वास किसी प्रकार का अंतर नहीं करता और समय तथा आकांक्षा की इस दुनिया में जो बात कोई अन्तर नहीं कर सकती, वह अस्तित्वहीन ही होती है।” (‘बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाङ्मय’, खंड-6)

स्पष्ट है कि अवैदिक परंपरा में थोथी आध्यात्मिकता जोकि धर्म को धुंधला कर प्रस्तुत करती हो, मानव की समस्याओं के प्रति कोई अहम् रोल अदा नहीं कर सकती। कोरी आध्यात्मिकता बुद्धिवाद के विरुद्ध एक सशक्त हथियार का कार्य करती है। “संपूर्ण ज्ञान मिथ्या है” आदि जैसे दार्शनिक मुहावरे धर्म की कार्य प्रणाली पर विपरीत प्रभाव डालते हैं। शायद यही कारण है कि बौद्ध धम्म का एक महत्वपूर्ण अंग ‘महायान’ की भूमिका आंबेडकरवादियों को निराश करती है, क्योंकि महायान दर्शन के अनुसार संसार के सारे पदार्थ निस्सार, मायामय एवं थोथे हैं। जबकि हीनयानवादी यह विश्वास करते थे कि संसार की सभी वस्तुएं क्षणिकमात्र हैं। (एसएन दासगुप्त, ‘कृत भारतीय दर्शन का इतिहास’, भाग-1) 

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यदि हम यहां यह भी चर्चा कर लें कि बौद्ध दर्शन में शून्यवाद एक ब्राह्मणवादी तत्व है, अप्रासंगिक नहीं होगा। शून्यवाद से अर्थ सत्वहीनता और सांसारिक वस्तुओं की निस्सारता से है। कहा गया है कि, “एक भिक्षु का यह प्रयास होना चाहिए कि वह संसार की इस शून्यता को पहचान कर मूर्त कर्म करे तथा इस (तथ्य) का साम्य स्थापित कर सारे संसार को शून्य समझे। वास्तव में यदि हम आंबेडकरवाद के दृष्टिकोण को अपनाएं तो नागार्जुन कृत शून्यवाद जोकि महायान शाखा का एक महत्वपूर्ण दार्शनिक तत्व है, आदिशंकराचार्य कृत दार्शनिक सिद्धांत शून्यवाद जोकि ब्राह्मणवाद का ब्रह्मशास्त्र है, बेशक दार्शनिक स्वर पर भिन्न रूप में व्याख्यायित किए जाते रहे हों, लेकिन इन दोनों को इस आलोचनात्मक दृष्टि से बचाया नहीं जा सकता कि यह दोनों दार्शनिक तत्व अध्यात्मवाद के अचूक शस्त्र रहे हैं। और यह दोनों सिद्धांत ब्राह्मणवाद के पक्ष में ही अपनी भूमिका का निर्वहन करते दिखाई देते हैं। यह दोनों सिद्धांत एक ऐसी बौद्धिक प्रक्रिया है जिसको हम बौद्धिक-ऐय्याशी का नाम भी दे सकते हैं। 

यहां यह बताना भी आवश्यक होगा कि इसी अध्यात्मवाद के बल पर भारत की संस्कृति में तमाम किस्म के सामाजिक भ्रष्टाचार बढ़ रहे हैं तथा स्वर्ग-नरक की अवधारणाएं अध्यात्मवाद के कारण ही मिटने का नाम नहीं ले रहीं। अध्यात्मवाद के नाम पर ही धार्मिक लूट-खसोट हो रही है, नये-नये डेरों का उदय हो रहा है। यहां लोगों को मानसिक गुलामी का पुतला बनाया जा रहा है। सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि सामाजिक परिवर्तन के तमाम मार्गों को अवरुद्ध किया जा रहा है। जिस अध्यात्म के बल पर समाज को नैतिकता देने जैसी घोषणाएं की जा रही हैं, उसके बल पर निर्धन को निर्धनता की सौगात बांटी जा रही है, इसी अध्यात्मिकता का सहारा लेकर मानव-मानव में विभेद पैदा किया जा रहा है। वास्तव में अध्यात्मिकता उस मानसिक स्थिति का नाम है, जिसका दोहन बहुत आसानी से किया जा सकता है।

यदि भारत की संस्कृति में बौद्ध परंपरा का दखल न होता तो भारत की संस्कृति का स्वरूप कैसा होता? यह समझने के लिये हमें बौद्ध काल से पूर्व के भारत की वैचारिक-स्थिति को खंगालना होगा। बौद्ध काल से पूर्व युग को हम वैदिक युग का नाम देते हैं। दार्शनिक क्षेत्र में जो विभाजन किया जाता है उसके अनुसार दर्शन की प्रणालियों को दो मुख्य वर्गों, नास्तिक व आस्तिक में विभाजित किया गया है लेकिन बौद्ध काल के बाद ही विधिवत् रूप में हमारे सामाजिक मूल्यों का गठन होता हुआ भी हम देखते हैं। उपनिषद् काल के तुरन्त बाद ही बुद्ध 62 प्रकार के पाखंडों या अधर्मों की गणना करते हुए पाए जाते हैं। ऋग्वैदिक काल में मानव जंगली अवस्था से ज्यादा कुछ नहीं था। कृषि व पशुपालन आदि जीविकोपार्जन के मुख्य साधन थे। विधिवत् दर्शन की बात तब हमें कहीं दिखाई नहीं देती। पुनर्जन्म जैसी अवधारणाओं का तो तब जन्म भी नहीं हुआ था। इसके उपरांत उपनिषद् युग हमारे सामने आता है, जिनके दार्शनिक विचार परस्पर विचार भिन्नता रखते थे। उस काल में ईश्वर की अवधारणा का जन्म हो चुका था। ईश-उपनिषद् का नाम ईश्वर की अवधारणा पर ही रखा गया है। इस युग में कर्मकांड का उदय हो चुका था। नैतिकता के नाम पर कुछ नियम हमारे सामने आते हैं, जिनमें प्रमुख हैं– सोने की चोरी करने वालों, शराब पीने वालों, गुरु-पत्नी के साथ व्यभिचार करने वालों और ब्रह्महत्या करने वालों को पतित आचरण वाले घोषित किया गया था। दूसरे शब्दों में हम यह कह सकते हैं कि उस युग में अनाचार का पूर्ण रूप में बोलबाला था, जिसको रोकने के लिए छान्दोग्य उपनिषद् में यह पद हमें देखने को मिलते हैं। इस विश्व को चलाने के पीछे कोई अनोखी शक्ति अवश्य है – इसका वर्णन हमें मिलता है। छान्दोग्य से ही सबसे पहले पुनर्जन्म आदि की अवधारणा का जन्म होता हुआ देखा जाता है। इस स्थिति पर हमें राहुल सांकृत्यायन की टिप्पणी को देखना चाहिए। वे लिखते हैं, “शायद उस वक्त प्रथम प्रचारकों ने यह न सोचा होगा कि जिस सिद्धांत (पुनर्जन्म) का वह प्रचार कर रहे हैं वह आगे जाकर कितना खतरनाक साबित होगा, और वह परिस्थितियों के अनुसार बदलने की क्षमता रखने वाली शक्तियों को कुंठित कर समाज की प्रवाह-शून्य नदी को गंदला पानी बना छोड़ेगा।” राहुल सांकृत्यायन का यह कथन उस समय की शातिर परिस्थितियों को भली-भांति विवेचित करता है। आज भी यह पुनर्जन्म का सिद्धांत अपनी आभा खोता दिखाई नहीं देता लेकिन यदि बुद्ध इस सिद्धांत को चुनौती न देते तो भारत की वैचारक काया अपंगता का शिकार होती। यदि भारत की वैचारिक पद्धति में यह विचार आज तक जीवित है कि पुनर्जन्म सिर्फ एक विचारमात्र है, यथार्थ नहीं है, तो इसका श्रेय हमें बौद्ध परंपरा को ही देना होगा। आज का बुद्धिवादी व्यक्ति पुनर्जन्म के सिद्धांत को बच्चों का सिद्धांत ही मानता है। आज के विज्ञान ने तो इस पौराणिक-सिद्धांत को सिरे से ही खारिज कर दिया है। कल्पना कीजिए यदि बौद्ध व चार्वाक सिद्धांत इस अवधारणा की खिल्ली न उड़ाते अर्थात् इसको अपने तर्कों द्वारा खंडित न करते तो यह अवधारणा एक ऐसी कटु हकीकत बन जाती, जिसको तोडऩा बहुत कठिन होता। 

वास्तव में छांदोग्य ऋषि राजजैवलि और ब्राह्मण आरूणि ने इस अवधारणा को इतना जटिल बना दिया था कि इस पर अविश्वास का प्रश्न ही पैदा नहीं होता था। इस पर यह कहना तर्कसंगत व अनुचित नहीं होगा, यदि हम यह कहें कि भारतीय आदर्शवादी, शून्यवादी, मायावादी इस संसार को असत्य सिद्ध करते रहे और दूसरी ओर पुनर्जन्म जैसी अवधारणाएँ भी बनाते रहे, धूर्तता के अलावा और क्या हो सकते हैं?

‘ब्रह्म’ की अवधारणा आज भी एक ऐसी अवधारणा है जोकि विज्ञान के साथ-साथ चली आ रही है। पिछले दिनों ‘गॉड पार्टिकल’ की खोज के परिणाम को भी वैदिक-परंपरा के पक्षधरों ने अपने ही ढंग से व्याख्यायित करते हुए यह सिद्ध करने के प्रयास किए थे कि जो ‘कण’ इस खोज द्वारा खोजा गया था, वह वैदिक-परंपरा में सदियों पूर्व ही सूत्रबद्ध कर दिया गया था।

यहां यह कहना असंगत नहीं होगा कि यदि वैदिक अवधारणा के समक्ष अवैदिक परंपरा के तमाम विरोध मौजूद नहीं होते तो वैदिक अवधारणा द्वारा तय किए हुए तमाम सामाजिक मापदंड भारतीय समाज के लिए प्रथम व अंतिम मापदंड का दर्जा प्राप्त कर गए होते। हमारा राष्ट्रीय चरित्र प्राकृत-प्रतिष्ठित वैदिक परंपरा के साए में पलता हुआ भारत की दलित-पिछड़ी जातियों के लिए एक ऐसा नासूर बन जाता, जिसका निदान कभी भी नहीं किया जा सकता था। वैदिक परंपरा के लोगों का राष्ट्रीय चरित्र आज भी ‘श्रीमद्भगवत गीता’ से प्रेषित देखा जा सकता है। कहा जाता है कि, “गीता जितनी पढ़ी जाती है उससे कहीं अधिक पूजी जाती है, और जितनी पढ़ी जाती है उससे बहुत कम समझी जाती है।” (डीडी कोसंबी, ‘प्राचीन भारत की संस्कृति और सभ्यता’)

बौद्धों का संपूर्ण वाङ्मय वैदिक परंपरा के विरोध में अब तक तना हुआ न होता तो यह वैदिक-परंपरा उस व्याधि की तरह अब तक फल-फूल रही होती जोकि अंत में शरीर का अंत करके ही छोड़ती है। ब्राह्मणों के संपूर्ण दर्शन का यदि बौद्धों ने निर्भीक योद्धा की तरह सामना न किया होता तो यह ब्राह्मणवादी दर्शन भारत के संविधान पर पूर्णरूपेण आच्छदित होता तथा भारत का राष्ट्रीय चिन्ह चार सिंह न होकर त्रिदेव (ब्रह्मा-विष्णु-महेश) होता। अशोक चक्र की जगह परशुराम जैसों का फरसा दिखाई पड़ता। भारत की धर्मनिरर्पेक्षता के अर्थ ‘ब्राह्मणवाद’ तक ही सीमित होते, जिसकी कोशिश आज भी देखने को आ रही है।

आज के संदर्भ में यदि हम भारत के राजनैतिक ढांचे की कल्पना करते तो हमें इन राजनैतिक दलों का राष्ट्रीय दलों के रूप में ब्राह्मण दल देखने को मिलते जिनके नाम क्रमश: इस प्रकार होते – परशुराम राष्ट्रीय पार्टी, मनु सेना राष्ट्रीय दल, राष्ट्रीय महाभारत दल तथा रामभक्त भारतीय स्वयंसेवक दल आदि। गली-मुहल्लों, शहरों तथा प्रांतों के नाम भी ब्राह्मणवादी व्यवस्था के अनुरूप होते। यह नाम यूं तो आज भी मौजूद हैं, लेकिन अंतर यही होता है कि इन नामों के अतिरिक्त कोई गैर ब्राह्मण नाम देखने को नहीं मिलता। कोलकाता, पटना, बनारस, दिल्ली जसे बड़े शहरों के नाम देखने-पढऩे को न मिलते। इसकी जगह ब्राह्मणवादी नाम ढूंढ-ढूंढकर रखे जाते। आधुनिक डॉक्टरों की जगह हकीमों-जराहों का आधिपत्य होता जोकि रामयुग के सतयुगी डॉक्टरी-अस्त्रों से लैस बीमारों की शल्य क्रिया करते दिखाई पड़ते। अस्पतालों में डेटोल की जगह लोबान के धुएं से माहौल को कीटाणु-रहित बनाया जाता। अर्थशास्त्र के स्थान पर कौटिल्य का अर्थशास्त्र पढ़ाया जाता। किसी भी भारतीय को सात समुद्र पार जाने की आज्ञा न होती।

विदेशों की प्रौद्यौगिकी की जगह राम युग के पुष्पक विमानों में बैठकर लोग यात्रा करते। देश की रक्षा के लिए सेना के पास आधुनिक हथियारों की जगह अग्निबाण उपलब्ध होते। न्यायालयों में न्याय के मापदंड भी ब्राह्मण संहिता के अनुसार होते। अर्थात ब्राह्मणों को दंड न के बराबर, तथा शूद्रों को अजीबो-गरीब दंड सुनाए जाते। कहा जाता है कि संस्कृत भाषा उच्च वर्ग की बोली बन गई, जिसे शिक्षित लोग ही समझ पाते थे। इस भाषा में दी जाने वाली विधिवत् शिक्षा पर ब्राह्मणों का ही अधिकार रहा है। यदि बौद्ध परंपरा पालि भाषा को उत्साहित न करती तो उस वक्त के आम जन को शायद बिना भाषा के गूंगों की तरह विचारों का अदान-प्रदान करना पड़ता। ब्राह्मणवादी साहित्य में तर्क की सदा अवहेलना की गई है। यदि ब्राह्मणों द्वारा तर्क शास्त्र प्रस्तुत भी किया गया तो उस ‘तर्कशास्त्र’ में समस्त वास्तविकता को यत्नपूर्वक दूर रखा गया। डीडी कोसंबी के मुताबिक, “इसकी अंतिम परिणति शंकराचार्य (लगभग 800 ई.पू.) के दर्शन में देखी जा सकती है।” (डीडी कोसंबी, ‘प्राचीन भारत की संस्कृति और सभ्यता’)

यहां हम यह प्रश्न उठा सकते हैं कि यदि बौद्ध परंपरा न होती तो क्या भारत का नाम तर्कशास्त्र विधा में ढूँढे मिलता? बौद्ध धर्म के दाशनिक तत्वों में अहिंसा का तत्व प्रधान है। हम इस तथ्य को यूं भी प्रकट कर सकते हैं कि बौद्धकाल से पूर्व अहिंसा की अवधारणा का अस्तित्व तक नहीं मिलता। लेकिन बौद्ध धर्म के अस्तित्व में आने के बाद ही ब्राह्मणों के लिए यह आवश्यक हो गया था कि वे वैदिक पक्षों की उक्त अहिंसा के प्रति दिखावटी भक्ति प्रदर्शित करने के साथ-साथ अहिंसा का भी उपदेश दें। यहां ब्राह्मण शाकाहारिता को अनिवार्य घोषित करने के लिए बाध्य हो गए थे। “इससे पूर्व स्मृतियों में विभिन्न प्रकार के मांसों की सूची दी गई है जोकि श्राद्धभोज में ब्राह्मण अतिथियों को खिलाया जाता था।” (वही)

यहां हम कल्पना कर सकते हैं कि यदि बौद्ध अहिंसा को न अपनाते तो शायद ही वैदिक-परंपरा शाकाहारिता को अपनाती, जिसको आज ब्राह्मण का आवश्यक गुण माना गया है। आज शाकाहारी होने का अर्थ ‘ब्राह्मण’ होने से चस्पां कर दिए गए हैं। ब्राह्मण भी आज मांसभक्षक होते। वैसे आज के ब्राह्मणों में चोरी-छिपे मांस खाने की रुचि का शिकार भी देखा गया है। इस तथ्य से हम यह निष्कर्ष बहुत सुगमता से निकाल सकते हैं कि यदि बौद्धों का दबाव न होता और उनकी वैचारिक प्रणाली मानववादी न होती तो वैदिक परंपरा से संवाहक ब्राह्मणों में से कुछ सुधारवादी तत्व कभी न उभर पाते। मांस खाना, यज्ञ आदि में पशुबलि देना उनके प्रिय अनुष्ठानों में शामिल था। लेकिन बौद्धों की अहिंसा के तत्त्वों को देख अपने विचारों में अहिंसा को भी शामिल करना उनकी विवशता रही थी। यहां हम निस्संकोच कह सकते हैं कि यदि बौद्ध परंपरा में अहिंसा जैसा दार्शनिक व धार्मिक तत्व मौजूद न होता तो वही ब्राह्मण जो गाय तक चट कर जाता था, गोपालक होने के बल पर अपनी पवित्रता कायम न रख पाता। इन अर्थों में इसे बौद्ध परंपरा का आभारी होना ही चाहिए।

डी.डी. कोसंबी लिखते हैं कि, “वास्तव में यह वैदिक परंपरा के संवाहक ब्राह्मणों की तमाम तार्किक असंगतियों को पूरा हजम कर जाने की इस क्षमता की छाप भारतीय राष्ट्रीय चरित्र पर भी पड़ी है। … वैदिक परंपरा ने बौद्ध परंपरा से बहुत-सी सामग्री हथियाकर अपने धर्मग्रंथों में प्रस्तुत कर दी है। गीता में बौद्धमत की कई बातें संक्षिप्त रूप में और बड़े कारगर ढंग से विष्णु के अवतार के मुंह से कहलवाई गई है।” (वही)

अंतत: हम यह निष्कर्ष बिना किसी हिचकिचाहट के प्रस्तुत कर सकते हैं कि यदि वैदिक संस्कृति के सामने अवैदिक परंपरा अर्थात् बौद्ध संस्कृति का दबाव न होता तो वैदिक संस्कृति का स्वरूप उस विगड़ैल सांड जैसा होता जोकि बिना किसी नकेल के सारे गांव में दनदनाता हुआ घूम रहा होता है और सबको अपने सींगों पर उठाये घूम रहा होता। यहां हमें दर्शन के चर्चित व्याख्याकार एसएन दासगुप्त की इस विषय में टिप्पणी स्मरण हो आती है। उन्होंने निष्पक्ष रूप से कहा है, “हिन्दू दर्शन के अध्येता यह भली-भांति जानते हैं कि धर्म के संघर्ष में दार्शनिक जिज्ञासा का जागरण अधिक तेजी से हुआ, अधिकांश दार्शनिक ग्रंथ इसी काल में लिखे गए, अत: विभिन्न हिन्दू दर्शनों का पूर्णरूपेण अध्ययन करने के लिए बौद्ध दर्शन का ज्ञान अत्यन्त आवश्यक है ताकि हम बौद्ध दर्शन के साथ उसका तुलनात्मक अध्ययन कर सकें।”

(संपादन : नवल/अनिल)


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