बहस-तलब : मौजूदा सवालों से बचने का वितंडा है आरएसएस का मिशन कश्मीर

इससे पहले भी दुनिया में इतिहास में हुई हिंसा को लेकर फ़िल्में बनी हैं। लेकिन इन फिल्मों का मकसद किसी देश या समुदाय के प्रति आज नफरत भड़काना नहीं होता। उदाहरण के लिए हिटलर के समय जर्मनी में यहूदियों का जनसंहार को विषय बनाकर कई फ़िल्में बनीं, जिनमें ‘शिंडलर्स लिस्ट’ तथा ‘अ बॉय इन स्ट्रिप्पड पाजामा’ मुख्य हैं। बता रहे हैं हिमांशु कुमार

आजकल सिनेमाघरों में एक नई फिल्म दिखाई जा रही है, जिसका नाम ‘कश्मीर फाइल्स’ है। इस फिल्म में कथित तौर पर कश्मीर में कश्मीरी पंडितों पर हुई ज्यादतियां दिखाई गई हैं। कोई भी मानवाधिकार पसंद व्यक्ति किसी समुदाय पर उसके धर्म या जाति के कारण किसी भी ज्यादती या हमले का समर्थन नहीं कर सकता। 

इस फिल्म के प्रदर्शन के बाद धार्मिक उन्माद के उभार के नए नए किस्से सामने आ रहे हैं। अनेक जगहों पर गांधी, नेहरु, जेएनयू और सेक्युलरिज्म को भद्दी-भद्दी गलियां दी जा रही हैं। 

जहां तक तथ्यों का सवाल है तो यह घटना जनवरी 1990 की है। कश्मीर के अलगाववादियों ने कश्मीरी पंडितों को वहां से बाहर निकालने की बात कही। इसके बाद करीब पौने दो लाख कश्मीरी पंडितों ने घाटी से पलायन कर किया, जिसमें करीब दो साल का समय लगा। 

जहां तक इस पूरी घटना के लिए कांग्रेस को गालियां देने का सवाल है तो यह पूरी तरह से इतिहास को भुलाने और उसमें गलत तथ्यों को मिलाना माना जाएगा। जब यह सब हुआ तब वहां कांग्रेस का शासन नहीं था। वहां राष्ट्रपति शासन लागू था। यानी सत्ता केंद्र सरकार के पास थी। उस समय केंद्र में विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार थी। यह सरकार भाजपा के समर्थन से केंद्र में टिकी हुई थी। यानी इस पूरे घटनाक्रम में भाजपा तो जिम्मेदार थी, लेकिन कांग्रेस किसी भी तरह से नहीं।

असली समस्या इस फिल्म के माध्यम से भड़काई जाने वाली नफरत को लेकर है। इससे पहले भी दुनिया में इतिहास में हुई हिंसा को लेकर फ़िल्में बनी हैं। लेकिन इन फिल्मों का मकसद किसी देश या समुदाय के प्रति आज नफरत भड़काना नहीं होता। उदाहरण के लिए हिटलर के समय जर्मनी में यहूदियों का जनसंहार को विषय बनाकर कई फ़िल्में बनीं, जिनमें ‘शिंडलर्स लिस्ट’ तथा ‘अ बॉय इन स्ट्रिप्पड पाजामा’ मुख्य हैं। लेकिन इन फिल्मों को देखने के बाद आप आज के जर्मन नागरिकों से नफरत नहीं करने लगते।

संजय काक के अनुसार, कश्मीर को अयोध्या बनाना चाहता है आरएसएस

असल तो फिल्म बनाने का मकसद है। इन विदेशी फिल्मों का मकसद किसी समुदाय के प्रति नफरत भड़का कर चुनाव जीतना नहीं था। इसलिए इन फिल्मों में मानवीय बुराई के साथ साथ मानवीय अच्छाई भी हकीकत के साथ दिखाई गयीं। इन फिल्मों में जहां एक ओर यहूदियों पर होने वाले ज़ुल्म दिखाए गये तो दूसरी ओरहीं इन यहूदियों की मदद करने वाले जर्मन लोग भी दिखाए गए। ‘शिंडलर्स लिस्ट’ फिल्म की तो कहानी ही यह है कि किस तरह एक जर्मन व्यापारी यहूदी लोगों को बचाने के लिए उन्हें अपने कारखाने में काम देकर सरकार को भ्रम में रखता है कि मुझे इन मजदूरों की ज़रूरत है, इन्हें ना मारा जाय। इसके लिए वह हिटलर के सैनिकों को बार-बार रिश्वत भी देता है तथा दिखावे के लिए दूसरी कंपनियों के उत्पाद खरीदता है। अंतत: वह  दिवालिया हो जाता है। इन बचाए गये लोगों के वंशज आज भी खुद को ‘शिंडलर ज्युज़’ कहते हैं। 

इसी तरह कश्मीर में भी हुआ था। जब वहां अलगाववादी गुटों ने कश्मीरी पंडितों के साथ बुरा व्यवहार किया तब अनेक कश्मीरी मुसलमानों ने कश्मीरी पंडितों का खुलकर साथ भी दिया। आपको ऐसी अनेक कहानियां वहां से निकले हुए पंडित सुनायेंगे। बीबीसी वेबसाइट पर कश्मीरी पंडित रोशन लाल मावा की आपबीती में भी उन्होंने बताया है कि मुसलमान पड़ोसियों ने उनकी किस तरह मदद की। 

मैं खुद जम्मू में रहने वाले आईडी खजूरिया जो कि खुद कश्मीरी पंडित हैं, तथा कश्मीरी फौजी अफसर के बेटे फिल्म निर्माता संजय काक से इस बारे में बातचीत कर चूका हूं तथा मैंने जम्मू जाकर वहां के हिन्दुओं और सिक्खों से बात की है। कश्मीर टाइम्स के संपादक वेद भसीन तथा अनुराधा भसीन से भी इस बारे में मेरी बात हो चुकी है। वे सब भी इस पूरे मसले को बेहद संतुलित ढंग से देखते हैं। कोई भी वहां के आम मुसलमान को इन सबके लिए जिम्मेदार नहीं मानता। 

इस मुद्दे पर बात करते समय फिल्मकार संजय काक का कहना है कि जिस दौर में करीब दो लाख कश्मीरी पंडितों ने घाटी छोड़ी, उसी दौर में इतने ही मुसलमानों ने भी घाटी छोड़ी है| हिंसा का शिकार वो मुसलमान भी बन रहे थे जो इन अलगाववादियों की बात नहीं मान रहे थे। अनेक मुसलमान राजनैतिक और धार्मिक नेता भी मारे गये थे। 

संजय काक ने यह भी बताया कि असल में भाजपा अब कश्मीर को नया अयोध्या बनाना चाहती है। भाजपा और संघ ने अयोध्या के नाम पर 1948 से ही अपनी हिंदुत्व की राजनीति को खड़ा करना शरू कर दिया था। लेकिन अयोध्या में राम मंदिर के शिलन्यास के साथ ही उस राजनैतिक प्रतीक का काम अब खत्म हो गया है। अब अगले चुनाव में अयोध्या के नाम पर वोट नहीं मांगे जा सकते। इसलिए अब भाजपा को ऐसा मुद्दा चाहिए, जिसके आधार पर 2024 में अगला चुनाव लड़ा जा सके।इसलिए भाजपा अब कश्मीर के पंडितों के ऊपर अत्याचार की कहानियों को तोड़ मरोड़ कर पेश करके हिन्दुओं के मन में देश भर में फैले हुए मुसलमानों के खिलाफ नफरत फैला कर अपनी हिंदुत्व की राजनाति को और ज्यादा मज़बूत करना चाहती है।  

भाजपा का मकसद भले ही चुनाव जीतना हो, जिसके लिए वह इतने पर ही नहीं रुक जाएगी। देखना यह भी होगा कि भाजपा अब इसके बाद क्या करेगी। जहां तक आरएसएस और भाजपा की अभी तक की कार्यप्रणाली रही है, वह इस मुद्दे पर हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच और भी ज़्यादा नफरत भड़कायेगी। इसके परिणामस्वरूप देश में हिन्दू मुस्लिम दंगे भड़काए जायेंगे। देश में पहले से खराब हो चुकी अर्थव्यवस्था और भी ज्यादा खराब होगी। इसका सबसे ज्यादा बुरा खामियाजा पहले से बर्बादी झेल रहा गरीब तबका भुगतेगा।

काक के मुताबिक, भाजपा को इसका फायदा यह होगा कि हर मोर्चे पर फेल हो चुकी उसकी सरकार से कोई भी रोज़गार शिक्षा या कानून व्यवस्था से जुड़े हुए किसी मुद्दे पर कोई सवाल नहीं पूछेगा। बल्कि ज़्यादातर लोग इस सांप्रदायिक माहौल में अधिक कट्टर बनकर हिंदुत्व के मुद्दे पर भाजपा को सत्ता में बैठा देंगे। और यही भाजपा की असली योजना है। 

इन सबसे भाजपा को चुनावी फायदा ज़रूर मिलेगा। लेकिन खतरा यह है कि भारत हिंसा के एक नए दौर में प्रवेश कर सकता है। अन्तर्राष्ट्रीय परिस्थितयां देखी जाएं तो दक्षिणी एशिया के इस हिस्से को अपना अड्डा बनाने के लिए अनेक अन्तर्राष्ट्रीय ताकतें ताक में बैठी हैं। कहीं ऐसा न हो कि भारत में मानवधिकार की हालत इतनी खराब हो जाय कि कोई विदेशी ताकत यहां मानवाधिकार बचाने के नाम पर घुस जाय और भारत अपनी आज़ादी और संप्रभुता ही गंवा दे। हम अपने आसपास ही ऐसा होते हुए और अफगानिस्तान जैसे मुल्कों को बर्बाद होते हुए देख चुके हैं।

(संपादन : नवल/अनिल)


फारवर्ड प्रेस वेब पोर्टल के अतिरिक्‍त बहुजन मुद्दों की पुस्‍तकों का प्रकाशक भी है। एफपी बुक्‍स के नाम से जारी होने वाली ये किताबें बहुजन (दलित, ओबीसी, आदिवासी, घुमंतु, पसमांदा समुदाय) तबकों के साहित्‍य, सस्‍क‍ृति व सामाजिक-राजनीति की व्‍यापक समस्‍याओं के साथ-साथ इसके सूक्ष्म पहलुओं को भी गहराई से उजागर करती हैं। एफपी बुक्‍स की सूची जानने अथवा किताबें मंगवाने के लिए संपर्क करें। मोबाइल : +917827427311, ईमेल : info@forwardmagazine.in

फारवर्ड प्रेस की किताबें किंडल पर प्रिंट की तुलना में सस्ते दामों पर उपलब्ध हैं। कृपया इन लिंकों पर देखें 

मिस कैथरीन मेयो की बहुचर्चित कृति : मदर इंडिया

बहुजन साहित्य की प्रस्तावना 

दलित पैंथर्स : एन ऑथरेटिव हिस्ट्री : लेखक : जेवी पवार 

महिषासुर एक जननायक’

महिषासुर : मिथक व परंपराए

जाति के प्रश्न पर कबी

चिंतन के जन सरोकार

About The Author

Reply